जानवर काटने के ख़िलाफ़ पर गोश्त खाने से परहेज़ नहीं

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पैसा देखते ही नैतिकता को लेकर हमारे पैमाने बदल जाते हैं.
पैसे का होना, इसके लेन-देन और कमाने के पेचीदा रास्ते, हमें कई चीज़ों को लेकर नैतिकता का ढोंग करने का मौक़ा दे देते हैं. हमें नैतिक जवाबदेही से बचाते हैं.
इसे बेहद सरल तरीके से साबित भी किया जा सकता है. क्या आप को लगता है कि जानवरों पर ज़ुल्म शैतानी है?
और क्या आप पोल्ट्री फार्म से निकले मुर्गे का मांस भी खाते हैं?
अगर दोनों का जवाब हां है, तो आपको खुद तय करना होगा कि ये आपका दोहरापन नहीं है, तो और क्या है?
एक ओर आपको जानवरों पर ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं है. लेकिन, उन्हीं जानवरों को मशीनी तरीक़े से तैयार करके निकाले जाने वाले मांस से आप को दिक़्क़त भी नहीं है.
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आंतरिक टकराव की स्थिति
वैसे, ऐसा दोहरा व्यक्तित्व रखने वाले आप अकेले नहीं हैं. पश्चिमी देशों से लेकर एशियाई देशों तक आप को हर जगह ये दोहरा रवैया देखने को मिलेगा.
हमें जानवरों पर ज़ुल्म पसंद नहीं. पर, उन्हीं जानवरों पर ज़ुल्म से तैयार मांस हम चाव से खाते हैं.
ऑस्ट्रेलिया के मनोवैज्ञानिक ब्रॉक बैस्टियन और स्टीव लोनन इसे 'मांस का विरोधाभास' कहते हैं.
ये उन लोगों की मनोवैज्ञानिक और नैतिक दुविधा है, जो मांस तो खाना चाहते हैं, पर ये भी चाहते हैं कि जानवरों पर ज़ुल्म न हो.
वो दिल ही दिल में इस सवाल से जूझते रहते हैं कि मैं जानवरों पर ज़ुल्म का विरोध कर के फिर मांस का लुत्फ़ कैसे उठाऊं?
इस अंदरूनी नैतिक संघर्ष का नतीजा ये होता है कि मांस खाने का लुत्फ़ तो ख़त्म हो ही जाता है और हम अपनी पहचान को लेकर भी दुविधा में पड़ जाते हैं.
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सामाजिक दबाव
हम अपनी पहचान स्थापित करने के लिए ऐसी आदतें पालने लगते हैं, जिससे हम ख़ुद को जायज़ ठहरा सकें.
असल में दुनिया भर में मांस खाना असली मर्द होने या ताक़तवर होने की निशानी माना जाता है. इंसान आदि मानव के दौर से ही मांस खाता आया है.
लेकिन, नैतिकता का सवाल ज़्यादा पुराना नहीं. जब से जानवरों को फार्म में पाल कर उनका कारखानों जैसे माहौल में मांस तैयार किया जाने लगा है.
तब से मांस खाने को लेकर नैतिकता का सवाल खड़ा हुआ है. फिर सामाजिक दबाव भी इसके लिए ज़िम्मेदार है.
अगर कोई मांस नहीं खाता, तो फ़ौरन उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. आप को प्रोटीन कहां से मिलेगा? जैसे सवालों से सामना करना पड़ता है.
फिर, हम फ़ैसले लेने के बाद उन्हें जायज़ ठहराने लगते हैं. जैसे कि मांस खाने के बाद उसे नैतिकता के पैमाने पर सही ठहराते हैं. हमें बहानों की तलाश होती है.
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'दिमागी विरोधाभास'
क्योंकि बहानों से ही तो हम ख़ुद को सही साबित कर पाते हैं. जब हम कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं तो, इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में 'दिमागी विरोधाभास' कहते हैं.
इस शब्द का अविष्कार लियोन फेस्टिंगर नाम के मनोवैज्ञानिक ने 1957 में किया था.
उन्होंने इस बारे में जेम्स कार्लस्मिथ के साथ मिलकर रिसर्च की थी और इस रिसर्च पेपर को 1959 में प्रकाशित किया गया था.
'अगर किसी इंसान को अपनी राय के विपरीत जाकर कुछ काम करना पड़ता है, तो उसके ख़यालात का क्या होता है?'
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए फेस्टिंगर और कार्लस्मिथ ने मिलकर 71 लोगों पर रिसर्च किया. इन लोगों को एक बोरियत भरा काम करने को दिया गया.
फिर इन लोगों को तीन हिस्सों में बांटा गया. एक ग्रुप को पैसे का लालच देकर दूसरे गुट को ये कहने को कहा गया कि काम बहुत मज़ेदार था.
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फेस्टिंगर ने क्या लिखा
दूसरे समूह को सच बोलने को कहा गया. तीसरे को कोई मशविरा नहीं दिया गया.
