धन-तन फूँक तमाशा देख!
माफ़ कीजिएगा, मैं फिर से साइकिल का ज़िक्र छेड़ रहा हूँ. लगता है साइकिल सचमुच मेरे दिमाग़ पर तारी हो गई है. बात ये है कि जब साइकिल चलाने का मौक़ा नहीं मिलता है तो मैं घर से बुश हाउस का सफ़र उसी तरह तय करता हूँ जैसे लंदन में लाखों लोग करते हैं यानी भूमिगत रेल के ज़रिए जिसे अंडरग्राउंड कहा जाता है.
अभी कल ही डिब्बे के भीतर एक विज्ञापन-तख़्ती पर नज़र पड़ी जिस पर लिखा था - "शराब के दुरुपयोग की वजह से इंग्लैंड की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा पर हर वर्ष दो अरब 70 करोड़ पाउंड का बोझ पड़ता है."
मेरे ख़याल से इसे रुपए में आँकने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि नुक़सान तो यहाँ इंग्लैंड में ही हो रहा है. इस समस्या से भारत में होने वाला जान-माल का नुक़सान आपसे छुपा नहीं.
दरअसल बात ये है कि ब्रिटेन सरकार इस समस्या को लेकर ख़ासी परेशान है कि लोग देर रात तक शराब पीते हैं और अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा पीते हैं. अब किस आदमी को कितनी शराब पीने की ज़रूरत है, ये कौन तय करे. शराब पीने वाले कहते हैं कि दो-चार-छह गिलास पी लेने से कुछ नहीं होता लेकिन सरकार और अनेक संगठनों का कहना है कि इससे शराब पीने वालों (मैं 'शराबी' नहीं कहना चाहता) की सेहत तो ख़राब होती ही है, समाज को भी नुक़सान होता है.
अब कोई सरकार से पूछे कि शराब पीने वाले ख़ुद का धन ख़र्च करते हैं तो समाज का नफ़ा-नुक़सान इसमें कहाँ से आ गया.
लंदन के मौजूदा मेयर बोरिस जॉन्सन ने तो एक जून 2008 से लंदन में सरकारी बसों और रेलगाड़ियों में शराब पीने पर ही पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी. उनके ख़याल में लोग शराब पीकर बसों और अंडरग्राउंड रेलगाड़ियों में हुड़दंग करते थे. यहाँ लंदन पुलिस भी कूद पड़ती है, जो कहती है कि ज़रूरत से ज़्यादा शराब पीने के बाद लोग रात को मयख़ानों-क्लबों के आसपास और सड़कों पर हुड़दंग करते हैं जिससे सामाजिक माहौल में ख़लल पड़ता है.
बहरहाल, मुझे ये सोचकर तो बहुत तसल्ली होती है कि यहाँ इंग्लैंड में ज़हरीली शराब को किसी की जान लेते नहीं देखा है, जैसाकि भारत में अक्सर होता है.
भारत की ही बात आगे बढ़ाएँ तो सड़कों पर हर कोस-दो कोस के फ़ासले पर शराब की दुकानें नज़र आ जाएंगी जो ठंडी-चिल्ड बीयर और देसी शराब धड़ल्ले से बेचती हैं. मैं सोच रहा था कि भारत में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों के बजाय क्या वाक़ई शराब की दुकानों की इतनी ज़रूरत है.
क्या कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है जिसमें लोगों को बोतलबंद पानी और महंगे कोल्ड ड्रिंक्स पर अपनी कमाई ना ख़र्च करनी पड़े और मुफ़्त मिलने वाला पानी बीमारियों और उनकी मौत का कारण ना बनें...
मेरे ख़याल से अगर शराब इतनी ही ज़रूरी है तो सरकार को चाहिए कि लोगों को शराब मुफ़्त बाँटने लगे! इससे उनका धन तो बचेगा जो रोटी-पानी ख़रीदने के काम आएगा! मुझे तरस इस बात पर भी आता है कि ऐसे लोग अपनी भलाई के बारे में सोचने की ज़िम्मेदारी किसी और पर क्यों छोड़ देते हैं. वे शराब पर अपना पैसा भी ख़र्च करते हैं और डॉक्टरों की बात मानें तो ख़ुद ही अपनी जान के दुश्मन भी बनते हैं. ये तो वही बात हुई - धन-तन फूँक तमाशा देख.
