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अपराध का दंड

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 05 नवम्बर 2009, 19:20 IST

कार में सीट बेल्ट न लगाने पर मेरा चालान हुआ. पुलिस वाले का कहना था बेल्ट लगाना मेरी सुरक्षा के लिए ज़रूरी है.

मोटरसाइकिल पर बिना हेलमेट सवारी करने पर भी फटकार पड़ी. मेरी जान को ख़तरा बताया गया.

अच्छा लगा. मेरे जीवन की, मेरी सुरक्षा की सरकार को चिंता है.

विमान दुर्घटना में मेरी मौत होने पर मेरे परिवार को भारी-भरकम राशि मिली. रेल दुर्घटना में मारे जाने पर भी जान की क़ीमत लगाई गई.

बाढ़, सूखा या भूकंप में मेरा सब कुछ तबाह हुआ, सरकार ने मुआवज़ा भी दिया और ज़मीन ख़रीदने के लिए पैसा भी.

इन प्राकृतिक आपदाओं से न निबट पाने की सरकार की अक्षमता का उसे एहसास है और उसकी भरपाई वह अपनी ज़िम्मेदारी समझती है.

मेरे देश को मेरी कितनी चिंता है. और साथ ही अपनी साख की भी...

लेकिन फिर ऐसा हुआ कि भूख से बिलख-बिलख कर मेरे प्राण निकल गए. रोज़गार छिन गया था और शरीर इतना दुर्बल कि मज़दूरी के लायक़ भी नहीं.

अब मेरी सुध कौन ले...भूख बर्दाश्त नहीं हुई और मैने दम तोड़ दिया.

मेरे परिवार पर न किसी नेता को दया आई और न ही समाज को.

भूखा रहना मेरा अपराध था. इसकी सज़ा मौत के रूप में मिली तो क्या बुरा हुआ.

मैंने गाय-बकरी की तरह पत्ते खा कर अपना पेट क्यों नहीं भरा. पीने का साफ़ पानी नहीं था तो नाले या सीवर से पानी ले कर प्यास क्यों नहीं बुझाई.

क्या इसके लिए भी सरकार ज़िम्मेदार है.

भूख से निबटना मेरी ज़िम्मेदारी थी और मौत मेरे अपराध का दंड.

अरे, मैंने अपना परिचय तो कराया ही नहीं.

मैं देश की जनता हूँ.

अब कौन सा देश और कहाँ की जनता....यह बात बेमानी है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 22:04 IST, 05 नवम्बर 2009 Anupam Gupta:

    जो लोग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं वे तो 4000 करोड़ बनाने के फेर में हैं. आप कैसे साहस कर सकते हैं इन लोगों को जवाबदेह ठहराने का या उनकी ज़िम्मेदारी पर सवाल उठाने का. वे तो 2020 के लिए अपना मिशन पूरा करने में व्यस्त हैं.

  • 2. 22:47 IST, 05 नवम्बर 2009 SHABBIR KHANNA:


    सलमा जी, बहुत शानदार मुद्दे का लेख आपने लिखा है लेकिन आप यह भूल गईं कि मेरे महान भारत में सरकार और अधिकारी भूख से मरने तक को मानते भी नहीं हैं, मुआवज़ा तो दूर की बात है. पिछले समय बीबीसी के एक रिपोर्टर ने अपनी आँखों से देख कर रिपोर्टिंग की लेकिन उड़ीसा की सरकार ने यह भी नहीं माना कि भूख से लोगों की मौत हुई है. मेरे ख़्याल में सरकार ट्रेन, प्लेन या अन्य दुर्घटनाओं पर भी पर्दा डाल सकती है लेकिन यह उस के बस की बात नहीं है. जनता में जागृति की ज़रूरत है और भूख से मरने वाले की अर्थी या जनाज़ा नहीं उठना चाहिए जब तक कि मरने वाले को उसी समय मुआवज़ा नहीं मिल जाता. ऐसा नहीं होगा तो भारत में भूख से मरने वाले को कुछ नहीं मिलेगा.
    सलमा जी, बहुत शानदार लिखा है आपने, बिलकुल सच लिखने के साथ थोड़ा यह भी बतादें कि जनता को किस तरह मुआवज़ा मिल सकेगा.

