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जाम में माया ध्यान!

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|बुधवार, 28 अक्तूबर 2009, 19:14 IST

अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के अमरोहा और मेरठ में छुट्टियाँ बिताने के दौरान सरकारी बस से कहीं जाना हुआ और रास्ते में ट्रैफ़िक जाम मिला तो दो घंटे का रास्ता सात घंटे में तय हुआ. जाम के दौरान कुछ और करने को था नहीं इसलिए दिमाग़ के घोड़े दौड़ने लगे - आसपास के माहौल, राजनीतिक स्थिति और लोगों के बीच जिन बातों की चर्चा हो रही थी, उन्हीं विषयों पर..

उन्हीं दिनों ख़बर गरम थी कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री लोगों को सलाह देती फिर रही थीं कि उनकी ख़ुद की प्रतिमाओं पर अरबों रुपए भले ही ख़र्च हो रहे हैं लेकिन उनसे आख़िरकार आम लोगों ख़ासकर दलितों को फ़ायदा होगा क्योंकि वे उन पार्कों में आकर चैन और फ़ुरसत के कुछ लम्हे गुज़ार सकते हैं. भारत में ट्रैफ़िक जाम के कारण समय और काम के नुकसान के बारे में शायद ही कोई सोचता है

मैं उस जाम के दौरान यही सोचता रहा कि जिन लोगों को खाने के लाले पड़े रहते हैं, जिनके स्वास्थ्य की कोई क़ीमत नहीं, जिनके बच्चों को शिक्षा मिलना अब भी एक ख़्बाव बना हुआ है, उन्हें अरबों रुपए की लागत से बनने वाली मायावती और काँशीराम की प्रतिमाएँ किस तरह और कितना फ़ायदा पहुँचाएंगी?

एक सवाल ये भी कौंधा कि अगर दलितों या आम लोगों को ये प्रतिमाएँ देखने जाना भी होगा तो क्या उन्हें हेलीकॉप्टर मिलेगा? वो जाएंगे तो सड़क के ज़रिए ही लेकिन अगर दो घंटे का रास्ता सात या आठ घंटे में तय होगा तो उनका पेट कैसे भरेगा. इस सवाल का जवाब तो मायावती ही दे सकती हैं. बहरहाल, बस में बैठे लोग बेहाल थे, किसी की ख़ुद की तबीयत ख़राब हो रही थी तो किसी को दवाई लेकर जल्दी घर पहुँचना था.

किसी बच्चे की किलकारी और चीख़ से मेरा ध्यान टूटता लेकिन बस में सिर्फ़ सोचते रहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था. मैं सोचने लगा कि शेरशाह सूरी ने सदियों पहले जब हज़ारों मील लंबा ग्रांट ट्रंक रोड बनवाया था तो उसे क्यों नहीं ख़याल आया कि हर एक मील के फ़ासले पर वो भी अपनी प्रतिमाएँ बनवाता जिससे उस सड़क से गुज़रने वाले लोग उसे हर पल याद करते. पर उसे तो लोग और इतिहास मूर्तियों की वजह से नहीं, सड़क की वजह से याद करते हैं.

मैंने उस जाम में इस उम्मीद के साथ माया (मायावती) ध्यान करने की कोशिश की कि हो सकता है इससे सड़कों और लोगों की हालत अच्छी होने में कुछ मदद मिल सके. बहुत से अन्य लोगों की ही तरह मैं भी उस दिन के इंतज़ार में हूँ जब कोई काला बंदर या स्पाइडरमैन आकर कोई करिश्मा करेगा क्योंकि आम लोगों ने तो सब कुछ, पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं पर छोड़ दिया है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:00 IST, 29 अक्तूबर 2009 Saagar:

    वल्लाह! मायावती जी सुन रही हैं क्या ? खैर छोड़िए. सुन कर तो लोग सतयुग में सुधरते थे. इतना आशावादी होना भी ठीक नहीं.अब सड़कें मज़बूरी में बनती हैं. मूर्तियाँ शौक से. इतना तो उनको पता ही होगा की कोई मूर्तिकार उनके लिए औजार नहीं उठाएंगे. तो ख़ुद से ही यह निर्माण कार्य का ज़िम्मा ले लिया. आपको तो दाद देनी चाहिए कि वे कला, इतिहास के पन्नों बचा रही हैं.

