ब्रिटेन के 'राज ठाकरे'
मैं उन अस्सी लाख लोगों में शामिल था जिन्होंने ब्रिटिश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के निक ग्रिफ़िन को गुरुवार की रात टीवी पर देखा, मैं उन लोगों में भी हूँ जिन्हें वे 'अपने देश' से निकाल देने का नारा बुलंद करते रहे हैं.
निक ग्रिफ़िन को देखकर लग रहा था कि राज ठाकरे थोड़े ज्यादा गोरे और मोटे हो गए हैं. दोनों ही मुझ जैसे लोगों को अपनी 'प्रिय मातृभूमि' से भगा देना चाहते हैं.
ग्रिफ़िन अगर 'गंदे भूरे' लोगों से कुछ सीखना चाहें तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के राज ठाकरे उन्हें बहुत कुछ सिखा सकते हैं, ख़ास तौर पर तोड़फोड़ और मारधाड़ के मामले में.
ठाकरे की तुलना में ग्रिफ़िन की हालत यूँ भी थोड़ी कमज़ोर रही है क्योंकि ब्रितानी मीडिया ने तय नीति के तहत उन्हें लगभग पूरी तरह 'ब्लैकआउट' कर रखा था, धमकियों के सीधे प्रसारण का ठाकरे वाला सुख उन्हें नसीब नहीं रहा.
जब ग्रिफ़िन को बीबीसी टीवी ने अपने प्रतिष्ठित कार्यक्रम 'क्वेश्चन टाइम' ( प्रश्न काल ) में शामिल होने का न्यौता दिया तो ज़ोरदार बहस छिड़ गई. बहस इतनी तीख़ी हुई कि कई सांसदों ने बीबीसी पर मुकदमा करने की धमकी दी.
ब्रितानी मंत्रिमंडल दो ख़ेमों में बँट गया, एक समूह बहस के ज़रिए उनकी नीतियों की पोलपट्टी खोलने का हामी था, तो दूसरा उन्हें मंच दिए जाने के सख़्त ख़िलाफ़. बीबीसी के दफ़्तर के बाहर तरह-तरह के गुटों, यहाँ तक कि पत्रकारों ने भी उन्हें टीवी पर दिखाए जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.
ग्रिफ़िन के सही या ग़लत होने पर कोई बहस नहीं थी. वैसी भी उनकी नीतियाँ इतनी ब्लैक एंड व्हाइट हैं कि बहस की कोई गुंजाइश है भी नहीं, बहस इस बात पर थी कि 'गोरे लोगों के वर्चस्व' की घोर अलोकतांत्रिक राजनीति करने वाले व्यक्ति के बहिष्कार का फ़ैसला क्यों बदला जाए?
लोकतंत्र के तकाज़े कई बार उसकी जड़ें खोदने वालों के ज्यादा काम आते हैं.
उन्हें टीवी पर दिखाए जाने की सबसे बड़ी दलील ये थी कि अगर उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, चुनाव जीतने से नहीं रोका जा सकता तो फिर एक निर्वाचित जन-प्रतिनिधि को टीवी पर आने से कैसे रोका जा सकता है?
बहरहाल, वे टीवी पर आए. लोगों ने बीसियों बार साबित किया कि वे झूठ बोल रहे हैं, अपनी वीडियो रिकॉर्डिंगों तक से मुकर रहे हैं, उन्हें इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान...किसी विषय की समझ नहीं है.
सिर्फ़ गोरे लोगों को अपनी पार्टी की सदस्यता देने वाले ग्रिफ़िन बार-बार यही कहते रहे कि "यह कितने दुख की बात है कि ब्रिटेन जैसे देश में एक गोरे ईसाई का मुँह बंद कराया जा रहा है".
मुख्यधारा की तीनों पार्टियों के नेताओं ने कहा कि ग्रिफ़िन बेनकाब हो गए हैं और अब उनकी राजनीति का अंत हो जाएगा लेकिन अगले दिन ख़बर आई कि तीन हज़ार लोगों ने उसी रात उनकी पार्टी की सदस्यता की अर्ज़ी दी जब वे टीवी पर आए.
मीडिया के 'ऑक्सीजन की सप्लाई' एक बहुत पेचीदा मामला है, यह सप्लाई किसको, किन परिस्थितियों में, कितनी मिलनी चाहिए इसका कोई सीधा या सही-ग़लत जवाब किसी के पास नहीं है.

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एक जानकारी मिली. धन्यवाद।
ये ब्लॉग तो काला अक्षर भैंस बराबर निकला, अगले ब्लॉग का इंतिज़ार रहेगा. लिखते रहिए और प्रभु के गुण गाते रहिए. आपकी लेखनी मस्ती है.
