वो सैन्य अभ्यास जो दुनिया ख़त्म कर सकता था

सैन्य अभ्यास

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    • Author, रिचर्ड हूलिंगम
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

ये बात 7 नवंबर 1983 की है. 100 के क़रीबी सीनियर सैन्य अधिकारी नेटो के ब्रसेल्स स्थित मुख्यालय में जुटे. उनका मक़सद था तीसरा विश्व युद्ध 'लड़ना'.

ये 'लड़ाई' वो हर साल करते थे. इसका नाम था 'एबल आर्चर'. ये एक युद्धाभ्यास था, जो नेटो देशों की सेनाएं करती थीं, ताकि वक़्त आने पर सोवियत संघ की सेना का मुक़ाबला कर सकें. और एबल आर्चर युद्धाभ्यास, परंपरागत युद्ध की वर्जिश 'ऑटम फोर्ज' के आख़िर में होता था.

इसमें नेटो देशों की हज़ारों सैन्य टुकड़ियां पश्चिमी यूरोप में होने वाले युद्धाभ्यास में हिस्सा लेती थीं.

जिस वक़्त 'एबल आर्चर 83' युद्धाभ्यास हो रहा था, तब शीत युद्ध चरम पर था.

नेटो देशों के संबंध वारसॉ पैक्ट के देशों यानी सोवियत संघ के समर्थक देशों से बहुत ख़राब हो गए थे. उसी साल की शुरुआत में अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सोवियत संघ को 'शैतान का साम्राज्य' कहा था.

1983 के सितंबर महीने में ही सोवियत संघ के पायलटों ने अपनी सीमा में घुस आए कोरियन एयरलाइंस के एक नागरिक विमान को मार गिराया था. इसमें विमान में सवार सभी 269 लोग मारे गए थे.

तीसरे विश्वयुद्ध के समीकरण में अरब देश

शीत युद्ध

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लोहे की दीवार के दोनों तरफ़ मध्यम दूरी तक मार करने वाले एटमी हथियार तैनात किए जा रहे थे.

ब्रिटेन में इसी दौर में ग्रीनहैम कॉमन इलाक़े में एटमी मिसाइलें तैनात की गई थीं. ये मिसाइलें और एटमी हथियार, लॉन्च होने के पांच मिनट के अंदर अपने निशाने को तबाह कर सकती थीं.

कुल मिलाकर दुनिया विनाश लाने वाले एटमी जंग की कगार पर खड़ी थी.

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क्या हुआ था काल्पनिक सैन्य अभ्यास में?

'एबल आर्चर 83' युद्धाभ्यास में जिस जंग की कल्पना की गई थी, उसकी शुरुआत अरब देशों में उठा-पटक से होनी थी.

इसकी वजह से सोवियत संघ को तेल की सप्लाई में बाधा आई थी. वहीं, युगोस्लाविया, जो गुटनिरपेक्ष देश था, वो पश्चिमी देशों के खेमे में चला जाता है.

इस वॉरगेम में सोवियत संघ के नेताओं को इस डर का शिकार होते दिखाया गया था कि युगोस्लाविया के पश्चिमी खेमे में जाने से दूसरे देश भी सोवियत संघ का साथ छोड़कर जा सकते हैं.

वो वार्सा पैक्ट छोड़कर नेटो में शामिल हो सकते हैं. इससे कम्युनिस्ट देशों की पूरी व्यवस्था चरमराकर तबाह होने का डर सोवियत नेताओं को दिख रहा था.

कल्पना का युद्ध

कल्पना का ये युद्ध उस वक़्त शुरू हुआ, जब सोवियत संघ के टैंक युगोस्लाविया में घुस आए.

इसके बाद स्कैंडिनेवियाई देशों यानी डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन पर सोवियत सेनाओं ने हमला बोला. जल्द ही सोवियत सेनाएं पश्चिमी यूरोपीय देशों में दाखिल होने लगी थीं. दबाव में नेटो देशों की सेनाओं को पीछे हटना पड़ा.

कुछ महीने बाद ये काल्पनिक जंग फिर से शुरू हो गई. पश्चिमी देशों के नेताओं ने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ एटमी हथियारों के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी.

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एटमी हमले की कल्पना

तब युद्धाभ्यास में शामिल नेटो सेनाओं के एटमी हमला करने की कल्पना की गई. पहले ही हमले में उस वक़्त सोवियत संघ का हिस्सा रहे यूक्रेन की राजधानी कीव का सफ़ाया हो गया. ये सोवियत संघ को चेतावनी थी कि नेटो देश जंग का दायरा बढ़ाने को तैयार हैं.

