ज़िम्बाब्वे: क्यों मशहूर हुआ डिप्रेशन से लड़ने वाला ये प्रोग्राम

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- Author, रिशेल नुवेर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर के लिए
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ हर छठा भारतीय अवसाद का शिकार है.
ज़िंदगी का ऐसा ही दबाव बना रहा तो भारत में साल 2020 तक मानसिक रोगियों की संख्या 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट को देखें तो डिप्रेशन महामारी का रूप लेता जा रहा है.
अमरीका और चीन में बड़ी तादाद में लोग डिप्रेशन के शिकार हैं. अब तक अमीर देशों का मर्ज़ समझी जाने वाली ये बीमारी ग़रीब मुल्कों में भी तेज़ी से पाँव पसार रही है.
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में 30 करोड़ से ज़्यादा लोग डिप्रेशन के शिकार हैं.
इसकी वजह से हर साल क़रीब 8 लाख लोग ख़ुदकुशी कर लेते हैं. इनमें से ज़्यादातर मौतें विकासशील या कम विकसित देशों में होती हैं.
इसकी बड़ी वजह ये है कि यहाँ पर डिप्रेशन को गंभीर बीमारी के तौर पर नहीं देखा जाता. साथ ही डिप्रेशन के इलाज के लिए पेशेवर मदद यानी मनोवैज्ञानिकों की भारी कमी है.
मगर, हालात बदल सकते हैं. अगर दुनिया दक्षिणी अफ्रीकी देश ज़िम्बाब्वे से सबक़ ले तो.

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सलाह-मशविरा
यहाँ के मनोवैज्ञानिक डिक्सन चिबांदा ने डिप्रेशन के शिकार लोगों की मदद के लिए एक नया नुस्खा निकाला है.
समाज के बुज़ुर्गों की मदद से डिप्रेशन के शिकार लोगों की मदद का कार्यक्रम डिक्सन ने शुरू किया है. इसमें ज़िम्बाब्वे की सरकार भी मददगार बनी है.
वैसे ये नुस्खा नया नहीं हैं. हम एक ज़माने से घर के बड़े-बुज़ुर्गों से सलाह-मशविरा करते रहे हैं. उनके तजुर्बों का फ़ायदा उठाते रहे हैं.
उन्होंने दुनिया देखी होती है. जीवन की ऊंच-नीच से वास्ता पड़ा होता है. बुज़ुर्गों, ख़ास तौर से दादी-नानी की बातें हमें सुहानी लगती हैं. उनकी बातें दिल को तसल्ली देती हैं.
डिक्सन चिबांडा को ये विचार एक बुरे अनुभव के बाद आया.
डिक्सन, ज़िम्बाब्वे की राजधानी हरारे में प्रैक्टिस करते हैं.
कई साल पहले उन्हें हरारे से क़रीब 100 मील दूर से एक डॉक्टर का फ़ोन आया.
26 साल की महिला एरिका ने ख़ुदकुशी की कोशिश की थी. एरिका का पहले भी इलाज हुआ था. डिक्सन को फ़ोन करने वाले डॉक्टर ने कहा कि एरिका को उनकी सख़्त ज़रूरत है, ताकि उसे ख़ुदकुशी करने से रोका जा सके.

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मुश्किल का हल
एरिका, डिक्सन के अस्पताल से 160 किलोमीटर दूर थी. डिक्सन ने एरिका की मां से बात की.
तय ये हुआ कि जब एरिका को अस्पताल से छुट्टी मिलेगी, तो मां उसे लेकर डिक्सन के पास आएगी.
इस बात को एक हफ़्ते बीते. फिर दो हफ़्ते और फिर एक महीना गु़ज़र गया. न एरिका का कुछ पता था और न ही उसकी मां का.
आख़िरकार, डिक्सन के पास एरिका की मां का फ़ोन आया. एरिका ने तीन दिन पहले अपनी जान ले ली थी.
डिक्सन ने एरिका की मां से पूछा कि वो बेटी को लेकर उनके पास क्यों नहीं आई? एरिका की मां ने बताया कि उनके पास बस भाड़े के लिए पैसे नहीं थे.
बस का किराया एक डॉलर से भी कम था. मगर ज़िम्बाब्वे में ग़रीबी इतनी है कि लाखों लोग इतना पैसा भी नहीं जुटा पाते कि वो डॉक्टर के पास पहुंच सकें.
नतीजा ये हुआ कि एरिका जैसे कितने नौजवान बेवक़्त जान गंवा देते हैं.
एरिका की मौत और हालात ने डिक्सन को इतना हिला दिया था कि उन्होंने इस मुश्किल का हल निकालने की ठान ली.
मुश्किल ये थी कि ज़िम्बाब्वे में मनोवैज्ञानिकों की भारी कमी है. इतने बड़े देश में कुल दर्जन भर मनोवैज्ञानिक हैं. कमोबेश सभी शहरों में रहते हैं.
ऐसे में दूर-दराज़ में रहने वाले लोगों तक डिप्रेशन के इलाज के लिए डॉक्टरी मदद पहुंचाना नामुमकिन था.
डिक्सन ने सरकार से मदद मांगी. ज़िम्बाब्वे की सरकार ने उन्हें मदद करने से साफ़ इनकार कर दिया.
स्वास्थ्य विभाग का कहना था कि अस्पताल पहले ही एचआईवी पीड़ित लोगों से भरे पड़े हैं. क़स्बों और गांवों के अस्पतालों में जगह नहीं है. संसाधन नहीं हैं.
ऐसे में डिक्सन अगर कुछ करना चाहते हैं, तो ख़ुद ही करना होगा.