  • 3. 22:55 IST, 05 नवम्बर 2009 Indrajeet Jha, Delhi University. :

    आज आपके इस ब्लॉग को पढ़कर एक बार फिर मैं बीबीसी का कायल हो गया वर्ना आज कल की मीडिया इन मुद्दों को उठाती कहाँ है. आज भी देश में इतनी बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं, लेकिन देश के नेताओ और प्रशासको को कोई परवाह नहीं है. बल्कि सरकार तो इसके ऊपर और पर्दा ही डालने का प्रयास करती है. सभी जानते हैं की लक्कारबाला कमिटी के सुझावों को अपनाकर किस तरह देश में गरीबो को संख्या को कम करके दिखाने की कोशिश की गयी. सरकारी आंकडो को ही माने तो देश के २७ प्रतिशत लोग १२ रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा कर रहे हैं. और कितने तो उस से भी दयनीय हालात में हैं. ऐसे में वे बांस के पत्तो और आम की गुठलियों को उबालकर खाते हैं, और उस से भी जिन्दा नहीं रह पाते तो सरकारी दस्तावेजो में उनकी मौत का कारण भूख को न बताकर पेट की बीमारी या कुपोषण को कारण बताया जाता है. और तो और, जब चुनाव का समय आता है तो इस तरह से ताना बना खरा किया जाता है की जनता के मुद्दे पीछे चले जाते हैं. और जब इन जगहों पर नक्सलवाद के जैसी घटना होती है तो यही नेता और सरकार इन्हे लोकतंत्र और चुनावी राजनीति की दुहाई देते हैं. ये नेता और प्रसासक भ्रष्ट ही नहीं है बल्कि इनकी मौत के लिए भी यही जिम्मेवार हैं.

  • 4. 23:56 IST, 05 नवम्बर 2009 sanjay kumar:

    क्या बात कहीं हैं सलमा जी. देश की जनता भूखे मर रही है, लेकिन सरकार इस बात को स्वीकार कभी नहीं करती, आख़िर ये देश की इज़्ज़त की बात जो हो जाती है? हर देश अपने लोगों की घटना में हुई मौत पर मुआवज़ा देती है, लेकिन उसी आम जनता की मौत यदि भूख से हुई होती है तो स्वीकार करने को ही तैयार नहीं होती. हमने देखा है कि जब लोगों की मौत भूख से होती है तो सरकार उसे बीमारी का नाम दे देती है, क्योंकि इस की क़ीमत जगहँसाई होती है, लेकिन ये बात हर कोई समझ सकता है कि अगर इंसान भूखा होगा तो उसे बीमारी होगी ही, लेकिन ये बात सरकार को समझ में नहीं आती? और फिर सरकार घोषणा करती है भूख से नहीं बीमारी से मौत हुई.
    फ़िलहाल सरकार कह रही है कि नरेगा जैसी योजनाओं के ज़रिय ग़रीबों को रोज़गार दिया जा रहा है, लेकिन ये योजना भी हक़ीक़त से कोसों दूर है. सरकार को एक ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता है.