  • 2. 12:49 IST, 29 अक्तूबर 2009 Ravi Shankar Tiwari:

    उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है. सवाल उठता है कि बार-बार जातिवादी, पुरुषवादी और धार्मिक विग्रह में फंस कर उत्तर प्रदेश अपने विकास का मार्ग क्यों अवरुद्ध करता है? स्पष्ट है कि प्रदेश अपनी संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हुआ है और बिना वैसा हुए उसके विकास का मार्ग प्रशस्त होता नहीं दिखता. मायावती जी , आपके इस व्यवहार से देश का आम आदमी आहत है !

  • 3. 13:32 IST, 29 अक्तूबर 2009 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":


    महबूब ख़ान साहब आपने उत्तर प्रदेश में एक बार बस से सफ़र कर लिया तो आपको सड़क के रास्ते चलने वालों के बारे में थोड़ा सा ज्ञान हो गया. यही बात हमारे मुल्क के नेताओ को समझाने की है कि आज के दौर में हर व्यक्ति उनकी तरह हवाई जहाज़ य अपनी लग्जरी गाड़ियों में नहीं बल्कि सड़क पर चलने वाले छोटे-छोटे वाहनों का सहारा लेता है. इसलिए नेताओं और वीआईपी को आम सड़क पर चलने वाले इंसान की तकलीफ़ कैसे पता चल सकती है. जहाँ तक रही बात बहन मायवती की बात तो उनको लगता है कि पता नहीं आने वाले समय में उनको यह सब करने का मौक़ा मिलेगा या नहीं. इसलिए जितना हो सके अपनी और कांशीराम की मूर्तियाँ लगवाकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कर वालें. लेकिन इसके उलट उन्हें ग़रीबों की परेशानियों की कोई सुध नहीं है वरना अगर इतना पैसा ग़रीबों के कल्याण में लगता तो वाकई ग़रीबों का कुछ उद्धार होता. आने वाली पीढ़ी इन लोगों को अच्छे इंसान के रूप में याद नहीं करेगी.

  • 4. 14:27 IST, 29 अक्तूबर 2009 Anand Yadavendu:

    महबूब ख़ान जी, अच्छी शासन प्रणाली नियमों के कारण नहीं बल्कि अच्छी नियत के काऱण होती है. लोकतंत्र में ज़रूरी है कि सभी को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हो. अगर 20-30 फ़ीसदी लोग अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से करते हैं तो पूरा तंत्र बदल सकता है. एक आम आदमी को अपनी ज़िंदगी में हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वह जैसी दुनिया चाहता है उसके लिए वह क्या कर रहा है? इसके लिए काले बंदर या स्पाइडर मैन की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए.

  • 5. 15:05 IST, 29 अक्तूबर 2009 bijay prakash tripathi:

