« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

मैं बर्लिन वासी हूँ

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 10 नवम्बर 2009, 12:31 IST

9 नवंबर को 140 किलोमीटर लंबी 12 फुट ऊँची बर्लिन की दीवार ढहने की 20वीं वर्षगाँठ पर सब ख़ुश हैं.

बहुत से टीवी चैनल को जॉन एफ़ केनेडी की 26 जून, 1963 का वह लोकप्रिय भाषण बार बार याद आ रहा है जब उन्होंने बर्लिन की दीवार के साए में बने हुए मंच पर वामपंथी तानाशाही को ललकारते हुए कहा था कि आज मैं बड़े गर्व से कहता हूँ, "ईख़ बिन आईन बर्लिनर" (मैं बर्लिन वासी हूँ).

लेकिन आज किसी को याद नहीं कि पूर्वी जर्मनी की वामपंथी सरकार ने अगस्त 1961 में बर्लिन के विभाजन के लिए बाड़ लगाने का काम शुरु किया तो कुछ महीनों बाद वाशिंगटन की ओर से क्रेमलिन को संदेश भेजा गया कि अमरीका बर्लिन की दीवार को एक अंतरराष्ट्रीय यथार्थता के रूप में स्वीकार करता है और इस प्रक्रिया को ताक़त के ज़रिए चुनौती नहीं दी जाएगी.

केनेडी प्रशासन की ओर से दिलाए गए आश्वासन के 25 साल बाद 12 जून, 1987 को उसी बर्लिन की दीवार के साए में एक और अमरीकी राष्ट्रपति रोनॉल्ड रेगन ने कहा, "गोर्बाचौफ़ इस दीवार को गिरा दो."

लेकिन बर्लिन की दीवार ढहने से दो महीने पहले रेगन की प्रिय मित्र ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर ने मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ से मॉस्को में मुलाक़ात के दौरान कहा कि हम एक संयुक्त जर्मनी नहीं चाहते. इससे विश्व युद्ध के बाद की सीमाएँ परिवर्तित होनी शुरु हो जाएँगी. हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते. इस प्रकार की प्रगति से न केवल अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा को हानि पहुँचेगी बल्कि हमारी संप्रभुता भी ख़तरे में पड़ सकती है.

मार्गरेट थेचर और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ़ाँसवा मितराँ को यह साझा ऐतिहासिक डर लगा हुआ था कि संयुक्त जर्मनी यूरोप का सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश बन जाने के बाद दूसरे विश्व युद्ध से पहले के जर्मनी के मुक़ाबले में महाद्वीप में ताक़त का संतुलन बिगाड़ने की ज़्यादा बेहतर स्थिति में होगा.

बर्लिन की दीवार के ढहने की 20वीं वर्षगाँठ के जश्न में अमरीकी विदेश मंत्री हेलरी क्लिंटन ने भी भाग लिया.

यह वही हिलेरी क्लिंटन हैं जिन्होंने 2005 में बतौर सेनेटर कहा था कि फ़लस्तीनी पश्चिमी तट और इसराइल के बीच उठाई जाने वाली 703 किलोमीटर लंबी, 30 फुट ऊँची दीवार और रुकावटें उठाने की शेरोन की परियोजना के पक्ष में हैं.

हालाँकि वे अच्छी तरह जानती थीं कि 2003 में संयुक्त राष्ट्र महासभा और 2004 में अंतरराष्ट्रीय अदालत एक ऐसी दीवार के निर्माण को अवैध क़रार दे चुकी थी जिसके नतीजे में प्रस्तावित फ़लस्तीनी राज्य का क्षेत्र न केवल साढ़े आठ प्रतिशत और घट जाएगा बल्कि लगभग पौने तीन लाख फ़लस्तीनी या तो इसराइल और पश्चिमी तट के आरपार विभाजित हो जाएँगे या दीवार के कारण पूरी तरह घिर जाएँगे.

सिद्ध क्या हुआ? सिद्ध यह हुआ कि बर्लिन की दीवार शीतयुद्ध की ज़रूरत भी थी और पश्चिमी देशों के हाथ में वामपंथियों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का ऐसा हथियार भी जिसे वह आख़िर तक खोना नहीं चाहते थे.

लेकिन इसराइल और फ़लस्तीन के बीच उठाई जाने वाली दीवार अगर बर्लिन की दीवार से कहीं बड़ी और ऊँची हैं, इसके बावजूद कोई यूरोपीय और अमरीकी नेता इस दीवार के साए में यह नारा लगाने पर तैयार नहीं कि "ईख़ बिन आईन फ़लस्तीनियन" (मैं फ़लस्तीन वासी हूँ).

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:11 IST, 10 नवम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    बहुत ख़ूब "अपने-अपने हित हैं. "उसूल ताक पर, जो मैं कहूँ वही उसूल है, इसी धारे पर आजकी दुनिया चल रही है.