  • 5. 01:31 IST, 06 नवम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    सलमा जी यह लेख लिखकर सोए हुए लोगों को नींद से जगाया तो है आपने, पर अब उनकी मर्ज़ी है कि यह जागें या न जागें. दरअसल भुखमरी भारत जैसे विश्व के बड़े लोकतंत्र के माथे पर एक कलंक है. सरकार और अधिकारियों की नज़रों में भुखमरी या अल्प अन्न पोषण जैसी कोई समस्या है ही नहीं? यह तो इसके शिकार लोगों की मजबूरी है जिसका फ़ायदा पहले से ही धन्ना-सेठ जैसे लोगों को मिलता आ रहा है. जो गरीब के मुँह का रुखा -सूखा निवाला छीन कर अपने मोटे पेट की चर्बी की परतों में इजाफ़ा कर रहे हैं. अगर मेरे भारत में ग़रीबी और भुखमरी का बसेरा है तो इस लोकतंत्र के लिए चाँद की उंचाइयां नापना कोई मायने नहीं रखता. जहाँ आम जनता दो वक़्त की रोटी के लिए मोहताज हो, ऐसा लगता है कि हरित क्रांति सिर्फ़ सरकारी काग़ज़ों में लिपट कर रह गई है. आम जनता की भूख का सारा दारोमदार सार्वजानिक वितरण प्रणाली पर निर्भर है, लेकिन यह प्रणाली भी ग़रीब के पेट से मीलों दूर है. इसका रास्ता कालाबाजारी, घूसखोरी, घोटालेबाजी, ग़बन, लूटमार, लूट- खसूट, सीनाज़ोरी और भरे हुए पेटों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर गुज़रता है. भूख तक पहुँचने का तो सवाल ही नहीं है, मैं ग़रीबों के मुँह से निवाला छीनने वालों से पूछना चाहता हूँ कि क्या कोई एक पल ,एक रात भी चैन से सो पाते हो अपने महलों में? अगर भूख से आम जनता मर रही है तो बिना भूख खा-खा कर मरने वालों की भी कमी नहीं. अगर भूख से तिल-तिल कर मरने वालों का दर्द न समझ आए तो भरे पेट वालों का लाइलाज ,आसाध्य रोगों से पीड़ित होकर मर -मर कर जीने से तो कुछ सीखना चाहिए. सरकार कौन है? आख़िर आप और हम ही तो हैं, नेता लोग लूटपाट में इतने मशगूल हैं कि भूख का दर्द तब तक समझ नहीं आता जब सोने -चांदी के बर्तन ,मखमली बिछौने , आलीशान महल, नोटों से भरे घर भी काटने को दौड़ते हैं. हक़ीक़त यही है कि किसी ग़रीब की दो जून की रोटी छीनकर आज तक कोई भी अमन चैन से न रह सका है और न ही रहेगा चाहे वो सरकार हो ,अधिकारी हों या ऊँचे रसूख वाला कोई भी. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के छाते के कपडे में छेद होते तो चल सकता था लेकिन अब तो छाते पर कपडा ही नहीं बचा है. ज़रूरत है दोबारा भूमिदान ,अन्नदान के बारे में सोचने की और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पारदर्शी, सशक्त और भूख मिटाने वाला बनाने की.

  • 6. 12:53 IST, 06 नवम्बर 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    सलमा जी, बहुत ख़ूब लिखा है आपने. सरकार चलाने वाले नेता लोग आम आदमी की सुध सिर्फ चुनावों में ही लेते हैं, उसके बाद उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है. बाढ़, सूखा, विमान दुर्घटना में तो लोगों को मुआवज़ा देकर सरकार अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेती है, क्योंकि वो प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सक्षम नहीं है. अपने "माननीय नेता जी" सिर्फ उपदेश देते रहते हैं, पानी बचाओ, बिजली बचाओ, लेकिन ये सब सरकरी ऑफिस में होता है..? कमरे में कोई नहीं है, फिर भी पंखा चलता रहता है. क्या ये सही है. और देश के बहुत से गाँव अँधेरे में डूबे हुए है. यहाँ नेता जी को ठरहने के लिए आलीशान होटल चाहिए.... क्या ये हमारे पैसे का सदुपयोग है...? इनको क्या पड़ी है कि आम जनता की परेशानी क्या है. वो तो आदमी के मरने पर भी "अच्छी राजनीती" कर लेते हैं और अपना काम निकाल लेते हैं. देश की जनता भूखी सोये तो ये उसे "परेशानी" है, हमे उससे क्या.. हमने तो अपना "पेट" भर लिया है. देश की जनता पीने के पानी को तरसे और नेता जी को "मिनरल वाटर" चाहिए. भूख से निपटना नेता जी का काम नहीं है, अरे भाई! बहुत से "मामले" होते है निपटाने के लिए. जनता का क्या है, छोटी सी बात को लेकर हाय-हाय करती रहती है. देश की जनता जाये भाड़ में, हमे तो अपने "मामले" निपटाने हैं.

