विधान सभा चुनावों से मिल रहा संदेश
चुनाव के बाद हमेशा बहुत कुछ कहा जाता रहा है. महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश और हरियाणा के चुनावी नतीजे हमारे सामने आ रहे हैं. इन से स्पष्ट होता है कि मतदाता ने कोई जोखिम नहीं उठाया है. उसने कांग्रेस पार्टी (महाराष्ट्र में गठबंधन) को दोबारा इन राज्यों में सत्ता सौंप देने का इरादा किया है.
यह भी स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक हालत चिंताजनक है. शायद परिणामों के कारण भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर ही हल्ला बोल दिया. पर जब उनको अपनी ग़लती का आभास हुआ तो नक़वी साहब दोबारा टेलिविज़न पर आये और उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया.
तीनों राज्यों के मतदाताओं ने साफ़ कर दिया है कि वे यथास्थिति को बदलने के मूड में नहीं हैं. अरुणाचल प्रदेश को तो अलग नज़र से देखना ही चाहिए क्योंकि उत्तरपूर्व का राज्य होने की वजह से बाकी देश इसकी राजनीति में अधिक रूचि नहीं दिखाता है.
अगर लोक सभा और अब विधान सभा के चुनावों से कोई सीख मिलती है तो वह यह है कि जनता चाहती है की उनके प्रतिनिधि कुछ कर के दिखाएँ. भाषण बहुत हुए -- इलेक्शन से पहले और इलेक्शन के बाद. अब समय आ गया है कि चुने हुए प्रतिनिधि जनता-जनार्दन की सेवा में जुट जाएँ.
एक बात और. घृणा की राजनीति से भी लोग ऊब गए हैं. तक़रीबन दो दशकों के बाद ऐसा हुआ है. जिन राजनीतिक दलों ने घृणा फैलाने का काम किया वो समझ रहे होंगे कि उनका दबदबा कुछ कम होता नज़र आ रहा है.
अब घृणा की राजनीति बहुत हुई. बेहतर होगा कि अब हमारे विधायक और सांसद ग़रीबी, पानी, बिजली और चिकित्सा जैसे मुद्दों पर ग़ौर करें.
मेरे लिए तो लोक सभा और अब विधान सभा के चुनावों का यह ही मतलब है. आप को जनता ने मौका दिया है, आप कुछ करेंगे या नहीं?
इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले लोक सभा चुनावों में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की छवि की वजह से कांग्रेस पार्टी को फायदा हुआ.
लोगों को यह लगा कि सिंह साहब भले आदमी हैं जो देश के लिए कुछ करना चाहते हैं. राजनीति और सत्ता में इतने साल के बाद भी उन पर किसी तरह का व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा है.
मेरी यह अपेक्षा है और आशा भी कि नए (और पुराने) मुख्यमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को मिसाल बनाकर अपने राज्यों की जनता की ज़िंदगियां बेहतर बनाने के लिए छोटे और बड़े कदम उठाएंगे.

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बीबीसी का कॉंग्रेस की ओर इतना रुझान क्यों हो रहा है जबकि सबको पता है कि कॉंग्रेस ने किस तरह ग़रीबों का जीना दुश्वार कर रखा है. रहा सवाल चुनाव में नेता जीत कर कुछ जनता का भला करेंगे तो यह तो आज़ादी के बाद से ही नहीं हुआ और न ही होगा.
यह लेख समय की माँग को दिखाता है. मैं पूरी तरह सहमत हूँ. लोगों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पाँच साल और शासन चलाने का मौक़ा देना चाहिए.
कॉंग्रेस को सत्ता में रहने का जनादेश तो मिल गया है लेकिन परिणामों से जनता की लाचारी स्पष्ट है कि उनके पास कोई ऐसा नहीं है जिसको चुन कर उन्हें कोई लाभ हो. भारतीय जनता पार्टी सरीखी पार्टियों को जनता मौक़ा देने का रिस्क नहीं ले पा रही है तो अन्य दलों और कॉंग्रेस की ओर केवल इस उम्मीद से देख रही है कि शायद उनका कुछ कल्याण हो सके.
