ज़ात नहीं बदली जाती
जपान और चीन के बाद भारत एशिया की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था है. लेकिन राजस्व रिकॉर्ड देखा जाए तो भारत की एक अरब 28 करोड़ की आबादी में से केवल तीन करोड़ 15 लाख लोग टैक्स देते हैं और उन में से 80 हज़ार लोग ऐसे हैं जिन की घोषित वार्षिक आय साढ़े दस लाख रुपये (22,600 अमरीकी डॉलर) है. मगर स्विस बैंकों सहित दुनिया की साठ से अधिक टैक्स बचाव/ छिपाओ संस्थाओं के ख़ुफिया खातों में चीनियों के केवल 9600 करोड़ डॉलर जमा हैं. जबकि इन ख़ुफिया खातों में भारतीयों के 15 हज़ार करोड़ डॉलर के लगभग जमा हैं.
आसान हिंदी में इस का अर्थ यह है कि दुनिया में काले धन का हर 11वाँ डॉलर किसी न किसी भारतीय के ख़ुफिया खाते में जमा है. अगर इस रक़म को भारत के 45 करोड़ इंतिहाई ग़रीब लोगों को बांट दिया जाए तो हर एक को लाख लाख रुपए मिल सकते हैं.
अब से तीन साल पहले स्विस बैंकर्स एसोसिएशन ने प्रस्ताव दिया था कि अगर भारत सरकार अनुरोध करे तो वह स्विस बैंकों के खातों की जानकारी दे सकती है. लेकिन आज तीन साल बाद भी सरकार "करते हैं, देखते हैं, सोचते हैं, बताते हैं," कर रही है.
पी चिदंबरम हों या प्रणव मुखर्जी या एस एम कृष्णा. सब हैरान हैं कि नक्सली इतने आपे से बाहर क्यों हो रहे हैं. कोई इस पर हैरान नहीं है कि दुनिया में मौजूद साढ़े गयारह खरब डॉलर में से डेढ़ खरब डॉलर के मालिक कुछ हज़ार भारतीय कैसे हैं और इतना बड़ा ख़ुफिया धन भारत से बाहर रखने में कैसे कामयाब हैं.
अब आप सोचेंगे कि पाकिस्तान का क्या हाल है. तो भाई पाकिस्तान का हाल इस क़ाबिल नहीं कि बताया जा सके. बस यूँ समझ लें कि 18 करोड़ की जनसंख्या में केवल 22 लाख कंपनियाँ और नागरिक टैक्स देते हैं. पिछले साल सब से ज़्यादा टैक्स एक बैंकर फारूक़ बंगाली ने ग्यारह करोड़ रुपए की घोषित आय पर दिया. नवाज़ शरीफ हर साल करीब बीस हज़ार रुपए और आसिफ ज़रदारी लगभग पच्चीस हज़ार रुपए टैक्स देते हैं. बाक़ी आप ख़ुद समझदार हैं.
मैं यह सारा राग यह ख़बर सुन कर अलापने पर विवश हुआ हूँ कि जर्मनी के 44 सबसे अमीर लोगों ने सरकार से अनुरोध किया है कि देश चूँकि आर्थिक संकट से जूझ रहा है, इसलिए हम जैसे 22 लाख अमीरों पर कि जिन में से हर एक के पास पांच लाख यूरो से ज़्यादा जमा हैं, सरकार पांच प्रतिशत ज़्यादा टैक्स लगा कर एक सौ अरब यूरो जमा कर अमीर और ग़रीब का फर्क़ कम कर सकती है.
देखा आप ने! जर्मनी जैसे खाते पीते बेफि़क्रे देश कभी भी हम जैसे ग़रीब देशों पर व्यंग्य करने से बाज़ नहीं आते.
वह जो कहते हैं कि पैसा आने से ज़ात नहीं बदलती. कमीना कमीना ही रहता है.

