निशाना मधु कोड़ा पर ही क्यों!
मधु कोड़ा प्रकरण जिस तरह सुर्ख़ियों में है, कुछ अजीब लगता है.
मधु कोड़ा ने ग़लत किया या नहीं, वह निर्दोष हैं या दोषी- यह सब बातें तो अदालत में तय होंगी.
अदालत का फ़ैसला जब भी आए, जिस तरह की हैरतअंगेज़ बातें मीडिया में छप रही हैं, उनमें अगर कुछ प्रतिशत भी सच्चाई है तो यह समझ में आ जाता है कि भ्रष्टाचार नापने के हर अंतरराष्ट्रीय मापंदड पर क्यों भारत का नाम भ्रष्ट व्यवस्था वाले राष्ट्रों की सूची में प्रथम पंक्ति में आता है.
पर फिर भी मधु कोड़ा का क़िस्सा जिस तरह उछल रहा है उससे कई प्रश्न और खड़े होते हैं.
पहला प्रश्न तो यही कि कोड़ा पर पड़े आयकर विभाग के छापों की टाइमिंग के पीछे भी क्या कोई राजनीति है.
क्यों यह क़िस्सा एक ऐसे समय सुर्ख़ियों में आया जब इससे एक बड़ा मामला सुर्ख़ियों में था.
केंद्रीय मंत्री ए राजा- जिनका नाम कुछ अख़बारों में तो स्पेक्ट्रम राजा रख दिया था, के विभाग की हो रही सीबीआई जाँच, डीएमके और कांग्रेस की इस मसले पर खींचतान और स्पेक्ट्रम घोटाले के तार अन्य दलों के नेताओं से जुड़ने की अटकलें- सभी कुछ कोड़ा कांड की सुर्खियों के पीछे जैसे छिप गया है.
यह भी एक दिलचस्प बात है कि कोड़ा पर सरकारी एजेंसियों की गाज उस समय गिरी जब झारखंड चुनावी मूड में है. क्या कोड़ा पर कार्रवाई निर्दलीय विधायकों और छोटे दलों को किसी तरह की चेतावनी है.
इस लेख का अर्थ कृपया यह नहीं लगाएँ कि कोड़ा की हिमायत की जा रही है. बिल्कुल नहीं.
सवाल सिर्फ़ यही है कि क्या हम यह मान लें कि देश में मुख्यधारा से जुड़ी राजनीतिक पार्टियों के सभी नेता क्या दूध से धुले हुए हैं. या फिर- "जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारें" वाली बात सिर्फ़ बड़ी पार्टियों पर लागू होती है.
मतलब यह कि गंदे तालाब या भ्रष्ट सागर की सभी बड़ी मछलियाँ या मगरमच्छ एक दूसरे का तो ध्यान रख लें और कहीं न कहीं 'राज के प्रसाद' को बाँटकर खाने पर अघोषित सहमति बना लें, पर किसी छोटे-मोटे क़द और हैसियत वाले राजनेता के ख़िलाफ़ जितनी चाहे सख़्त कार्रवाई करें.
मैं एक बार फिर यह साफ़ करना चाहता हूँ कि हम कोड़ा के ख़िलाफ़ जो कुछ हो रहा है उसे ग़लत नहीं मानते.
प्रश्न सिर्फ़ यह है कि अगर मधु कोड़ा कांग्रेस, बीजेपी या वाम मोर्चा या किसी भी अन्य बड़े दल में होते तो क्या यह सब होता जो हो रहा है.
होना यही चाहिए था- पर शायद होता नहीं.
चलते-चलते एक बात और.
राजनीति जनता की सेवा के लिए नहीं अपना उल्लू सीधा करने के लिए ज़्यादातर राजनेता करते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है.
पर पैसे और पद की जिस तरह की नंगी भूख पिछले दिनों कर्नाटक और महाराष्ट्र में देखी गई उसकी भी बहुत ज़्यादा मिसाल हमें देखने को नहीं मिली है. एनसीपी और कांग्रेस के बीच विभागों की खींचतान का एकमात्र मुद्दा यही था कि कौन सा विभाग और मंत्रालय कितना 'कमाऊ पूत' है. यही भूख और लालच कर्नाटक में बीजेपी सरकार पर आए संकट का केंद्र बिंदु थे.