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दादी-नानी की मदद
ज़िम्बाब्वे में कितने लोग अवसाद के शिकार हैं, किसी को नहीं पता.
स्थानीय भाषा में इसे कुफुंगिसिसा यानी बहुत ज़्यादा सोचना कहते हैं.
डिक्सन चिबांदा का मानना है कि ज़िम्बाब्वे की आबादी का एक बड़ा हिस्सा डिप्रेशन से पीड़ित है.
देश ने बहुत सी मुसीबतें झेली हैं. पहले ज़िम्बाब्वे का नाम रोडेशिया था. ये और ज़ैम्बिया मिलकर एक देश हुआ करते थे.
उस वक़्त बुश रोडेशिया युद्ध हुआ. फिर माटाबेलेलैंड नरसंहार की त्रासदी भी ज़िम्बाब्वे ने झेली.
डिक्सन बताते हैं कि कई अफ्रीकी देशों में तो एक भी मनोचिकित्सक नहीं है. ज़िम्बाब्वे में कुल 12 रजिस्टर्ड साइकिएस्ट्रिस्ट हैं.
यानी 15 लाख लोगों पर एक मनोचिकित्सक. ऐसे में सब की मदद कर पाना नामुमकिन है.
इसीलिए साल 2006 में डिक्सन ने मनोचिकित्सकों की इस कमी का तोड़ निकाला दादी-नानी की मदद लेने का फ़ैसला कर के.
साल 2006 से आज तक डिक्सन और उनकी टीम ने 400 बुज़ुर्ग महिलाओं को ट्रेनिंग दी है, ताकि वो डिप्रेशन के शिकार लोगों की मदद कर सकें.
डिक्सन का मानना है कि ये ऐसा कार्यक्रम है, जिसे किसी भी देश और समुदाय में लागू किया जा सकता है.
किसी भी देश की दिमाग़ी सेहत बेहतर हो, इसके लिए ज़रूरी है कि लोग डिप्रेशन से बचे रहें. डिक्सन का 'ग्रैंडमदर्स क्लब' डिप्रेशन की चुनौती से निपटने में बहुत कारगर साबित हुआ है.
वो इसकी कामयाबी से इतने उत्साहित हैं कि आज वो दादी-नानियों का ग्लोबल क्लब बनाना चाहते हैं.

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दूसरी चुनौती
ख़ुद डिक्सन यूं तो बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहते थे. मगर वो बच्चों के डॉक्टर या स्किन स्पेशलिस्ट के बारे में सोचा करते थे.
लेकिन, जब वो चेक रिपब्लिक में पढ़ाई कर रहे थे, तो एक साथी ने ख़ुदकुशी कर ली. वो बहुत हंसमुख था.
मगर न जाने क्या बात थी, जिसने उसे अंदर से खोखला कर दिया और अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया.
इस हादसे के बाद ही डिक्सन ने मनोविज्ञान का विशेषज्ञ बनने का फ़ैसला किया.
साल 2005 में ज़िम्बाब्वे की सरकार ने हरारे में एक अभियान चलाया-ऑपरेशन मुराम्बात्सविना. इसका मतलब होता है गंदगी की सफ़ाई. इसके तहत स्लम में रह रहे लोगों को ज़बरदस्ती हटा दिया गया.
इस अभियान की वजह से सात लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गए थे.
इनमें से बहुत से लोग हालात की मार से डिप्रेशन के शिकार हो गए.
इन लोगों के बीच काम करते हुए ही डिक्सन को एहसास हुआ कि उनका देश दिमाग़ी तौर पर कितना बीमार है. लोगों को मदद की कितनी सख़्त ज़रूरत है.
ग्रैंडमदर्स क्लब बनाने के बाद डिक्सन चिबांदा के सामने दूसरी चुनौती थी, जगह की. अस्पतालों में जगह की भारी कमी थी.
इसका तोड़ डिक्सन ने निकाला फ्रेंडसिप बेंच की शक्ल में. सार्वजनिक पार्क और ठिकानों पर ऐसे बेंच लगाए गए.
जहां पर ये बुज़ुर्ग महिलाएं, डिप्रेशन के शिकार लोगों से बात कर के, उन्हें समझा-बुझाकर उनकी मदद करती थीं.
पहले तो उनका बहुत मज़ाक़ उड़ाया गया. लोगों ने कहा कि दिमाग़ी सेहत ऐसे नुस्खों से नहीं सुधारी जा सकती. लेकिन डिक्सन ने हार नहीं मानी.
उन्होंने बुज़ुर्ग महिलाओं को ट्रेनिंग देकर लोगों की मदद के लिए तैयार किया. उन्हें पहले तो पश्चिमी देशों की तर्ज पर काम करने को कहा गया.
मगर इसके नतीजे बहुत ख़राब रहे.