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टैक्स चोरी को स्विट्जरलैंड में अपराध की कैटिगरी में नहीं रखा जाता है. यही कारण है कि पिछले तीन सौ सालों से स्विस बैंक अपने खातेदारों की जानकारी हर तरीके से गोपनीय रखते आ रहे हैं. हालांकि भारतीयों द्वारा स्विस बैंकों में जमा कराए गए धन के बारे में कोई विवरण उपलब्ध नहीं है, लेकिन जून के अंत तक विदेशी नागरिकों द्वारा स्विस बैंकों में कुल जमा रकम 1,00,00,000 करोड़ रुपये है.
खान साहब जिस मुद्दे का उल्लेख आपने किया है उसके लिए भारत के नेता और पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी जिम्मेदार हैं. और कुछ हद तक दोनों देशो की जनता भी जिम्मेदार है. जिस देश की जनता 100 रुपए लेकर वोट बेच सकती है उस देश के साथ ऐसा ही हो सकता है और इससे अच्छे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है.
वैसे अगर देखा जाए तो वुसतुल्लाह साहब जर्मनी की सरकार और हमारी सरकार में काफ़ी फर्क है. रही बात स्विस बैंक के एकांउट की तो सब राजनीति पार्टियाँ मिलीभगत से चुप बैठी है. इनके लिए चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत सटीक है. यदि कर प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाया जाए तो भारत में कर वसूली कहीं ज्यादा होगी. यदि भारत सरकार स्विस खाते की जाँच करवाए तो देश को किसी और के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं रहेगी.
ये तो हर देश में होता है, टैक्स चोरी करने में छोटे से लेकर बडा माहिर होता जा रह है. लोग ये सोचते हैं की किस तरकीब से पैसे बचाए जाये. और आप भारत की तुलना पाकिस्तान से नहीं कर सकते हैं, पकिस्तान भारत की किसी भी तरह से होड़ नहीं कर सकता.
जिस देश में ज़रदारी और नवाज़ शरीफ़ इतना टैक्स देते हों उसका तो मालिक ही हाफ़िज़ हैं.भारत का भी यही हाल है नेताओं से मिलकर देश को चूना लगाओ.
अच्छा है काले धन के बारे में इसी तरह लोगों को रुबरु कराते रहें. आपको नहीं लगता कि इसे छिपाने वाले लोगों को भी सामने लाया जाना चाहिए.खैर बैंक खातों का खुलासा होते ही वो भी पता लग जाएगा. मुझे तो लगता है मेरे देश के नेताओं के पास सबसे अधिक काला धन है.
अच्छा है काले धन के बारे में इस तरह लोगों को रूबरू कराना. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इस काले धन को छिपाए सफ़ेदपोश लोगों को भी सामने लाना चाहिए. ख़ैर वे तो शायद कभी स्विस बैंकों के ख़ुलासे के बाद सामने आ ही जाएगा. मेरा तो अपने देश के इन सफ़ेदपोशों के बारे में मानना है कि उनके पास काला धन बहुत होगा.
भारत-पाकिस्तान के लोगों की जर्मनी के लोगों के साथ यह तुलना अच्छी लगी.
ख़ान साहब, बहुत अच्छी जानकारी बीबीसी श्रोताओं को दी आपने इस लेख के ज़रिए. लेकिन वह दिन कभी नहीं आ सकता है जब इन खातों से पैसा वापस मुल्क में लाकर ग़रीबों को तक़सीम किया जाए. क्योंकि यह सब करने वाले मुल्क के बेईमान नेता और अधिकारी हैं और वे अपना पैसा कभी वापस नहीं लाएँगे. अगर ईमानदारी से अदालत चाहे तो वह ज़रूर इस पैसे का हिसाब ले सकती है. लेकिन जब बाड़ ही खेत को खाएगी तो खेत का क्या होगा.