आप क्या कहते हैं....

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खान साहब बहुत सही लिखा है आपने | दरअसल शराब के नाम पर हमारे यहाँ बहुत से आडम्बर होते हैं | पहला आडम्बर पीने वाला करता है जो कि थोड़ी बहुत पीने के बाद पियक्कड़ होने का ढोंग करता है | दूसरा आडम्बर सरकार करती है शराब पर अधिकतर टेक्स लगाकर कि शायद पीने वाले कम हो जाएँ | लेकिन असर इसका उल्टा ही हुआ है | क्योंकि पीने वाला तो पीएगा ही चाहे शराब कितनी ही महँगी क्यों न हो जाए | कुछ राज्यों ने नशाबन्दी लगाकर भी देख लिया लेकिन उसके भी परिणाम अच्छे निकल कर नहीं आये उल्टे अनैतिक व अवैध तरीके से शराब पीने -पिलाने व बिक्री से भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया | अनगिनित मौतें अवैध शराब सेवन से हुईं वह एक अलग पहलू है | एक बात और सामने निकल कर आती है कि शराब महँगी होने से आम पीने वालों की आमदनी तो वहीं के वही है तो पीने वाले अनैतिक तरीकों की तरफ अग्रसर हो जाते हैं | यह एक कड़वा सच है कि मनाही वाली तमाम चीजें अवैध तरीके से बिकने से राष्ट्र की आर्थिक शक्ति में सेंध लगती है | दूसरा कड़वा सच यह भी है कि आज हमारे देश में पानी के नाम पर कई स्वदेशी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मालामाल हो रहीं हैं | आलम यह है कि मुख्य स्थलों पर जहाँ पर सरकार मुफ्त साफ़ व पीने लायक पानी उपलब्ध करवा सकती है वहां धड़ल्ले से बोतल बंद पानी बेचा जाता है नगर निगम के नलों का पानी जो हजम कर जाए वह तो भाग्यशाली है | अगर आप भारतीय महामार्गों पर निकल जाएँ तो फर्स्ट ऐड तक की जगह मीलों दूर तक नहीं मिलेगी जबकि देशी ,अंगरेजी शराब की दूकानें हर मोड़ पर मिलेंगीं | शराब मुफ्त मिलने लगे तो एक बात तो तय है कि अवैध बिक्री से भ्रष्टाचार में कमी तो आयेगी व् पीनी पिलाने के लिए मारा - मारी भी नहीं होगी व कम से कम आम आदमी शराब के नाम पर रोटी से समझौता नहीं करेगा | वैसे शराब कुछ राजनितिक त्योहारों मेरा मतलब चुनावों के मौसम में, राजनितिक रैलियों में खूब शराब मुफ्त मिलती है | आम आदमी भूख से, बीमारी से, या फिर अवैध शराब से मरे इससे राजनीति को कोई फर्क नहीं पडेगा |
महबूब साहब, बहुत सुंदर लिखा है लेकिन क्या भारत में ज़हरीली शराब रुक सकेगी? कभी नहीं क्योंकि बनवाने वाले और बेचने वाले सब बेईमान हैं और उन पर नेताओं का हाथ है. और यह हाथ कभी नहीं रुक सकता है जब तक भारत में प्रजातंत्र रहेगा. जब तक पीने वाले को ख़ुद अहसास नहीं होगा कि उसके घर में बच्चे भूखे सोते हैं और वह ज़हरीली शराब का सेवन करता है.