ये देखा गया कि पैसे की लालच में लोग बोरिंग काम को भी मज़ेदार और बेहद दिलचस्प बताने को राज़ी हो गए.
1962 में फेस्टिंगर ने अपने ख़यालात को और विस्तार से बयां किया. उन्होंने लिखा, "हम अक्सर ये मानते हैं कि हमारे विचार स्थिर हैं."
"लेकिन हक़ीक़त में ऐसे यक़ीन और बर्ताव ग़लत हो जाते हैं. ये विरोधाभास ही होता है. हमारे बर्ताव और ख़यालात में."
- जब हमारी सोच और बर्ताव में फ़र्क़ होता है, तो हमारी कोशिश इस फ़र्क़ को मिटाने या कम करने की होती है.
-अगर ये विरोधाभास ख़त्म नहीं होता, तो हम असहज महसूस करते रहते हैं.
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मांस को दिए जाने वाले आकर्षक नाम
जैसे हम भूख लगने पर खाना तलाशते हैं. वैसे ही अगर हमारी सोच और व्यवहार में अंतर होता है, तो हम उस खाई को पाटने के तरीक़े तलाशने लगते हैं.
जैसे कि हम अगर जानवरों पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ हैं. और, मांस भी खाते हैं. तो, हम इस विरोधाभास की खाई को पाटने के लिए कई तरीक़े अपनाते हैं.
समाज विज्ञानी लिज़ ग्रायुरहोल्ज़ कहते हैं कि जानवरों के उत्पादों पर क्यूट दिखने वाली तस्वीरें लगाते हैं.
इससे ये संदेश देने की कोशिश होती है कि जो मांस उत्पाद हम खा रहे हैं, वो किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती या ज़ुल्म का नतीजा नहीं है. फिर हम उनके नाम भी बदल देते हैं.
बछड़े के मांस को वील, सुअर के मांस को हैम, पोर्क और जानवरों के शिकार को 'हंटिंग गेम' का नाम दे देते हैं.
मुर्दा जानवरों के जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर के जब पैक होते हैं, तो उसकी ख़ूबसूरत पैकेजिंग कर के खाने के अफ़सोस को मिटाया जाता है.
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मांस उत्पादों की पैकेजिंग
लिज़ ने जब मांस उत्पादों की मार्केटिंग के तरीक़ों पर गौर किया, तो दो बातें सामने आई. पहली तो ये कि मांस को साफ़-सुथरा, टुकड़ों में काटा जाता है.
दूसरा इन मांस को प्लास्टिक अच्छे से पैक किया जाता था. इसे देख कर आप सोच भी नहीं सकते कि मांस को किसी जानवर को मार कर निकाला गया है.
लिज़ ने पाया कि ऐसा एशियाई देशों, ख़ास कर जापान में बहुत होता है. जानवरों को क्यूट बनाकर पेश किया जाता है.
बड़ी आंखों, दुबले और गोलाकार शरीर वाले जानवरों की तस्वीरें मांस उत्पादों की पैकेजिंग में इस्तेमाल होती हैं.
इसका मकसद ये संदेश देने का होता है कि ये मांस ख़ुशदिल जानवरों से हासिल किया गया है. इससे फार्म में जानवरों पर ज़ुल्म की हक़ीक़त पर पर्दा पड़ जाता है.
हमें पता है कि गरीबी लोगों को कितनी तकलीफ़ देती है. फिर भी हम ढेर सारे कपड़े ख़रीदते हैं, मौक़ा देखते ही नए जूते ख़रीद लेते हैं.
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कैसे आ सकता है बदलाव?
हम बाल मज़दूरी के ख़िलाफ़ होते हैं, लेकिन सेल सीज़न का भरपूर फ़ायदा उठाते हैं. ऐसे कई काम करके हम ख़ुद को नैतिक ठहराते हैं.
इस बौद्धिक विरोधाभास को दूर करने के लिए हम दूसरों को भी अनैतिक काम करने को उकसाते हैं.
दोहरेपन को सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार ही बढ़ावा देते हैं. ये हमारे नैतिक संघर्ष पर पर्दा डालते हैं.
शायद अब वक़्त आ गया है कि हम अपने दोहरेपन को ख़त्म करें. इस धरती, जानवरों और दूसरे इंसानों के बारे में हम जैसी बातें करते हैं, उसमें बड़े बदलाव की ज़रूरत है.
हम दिमाग़ी करतबबाज़ी से अपने आप को सही ठहराने के बजाय ग़लतियां मानें.
अपने अनैतिक बर्ताव को स्वीकारें और ख़ुद में बदलाव लाने की कोशिश करें. इससे हमारे ज़हन और दिल पर पड़ा अनैतिकता का बोझ कम होगा.
हम बेहतर और ख़ुशदिल इंसान बनेंगे और ये दुनिया भी ज़्यादा हसीन बनेगी.
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