कोई साथ हो तो हम इसलिए खाते हैं ज़्यादा खाना

खाना खाते महिला-पुरुष

इमेज स्रोत, Asif Saud

    • Author, याओ-वॉ लॉ
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं खाना हमेशा सबके साथ मिल-बांट कर खाना चाहिए. तन्हा खाना अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता.

बुज़ुर्गों का तर्क है कि मिल-जुलकर खाने से बरकत होती है. लेकिन मॉडर्न रिसर्च बताती हैं कि हम ग्रुप में बैठ कर ज़्यादा खाना खाते हैं. हम उन व्यंजनों का ज़ायक़ा भी ले लेते हैं, जिन्हें हम अकेले में शायद कभी ना खाएं.

वैसे साथ मिलकर खाने का चलन बहुत पुराने ज़माने से रहा है. जब इंसान शिकार करके पेट पालता था, तब भी वो झुंड में बैठकर खाता था. रिसर्च तो ये भी साबित करती है कि अकेले खाना खाने से इंसान डिप्रेशन और तनाव का शिकार हो जाता है. कहते हैं कि साथ बैठने-उठने वालों के खान-पान की आदतें भी हम पर अपना असर डालती हैं.

हेल्थ मनोचिकित्सक जॉन दी कास्त्रो ने साल 1994 में क़रीब 500 लोगों पर रिसर्च की. इस रिसर्च सैम्पल में अकेले खाना खाने वाले और लोगों के साथ खाने वाले दोनों शामिल थे. पाया गया कि ग्रुप में खाने वालों ने खाना ज़्यादा खाया.

एक और रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि ग्रुप में खाने वाले 40 फ़ीसद लोग ज़्यादा आइसक्रीम खाते है. 10 फ़ीसद लोगों ने मैक्रोनी ज़्यादा खाई. जबकि जो लोग अकेले बैठ कर खाना खाते हैं वो इन चीज़ों को कई मर्तबा हाथ तक नहीं लगाते.

खाना खाते लोग

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या है वजह?

क्या वजह है कि जब हम किसी और के साथ खाना खाते हैं तो ज़्यादा खा लेते हैं? कास्त्रो के मुताबिक़ जब कई लोग मिलकर खाते हैं, तो खाने के साथ गुफ़्तगू का दौर भी चलता रहता है. जिसके चलते हमारा हाथ कई बार खाते-खाते रुकता जाता है. इससे खाने का समय बढ़ जाता है.

बड़े समूहों में खा रहे लोग और ज़्यादा वक़्त लगाते हैं जिसके चलते ज़ेहन तक पेट भरने का संदेश नहीं पहुंच पाता. जबकि जो लोग छोटे ग्रुप में खाते हैं या अकेले खाना खाते हैं, वो जल्दी अपना खाना ख़त्म कर लेते हैं. इस तरह वे ज़्यादा खाना खाने से बच जाते हैं.

खाना खाता एक शख्स

इमेज स्रोत, Getty Images

साल 2006 में इसी तरह का एक और प्रयोग किया गया. क़रीब 132 लोगों को खाने के लिए एक निश्चित समय दिया गया. सभी प्रतिभागियों को दो या चार के ग्रुप में बांटा गया था, जबकि कुछ को तन्हा छोड़ा गया. लेकिन रिसर्च के नतीजों ने साबित किया कि समय सीमा होने की वजह से सभी ने लगभग बराबर मात्रा में खाना खाया.

इससे साबित होता है कि जब हम खाने में समय ज़्यादा देते हैं, तो खाते भी ज़्यादा है. अक्सर समारोह के दौरान जब बहुत से लोग इकट्ठा होते हैं, तो सभी के साथ घूमते-फिरते कुछ ना कुछ खाते रहते हैं. इस थोड़े-थोड़े खाने में ही हम अपनी भूख से ज़्यादा खा लेते हैं, और इसका हमें अंदाज़ा तक नहीं होता.

प्लेट में खाना लेकर जाता एक शख़्स

इमेज स्रोत, Getty Images

रेस्तरां में आईने क्यों लगे होते हैं?

कुछ जानकारों का कहना है कि सिर्फ़ सोशल ग्रुप ही हमें ज़्यादा खाने के लिए मजबूर नहीं करते. बल्कि कई मर्तबा अकेले बैठे लोग ज़्यादा खा लेते हैं. कई लोग तो अजनबियों के साथ बैठकर भी ज़्यादा खा लेते हैं.