महबूब जी..... मुझे आपकी सोच पर तरस आता है. क्या कह रहे है आप..? कि शराब मुफ्त मिले... अजी जनाब जब शराब पैसे में मिल रही है तब ये हाल है तो मुफ्त मिलेगी तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते की क्या हो..? हमने अभी तक तो ये देखा है की शराब से कोई न तो सामाजिक ढांचे में अच्छा परिवर्तन आया है. आप मुझे एक भी फायदा बता दीजिये की शराब से इस व्यक्ति का शारीरिक विकास हुआ, सामाजिक विकास हुआ, आध्यात्मिक विकास हुआ, भारत जो कि अपनी अच्छी मान्यताओ के लिए जाना जाता है, उनका क्या होगा..? यहाँ पर पग-पग पर अलग-अलग परम्पराएं है. लोग शराबी कि कितनी इज्जत करते है ये सब जानते है. आप शराब को मुफ्त करने के बजाये आम सुविधाओं की बात करें जैसे कि, बिजली, पानी, शिक्षा, हॉस्पिटल, दवाएं इनको मुफ्त करें. आज देश में मूलभूत आवशयकता की चीजों की कीमतें आसमान छु रही है उन्हें मुफ्त करने की बात करें. शराब ने समाज को क्या दिया...? परिवार में बिखराव, लड़ाई, आये दिन गली गलोच, जब अभी ये हाल है तो बाद में क्या होगा? शरब पीनेवाले अपने पैसे की पीते है तो इसमें आपको क्या प्रॉब्लम... ये सवाल अच्छा है तो उन लोगों के लिए सलाह है की अगर अपना घर फूंक कर तमाशा देखना आपको अच्छा लगता है तो आप फ्री है, जो इच्छा है जो करें, लेकिन आपके काम से दूसरो को प्रॉब्लम नहीं होना चाहिए. जो भी करें अपनी रिस्क पर करें, दूसरो को परेशान करने का, उनकी जिंदगी में दखल देने का आपको कोई हक नहीं है. और और भी ज्यादा तमाशा देखना है या ज्यादा मज़ा लेना है तो ऐसे लोगों को "ज़हर" भी पीकर देखना चाहिए. ये आपने बहुत अच्छी बात कही है कि भारत जैसे देश में आज हर जगह शराब कि दुकाने खुली हुई है, जो चिंता का विषय है. आज यहाँ पर दवाई कि दूकान से पहले शराब कि दूकान खुलती है... क्या ये इतनी ज़रूरी है कि देश के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो. और आपने ये भी बताया है कि कोई ऐसा रास्ता निकाला जाये कि लोगों को कोल्ड ड्रिंक्स और बोतल बंद पानी पर पैसे खर्च न करने पड़े तो इसके लिए हम सबको ही कुछ करना पड़ेगा और कोल्ड ड्रिंक्स में आये दिन क्या-क्या निकलता है ये भी आप और हमसे छुपा नहीं है, तो कोल्ड ड्रिंक्स को बंद कर देना चाहिए. और अगर आप समाज को सुधारना चाहते है तो समाज में से "शराब" को निकलना पड़ेगा, इसे भी बंद कर देना चाहिए. आपको एक बात बताना चाहूँगा कि लन्दन और इंडिया में बहुत अंतर है, वहां कि परिस्थितियाँ और हमारी परिस्थितियों में रात-दिन का फर्क है, तो हमे उनकी अच्छी बातों को ग्रहण करना चाहिए न कि बुरी बातों को.
गुजरात में शराब पर मनाही है क्योंकि पूरे गुजरात में अवैध शराब बेचने वाले पुलिस और राजनेताओं को हर महीने लाखों रुपए देते हैं. अगर शराब पर से पाबंदी हट जाए तो फिर इन लोगों को मुफ़्त पैसा कौन देगा.
हार्ड ड्रिंक्स को किसी भी तरह से अच्छा नहीं कहा जा सकता लेकिन अगर उन्हें हल्की मात्रा में लिया जाए तो उचित कहरा जा सकता है. लेकिन भारत में लोग पीने की सीमा से परिचित नहीं है. वो पीने में एक दूसरे की होड़ करते हैं, कभी तो वो ख़ाली पेट भी पीते हैं, इस मामले में तो बहुत थोड़ी सी मात्रा भी ख़तरनाक साबित हो सकती है. समाज मे दरअसल दोहरे मानदंड चलते हैं. कोई सामान्य व्यक्ति शराब पीता है तो हायतौबा होती है जबकि अमीर आदमी के शराब पीने की आदत को प्रतिष्ठा का प्रतीक समझा जाता है. उत्तर अमरीका में कहा जाता है - REMEMBER WHISKEY IS NOT NEW WATER. जहाँ तक भारत का सवाल है तो लोगों में शराब के बारे में पूरी जागरूकता नहीं है.