  • 2. 17:12 IST, 10 नवम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    ख़ान साहब खूब लिखा है, ज़ोरदार लिखा है. शीत युद्घ के अवशेष जो कभी किसी के रुतबे की निशानी हुआ करते थे, किसी की जरूरत थे तो किसी के दिलों पर गुजरे वक्त के सितमों की दास्ताँ उकेर गए. यूरोप का विभाजन और एलाइड पावर्स का खेल जिसके भयावह परिणाम कई जिन्दगिंयों को मौत और विछोह के साग़र में डूबा गए. यह तो इतिहास है जिसका पहिया रुकता नहीं. अब गिनती के वामपंथी देश बचे हैं और न ही इसका सूत्रधार सोवियत संघ बचा. बचे हैं तो बस बुरे वक्त के निशान जो मिटने के बाद भी सरमायादारों और मतलबपरस्तों की चाहत की छाप कहीं न कहीं सदियों तक छोड़ते रहेंगे. रही बात इसराइल और फ़लस्तीन के बीच उठाई जाने वाली दीवार की तो गोद में पूत को बैठाकर कौन चिकोटी कटेगा. मतलब कि राजनीति है इस्तेमाल करो और बाद में गर्त में डालो. लेकिन एक बात तो तय है समय हमेशा एक सा नहीं रहने वाला. सोवियत संघ नहीं बचा तो औरों की बारी भी आनी है. सूरज हमेशा अस्त भी होता आया है.

  • 3. 18:12 IST, 10 नवम्बर 2009 Parvez Ahmad:

    काफी अच्छा लेख है "काश ऐसा हो पाता"

  • 4. 20:36 IST, 10 नवम्बर 2009 ghanshyam tailor:

    दीवार नहीं पुल बनाने चाहिए और दीवार गिरानी चाहिए.

  • 5. 23:19 IST, 10 नवम्बर 2009 Rajnit Kumar:

    भाई साहब आपने भारत और पाकिस्तान के बीच की दीवार की कोई चर्चा नहीं की. आख़िर इस दीवार ने भी हमें बाँट रखा है. ये दीवार कब गिरेगी?

  • 6. 03:16 IST, 11 नवम्बर 2009 Girish Bene:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब, आपका हर लेख मैं बड़े ध्यान से पढ़ता हूँ. आपके लेख का शीर्षक पढ़कर लगा कि आप भारत और पाकिस्तान के बीच की दीवार गिराने की बात करेंगे. लेकिन मैं भूल गया कि आप वुसतुल्लाह ख़ान हैं. लगता है कि भारत के लोग आपके कुछ नहीं लगते. धर्म से ऊपर उठकर सोचना अब शायद नामुमिकन सा हो गया है.

  • 7. 08:13 IST, 11 नवम्बर 2009 VIRMA RAM:

    बर्लिन की दीवार गिराने में जर्मन नागरिकों की भूमिका सबसे अहम थी. लेकिन इसराइल और फ़लस्तीनियों में पश्चिमी देशों ने कभी खत्म न होनेवाली दूरियाँ पैदा कर दी हैं. इसराइल के पक्षधरों के चंगुल में फंसा अमरीका शायद कभी ऐसी बात कह पाए. ख़ान साहब क्या हम नोबेल पुरस्कार विजेता ओबामा से ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं?

  • 8. 13:22 IST, 11 नवम्बर 2009 Wasim Raza:

    अच्छा है. आपसे और अच्छा लिखते रहने की उम्मीद है.

  • 9. 21:37 IST, 11 नवम्बर 2009 abhishek gupta , bareilly:

    अच्छे विचार हैं आपके. लेकिन भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में अगर बात करें तो यह बात शायद एक सपने से कम नहीं है. दीवार कम, आपसी रिश्तों में खाइयाँ ज़्यादा बन गई हैं. बस केवल इतना कर सकते हैं कि एक-दूसरे को नुक़सान पहुँचाना बंद कर दें. प्यार नहीं तो लड़कर भी किसी को क्या फ़ायदा मिला है आज तक.

  • 10. 22:40 IST, 12 नवम्बर 2009 mohd shamim saudi arbia:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है.

  • 11. 22:27 IST, 13 नवम्बर 2009 Ayaan Md Ali Zaidi:

    ख़ान साहब क्या ख़ूब लिखा है आपने, ग़ौर से देखने पर यह बात आईने की तरह साफ़ हो जाती है कि दीवार के पीछे नेताओं की गंदी सियासत है. अब हमें चाहिए कि हम अपने दिल में खिंची दीवारों को ख़ुद गिराएं और एक दूसरे को समझना शुरू करें.

  • 12. 13:44 IST, 21 नवम्बर 2009 manoj:

    जो लोग विभाजन के हक़ में हैं और उसे बढ़ावा देते हैं वो भी विभाजन का दर्द ज़रूर पाएंगे एक दिन.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.