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जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है...

ममता गुप्ताममता गुप्ता|सोमवार, 09 नवम्बर 2009, 03:47 IST

मन ही मन सब चाहते हैं कि बस एक बार लॉटरी लग जाए तो वारे-न्यारे हो जाएं.

यहाँ तक कि मुझ जैसे लोग भी जीवन परिवर्तन के सपने देखते हैं जबकि लॉटरी का टिकट नहीं ख़रीदते. जब कभी ख़रीदा भी तो छह में से एक नंबर भी नहीं लगा.

लेकिन मैं उन दो ब्रिटिश नागरिकों के बारे में सोच रही हूँ, जिन्होंने यूरो मिलियन्स लॉटरी का जैकपॉट जीत कर अलग-अलग साढ़े सात करोड़ डॉलर जीते हैं.

मेरा हिसाब यूं भी ज़रा कमज़ोर है. ऊपर से इतनी मोटी रक़म का क्या मतलब हुआ इसे समझने के लिए मुझे दिमाग़ पर बहुत ज़ोर लगाना पड़ रहा है.

सोचती हूँ क्या करेंगे वो इतने धन का. ब्रिटन के किसी शानदार इलाक़े में एक आलीशान मकान, रोल्स रॉएस कार, डिज़ाइनर कपड़े, नवीनतम उपकरण, दुनिया की सैर. सूची चाहे जितनी लंबी बना लें लेकिन कहीं तो रुकेगी. उसके बाद.....

दुनिया के सभी देशों में लॉटरी खेली जाती है और कुछ भाग्यवान लोग जीतते भी हैं. लेकिन इस खेल में बड़ा असंतुलन है.

ब्रिटन की राष्ट्रीय लॉटरी में छह अंक होते हैं. तीन नंबर लगने से कोई 10 पाउंड मिलते हैं, चार लगने से कोई 75, पांच लगने से हज़ार डेढ़ हज़ार और अगर छह के छह लग जाएं तो आप एक पल में करोड़पति बन जाते हैं.

जिस सप्ताह किसी का जैकपॉट नहीं लगता तो वो राशि अगले हफ़्ते के जैकपॉट में जमा हो जाती है.

मुझे यह बहुत ही अन्यायपूर्ण लगता है. सरकार किसी एक को करोड़पति बनाने को उत्सुक रहती है लेकिन दस-पचास को लखपति या हज़ारपति नहीं बनाना चाहती.

अगर ऐसा हो तो इसके दो फ़ायदे होंगे. एक तो धन का अधिक न्यायपूर्ण वितरण होगा और दूसरा जीतने वालों के सामने ये धर्मसंकट नहीं आएगा कि साढ़े सात करोड़ डॉलर जैसी भारी भरकम राशि कैसे ख़र्च करें.

आपका क्या ख़्याल है....

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 07:17 IST, 09 नवम्बर 2009 Pankaj Bhatnagar:

    मैं समझता हूँ कि अगर इनामी राशि बहुत अधिक नहीं होगी तो कोई लॉटरी क्यों खेलेगा. क्योंकि जो लोग टिकिट ख़रीदते हैं उसकी वजह ही बड़ी राशि हासिल करना होता है.

  • 2. 08:55 IST, 09 नवम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    ममता जी आपके विचार स्वागतयोग्य हैं. सरकार को इस बाबत सोचे तो कोइ बुराई नहीं है, लेकिन दर्द इस बात का है कि लॉटरी का खेल ही ऐसा है.| खेल और खिलाड़ी जानते हैं फिर भी मृगमरीचिका का पीछा होता आया है. दस - पचास को लखपति और हजारपति बनाकर सरकारें शायद लॉटरी के मायने नहीं बदलना चाहतीं हैं. यह तो फिर किसी सरकारी परियोजना के लाभांश जैसा हो जाता है. अपने यहाँ का तो पता नहीं परन्तु सुनने में आया है कि ब्रिटेन में ज़रूर लॉटरी की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खेलों ,सांस्कृतिक और मीडिया जैसे कामों में खर्च किया जाता है और शारीरिक असमर्थ लोगों की मदद में भी यह धन लगाया जाता है. पता चला था कि मंचेस्टर कॉमन वेल्थ गेम्स के दौरान भी लॉटरी की कमाई का काफी धन लगाया गया था. अगर ऐसा हर देश में होता है तो लॉटरी की कमाई का पैसा विजेता के साथ -साथ कई ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँच रहा है. बाकी जिसको कैसे धन खर्च करना है तो धन बचाने की बजाय खर्च करने के कई तरीके हैं. सर्वप्रथम तो सरकार ही टेक्स के रूप में अच्छा -खासा हिस्सा वसूल लेगी. ममता जी मेरे विचार से लॉटरी का खेल असंतुलन का नहीं बल्कि हमारे इकनॉमिक पिरामिड को संतुलित बनाने में कारगर है.