राजेश जी ये मानकर चलिए कि राज ठाकरे, प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल जैसे लोग हर देश और हर काल में मिल जाएंगे जो अपने स्वार्थ के लिए लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं और उसके ऊपर राजनीति की रोटी सेंकते हैं. भारत में ये बात बहुत पहले से है, लेकिन ऐसा इंग्लैंड में भी होता है जानकर थोड़ी हैरत हुई. निक ग्रिफ़िन अगर इंग्लैंड में ये बोली बोलते हैं तो ये मानकर चलिए कि महाराष्ट्र और भारत के राजनीतिक दलों वाली स्थिति नहीं होने वाली है. महबूब भाई के एक ब्लॉग में मैंने एक बार पढ़ा था कि वहां के मेयर भी साईकल से चलते हैं इसके लिए उन्हें कोई शर्मिंदगी नहीं होती. इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि ग्रिफ़िथ नफ़रत की भाषा बोल कर इंग्लैंड के लोगों को अपने पक्ष में नहीं कर सकते क्योंकि नफ़रत की फ़स्ल के लिए बेकारी की खाद बहुत ज़रूरी है. और इंग्लैंड में फ़िलहाल तो वैसी स्थिति नहीं है, लेकिन ग्रिफ़िथ के इस तरह की भाषा बोलने के पीछे ज़रूर कोई वजह रही होगी. उन्हें लगा होगा कि राजनीति चमकाने के लिए ये हथकंडा सही होगा.
अच्छा लिखा है
आश्चर्य होता है कि अभी भी ब्रिटेन में गोरा, भूरा शब्दों का इस्तेमाल होता है. ग्रिफ़िन जैसे लोगों का ऐसा कहना उनके मानसिक दिवालिएपन का द्योतक है. बीबीसी ऐसे लोगों को क्यों मंच प्रदान करती है? विडंबना है कि मीडिया इन लोगों के हाथों का खिलौना है.
सबसे पहले राजेश प्रियदर्शी जी को लाख बधाइयों कि इस तरह की जानकारी देने के लिए. ब्रिटेन के निक ग्रिफ़िन जैसे लोग हर जगह मौजूद हैं. ये अपनी पॉपुलियरिटी केलिए गलत-सलत बयान देते हैं. उन्हें इसके अंजाम की चिंता नहीं रहती.
राज ठाकरे जैसे लोगों की वजह से ही मीडिया की रोज़ी-रोटी चलती है. जिस तरह से राज जैसे लोग राजनीति चमकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं उसी तरह आज मीडिया की भी स्थिति है. मीडिया भी पहले हम तो पहले हम के चक्कर में राज जैसे नेताओं को ऑक्सीजन सप्लाई करता है.
राज ठाकरे आधुनिक जिन्ना हैं.
मूल निवासियों की समस्या उन लोगों के लिए नहीं है जो स्थानीय संस्कृति का सम्मान करते हैं और शांति व भाइचारे के साथ रहते हैं. यह समस्या उन लोगों के साथ है जो बिना घर, पैसे और परिवार के साथ पलायन करते हैं. उनसे है जिनका वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. जय बच्चन मे स्थानीय संस्कृति का कैमरे पर अपमान किया लेकिन किसी भी हिन्दी बोलने वाले ने उनका विरोध नहीं किया. महाराष्ट्र एक आधुनिक राज्य बन गया है जहाँ विभिन्न संस्कृतियों और भाषा के लोग एक साथ रहते हैं.
यह बहुत ख़ेदजनक है कि कई बार जो लोग नस्लवाद का समर्थन करने में असमर्थ हैं वे यह आरोप लगाते हैं कि अच्छी नौकरियाँ प्रवासी लोग ले ले रहे हैं. नेता लोग इस तरह का व्यवहार कर वोट प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं.
अपने ही घर में अपना हक़ माँगने में क्या ग़लत है.
यह बहुत दुखद है कि एक पढ़े-लिखे देश के लोग इस तरह का घटिया व्यवहार कर रहे हैं. यह उनकी घटिया मानसिकता को दर्शाता है. उन्हें इस पर शर्म आनी चाहिए.
राज ठाकरे किसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं वो तो सिर्फ़ स्थानीय लोगों के अधिकार की बात कर रहे हैं. ऐसा हर देश में हो रहा है कि जहाँ सरकार स्थानीय लोगों को दरकिनार कर शासन कर रहे हैं, ऐसे हम राज को नकार नहीं सकते.
बहुत बढिया राजेश जी.
राजनीति के गंदे खेल को हम कैसे रोकें.