  • 7. 20:25 IST, 06 नवम्बर 2009 himmat singh bhati:

    सलमा जी, आप ने यह बताया है कि भारत में लोगों का ख़्याल सरकार कैसे-कैसे रखती है. दाद तो देनी ही पड़ेगी आप के इस ब्लॉग पर. सही कहा है आपने कि ख़ास लोगों को भारी-भरकम मुआवज़ा किस तरह दिया जाता है और आम साधारण लोगों को भी उनकी मौत की क़ीमत मिलती है. लेकिन अत्यधिक ग़रीबों को पेट भरने के लिए आधी रोटी दी जाती है जिससे वे ज़िंदा रह सकें और न ही मर सकें. यह इसलिए ताकि ग़रीब सरकार पर आश्रित बना रहे. बाढ़, सूखे और भूकंप के लिए कोई योजना इसलिए नहीं बनाई जाती कि ग़रीबों को रोज़गार मिलता रहे इसी बहाने. ग़रीबों को अनाज कहाँ मिलता है, जो धान मिलता है वह चारे के समान होता है. पीने का पानी भी गटर के पानी से कहाँ अलग है.

  • 8. 22:13 IST, 06 नवम्बर 2009 Pankaj Bhatnagar:

    अच्छा लिखा है लेकिन समाधान क्या है. हम इस स्थिति से कैसे छुटकारा पा सकते हैं.

  • 9. 17:11 IST, 07 नवम्बर 2009 himmat singh bhati:

    सलमा जी आपने अपराध और दंड पर पते की बात की है. भारत में अपराध के मायने भी अलग हैं और दंड देने की प्रक्रिया भी अलग है. पैसे वाला अगर अपराध भी करता है तो उसे पता है कि उसे सज़ा से कैसे बचना है. अगर सज़ा से बचना है तो पैसा तो हर हाल में होना ही चाहिए. सज़ा से बचना है तो बड़ा वकील करने की सामर्थ्य होनी चाहिए. दूसरी ओर, ग़रीब अगर भूलवश भी अपराध कर दे तो उसे दंड तो भुगतना ही पड़ता है. आम लोगों और पैसे वालों में ये सबसे बड़ा फ़र्क़ देखने को मिलता है.

  • 10. 21:42 IST, 07 नवम्बर 2009 himmat singh bhati:

    सलमा जी आपका यह ब्लॉग मैंने बार बार पढ़ा है और लोगों की प्रतिक्रया भी देखी है. आपकी बात शत प्रतिशत सही है.

  • 11. 11:02 IST, 12 नवम्बर 2009 raza husain:

    क्या सच्चा मुद्दा उठाया है सलमा जी. हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. जब आज का मीडिया फ़िल्मी तड़का, क्रिकेट, खाना-ख़ज़ाना, भूत-प्रेत, ज्योतिष जैसे ख़बरें दिखाता है. आम जनता की बात कोई नहीं उठाता है. मेरा मानना है कि बीबीसी को हिंदी में न्यूज़ चैनेल लॉंच करना चाहए. जो जनता से जुड़ी ख़बरों को आमजन तक पहुँचाए.

  • 12. 19:11 IST, 13 नवम्बर 2009 a p asthana jamshedpur:

    वाह क्या मुद्दा उठाया है आपने. यहां हम तो ऐसे देश में जीते हैं जहां हम वोट किसी को करते हैं और गिंती किसी और के नाम पर होती है. कोई व्यवस्था नहीं है हमारे पास. भूख जैसे फ़ालतू शब्द पर कौन सोचे.

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