दरअसल बेईमानी हमारी फितरत है. आइनए अवध (1869)में लगभग 12 सौ साल पहले की एक रिपोर्ट का हवाला है, जो अरब खलीफा की भेजी हुई टीम ने लिखी थी. लिखा है कि भारत के लोग आम तौर से बेईमान हैं, बिला वजह झूठ बोलते हैं, समझौते तोड़ने वाले हैं, इस लिए यहाँ कोई मुहिम चलाना ठीक नहीं है. केवल जब अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन था उस समय भ्रष्टाचार कम था और उस आन्दोलन की आग में तपे अधिकतर लोग अच्छे और ईमानदर थे. नस्ल बदली और हम अपने पुराने चरित्र पर आ गए.
ठीक ही कहा वुसतुल्लाह भाई ने ज़ात नहीं बदलती. कमीना कमीना ही रहता है.
हम सब जानते हैं कि स्विस बैंकों में हमारे मुल्कों का काला दन रखा हुआ है. आपने ऐसी सरल भाषा में ये सब लिखा है कि लगता है ये पहली बार बताया जा रहा है. लिखते रहिए आप अच्छा लिखते हैं.
खान साहब सलाम
यदि मुझसे सरकार तनख्वाह पर 15-20 प्रतिशत टैक्स ले और कोई रियायत न दे तो मैं खुश हूं सरकार पच्चीस रियायत देती है इसका मतलब है मेरे पास चोरी करने के पच्चीस रास्ते हैं. मैं 35 प्रतिशत टैक्स देता हूं जबकि मेरे पास वाला पांच प्रतिशत. सरकार को एक समान टैक्स नीति बनानी चाहिए.
भारत और पाकिस्तान की बात ही क्या करना. सबको पता है. लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि स्विटज़रलैड में नंबर दो का पैसा रखा कैसे जाता है. सभी देशों को स्विटज़रलैंड पर हमला करके उसे लूट लेना चाहिए.
स्विटज़रलैंड तो लगता है कि रावण की लंका है...
यह पोस्ट पढ़ कर मेरे ज्ञान में बहुत इज़ाफा हुआ है और इसे मैंने सेव कर लिया है। वैसे आपने आंकड़ें बहुत हैरतअंगेज़ एवं चौंकाने वाले पाठकों के समक्ष रखे हैं --इसलिये पाठक संभवतः बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।
ख़ान साहब आपने जर्मन लोगों से अपनी या हमारी तुलना करके ठीक नहीं किया. शायद आपको पता नहीं है कि जर्मन जितना गंदे रहते हैं, उतना शायद ही किसी देश के लोग रहते हों. उन्हें नहाने से चिढ़ है और हम बिना नहाए नहीं रह सकते हैं. यही उनकी बचत का बड़ा कारण है और हमारे खर्चे का. रही बात स्विट्ज़रलैंड की तो वह भी बहुत चालाक देश है. वह बिना किसी सेना के दुनिया भर का पैसा जमाकर मजे कर रहा है. जबकि हम सेना पर भारी खर्च किए जा रहे हैं. यह न आप समझ रहे हैं न हम और न दुनिया समझ पा रही है.
यह दीमाग का खेल है जो वह खेल रहे है और हम नहीं खेल पा रहे हैं.
बहुत अच्छी जानकारी है मगर क्या करें इन पैसे के भूखे सौदागरों पर नकेल कैसे कसी जाये कोई नहीं जानता। धन्यवाद.