चलिए हम ख़ुश हो लें. केंद्र से भेजी गई राशि इन तीन राज्यों में सीधे जनता को मिलेगी क्योंकि भेजने वाले और ख़र्च करने वाले एक ही हैं.
बरुआ साहब, घृणा फैलाने वालों का अंत हो रहा है लेकिन नए घृणा फैलाने वाले भी पैदा हो रहे हैं. इसका श्रेय भी कॉंग्रेस को जाता है. बाद में तफ़सील से राजकाज पर लिखूँगा.
अंग्रेज़ी में एक कहावत है, गिव मी अ ब्रेक...लेकिन भारतीय जनता चाह कर भी कॉंग्रेस को यह नही कह पाती क्योंकि कॉंग्रेस के अलावा अभी और शायद अगले पाँच साल तक कोई भी राष्ट्रीय दल नहीं है जो देश चला सके. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में अन्य सभी पार्टियाँ घृणा, जात-पात और धर्म से ऊपर नहीं उठ पाई हैं. कॉंग्रेस इस मामले में उनसे बेहतर नज़र आती है. साथ ही उनकी ब्रांड वैल्यू परखी हुई है. वह कहते हैं न, मजबूरी का नाम गांधी....लेकिन याद रहे यहाँ गांधी जी का मतलब सोनिया जी से है.
मुझे नहीं मालूम आपने किन तथ्यों के आधार पर ये लेख लिका है...लेकिन एक बात साफ करना चाहूंगा कि लोग कांग्रेस के कुशासन से निजात पाना चाहते हैं... लेकिन कांग्रेस ने ऐसी गोटी लगा कि जनता बेवकूफ बन गई... महाराषट्र में राज ठाकरे ने शिवसेना से बारह सीटें जीती हैं... लेकिन इससे कहीं ज्यादा करीब चलीस सीटों पर सिवसेना और बीजेपी को हराया है... ऐसे में कांग्रेस जीती है... गलत होगा.... असल में कांग्रेस ने राज को सामने करके अपनी राह बनाई है... वहीं हरियाणा में हुड्डा को अपनी औकात दिख गई है... ऐसे में मै आपसे कतई इत्तेफाक नहीं रखता।
आज के दौर में राजनीति में स्थिरता का दौर आना अच्छी बात है। दिल्ली, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, गुजरात के बाद फिर से हरियाणा, महाराष्ट्र तथा अरुणाचल प्रदेश में सत्ताशील पार्टी को ही जनता ने जनादेश दिया है। सत्ताशील पार्टी के कामकाज को आधार बनाकर जनता जनार्दन ने अपना फैसला दिया साथ ही घृणा, विरोध की राजनीति को सत्ता से बेदखल कर दिया। यह जनादेश केवल प्रदेश सरकार के कामकाज को ही जनादेश नहीं था बल्कि केन्द्र सरकार की बेहतर नीतियों का समर्थन भी है। इसलिए कांग्रेस विरोधी दलों को समझना होगा की आम आदमी की तरफ अपने कदम बढ़ाए। जनता के लिए बेहतर योजनाओं और सकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वाह कर लोकतंत्र को मजबूत करें।
जब देश 1947 में आज़ाद हुआ तब के हालात ध्यान में रख कर आरोप लगाना चाहिए और अन्य पार्टियों को सबक सीखना चाहिए कि वे समाज को बांटने और घृणा फैलाने का काम छोड़ दें.
हमारे पास दो ख़राब विकल्प थे, मेरे विचार में नागरिकों ने उस पार्टी को चुना जो इतनी बुरी नहीं थी जितनी दूसरी. यह एक महत्वपूर्ण फ़ैसला है क्योंकि भारत के नागरिकों में एकता है और उन्हें ऐसी किसी पार्टी की ज़रूरत नहीं है जो धर्म के आधार पर बांटने का काम करे. सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा...