    महबूब जी, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद की आपने सरकारी बस का प्रयोग अपनी यात्रा के लिए किया और कम से कम आपको यह बात पता तो चली कि मायाराज में उस राज्य का क्या हाल है. मै मानता हूँ कि मायावती सरकारी पैसों का ग़लत इस्तेमाल कर रही हैं लेकिन यह अधिकार उनको उसी राज्य की जनता ने दिया है. अब जब कोई ख़ुद से ही यह चाह रहा हो कि उनके बच्चे निरक्षर और बेकार रहें, घर में लोग दवा से तड़प कर मर जाएं, मस्तिस्क ज्वर से हज़ारों मासूम बेमौत दम तोड़ते रहें, शिक्षा के नाम पर विश्वविद्यालय और कॉलेज मछली बाज़ार बन जाएं, और भूख और बेकारी के नाते लोग अपनों के ही दुश्मन बन जाएं तो इसमें मायावती का क्या कसूर है. इस राज्य के लोग एकदम भ्रष्ट और बेईमान हो गए हैं इसलिए उन्हें ऐसे ही नेता की ज़रूरत है. आप देखिएगा अगले चुनाव में फिर से वही जनता इन्हीं लोगों में से किसी को चुन कर ले आएगी. आज इस राज्य में सभी एक जैसे हो गए है, मुलायम के राज से आजिज़ आकर जनता ने मायावती को सत्ता की जाबी सौंपी जबकि उसे अच्छी तरह पता था कि मायावती उस राज्य का कभी भला नहीं कर सकती. जब तक उस राज्य की जनता अपने लालच, बेईमानी और धोखेबाज़ी से अपने को अलग नहीं करती तब तक वह ऐसे ही नेताओ के चंगुल में फँसी रहेगी. जनता को अपनी लगाई हुई बीमारी का इलाज भी ख़ुद ही करना पड़ेगा. अब देखना है कि कब उसे याद और हिम्मत आती है इस काम के लिए.

  • 6. 15:36 IST, 29 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    महबूब साहब, आपने सिर्फ़ उत्तर प्रदेश तक ही अपने की सीमित क्यों रखा, क्या पूरे भारत के लोगों को खाना, दवा, पानी या अन्य सुविधाएँ मिल रही हैं. रहा सवाल उत्तर प्रदेश में मायावती की मूर्तियों का तो आप और हम तो नहीं देखेंगे लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी इन मूर्तियों की आलोचना करेंगी. रहा सवाल ग़रीबी का तो उत्तर प्रदेश क्या कोई और भी राज्य ग़रीबों के साथ है. ग़रीब का हक़ देश के नेता और अधिकारी दोनों हाथों से लूट रहे हैं और लूटते रहेंगे. इसका कोई भी इलाज़ नहीं है. फिर मायावती का नाम तो माया है वे पैसों और झाड़ू दोनों से जनता पर माया कर सकती है.

  • 7. 17:16 IST, 29 अक्तूबर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    माया महाठगनी, हम जानी.

  • 8. 18:00 IST, 29 अक्तूबर 2009 Indrajeet Jha, Delhi University. :

    माफ़ करेंगे महबूब जी, लेकिन सारी समस्याओं के लिए केवल मायावती को ही दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा. सवाल यह है की आज तक जो सरकार रही उसी ने आम लोगों के लिए क्या किया है. रही बात मूर्तियों की तो जिसके पास सत्ता होती है वो इसका उसी तरह फायदा उठाती है चाहे वो मायावती हो या सोनिया या कोई और. अब देखिये न, हमें नहीं लगता कि भारतीय राजनीति में संजय गाँधी का कोई ऐसा योगदान है लेकिन उनके नाम पर कई चीज़ें मिल जाएँगी. पिछले दिनों मुंबई में ब्रिज का उदघाटन हुआ तो उसका भी नाम राजीव गाँधी के नाम पर रख दिया गया. देश में इतने विद्वान और इतने वैज्ञानिक हैं, उनके नाम पर इन चीजो का नामकरण क्यों नहीं होता. तो कुल मिलाकर सत्ता में रहने वाले लोग इस तरह से अपने फायदे के लिए काम करते ही हैं. और इसीलिए मायावती का यह कार्य काफी हद तक पहचान की राजनीति से भी जुडा है. फिर भी ऊत्तर प्रदेश में ग़रीबी की जो हालत है उसमें मायावती के इन कृत्यों की प्रशंसा नहीं की जा सकती. लेकिन इसके लिए केवल मायावती को दोष देना भी ठीक नहीं होगा.