- ''मुफलिसों की भीड़ में दो-चार गिनती के खुदा,
बोलते हैं आसमां से हर्जाना कोई नहीं।''
वुसत जी, एक बार दुनिया भर के मेंढकों के बीच कॉम्पिटीशन होता है कि एक जार में एक देश के दस मेंढक रखे जाएंगे, जो भी सबसे बाद में जार से बाहर निकलेगा, उसे गोल्ड मैडल दिया जाएगा। सभी देशों के मेंढक एक-एक करके जार से बाहर हो जाते हैं, सिर्फ भारत और पाकिस्तान के सभी मेंढक उसी जार में पड़े रहते हैं, जहां से कॉम्पटीशन शुरू हुआ था।
आखिरकार इन दोंनो को ही गोल्ड मैडल देना पड़ा। जब हम जैसे लोगों ने जाकर इस जबरदस्त नुमाईश का इंटरव्यूह लिया तो भारतीय मेंढकों ने बताया कि वे जार से ऊपर जाने की कोशिश तो करते रहे, लेकिन नीचे के मेंढक उनकी टांग खींचकर उन्हें नीचे गिरा देते थे। इसी प्रकार जब पाकिस्तान के मेंढकों से बात की तो कप्तान ने कहा कि हम सब तो गहरी नींद में आ गए थे, आगे क्या खाक बढ़ते?
मेरे विचार से वर्तमान कर प्रणाली कर जमा करने के लिए बेहतर नहीं है. इसे बंद कर सरकार को सभी लोगों पर एक समान कर लगा देना चाहिए.
जितने भी अंग्रेज़ी भाषी या गोरे लोगों का देश हैं, वे चाहे कुछ भी करें इसके लिए जल्दी कोई हिंदी, उर्दू या अरबीभाषी आवाज़ नहीं उठा पाता है. अगर उठाएगा भी तो यही कहेगा कि वह बढ़िया काम कर रहा है. अब रही बात स्वीट्ज़रलैंड की तो यह भी उनसे ही जुड़ा हुआ है.
ख़ान साहब सलाम, रामायण में कहा गया है कि ' समरथ के नहीं दोष गोंसाईं'. भारत में बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का सामाजीकरण हुआ है. यहाँ शायद ही कोई क़ानून काम करता हो. सामाजिक न्याय प्रणाली भ्रष्ट हो चुकी है. यहाँ कर केवल नौकरीपेशा लोगों पर ही लगाया जाता है बाकी लोग मजे करते हैं. एक नागरिक के रूप में हम शायह ही अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करते हैं. हम भारतीय इस उम्मीद में हैं कि बाहरी लोग देश का ध्यान रखेंगे.
आप को पता है सर कि देश में कितने लोग टैक्स बचाने के लिये तरह तरह के जुगत लगाते है औ जो लोग टैक्स बचाने के लिये जुगत लगाते है वो लोग जानते है कि टैक्स से हमारे देश का कुछ नहीं होने वाला क्योंकि वही पैसा देश के सभी नेताओं और छुटभैय्यों की जेब में जायेगा या मुर्तियों पर खर्च किया जायेगा,देश के विकास में नहीं लगना है उसे, दूसरी बात टैक्स देने वाले ये भी करते है कि अगर पांच लाख पर टैक्स देना है तो अपनी आमदनी तीन लाख ही दो लाख के आसपास ही बताते है ताकि टैक्स कम देना पड़े क्योंकि वो जानते है कि अगर वो दस रुपये टैक्स के नाम पर देंगे तो सिर्फ एक रुपये ही देश के काम आना और बाकी पैसा स्विट्जरलैड जाना है जमा होने
खान साहब आपके दिए जानकारी और आंकड़े तो सही हैं .... लेकिन आज तीन साल बाद भी सरकार "करते हैं, देखते हैं, सोचते हैं, बताते हैं," कर रही है | 30 साल बाद भी यही स्थिति रहेगी | नेता तो जैसे हैं सो हैं ... हमारी जनता .... महंगाई से त्रस्त है .... फिर भी एक बोतल दारु लेकर वोट उसी को देंगे.
ख़ान साहब, एक बुनियादी फ़र्क जो आप भूल रहे हैं वह यह कि आपके देश में जनता द्बारा अदा किया गया और चोरी किया गया, दोनों ही टैक्स का कुछ हिस्सा भारत के खिलाफ आतंकवाद के पोषण में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि हमारे यहाँ ऐसा नहीं है.