अब पटाखों की तरह उल्कापिंडों की आतिशबाजी की तैयारी

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    • Author, अभिजीत बैरनयूक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

अगर कभी यूं ही बैठे-बैठे आप को आसमान में उल्कापिंडों की चमकीली आतिशबाज़ी देखने को मिले, तो इसके लिए 2008 की मंदी को शुक्रिया कहिएगा.

क्योंकि, इस बनावटी आतिशबाज़ी में आर्थिक मंदी ने अहम रोल निभाया है.

2008 की आर्थिक मंदी के बाद जापान की लेना ओकाजीमा ने एक वित्तीय कंपनी में अपनी नौकरी को छोड़ दिया. उन्होंने एकदम क्रांतिकारी कारोबार शुरू करने का फ़ैसला किया.

ओकाजीमा ने एक ऐसी कंपनी बनाई, जो सैटेलाइट के ज़रिए उल्कापिंडों की बारिश करेगी जिससे क़ुदरती आतिशबाज़ी का दीदार किया जा सकेगा.

आज दस साल बाद लेना ओकाजीमा कहती हैं, 'मुझे अपनी नौकरी बदलनी पड़ी क्योंकि उस वक़्त आर्थिक हालात बहुत बुरे थे.'

बनावटी उल्कापिंडों की बारिश का ख़याल ओकाजीमा को 2008 से भी काफ़ी पहले यानी 2001 में आया था. उस वक़्त उन्होंने लियोनिड नाम के उल्कापिंड की आतिशबाज़ी देखी थी.

लेना ओकाजीमा कहती हैं कि, 'इन उल्कापिडों की बारिश बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में होती है. ये बाहरी अंतरिक्ष से धरती की कक्षा में आ जाते हैं. इसलिए हमने सोचा कि हम छोटे-छोटे उपग्रहों की मदद से ऐसा मंज़र दिखाने की कोशिश करें.'

इसलिए लेना ओकाजीमा ने एस्ट्रो लाइव एक्सपीरिएंसेज़ नाम से कंपनी बनाई है. जल्द ही उनकी कंपनी उल्कापिंड बरसाने वाले पहले सैटेलाइट को लॉन्च करने वाली है.

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अगर ये प्रयोग कामयाब रहा, तो उनकी कंपनी उल्कापिंडों से आतिशबाज़ी कराने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन जाएगी. फिर, वो बड़े आयोजनों के मौक़े पर आसमान में आतिशबाज़ी कराया करेंगी. इसके अलावा भी वो दूसरे किस्म के मनोरंजक कार्यक्रम पेश करने का इरादा रखती हैं.

लेकिन, क्या लेना ओकाजीमा की योजना का कामयाब होना मुमकिन है?

कैसे होगी उल्कापिंडों की बारिश

इसमें कोई दो राय नहीं कि लेना की महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी है. उनकी योजना है कि हर सैटेलाइट में दो सेंटीमीटर बड़े 400 टुकड़े अंतरिक्ष में ले जाए जाएं और फिर उन्हें धीरे-धीरे गिराया जाए. इन्हें तीन से 10 सेकेंड के अंतराल पर सैटेलाइट से छोड़ते हुए, आतिशबाज़ी के कार्यक्रम को कुछ मिनटों तक चलाया जाए.

ओकाजीमा की कंपनी एएलई के प्रचार का एक वीडियो दिखाता है कि गोल-गोल टुकड़े धरती का चक्कर लगा रहे सैटेलाइट से छोड़े जा रहे हैं. वो तेज़ी से धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं. वायुमंडल में घुसते ही वो जलने लगते हैं. इससे शहरों के ऊपर चमकदार आतिशबाज़ी का नज़ारा बन जाता है.

उल्कापिडों के जलने से ऐसा ही क़ुदरती नज़ारा दिखता है. जब ब्रह्मांड में तैर रहे छोटे-छोटे उल्कापिंड और चट्टानों के टुकड़े धरती की कक्षा में घुसते हैं, तो यहां के वायुमंडल के दबाव में वो जलने लगते हैं. इसे ही उल्कापिंडों की बारिश कहा जाता है.

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कंपनी के प्रचार के वीडियो में तो ये काम बड़ी आसानी से होते हुए दिखाया जाता है. लेकिन, हक़ीक़त ये है कि ये इतना आसान नहीं होगा. ओकाजीमा के साथ एड्रियन लेमल कहते हैं कि जिन टुकड़ों को बरसाना है, उन्हें बिल्कुल सटीक रफ़्तार और सही जगह से गिराना होगा, वरना वो शायद धरती की कक्षा में प्रवेश ही न करें.

ऐसा करने के लिए एड्रियन लेमल और उनकी टीम ऐसे गैस टैंक विकसित कर रही है, जो 8 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से धातु के टुकड़ों को अंतरिक्ष में फेंक सके.

लेमल कहते हैं कि धरती पर अब तक ऐसी कोई चीज़ विकसित नहीं की गई हैं.

जिन टुकड़ों को सैटेलाइट से फेंककर आतिशबाज़ी कराई जाएगी, वो किस चीज़ के बने हैं? लेमल और ओकाजीमा इस सवाल के जवाब में ख़ामोश हो जाते हैं.