क्या आपको सचमुच में लगता है कि कांग्रेस ने ऐसा कुछ किया है कि जनता उसे वोट दे. माफ़ करेंगे लेकिन हमें तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता. बल्कि चुनाव में तो आम लोगो से सम्बंधित मुद्दे गायब ही रहते हैं. यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस विदर्भ में इतनी अधिक संख्या में किसानो ने आत्महत्या कि वहां किसानो के मुद्दे गायब ही रहे. इतनी अधिक महंगाई के दौर में सरकार के खिलाफ वोट नहीं पड़ा. यह जनता के समक्ष विकल्प के आभाव को दर्शाता है. फिर भी मेरी समझ से कांग्रेस के इस जीत के किसी सकारात्मक पक्ष को देखा जाय तो वो केवल यह है कि बीजेपी सत्ता से बाहर है. बांकी कांग्रेस ने भी तो आम लोगो के खिलाफ ही राजनीति की है. इसीलिए आज जरुरत विकल्प के राजनीति की है न की कांग्रेस के गुणगान की.
बरुआ जी ने कहा है कि कांग्रेस को काम करने के लिए वोट मिला है, जबकि महाराष्ट्र में कानून व्यवस्था पिछले 10 सालों में बद से बदतर हो गई है. राजनीतिक फायदे के लिए राज ठाकरे को किस तरह से छूट दिया गया वह सबके सामने है. यह राज्य आर्थिक संपन्नता के कई पैमानों पर देश का सबसे अग्रणी राज्या था लेकिन आज गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्य इससे काफी आगे निकल गए हैं. हरियाणा में हुड्डा सरकार ने किस तरह जनता के पैसे का दुरुपयोग मीडिया को खुश करने में किया पूरी दुनिया ने देखा. चुनाव के पहले भी वोटरों को पैसे खूब बांटे गए.
यह घृणा की राजनीति क्या है और किसने फैलाई, इसका ख़ुलासा करते तो अच्छा था. मेरे ख़्याल में सबसे ज़्यादा घृणा की राजनीति कॉंग्रेस ने की है. उसी ने हिंदू-मुसलमानों को बांटा है.
बरुआ जी बधाई आपको. आपने जो लेख लिखा है वह समय की माँग है. आज के पढ़े-लिखे वर्ग के लिए विकास सबसे बड़ी चीज़ है. कोई भी सांप्रदायिक बन कर नहीं रहना चाहता है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो. इसी वजह से भाजपा को सब नकारने लगे हैं.
यह तो गणित की जीत है. यह संसदीय चुनाव की पुनरावृत्ति है. यदि कोई ऐसा नेता आ जाए जो विपक्ष को एकजुट कर सके तो कॉंग्रेस सत्ता से बाहर हो जाएगी.
मैं आपसे जानता चाहता हूँ कि क्या देश में मंहगाई नहीं है? क्या देश में ग़रीब दो वक्त की रोटी खाकर चैन से सोता है. क्या देश में कानून व्यवस्था ठीक है? यदि यह सब ठीक है तो आपका लेख बिलकुल ठीक है, यदि ऐसा नहीं है तो आपने खुलेआम कांग्रेस का पक्ष लिया है. ऐसा लगता है कि बीबीसी पर कांग्रेस का चश्मा चढ़ा हुआ है.
कॉंग्रेस ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है. निजी कंपनी अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही है. इन्होंने सरकारी विभागों की तनख्वाह बढ़ा कर मंहगाई को और बढ़ा दिया है. जिनकी नौकरी चली गई वह अब भी बेरोज़गार हैं. मंहगाई अपनी चरमसीमा पर है. इन्होंने सिर्फ़ वोट बैंक बनाने के लिए सब कुछ किया.
बहुत नचायो गोपाल. इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि जनता को उम्मीद की किरण कहीं से नज़र नहीं आ रही है. जनता बेबस है, और यह मानना होगा कि यह परिणाम कॉंग्रेस के पक्ष में नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ है. आम आदमी की उदासीनता और बेबसी सिर्फ़ नज़र आ रही है.
अमित जी, ठीक ही कहा है, मैं एक बात और कहना चाहता हूँ कि जिन्ना के भूत से जूझ रहे भाजपा के लिए तीन राज्यों का चुनाव परिणाम एक बड़ा सबक है. लोकसभा चुनाव के बाद अंतर्कलह से जूझ रही भाजपा के लिए संदेश है कि वो सबसे पहले अपने घर को ठीक करे. शिव सेना-भाजपा के गठबंधन को लोगों ने नकार दिया है. इसकी वजह भी तलाशी जानी चाहिए.