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दोस्ताना बेंच
तो फिर, डिक्सन ने तय किया कि वो स्थानीय रीति रिवाज के हिसाब से चलेंगे. लोगों से उनकी भाषा और शब्दों में बात करेंगे. ये तरीक़ा असरदार साबित हुआ.
हरारे की रहने वाली रूडो चिनहोई ऐसी ही महिला हैं, जो डिक्सन के मिशन से जुड़ी हुई हैं. रूडो के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है. आस-पास के इलाक़े में वो दादी रूडो के नाम से मशहूर हैं.
रूडो कहती हैं कि "मैं इस कार्यक्रम का हिस्सा बनी क्योंकि मैं लोगों की मदद करना चाहती थी. मेरे आस-पास बहुत से डिप्रेशन के सिकार लोग थे. मैं उनकी संख्या कम करना चाहती थी. मेरा मिज़ाज हमेशा से ही लोगों की मदद करने वाला था. मुझे इंसान की जान की क़ीमत का एहसास है."
72 साल की रूडो को याद भी नहीं कि उन्होंने कितने लोगों की मदद कर के उन्हें डिप्रेशन से छुटकारा दिलाया है.
पर वो रोज़ाना कमोबेश 10 लोगों से बात करती हैं. ख़ास तौर से एड्स के शिकार युवाओं से. इसके अलावा वो अपने देश में भुखमरी, ग़रीबी और दूसरी मुश्किलात की शिकार लोगों की मदद करती हैं.
इनमें शादीशुदा ज़िंदगी में तनाव झेल रहे लोगों से लेकर अकेलेपन के शिकार बुज़ुर्ग, बिना शादी के गर्भवती हुई महिलाएं भी शामिल हैं.
रूडो बताती हैं कि, 'मैं पहले अपना नाम बताती हूं, फिर सामने वाले का नाम पूछती हूं और फिर पूछती हूं कि तुम्हारी क्या परेशानी है. मुझे पूरी बात बताओ. मैं तुम्हारी मदद करने की कोशिश करूंगी.'
मरीज़ का पूरा क़िस्सा सुनने के बात वो उसे उसकी मुश्किल का हल समझाने की कोशिश करती हैं. जब तक पूरा मसला हल नहीं हो जाता, दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला यूं ही चलता रहता है. वो एक-दो दिन में उस मरीज़ से मिलती रहती हैं.
रूडो बताती हैं कि "एक बार मेरी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई, जिसकी बीवी उसे छोड़ कर चली गई थी. वो उसे मार डालना चाहता था. मैंने उसे समझाया कि उसे मारने से क्या होगा. तुम्हारे बच्चे अनाथ रह जाएंगे. उसे बात समझ में आई. उसने अपनी पहली बीवी को तलाक़ देकर दूसरी शादी कर ली और आज वो बहुत ख़ुश है."
रूडो और ऐसी दूसरी महिलाएं उसी समुदाय से ताल्लुक़ रखती हैं, जिससे मरीज़ आते हैं. इसलिए वो उनकी बातें और परेशानियां बेहतर समझती हैं.
कार्यक्रम के कामयाब रहने के बाद चिबांडा ने ज़िम्बाब्वे और ब्रिटेन के अपने साथी डॉक्टरों से मिलकर इसके नतीजे प्रकाशित कराए.
अब दादियों-नानियों की मदद से डिप्रेशन के इलाज का ये कार्यक्रम कई देशों में चलाया जा रहा है. न्यूयॉर्क शहर में भी इसे अपनाया गया है. जहां सिर्फ़ महिलाएं नहीं, बल्कि हर उम्र और वर्ग के लोग सलाह देते हैं.
वहीं मलावी में महिलाओं के साथ बुज़ुर्ग पुरुषों को भी इस कार्यक्रम से जोड़़ा गया है. ज़ंज़ीबार में युवा ये काम करते हैं.
न्यूयॉर्क में ऐसे कार्यक्रम से जुड़े कई लोग तो ख़ुद पहले कई दिमाग़ी चुनौतियों के शिकार थे. पर अब वो ख़ुद इससे उबर चुके हैं और लोगों की मदद कर रहे हैं.
न्यूयॉर्क में फ्रेंडशिप बेंच की शुरुआत 2016 में हुई थी. साल 2017 में इसे पूरे शहर में लागू कर दिया गया.
आज की तारीख़ में 30 हज़ार से ज़्यादा लोग इसकी मदद से डिप्रेशन का मुक़ाबला कर रहे हैं.
यूं तो न्यूयॉर्क में बड़ी तादाद में मनोचिकित्सक हैं. मगर इन फ्रेंडशिप बेंच की मदद से उन डॉक्टरों पर भी दबाव कम हुआ है.
अब ब्रिटेन में भी ये कार्यक्रम लागू किया जा रहा है.
दोस्ताना बेंच की मदद से डिप्रेशन से इंसान की जंग दिलचस्प होती जा रही है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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