वो कहते हैं कि धातुओं के अयस्कों से ये गोलियां तैयार की जा रही हैं. लेकिन, वो ये ज़रूर बताते हैं कि इनसे क़ुदरती उल्कापिंडों के मुक़ाबले ज़्यादा चमकीली आतिशबाज़ी होगी. यही नहीं, ये रंग-बिरंगी भी होगी. इनमें ऐसी गैसें होंगी, जो नारंगी, हरे या नीले रंग में जलेंगी.

लेमल और ओकाजीमा की रिसर्च कई सालों से चल रही है. लेकिन, वो अगले कुछ महीनों में अपनी प्रायोगिक सैटेलाइट को जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा के रॉकेट की मदद से लॉन्च करने वाले हैं.

ब्रिटेन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के रॉबर्ट मैसी कहते हैं, 'उल्कापिंड तो बालू के कण जितने होते हैं. उनके मुक़ाबले लेमल और ओकाजीमा जिन टुकड़ों की बारिश कराएंगे, वो बड़े आकार के होंगे, तो उनके जलने से ज़्यादा चमकीली रोशनी होगी.'

इंसान अंतरिक्ष से बेकार हो चुके यानों, रॉकेट और सैटेलाइट को पहले भी धरती की कक्षा में दोबारा ला चुका है. वायुमंडल में प्रवेश करते ही ये जलने लगते हैं.

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पहले भी हुए प्रयोग

1980 के दशक में एक मिशन के ज़रिए धूमकेतु के धरती की कक्षा के आस-पास आने का मंज़र बनावटी तरीक़े से दिखाने की कोशिश हुई थी. वैज्ञानिक इस प्रयोग के ज़रिए ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि आख़िर सूरज से निकलने वाले ये टुकड़े सौर तूफ़ान के चलते किस तरह से पूरे अंतरिक्ष में फैलते हैं और जब ये धरती के क़रीब आते हैं, तो कैसा बर्ताव करते हैं?

इस प्रोजेक्ट के अगुवा रहे अमरीकी वैज्ञानिक एंड्र्यू कोट्स कहते हैं कि ये वैज्ञानिक प्रयोग तो था ही, जो लोग धूमकेतु को देखना चाहते हैं, उनके देखने के लिए भी ये दिव्य नज़ारा था. उन्होंने ख़ुद अपनी दूरबीन से इस प्रयोग को देखा था.

एंड्र्यू कोट्स कहते हैं कि वैज्ञानिकों ने ध्रुवों पर होने वाली चमकीली आतिशबाज़ी को भी कृत्रिम तरीक़े से 1969 में कराया था. ये प्रयोग एक रॉकेट के ज़रिए किया गया था.

ओकाजीमा का इरादा आसमान को कैनवास बनाकर उस पर ख़ूबसूरत तस्वीरें उकेरने का है.

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प्रोजेक्ट पर एतराज़

लेकिन, बहुत से लोगों को इस पर ऐतराज़ है. ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी के ह्यू लेविस कहते हैं कि इससे अंतरिक्ष में बहुत कचरा फैलेगा. ये कचरा, धरती का चक्कर लगा रहे सैटेलाइट और दूसरे अंतरिक्ष यानों के लिए ख़तरा बन सकता है. हालांकि, ओकाजीमा का दावा है कि ये टुकड़े इतने छोटे होंगे कि इनसे किसी को कोई नुक़सान नहीं होगा.

लेकिन, ह्यू लेविस कहते हैं कि ये तो अंतरिक्ष में कचरा बिखेरनी की आज़ादी जैसा है. लेविस का कहना है कि ओकाजीमा की कंपनी धरती के क़रीब ये आतिशबाज़ी कराने की योजना बना रही है, इससे सैटेलाइट या इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को फिलहाल तो कोई ख़तरा नहीं है. लेकिन, भविष्य में भेजे जाने वाले सैटेलाइट इस कक्षा में स्थापित किए जाएंगे. तो ये कचरा उन्हें नुक़सान पहुंचा सकता है.

हालांकि, लेमल कहते हैं कि उन्होंने अब तक जो मॉडल तैयार किए हैं, उनके हिसाब से ज़्यादातर टुकड़े जल जाएंगे. तो, अंतरिक्ष में कचरा होने की आशंका न के बराबर है. फिर ये ज़हरीले टुकड़े होंगे नहीं, तो इनसे क्या नुक़सान होगा भला?

ह्यू लेविस एक और आशंका जताते हैं. वो कहते हैं कि धरती के ऊपर तैर रहे सैटेलाइट से ख़ास जगह आतिशबाज़ी कराना मुमकिन नहीं होगा. क्योंकि जब तक सैटेलाइट से धातु के गोले छूटेंगे, तब तक सैटेलाइट किसी ख़ास जगह से दूर हो चुका होगा. उड़ते हुए टुकड़े कहां से धरती की कक्षा में प्रवेश करेंगे, पता नहीं. ऐसे में आतिशबाज़ी टोक्यो में करानी हो, तो पता चला कि वो मॉस्को में हो रही होगी.

लेकिन, ओकाजीमा, लेविस की आशंका से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखतीं. वो बरसों से इस ख़्वाब को पूरा करने में जुटी हैं. तमाम आशंकाओं के बावजूद ओकाजीमा को उम्मीद है कि उल्कापिंडों की कृत्रिम आतिशबाज़ी कराने का उनका बीस साल पुराना ख़्वाब बस पूरा होने को है.

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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