  • 9. 18:59 IST, 29 अक्तूबर 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    महबूब जी, आपने आज के समय की ज्वलंत समस्या को उठाया है, उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के हर बड़े महानगर में यही स्थिति है. वाहन इतने सारे हो गए हैं की पैर रखने को जगह नहीं मिल पाती है. और अगर आप ज़रूरी काम से जा रहे हो जैसे की मरीज़ को हॉस्पिटल ले जा रहे हो, ट्रेन पकड़नी हो या और कुछ तो सबसे ज्यादा गुस्सा आपको सरकार पर आएगा, मान लीजिये की सारा दोष सरकार का है. तो सरकार से कम दोषी हम भी नहीं है, आप देखेंगे की जहा नो पार्किंग का बोर्ड लगा होता है वह पर लोग पार्किंग करते है, हमारे यहाँ घोड़ा गाड़ी, बैल गाड़ी, साइकिल, कार, ट्रक सब एक साथ एक ही सड़क पर चलते है तो प्रॉब्लम तो होगी ना. रही बात मायावती जी की तो आप ही बताये की मायावती जी की "माया" को कौन समाज पाया है..? जो धन मूर्तियाँ बनाने में लगाया जा रहा है, अगर वो ही पैसा आम जनता की सुविधा के लिए ख़र्च किया जाता जो लोग मायावती जी को आजीवन याद करते कि उन्होंने जनता के लिए कुछ "ख़ास" किया. लेकिन आप और हम तो क्या हमारी आनेवाली पीढियां भी मायावती जी को इस काम के लिए कोसेगी. अगर मूर्तियों से ही लोगों की मुश्किल हल हो जाए तो क्या बात है, फिर तो हर जगह हमें राजनेताओं की मूर्तियाँ नज़र आएगी और सारा देश "मूर्तिमय" हो जायेगा. हम तो एक ही बात जानते हैं कि आदमी अपने कर्मों से पूजा जाता है, मूर्तियाँ बनाने से नहीं "मायावती जी" और महबूब जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने इतना अच्छा मुद्दा उठाया.

  • 10. 19:36 IST, 29 अक्तूबर 2009 Rakesh Sohal:

    ये जो कौतूहल मच रहा है मूर्तियों का वो इस कारण है कि मायावती ने ख़ुद की मूर्तियाँ लगवा दी हैं. पर क्या केवल मायावती ही की मूर्तियाँ लगवाई गई हैं, ये भी जाने लेने वाली बात है. काँशीराम की मूर्तियाँ और फिर दूसरे दलित नेताओं जैसे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, महाराजा ज्योतिराव फुले की मूर्तियाँ भी लगवाई गई हैं. ये सारी मूर्तियाँ लगवाने का मुख्य उद्देश्य क्या हो सकता है, किसी ने कभी सोचा है. मुझे तो लगता है कि सब कुछ मालूम होते हुए भी मूर्तियों के बारे मं केवल इसलिए हंगामा मचा रखा है क्योंकि ये दलित नेताओं की मूर्तियाँ हैं. मूर्तियाँ और स्मारक बनवाने का मुख्य उद्देश्य है इस भारतीय समाज में अपनी जड़ों को याद रखना जिस समाज ने उनका नाम कभी भी प्रसिद्ध नहीं होने दिया. आज कोई भी दलित जब उत्तर प्रदेश में जाएगा तो ये देखकर गौर्वान्वित महसूस करेगा कि मायावती ने उन सभी दलित नेताओं का नाम जनता में परिचित कराया जोकि भारतीय इतिहास के पन्नों में कहीं नहीं थे. मूर्तियों पर सवाल खड़े करने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने ये मालूम करने की कोशिश की कि मायावती ने ग़रीबों की स्थिति सुधारने के लिए क्या-क्या क़दम उठाए हैं. क्योंकि मीडिया जानबूझकर ऐसी जानकारी नहीं देता इसी कारण आम आदमी (उत्तर प्रदेश से बाहर) को ये जानकारी मिल ही नहीं पाती है. और ये भी एक कारण है क्योंकि बीएसपी दूसरे राज्यों में अपनी सरकार नहीं बना पा रही है. ये सब देखकर तो यही लगता है कि मीडिया भी जातियों में बँटा है. नहीं तो क्यों नहीं मीडिया ये बताता कि मायावती ने ग़रीबों के हित में क्या-क्या किया है?