खान साहब, ........
जाने दीजिये शराब ही तो पीते है.....
अगर दूध पीते तो .....शायद बच्चो के लिए दूध नहीं बचता |
वैस भी दूध वाला अपने माथे पे दूध लेकर घूमता है लेकिन दूध शराब इतना नहीं बिकता है | शराब की दुकान पे "सरकारी शराब की दुकान" लिख कर शराब को बेचते है | जब किसी को अपने ही बारे में अच्छे-बुरे का ज्ञान ही नहीं है तो क्या किया जा सकता है........ लेकिन उसका परिवार बर्बाद होता है..... उसी को देख कर तो बच्चे भी पीते है | सरकार तो शराब की बोतल पे लिखवा दी है . शराब सेहत के लिए खतरनाक है | वैसे सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब भारत शराब पीने वालों में नम्बर एक पर आ जाये |
मैं आज तक ये नहीं समझ पाया कि शराब बनती ही क्यों है. लेकिन मैं दिल्ली में रोज़ देखता हूँ कि कुछ बच्चे और ग़रीब लोग शराब की ख़ाली पड़ी बोतल बेचकर पेट भरते हैं, क्या विडंबना है.
शायद शराब पीने से ग़म उठाने की ताक़त मिलती है. वो गाना भी हैं ना, 'ग़म उठाने के लिए मैं तो पीये जाऊँगा' मुझे लगता है कि आजकल शराब पीने की मुख्य वजह उसके प्रति आकर्षण है. . पाबंदी इसका समाधान है. लेकिन इसपर नज़र भी रखी जा सकती है ताकि ज़हरीली शराब बनकर बिक नहीं पाए.
महबूब ख़ान जी, बहुत अच्छा लगता है जब बीबीसी हिंदी पर इस प्रकार की महत्वपूर्ण समस्याएँ उजाकर होती हैं. और पाठकों द्वारा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते देख भी ख़ुशी होती है. पर क्या हम यूँ ही पढ़ते और लिखते रहेंगे? मैं सोचता हूँ कि काश वो सब हो पाता जिसके बारे में हम अपने विचार यहाँ रखते हैं. परंतु ऐसा नहीं होता, इसलिए मुझे ये सब केवल एक छोटी सी संतुष्टि ही देता है कि कुछ लोग तो हैं जो अच्छा सोचते हैं और शायद करते भी हैं. और फिर छोड़ जाते हैं एक बहुत बड़ी चिंता भारतीय समाज के लिए, भारतीय राजनीति के लिए. महबूब जी, ब्लॉग में आपका दिनेश भाई के लिए जवाब भी पढ़ा. तो मैं भी आपसे और बीबीसी हिंदी से पूछना चाहता हूँ कि इस प्रकार के ब्लॉग की उपादेयता क्या है. क्या हम इसकी उपयोगिता ज़मीनी नहीं बना सकते?
शराब पर पाबंदी कोई हल नहीं है. क्योंकि जिन्हें इनकी ज़रूरत है वे कहीं न कहीं से इसका उपाय कर लेंगे जिसके कारण एक और अवैध धंधा शुरू हो जाएगा. ज़रूरत है लोगों में इसके प्रति जागरुक्ता लाने की कि इससे किसी व्यक्ति, परिवार, समाज और देश पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. अगर सरकार बुनियादी ज़रूरतें पूरी करे तो लोग शराब की ओर नहीं जाएंगे. सुखी और स्वस्थ जीवन गुज़ारेंगे.
शराब बंद नहीं हो सकती. बस इस पर नियंत्रण हो सकता है.
महबूब जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन मेरा ख़याल है कि आप शायद एक बात भूल गए. भारतीय सेना में वाइन बहुत सस्ती मिलती है और जब कोई भी सैनिक घर जाता है तो उसका बैग शराब की बोतलों से भरा होता है. आप किसी शराब पीने वाले से पूछें कि वो शराब क्यों पीते हैं तो उनका कहना होता है कि यह थकान और मानसिक दबाव को दूर करती है और शराब पीने के बाद आदमी की कल्पना शक्ति सक्रिय हो जाती है.