मैं तो पेड़ पर रहूँगा
भारत और पाकिस्तान में अधिकतर सड़कों और व्यस्त चौकों पर आप को कोई साहब एक आध पिंजरा पकड़े हुए दिखाई पड़ेंगे. उन में फाख़ताएँ और प्यारी प्यारी सी विभिन्न रंगों की चिड़ियाँ बंद होती हैं. जैसे की ट्रेफिक सिग्नल की लाल बती रोशन होती है. यह साहब अपना पिंजरा उठाए बड़ी बड़ी गाड़ियों के बीच घूमना शुरु कर देते हैं और अंदर बैठे लोगों से कहते हैं कि अगर आप इतने पैसे दें तो वह पिंजरा खोल कर इन पक्षियों को आज़ाद कर देंगे. पक्षी आज़ाद हो कर आप को दुआएँ देंगे. भगवान/अल्लाह आप की किस्मत को अच्छा कर देगा और आप के मसले हल होते चले जाएँगे.
अगर आप शिकारी की बातों पर विश्वास कर पैसे देंगे तो वह आप के सामने पिंजरे का दरवाज़ा खोलेगा और सारे पक्षी फुर फुर करते हुए उड़ जाएँगे. आप भी ख़ुश, शिकारी भी ख़ुश और पक्षी भी ख़ुश. लेकिन जैसे ही आप की गाड़ी आगे बढ़ेगी. शिकारी इधर उधर मौजूद अपने माहिर शागिर्दों की मदद से उनमें से अधिकतर पक्षी पकड़ पर दोबारा उसी पिंजरे में बंद कर लेगा और फिर आप जैसे किसी नरमदिल आदमी से कहेगा कि इतने पैसे दो तो यह पक्षी आज़ाद कर दूँगा.
मुझे पाकिस्तान और भारत की सरकारें भी इस प्रोफेशनल शिकारी की तरह लगती हैं. यह सरकारें एक दूसरे के सैंकड़ों मछुवारों और वीज़ा अवधि से ज़्यादा रहने पर एक दूसरे के आम नागरिकों को पकड़ कर पिंजरों में बंद कर देती हैं और फिर एक दूसरे पर अपना ख़ुलूस साबित करने के लिए इन्हें कुछ कुछ समय बाद छोड़ती भी रहती हैं. बाद उन की जगह नए मछुआरे और नए नागरिक इतनी ही बड़ी संख्या में पकड़ लेती हैं.
चार साल पहले भी भारत के पास चार-पांच सौ पाकिस्तानी नागरिक और पाकिस्तान के पास भी लगभग इतने ही भारतीय नागरिक थे. आज भी दोनों देशों की जेलों में एक दूसरे के इतने ही नागरिक बंद हैं. हालाँकि पिछले चार सालों में दोनों देश एक दूसरे के दो हज़ार के लगभग नागरिक रिहा कर चुके हैं.
मैं सोच रहा हूँ कि सआदत हमन मंटो की कहानी "टोबा टेक सिंह" का वह पागल क्या बुरा था जो विभाजन के बाद सीमा पर पहुँच कर पार जाने के बजाए यह कहते हुए पेड़ पर चढ़ गया था कि न मैं भारत में रहूँगा और न पाकिस्तान में. मैं तो इस पेड़ पर ही रहूँगा.

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बहुत खूब, अच्छा है.
ख़ान साहब,आपको ही याद कर रहे थे, आपके लिखे का मैं सिरे से कायल हो गया हूँ. आपके कहने का अंदाज़ बेमिसाल है. आपकी सारी रचनाएँ मैंने पूरे ध्यान से पढ़ी है. वुसतुल्लाह ख़ान साबह आप का कोई जवाब नहीं, हर लेख एक से बढ़ कर एक होता है. कमाल है आप की क़लम का जादू.
बहुत खूबसूरत लिखा है आपने. तबीयत खुश हो गई. आपका और बीबीसी का शुक्रिया. भारत और पाकिस्तान के बीच खींचतान चलती रहेगी क्योंकि ये वोट की राजनीति है.यहां मसले हल करने की बजाय लंबे खींचे जाते हैं ताकि आम आदमी बेवकूफ़ बना रहे और ये नेता अपनी जेब ग़रम करते रहें. कितने लोग दोनों देशों के इस दुश्मनी का शिकार हो गए.इन नेताओं को लोगों की परवाह नहीं है.
खान साहेब, आपके व्यंग्य बाण सटीक और सूक्ष्म होते हैं. साथ ही समयपूरक भी. कृपया ऐसी ही मसलों को उठाते रहें.शायद नेताओं अधिकारियों की नज़र पड़ जाए तो हल होने की दिशा में कदम उठाए जाएं.
बहुत खूब ख़ान साहब. कम शब्दों में जिस खूबी और बारीकी से आपने अत्यंत ही उलझे हुए मुद्दे पर अपने स्पष्ट विचार व्यक्त किए हैं, वो वाकई तारीफ़ के काबिल है. आपके अगले ब्लॉग का इंतज़ार रहेगा.