  • 11. 20:08 IST, 29 अक्तूबर 2009 Mahendra Singh, Philadelphia, USA:

    मैं राकेश सोहल जी की बातों से सहमत हूँ. महबूब ख़ान साहब ने बहुत ही वाजिब सवाल उठाया है और ये सच्चाई है कि ग़रीब दलितों का पैसा मायावती की मूर्तियाँ बनाने में व्यर्थ हुआ है. राकेश जी, पसे सिर्फ़ इतना ही कहना है कि मूर्तियों के ख़िलाफ़ कोई नहीं है, लेकिन मायावती को ऐसा कोई काम करना चाहिए कि लोग उनकी मूर्तियाँ ख़ुद बनवाएँ, जैसेकि डॉक्टर अंबेडकर की मूर्तियाँ आज पूरे देश में हैं. और एक बात ग़ौर करने लायक है कि डॉक्टर अंबेडकर ने कभी भी अपनी कोई मूर्ति नहीं लगवाई. ये तो उनकी प्रतिभा और योग्यता का लोहा मानने वालों ने पूरे देश में उनकी मूर्तियाँ लगवाई हैं. वैसे राकेश जी, एक जिज्ञासा ये है कि मायावती ने ऐसा कौन सा काम उत्तर प्रदेश के ग़रीबों के लिए किया है जो मीडिया ने अब तक लोगों को नहीं बताया या छिपाकर रखा है. कृपया आप ही हम लोगों को बताने की कृपा करें. मैं भी उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ और हर साल अपने देश और गाँव जाता हूँ लेकिन मुझे तो नहीं लगता कि मायावती जी ने दलितों के हित में कोई काम किया हो.

  • 12. 22:24 IST, 29 अक्तूबर 2009 Maharaj Baniya:

    सुश्री बहन मायावती जी को शरम आनी चाहिए कि लोग खुले आम उनकी बुराइयाँ करते फिर रहे हैं और वो बस पैसे जोड़ने में लगी हुई हैं. उनको ये कब समझ में आएगा कि एक लिमिट के बाद का पैसा ना तो वो खा सकती हैं और ना ही उसको मरने के बाद अपने साथ ले जा सकती हैं. ना ही उनकी शादी हुई है तो उनकी संतान को कोई इस पैसे से फ़ायदा होने वाला है. फिर ऐसा क्या कारण है जो उन्हें मूर्तियों के बहाने पैसा जोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है. रही बात रिटायरमेंट की तो उत्तर प्रदेश सरकार किसी पूर्व मुख्यमंत्री को सड़क पर नहीं छोड़ देती है. उनके लिए बहुत सारे भत्ते होते हैं और मेडिकल सेवाएँ मुफ़्त होती हैं. इतनी सारी सुविधाओं के बाद भी अगर बहन मायावती धन जोड़ने के बारे में ही सोचती रहती हैं और उन्हें प्रदेश और लोगों के विकास की कोई चिंता नहीं है तो वो भी कांग्रेस के ही ढर्रे पर चल रही हैं जिसमें लोगों की कोई चिंता नहीं की जाती बल्कि उनके वोटों की फिक्र की जाती है.

  • 13. 05:06 IST, 30 अक्तूबर 2009 raomrx:

    शर्म तो किसी को नहीं आती. ना ही कांग्रेस को जिसने देश के ऊपर 54 वर्ष तक राज किया है और फिर बोफ़ोर्स स्कैंडल किया. सभी लोग बेकार की बातों में उलझे हुए हैं. आप मुझे बताएँ कि दबे-कुचले लोगों के लिए किसने क्या किया है. इन लोगों के स्विस बैंकों में कोई खाते नहीं हैं. बहुत से राजनेताओं के स्विस बैंक में खाते मिल जाएंगे.

  • 14. 07:00 IST, 30 अक्तूबर 2009 Bansi Butta:

    माया ने अच्छे अच्छों को नहीं छोड़ा तो उल्टे प्रदेश की क्या बिसात है.