पर चूँकि इन दोनों ही राज्यों में राष्ट्रीय दल इस घिनौनी खींचतान में शामिल थे, मीडिया की चाबुक कोड़ा पर ही अधिक चली.

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अदालत में आजतक कोई नेता दोषी साबित हुआ? सीधी बात यह है कि चुनाव से ठीक पहले एक अकेला मधु कोडा ही क्यों? पूरे देश में कुल मिलकर सौ पचास हज़ार राजनेता तो होंगे ही, और सबके सब कोड़ा से भी ऊपर होंगे, तो उनपर क्यों नहीं?
बहुत ही सही कहा, शायद आज की राजनीति में जो भी रहा वो केंद्र की सरकार के इशारों पर हो रहा है. जहाँ सरकार अपनी ग़लतियों को छुपाने के लिए जनता का ध्यान कहीं और केंद्रीत कर रही रही है. ये भी सही है कि यदि मधु कोड़ा किसी बड़े दल के नेता होते तो शायद उनकी ऐसी दुर्दशा नहीं होती.
बहुत सही कहा, हम क्यों सुखराम, ए राजा और ओम प्रकाश चौटाला जैसों को भूल गए?
संजीव जी मैं आप से पुरी तरह से सहमत हूँ. मैं अचरज में हूँ कि कोई भी राष्ट्रीय या राज्यस्तर का नेता इस तरह से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठा रहा है.
और हर कोई कहता है कि क़ानून अपना काम करेगा.
यहाँ मीडिया की ज़िम्मेदारी सबसे बड़ी हो जाती है. हमें लगाता है कि कोड़ा के साथ साथ अब तक हुए सभी घोटाले पर मीडिया को बाराबरी के साथ ध्यान देना चाहिए. क्योंकि जब इन मामलों को सामने नहीं रखा जाता, तो नेता इसका ग़लत फ़ायदा उठाते रहेंगे. ध्यान रहे मीडिया के अलावा इस मामलों को कोई ज़िंदा नहीं रखा सकता है.
संजीव जी आपने क्या नब्ज़ पकडी है यह सब राजनीति का खेल है सब अपना उल्लू सभी सीधा करने मे लगे हुए है आम जनता का ध्यान रखने वाले बहुत कम ही होंगे.
संजीव जी आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. आपने बिल्कु सही लिखा है.
इसमें जातवादी राजनीति भी हावी है. मधु कोड़ा छोटी जाती के हैं इस लिए उनके साथ ऐसा हो रहा है, जबकि राजनेताओं के घोटालेबाज़ होने की सूची काफ़ी लंबी है और इससे कोई भी राजनीतिक पार्टी वंचित नहीं है.
संजीव जी मुझे एक ही बाच पर आश्चर्य हो रहा है कि कोड़ा ने जितनी जल्दी और जिस तरीक़े से इतना पैसा बनाया उसकी भनक सीबीआई को तब क्यों नहीं लगी जब वो केंद्र की सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील सरकार की मदद से झारखंड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. कहीं ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने यूपीए सरकार में शामिल लोगों का हिस्सा नहीं दिया है इसलिए उनके साथ आज ऐसा हो रहा है?
मैं आपसे सहमत हूँ. ये सिर्फ़ एक झलकियाँ है. भारत में कोई भी बड़ी पार्टी या बड़े नेता को घोटाले या अन्य मामले में छू नहीं सकता. इसका इदाहरण महाराष्ट्र में राजठाकरे के कारनामे से भी देखा जा सकता है.
इस मामले पर बस यही कहा जा सकता है. " हर शाख़ पर जहाँ उल्लू बैठा हो, अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा"
संजीव जी आप जो भी लिख रहे है उससे हालात नहीं बदलने वाले हैं. ये चलता ही रहेगा.