मीडिया और मीडियाकर्मियों का अवलोकन हमेशा ही ग़लत रहा है. आप लोगों का तरीक़ा यह ही है कि जिस ओर हवा चली उसी ओर हो चल दिए. मीडिया चुनाव नतीजों से जनता के संदेश को समझ नहीं पाया है.
अमित जी जब हम नफ़रत फैलाने वाली सियासी पार्टियों की बात करते हैं तो हम लोगों का इशारा भारतीय जनता पार्टी और उन जैसी दूसरी पार्टियाँ होती हैं. लेकिन उसमें कांग्रेस को शामिल नहीं किया जाता है. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि जब हम 1984 के सिख विरोधी दंगों की बात याद करते हैं तो पाते हैं कि 2002 के गुजरात और 1984 के सिख विरोधी दंगों में कोई फ़र्क़ नहीं हैं. ऐसे में हमें चीज़ों को सही ढ़ंग से पेश करना चाहिए.
भारत का इतिहास रहा है सत्ता सुख के लिए आदमी कितना गिर सकता है ये मिसाल महाराष्ट्र मे देखने को मिल रही है. शरद पवार, कांग्रेस को सोनिया के विदेशी मूल के कारण छोड़ा था. परंतु महाराष्ट्र मे सरकार बनाने के लिए उन्हीं के तलुए चाट रहे हैं. बाला साहेब, पुत्र मोह मे धृतराष्ट्र तक बन गए, तो राज ठाकरे जयचंद की भूमिका अच्छे से निभा रहा है. कही हम फिर से गुलामी की तरफ तो नही जा रहे हैं?
आजकल जनता जागरूक हो गई है. मनमोहन सिंह लाजवाब हैं, नेता हो तो मनमोहन सिंह जैसा.
ये बिल्कुल सच है कि जनता के पास कोई विकल्प नही है . नही तो कांग्रेस की नीतियों को सब जानते और समझते है. कांग्रेस ने देश का काफ़ी वर्षों से शोषण ही किया है. अगर जनता के पास कोई स्पष्ट विकल्प हो तो कांग्रेस का देश चलाने का ठेका समाप्त होगा. ये देश की जनता के लिए एक उजाला जैसा होगा.
अमित साहब ने ऐसा क्या कह दिया जो सब उनके या बीबीसी के पीछे पड़ गए? सब महंगाई महंगाई चिल्ला रहे हैं.आज महंगाई दुनिया भर में बढ़ी है.कुछ पाठक जो खाड़ी के देशों में रहते हैं, उनसे पूछिए कि वहां क्या महंगाई और बेरोज़गारी नहीं बढ़ी है? कितनी लोगों की नौकरियां गयीं वहां.भारत में तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, लेकिन वहां तो लोग सरकार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते.बहरहाल,चुनाव में क्या विकल्प था महाराष्ट्र में जनता के पास? वो सेना जिसकी बुनियाद ही सिर्फ मराठी मानुस है? क्या पहले दक्षिण भारतियों को नहीं पीटा गया? अब उत्तर भारतियों को मारा जा रहा है. अगर जनता इतनी परेशान है तो क्यूँ इन पार्टियों को वोट डालती है? मेरे ख्याल से जितनी क्षेत्रीय पार्टियां भारत में हैं उतनी और कहीं नहीं, लेकिन सब अपने मतलब की हैं. हम लोगों को एक राष्ट्रीय पार्टी का समर्थन करना चाहिए.
इस समय भारत में चुनाव की विश्वसनीयता सबसे कम है. हमने वोट कहां दिया और इसकी गिनती कहां हो रही है. इसका सबूत भारतीय चुनाव प्रक्रिया में नहीं रह गया है. इसलिए जब तक वोट पड़ने और गिनने की पुख़ता व्यवस्था नहीं की जाएगी इसीक कोई अहमियत नहीं होगी. चुनाव आयोग को इवीएम की जांच के लिए पेपर-ट्रिल की तकनीक लानी पड़ेगी जिसे मत्दान और गणना की जांच हो सके.