  • 15. 10:01 IST, 30 अक्तूबर 2009 akhilesh prasad:

    मैं भी महबूब ख़ान की बातों से सहमत हूँ। मायावती ने पूरी ज़िन्दगी में केवल दलितों के नामपर राजनीति ही की है. मुर्तियाँ लगा देने से क्या गरीबो को दो वक़्त की रोटी मिल पाएगी। मूर्तियाँ लगा देने से समाज में व्याप्त छुआछूत ख़त्म हो जाएगी तो, भारत सरकार को भी मूर्तियाँ लगाने का अभियान चलाना चाहिए.

  • 16. 14:59 IST, 30 अक्तूबर 2009 Ankur:

    जो इच्छा शक्ति माननीय मुख्यमंत्री जी ने मूर्तियाँ लगवाने में दिखाई, और जिस मनोयोग से अभी भी वे इस एकसूत्रीय कार्यक्रम में लगी हुई हैं, अगर यही दृढ़ता वे प्रदेश के उत्थान में लगाती, तो कोई शक नहीं की प्रदेश अद्वितीय तरक्की करता और निश्चय ही प्रदेश की जनता उनको सर आँखों पर बिठाती. पर शायद उनको इल्म नहीं की सत्ता की इस चार दिन की चांदनी के बाद अँधेरा भी हो सकता है. और उच्चतम न्यायालय तो पहले ही उनके मूर्ति प्रेम पर कुपित है. बाकी प्रदेश की जनता सिर्फ लखनऊ में नहीं रहती जो पार्कों और मूर्तियों से संतुष्ट हो जाए. उसे बुनियादी सुविधाएं (सड़क, बिजली, पानी) चाहिए. और इन सुविधाओं के नाम पर प्रदेश निश्चय ही फिसड्डी है.

  • 17. 15:06 IST, 30 अक्तूबर 2009 Rakesh Sohal:

    अब जब महेंद्र भाई ने पूछ ही लिया है तो मैं बताए देता हूँ कि बीएसपी सरकार ने ग़रीबों के लिए अब तक क्या किया है. यहाँ मैं कुछ चुनिंदा उपलब्धियाँ ही बताउंगा. साठ वर्षों का अनुसूचित जाति, जनजाति बैकलॉग पूरा किया है, एक लाख सफ़ाई कर्मचारियों की भर्ती, लगभग नव्वे हज़ार प्राईमरी अध्यापकों की भर्ती, कुख्यात ददुवा, राजा भैया और सुग्रीव, पहले की सरकारें जिनके चरण छूती थीं, उनका सुनियोजित सफ़ाया, भूमिहीनों को खेती के लायक भूमि आबंटन, बेगारों को घर (गाँवों और शहरों में), हज़ारों अवैध क़ब्ज़े हटाए गए, चार हज़ार तालाबों का निर्माण कराया गया. और आगे बहुत कुछ है जो कि बसपा सरकार ने दो वर्ष से कम अवधि में किया. आप इन सब क जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल कर सकते हैं.

  • 18. 19:19 IST, 30 अक्तूबर 2009 himmat singh bhati:

    पिछले चुनाव में जब मायावती जी जीती थीं तो उस समय उत्तर प्रदेश में अपराध में कुछ कमी आई थी. इसी कारण से उन्हें इस बार बहुमत से जिताया तो सत्ता के नशे में इतनी घमंडी हो गईं कि हर बात का पैसा लोगों से वसूल रही हैं. और अपनी पार्टी के लोगों को भी नहीं छोड़ रही हैं. वो ये भी भूल गई हैं कि लोग अच्छे काम करने वाले नेताओं की याद में उनके मरने के बाद मूर्तियाँ बनवाते हैं. मायावती ये जानती हैं कि उनके मरने के बाद शायद ही लोग उन्हें याद रखेंगे इसलिए वो पहले ही अपनी मूर्तियाँ लगा रही हैं.