खान साहब बेहतर फरमाया है आपने. सरकारी फरमान बहेलियों व चिड़ी मारों का खेल बनकर रह गए हैं. यह बात भी सच है कि हर बार पकड़े जाने वाले वाले नागरिक निर्दोष भी नहीं होते. बात सिर्फ मछुआरों तक ही सीमित नहीं है. मछुआरों के नाम पर नकली नोट, ड्रग -ट्रेफिकिंग और न जाने क्या -क्या धंधों में मशगूल हैं कुछ लोग. खैर चिड़ी मारों व बहेलियों के लिए तो हमारे यहाँ मेनका गांधी जैसे लोग सक्रिय है लेकिन सरकारी तुगलकी फरमानों के चलते मजबूर व निर्दोष लोग बेवजह ही जेलों में सड़ने को पड़े रहते हैं. सबसे बड़ी कमी यह है कि इन लोगों की जानकारियाँ सरकारों द्वारा इनके हाथों में थमाई गयी तख्तियों पर नाम व पिता का नाम ही होती है, वो भी स्थानीय भाषाओं में. सरकारों को चाहिए कि पकड़े गए लोगों की संपूर्ण जानकारी , पता व पारिवारिक पृष्ठभूमि अखबारों व मीडिया में दे ताकि सही -सही निशानदेही हो सके. इसके साथ ही वक्त रहते स्थानीय प्रशासन व परिवार को भी जानकारी दी जाए ताकि कानूनी सलाह-मशविरा हो सके. खान साहब अब तो न वैसे बावरे बचे हैं न ही वैसा सरहदी पेड़!
बेहतरीन लिखा है आपने.
बहुत ही बढ़िया है.
आपकी टिप्पणी सटीक है. दो सरकारों को केवल दिखावा छोड़ कर कुछ वास्तविक प्रयास करने होंगे. यदि दोनों देशों को क़रीब लाना है तो यह काम हिंदी फ़िल्म के अभिनेता, गायक, क्रिकेट खिलाड़ी बखूबी कर सकते हैं जब इन्हें सीमा पार आने-जाने की छूट मिले,
खां साहब, आपने फिर से भारत और पकिस्तान की तुलना की है, जो मेरे हिसाब से सही नहीं है. आपने जो मुद्दा उठाया है वो तारीफ़ के काबिल है. भारत और पाकिस्तान की जेलों में कितने ही लोग आज भी बंद है और स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ऐसे लोगों को छोड़ दिया जाता है, लकिन जो सुलूक पकिस्तान में भारतीय कैदियों के साथ होता है उसे बयां करना मुश्किल है. आज सभी जानते हैं की पाकिस्तान अपनी आग में झुलस रहा है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है, तो आप किस तरह से भारत की तुलना पकिस्तान से कर सकते हैं.
हाँ, मैं मान सकता हूँ की कुछ बातें दोनों देशों में समान है. आप एक पिंजरेवाले का उदाहरण देकर क्या साबित करना चाहते हैं..? ये मेरी समझ से परे है. मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ की "बाप की कुछ आदतें उसके बेटे में तो आएगी ना" इसलिए भारत और पकिस्तान में बहुत सी बातें समान है, तो आप उनकी समानता के आधार पर तो तुलना नहीं कर सकते ना. एक छोटी सी राय है कि आप भारत और पकिस्तान की तुलना नहीं करें.
वाह जी वुसत साहिब! कैसे-कैस मुहावरे लाते हैं, मज़ा आ गया. हाँ ये बिल्कुल सच है कि भारत और पाकिस्तान के बीच इसी तरह का खेल 60 सालों से बो रहा है और इसमें अक्सर मासूम लोग फंस जाते हैं और जेलों में डाल दिए जाते हैं. सच्चाई यह है कि अगर सकून से बैठकर दोनों देशों की सरकारें कोई ठोस हल निकाले के लिए ईमानदार कोशिश करें तो हल ज़रूर निकल सकता है. लेकिन हमें देखना होगा कि ईमानदार कोशिश कब की जाती है और भारत और पाकिस्तान के अवाम को सकून कब मिलता है.
भारत की तुलना पाकिस्तान से भला कैसे भी करें, ज़रा इन सवालों का जवाब ख़ुदें और अंतर साफ़ दिख जाएगा. कोई ये तो बताए कि कितने लोग पाकिस्तान को छोड़कर भारत में आना चाहेंगे, इसके उलट भारत को छोड़कर पाकिस्तान जाना चाहेंगे. पाकिस्तान चरमपंथ को हवा देता है जबकि भारत इसके ख़िलाफ़ है. पाकिस्तान में लगातार सेना लोकतंत्र का गला दबाती रही है, जबकि भारत में लोकतंत्र की जड़ें हमेशा मज़बूत होती रही हैं. वहाँ लोग मर-मर कर जी रहे हैं जबकि भारत में लोग जी जी के रह रहे हैं. इसलिए भारत की तुलना पाकिस्तान से नहीं की जा सकती. सिर्फ़ खानपान में समानता को लेकर कब तक तुलना कर सकते हैं.
आपने बहुत सुंदर लिखा है.
ख़ान साहब, लगता है आपकी मेरे साथ कोई रंजिश है इसीलिए आप के इस ब्लॉग पर चार बार भेजी टिप्पणियों को भी जगह नहीं मिली. दिल तो करता है बीबीसी की वेबसाइट पर जाना ही छोड़ दूँ.
काफी अच्छा लिखा है. धन्यवाद.