मिसाल के लिए जापान में की गई एक रिसर्च के दौरान कुछ लोगों को आईने के सामने या दीवार के सामने बैठकर पॉप-कॉर्न खाने को कहा गया. आईने के सामने पॉप-कॉर्न खाने वालों ने अपना खाना ज्यादा मज़े लेकर खाया. शायद इसीलिए ज़्यादातर रेस्टोरेंट चारों तरफ़ आईने लगाए रखते हैं, ताकि ग्राहक ज़्यादा खाए, और ज़्यादा खाने का ऑर्डर दे.

हरेक रिसर्च के नतीजे सौ फ़ीसद सही हों ऐसा भी नहीं है. कुछ स्टडी दावा करती हैं कि ग्रुप में लोग कम खाते हैं. दरअसल जब हम तन्हा खाना खाते हैं, या किसी ऐसे शख्स के साथ खाना खाते हैं, जिसके खाने की आदतों से हम वाक़िफ़ हैं, तो बेतकल्लुफ़ होकर खाते हैं. जबकि ग्रुप में जितने लोग होते हैं, उनकी खाने की आदतें अलग-अलग होती हैं. सभी संकोच में रहते हैं. कहीं ना कहीं दिमाग़ में सोच होती है कि मेरे खाने की आदत के बारे में सामने वाला कोई ग़लत राय क़ायम ना कर ले.

खाना

इमेज स्रोत, Getty Images

ऐसी बहुत सी स्टडी हैं जो ये साबित करती हैं कि मोटापे का शिकार बच्चे ग्रुप के बजाय अकेले में ज़्यादा खाते हैं. इसी तरह जब मोटापे का शिकार नौजवान अपने ही जैसे वज़नी लोगों के साथ होते हैं, तो चिप्स और बिस्कुट ज्यादा खाते हैं. शायद उन्हें तसल्ली रहता है कि वही अकेले मोटापे का शिकार नहीं हैं. लेकिन जब यही लोग दुबले-पतले लोगों के साथ होते हैं तो कम खाते हैं.

यही बात महिलाओं में भी देखी गई है. जब महिलाएं मर्दों के साथ खाना खाती हैं तो कम कैलरी वाली चीज़ें खाती हैं. लेकिन जब सिर्फ़ महिलाओं की साथ खाना खाती हैं तो बिना किसी परहेज़ के सब-कुछ खाती हैं.

लिहाज़ा कहा जा सकता है कि समाज के तौर तरीक़े हमारे खान-पान की आदतों पर असर डालते हैं. लेकिन ये किस हद तक असर डालते हैं, इस बारे में कोई रिसर्च अभी तक नहीं हुआ है.

खाद्य सामग्री

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या और कितना खा रहे हैं, ध्यान रखें

ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर सुज़ैन हिग्स कहती हैं कि ग्रुप में बैठ कर खाने से बच्चों की आदतों पर गहरा असर पड़ता है. वो संतुलित आहार लेते हैं. बच्चों के लिए ज़रूरी है कि वो अपने बड़ों से खाने का तौर-तरीक़ा सीखे. ख़ास तौर से जो लोग लंबे वक़्त तक जीते हैं, उनके खाने की आदतों पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए.

आज जिस तरह की दावतें दी जाती हैं, उसमें ज़्यादातर ऐसा खाना परोसा जाता है जो मोटापे को जन्म देता है. लोग भी मोटापे के ख़ौफ़ से बेख़बर जमकर खाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में क़रीब एक अरब लोग मोटापे का शिकार हैं. इनमें तीस करोड़ 40 लाख बच्चे शामिल हैं.

खाने की सही आदतें अपनाने के लिए ज़रूरी नहीं है, कि हम अपने दोस्तों का साथ छोड़ दें और अकेले बैठ कर खाना शुरू कर दें. बल्कि हमें ख़ुद इस बात का ध्यान देना चाहिए कि हम क्या खा रहे हैं और कितना खा रहे हैं.

अगर कहीं पार्टी में जा रहे हैं तो भी ये सोच कर मत जाइए कि वहां ज़ायक़ेदार पकवान मिलेंगे तो जमकर खाएंगे. याद रखिए अनाज पराया है, लेकिन पेट तो आपका अपना है. अच्छी सेहत के लिए खाने पर कंट्रोल करना बहुत ज़रूरी है.

(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)