  • 19. 20:36 IST, 30 अक्तूबर 2009 Rakesh Sohal:

    ये तो है भट्टी साहब, मायावती का नाम भी कुछ अरसे बाद शायद भुला दिया जाए. लेकिन मुझे यक़ीन है कि राहुल गाँधी, भगवान ना करे, अगर आज ही गुज़र जाएँ तो भारतीय जनता के लिए कुछ भी ख़ास ना करने के बावजूद उन्हें मायावती से कहीं ज़्यादा याद रखा जाएगा. यही तो भारतीय राजनीति की विडंबना है मेरे दोस्त. इसी कारण मैं आप सब स यही गुज़ारिश करूंगा कि वर्तमान में किसी भी अन्य राज्य सरकार की उपलब्धियों की तुलना उत्तर प्रदेश सरकार की उपलब्धियों के साथ करें. मायावती ने जो ख़ुद की मूर्तियाँ स्थापित करवाई हैं, मैं भी इसे पूर्ण रूप से सही नहीं मानता. परंतु उन्होंने जो दूसरे कई अन्य बहुजन समाज के गुरुओं और महात्माओं की मूर्तियाँ स्थापित कराई हैं, इस पर मैं उनकी ख़ुद की मूर्ति लगवाने की ग़लती माफ़ कर सकता हूँ. क्योंकि इससे बहुजन समाज को ज्ञात हो जाएगा कि सत्ता अपनी होने के कितने लाभ हैं. अब उनका आत्मविश्वास बढ़ गया है. अब उनको हीन भावना का शिकार नहीं होना पड़ता. व्यावहारिक रूप से उनके लिए सही मायने में उन्हें अब आज़ादी मिली है.

  • 20. 09:29 IST, 31 अक्तूबर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    मूर्ति - प्रेम की बजाय अगर ग़रीब घरौंदा योजना के बारे में सोचा होता तो हर ग़रीब के दिल से यही दुआ निकलती कि हे "माया तेरा ही आसरा है". ग़रीब का सुख चैन व आराम पार्कों व मूर्तियों तले नहीं बल्कि एक सिर छुपाने लायक महफूज़ जगह पर मिलता है जहाँ बेचारा धूप ,बरसात व सर्दी से बच सके. अगर प्रदेश के हिस्सों में खुले आसमान के नीचे जीवनयापन करने वालों ,फुटपाथों पर दिन रात गुज़ारने वालों के लिए सही मायनों में आवास योजना होती जो कि दलालों के चुंगल से मुक्त होती तो सदियों तक बहनजी को ग़रीब दुआएं देता. लेकिन उम्मीद की कोई किरण नहीं क्योंकि जहाँ ग़रीबों व ,विधवाओं की पेंशन तक मोटे पेट वाले ग़रीब हड़प कर जा रहे हैं वहां और कोई उम्मीद बेकार है.

  • 21. 16:09 IST, 31 अक्तूबर 2009 Indrajeet Jha, Delhi University. :

    मैं राकेश सोहल जी से पूरी तरह तो नहीं लेकिन काफी हद तक सहमत हूँ.. जो लोग आज मायावती के नाम पर इतना बवंडर कर रहे है उन्हें कम से कम आज का नेशनल न्यूज़ पेपर तो देख ही लेना चाहिए. आज इंदिरा गाँधी जी की पुण्य तिथि के अवसर पर लगभग हर मंत्रालय की तरफ से लगभग सभी न्यूज़ पेपर में बड़े बड़े विज्ञापन छपे हैं... क्या कोई है जो इसपर प्रश्न कर सके की इन विज्ञापनों पर जो करोडो रुपये खर्च हुए वो कहाँ से आये.. क्या आज बीजेपी या कोई और पार्टी सत्ता में होती तो भी इन मंत्रालयों की तरफ से इतने विज्ञापन छपते? भाई ये जनता के पैसे है और जिसे आप माया का खेल समझ रहे हैं वो दरअसल सत्ता का खेल है.