  • 3. 10:29 IST, 09 नवम्बर 2009 jalaluddin asnari:

    मेरे ख़्याल है कि उसे कुछ पैसे ग़रीबों में बाँटने चाहिए.

  • 4. 10:40 IST, 09 नवम्बर 2009 kulwant happy:

    आपके विचार से सहमत हूं, लेकिन वो धन्धा करने बैठे हैं, लखपति करने नहीं. एक को करोड़पति करते हैं और बहुत से लोगों को सड़क पर लाते हैं. ऐसे लोग मुझे भी याद हैं जो भारत में पिछले 15 सालों से लाटरी खरीद रहें, बस इस उम्मीद में कि एक झटके में वो करोड़पति हो जाएंगे.

  • 5. 12:43 IST, 09 नवम्बर 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    ममता जी, आपके सोचने से परिवर्तन संभव नहीं है, ये इंडिया है..? यहाँ सब कुछ संभव है.. यहाँ पर जहाँ एक ओर लोग पीने के पानी के लिए तरसते है, तो दूसरी और पानी से लोग अपनी गाड़ियों को स्नान करवाते है. जहाँ एक ओर लोग दो जून की रोटी के लिए "कुछ भी" करने को तैयार हो जाते है, तो दूसरी और बहुत सारा खाना बर्दाद होता है... एक बात और अगर लॉटरी में सबका नंबर लगने लग जाएगा तो लॉटरी वाले का धंधा चोपट हो जागेगा और उसे अपनी "दूकान" बंद करनी पड़ेगी. कुछ चांस तो लेना पड़ता है. आप कहीं भी देख लीजिए हर जगह लॉटरी सिस्टम है. कांटेस्ट होता है तो उसमे लोत्टर सिस्टम होता है. और भी बहुत बड़ी लिस्ट है...... लेकिन मुझे आपका ये विचार बहुत अच्छा लगा की पैसे का सामान वित्रान होना चाहिए, जिससे की असमानता नहीं रहे. और लोगों को "पैसे कहाँ खर्च करूँ" की चिंता से मुक्ति मिले. और जिसकी लॉटरी लगती है तो कुछ रूल्स ऐसे बने की उसे कुछ पैसे उसमे दान करने हो जैसे की कुछ परसेंट गरीबों के लिए, कुछ अनाथ बच्चों के लिए, कुछ टैक्स के लिए. कुछ समाज के लिए. कुछ ऐसे काम करने चाहिए की लोगों की भलाई हो सके. "स्व से हटकर पर" की सोच विकसित हो. वैसे भी एक गाना है "अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ए-दिल ज़माने के लिए".

  • 6. 21:32 IST, 10 नवम्बर 2009 Tej Bahadur Yadav :

    ममतातयी सर्वजनहिताय विचार
    ममता जी
    ऐसे विचार जनकल्याणकारी सरकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं के दिमाग में क्यों नहीं आती है। वे ऐसा क्यों नहीं सोचते कि एक व्यक्ति को अरबपति बनाने की बजाय लाटरी को दस-बीस लोगों को लखपति-लखपति बनाया जाए। एक अरब रुपए का विभाजन सौ लोगों तक करवाकर उन्हें 10-10 लाख रुपयों का धनी बनाया जा सकता है। इस सोच पर सरकारों को विचार करना चाहिए और कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए, जिससे गरीब वर्ग के लोगों की लाटरी लगे। अमीर भी उपेक्षित न रहें और मध्यवर्ग की भी बारी आए। व्यवहारिक रूप से यह कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। ममताजी इस बारे में और लिखें--
    तेज बहादुर यादव

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