संजीव जी बात बस इतनी- सी है कि अपने तन की कालिख को छुपाने के लिए दूसरों के कपड़े उतार कर ढंकने की कोशिश है | बदले की राजनीती, अपनी बिसात को बचाने के लिए निम्न दर्जे तक गिरना, सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग, चुनावी माहौल को देखकर गड़े मुर्दे उखाड़ना आज राजनीति का प्राय बन चुका है | यहाँ कोई साधू -संत नहीं है बस दूसरों को प्रवचन देना फितरत बन चुका है | यह हमारे देश की राजनीति के लिए अभिशाप मात्र है कि जरूरत पड़ने पर ऐरो गैरों के गले में बाहें डालकर रहना व मतलब निकल जाने पर गला काट अभियान छेड़ देना | खैर जो पकडा गया वही चोर | वरन यहाँ तो एक ही जमात है एक ही जात है | आज मधु कोडा का वक्त खराब है वरन सियासतदानों के लिए नियम -कानून व् जेलों की कोठरियां थोड़े न बनी हैं | साहब यह लोग तो बादाम गटककर चने का डकार लेकर मिसाल पेश करते हैं | मधु कोडा के नाम पर ढोल पीटने वालों को क्षण भर के लिए अपने गिरेबान में तो झांक लेना चाहिए |
संजीव जी, बात तो आपने बिल्कुल सही उठाया है. लेकिन सवाल उठता है की चाहे बड़ी पार्टी के नेता हो या छोटी पार्टी के, दोषी कौन है? इसका दोष भी देश की जनता पर ही मढ़ना चाहिए जो की सबसे ज्यादा इन नेताओ को कोसती है. हमारे समाज में एक परिपाटी बन गई है कि जैसे ही कोई नेता विधायक या सांसद बन जाता है या कोई नौकरशाही में प्रवेश कर जाता है, समाज में कोई इस बात पर सवाल नहीं करता है कि उसके पास इतनी संपत्ति कहाँ से आ गई. बल्कि लोग उसे स्वाभाविक रूप से स्वीकार भी कर लेते हैं. उन्हें समाज में विशेष प्रतिष्ठा भी देते हैं. हमारे समाज में जब कोई छोटा मोटा चोर पकड़ा जाता है तो उसे लोग बुरी तरह से मारते-पीटते हैं. लेकिन जब ये नेता और प्रशासक इतनी बड़ी-बड़ी चोरियां करते हैं तो इन नेताओ और प्रशासको पर कोई सवाल नहीं उठाता. बल्कि उन्हें समाज में ज्यादा इज्जत मिलती है. आज भी जब मधु कोड़ा पर कार्यवाही हुई है तो ये जनता के लिए कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है, क्योंकि उसे सब पाता है. अतः सवाल यहाँ मानसिकता को बदलने का है. जब तक ये मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक चाहे बड़ी पार्टी के नेता हो या छोटी पार्टी के, करप्ट होते रहेंगे और प्रभावी नेता कमजोर नेताओ पर कार्यवाही करके अपनी चोरी पर पर्दा डालते रहेंगे. आखिर सीबीआई जैसी संस्था को भी तो कुछ काम देना है, ताकि जनता उसके महत्व को समझे. तो ये सभी जनता को बहलाने के तरीके मात्र हैं. और इसके लिए दोषी भी जनता ही है.
सच तो ये है कि मधु कोड़ा अकेले नहीं हैं जिन्होंने झारखंड को दोनों हाथों से लूटा. उनके साथ निर्दलीय मंत्रियों की फौज और नौकरशाह से लेकर मीडियाकर्मी भी समान रुप से बहती गंगा में हाथ धोने का काम किये हैं. कोड़ा आदिवासी है. कम पढ़े-लिखे हैं. अवैध पैसे को हजम करने का तरीका नहीं जानते ,इसलिए आज सबकी नजर में हैं. बाकी भी कई लोग हैं जिनपर जांच होने की जरूरत है. सबसे दोषी तो कांग्रेस और राजद के वे नेता हैं तो जो सबकुछ जानते हुए एक निर्दलीय के नेतृत्व को कंधा देते रहे. क्या वे लोग ऐसे हीं बच जाएंगे.
फिर भी जो हो रहा है उसका स्वागत कीजिए संजीव जी.
मेरे विचार से मधु कोड़ा ने कुछ ग़लतियां की हैं और उन्हें उस पर क़ायम रहना चाहिए क्योंकि भारतीय राजनीति के हमाम में सब एक से हैं.
हम लोग भ्रष्टाचार पर गला फाड़ते हैं कि राजनीति बहुत गंदी हो चुकी है. हम जब यह मानते हैं कि कोई आदमी भ्रष्ट है फिर उसे जिता कर संसद, विधान सभा या राज्य सभा में क्यों भेजते हैं. भ्रष्ट नेता किसी जादू के ज़ोर पर एमपी या एमएलए तो नहीं बनता हम उसे बनाते हैं. सांप को दूध पिलाएंगे फिर कहेंगे कि सांप ने काट लिया.