  • 22. 19:36 IST, 31 अक्तूबर 2009 Ram Lakhan Ram, BHU, Varanasi:

    मैंने अपनी दादी माँ से एक कहावत सुनी थी - अगर अमीर हाफ़ पैंट में घूमता है तो उसको फ़ैशन कहते हैं लेकिन वही काम ग़रीब करे तो उसको बेशर्म कहा जाता है. प्रतिमाएँ लगवाने का काम आज़ादी के पश्चात कांग्रेस या तमाम पार्टियाँ करती रही है तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई. लेकिन वही काम अगर मायावती करे तो हायतौबा मचाई जा रही है. किसी दलित के घर जाकर चमचम खाने से उस दलित की ग़रीबी नहीं मिटेगी. किसी संस्था, संगठन या फिर सड़क का नाम गाँधी, नेहरू या फिर इंदिरा रखने से भी देश का विकास नहीं होगा. इस देश में इन लोगों के अलावा भी कई सारे नाम हैं जो सम्मान के हक़दार हैं. जिसमें से एक काँशीराम भी है. आज राजनीतिक चेतना उतनी ही ज़रूरी है जितनी कि सामाजिक और आर्थिक चेतना. मैं मीडिया से गुज़ारिश करना चाहूँगा कि आप आलोचना करते समय इसके दूसरे पहलू का भी ध्यान रखें. डॉक्टर अम्बेडकर, काँशीराम, मायावती की मूर्तियाओं से दलितों में राजनीतिक चेतना आएगी.

  • 23. 19:34 IST, 01 नवम्बर 2009 Pankaj Bhatnagar:

    बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन क्या आपने सुना कि बस में लोग क्या बातें कर रहे थे. मैं भी इस तरह के हालात से गुज़र चुका हूँ. ताज्जुब इस बात का है कि लोग सरकार और कुप्रबंधन का समर्थन करते हैं. लोगों का कहना है कि सरकारें एक बड़े देश का अच्छी तरह ख़याल रख सकती हैं, अगर लोग इसी तरह के हालात का समर्थन करते हैं तो उन्हें इन्हीं परिस्थितियों में ही रहना चाहिए.

  • 24. 12:24 IST, 02 नवम्बर 2009 deepesh gupta:

    मेरी नज़र में मायावती के नाम से यही अर्थ निकलता है कि वो केवल अपने नाम के अनुरूप ही माया (धन) के लिए ही राजनीति कर रही हैं. उन्हें आम जनता से कोई लेना-देना नहीं है. वो आख़िर अपनी ही मूर्ति बनवाकर क्या साबित करना चाहती हैं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है. वो हमारे राष्ट्रपति महात्मा गाँधी जी को, जिनका हम बहुत सम्मान करते हैं, उनको ढोंगी कहती हैं, जोकि वास्तव में ख़ुद मायावती जी पर ही खरा उतरता है.

  • 25. 13:39 IST, 03 नवम्बर 2009 ahmad faraz tanda/lucknow:

    मायावती जी अब तो कुछ शर्म कीजिए.

  • 26. 20:16 IST, 13 नवम्बर 2009 Rakesh Sohal - BTU Cottbus, Germany:

    मायावती उत्तर प्रदेश में आम आदमी के लिए कुछ कर रही हैं या नहीं ये जानने के लिए अभी हाल ही में जो विधान सभा की 11 सीटों के लिए चुनाव हुआ था उसका परिणाम देखना बेहतर होगा. परंतु मैं उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी काम देखना चाहता हूँ, जैसेकि पुलिस में भ्रष्टाचार का पुरी तरह ख़ात्मा, एक भी झुग्गी-झोंपड़ी ना रहे, सबके पास घर हो, पीने का पानी उपलब्ध हो और मल-शौच सफ़ाई की आधुनिक युग की व्यवस्था की कम से कम शुरूआत तो हो. ऐसा हो जाने से उत्तर प्रदेश अन्य राज्यों के लिए एक आदर्श प्रदेश बन जाएगा.

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