पश्चिमी देशों को ये उम्मीद थी कि इस चेतावनी से सोवियत संघ समझेगा कि जंग रोक दी जाए. मगर, एटमी हमला भी काम नहीं आया.

11 नवंबर 1983 तक दोनों ही खेमों ने अपने-अपने एटमी हथियार लॉन्च करने शुरू कर दिए. इन हमलों में दुनिया का ज़्यादातर हिस्सा तबाह हो गया. अरबों लोग मारे गए. सभ्यता का ख़ात्मा हो गया.

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गलती से मिले संकेत

उस दिन जमा हुए नेटो देशों के सैनिक अधिकारी, जब इमारत से बाहर निकले, तो एक-दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे. ये 'एबल आर्चर' युद्धाभ्यास की कामयाबी की बधाई थी. लेकिन, बाद में पश्चिमी देशों की सरकारों को पता चला कि इस युद्धाभ्यास से दुनिया तीसरे और एटमी विश्व युद्ध के बेहद करीब आ गई थी.

अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में सूचना के अधिकार की आज़ादी के प्रोजेक्ट से जुड़े नेट जोन्स कहते हैं कि, 'इस बात के पक्के सबूत हैं कि सोवियत संघ में उच्च स्तर के सैन्य अधिकारियों के लिए नेटो का युदधाभ्यास असली जंग की तैयारी जैसा लगा था.' जोन्स कहते हैं कि अब हमारे पास इस बात के हज़ारों सबूत हैं कि 'एबल आर्चर' युद्धाभ्यास से सोवियत संघ को इस बात का डर था कि पश्चिमी देश उस पर एटमी हमला कर सकते हैं.

अमरीका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव है. यहां पर देश की सुरक्षा से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज़ रखे हैं. हर अल्मारी से सूचनाओं का अंबार झांकता है.

इन दस्तावेज़ों से 'एबल आर्चर 83' की जानकारियां जुटाने में नेट जोन्स को कई साल लग गए.

रूस

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वो बताते हैं कि, 'जब मैंने उस युद्धाभ्यास से जुड़े दस्तावेज़ मांगे तो लोगों ने मेरे ऊपर हंस कर कहा कि वो तो गोपनीय दस्तावेज़ हैं. वो नहीं दिए जा सकते. लेकिन 12 साल की क़ानूनी जंग के बाद 2015 में नेट जोन्स को एबल आर्चर से जुड़ी जानकारियों की पड़ताल की इजाज़त मिल गई.'

मज़े की बात ये रही कि नेट जोंस को ये दस्तावेज़ उनके जन्मदिन पर मिले.

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सोवियत संघ के भीतर पनपा डर

ये दस्तावेज़ 1990 में अमरीकी राष्ट्रपति के विदेशी खुफिया सलाहकार बोर्ड ने तैयार किए थे. इनका नाम था-द सोवियत वार स्केयर यानी सोवियत संघ को जंग का ख़तरा. 109 पेज की इस रिपोर्ट में 'एबल आर्चर 83' से सोवियत संघ के भीतर मची खलबली को विस्तार से बताया गया है.

ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी युद्धाभ्यास में नेटो सेनाओं ने ख़ुफ़िया और कोडेड संदेश भेजे.

लंबे वक़्त तक रेडियो पर संदेशों की आवाजाही बंद रही. ज़मीनी स्तर पर भी सैनिकों को तैनात किया गया.

कई अमरीकी हवाई अड्डों पर तो हथियारों की आवाजाही का भी अभ्यास किया गया. फ़र्ज़ी एटमी हथियारों को हवाई अड्डे से बाहर-भीतर लाया-ले जाया गया.

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इस युद्धाभ्यास के बाद के दिनों की ख़ुफ़िया रिपोर्ट की पड़ताल कर के 1990 की ये रिपोर्ट अमरीकी राष्ट्रपति को सौंपी गई थी.

इसमें बताया गया था कि युद्धाभ्यास के बाद सोवियत संघ क्या-क्या करने की तैयारी कर रहा था.

इसमें पता ये चलता है कि सोवियत संघ ने अपनी सभी उड़ानें रोकने, एटमी हथियारों को तैनात करने और उनके टारगेट तय करने की तैयारी कर डाली थी.

आम नागरिकों को भी जंग के लिए तैयार होने की ट्रेनिंग पर ज़ोर दिया जा रहा था. मतलब साफ़ था, सोवियत संघ पूरी तरह से युद्ध की तैयारी में जुट गया था.

सोवियत संघ के नेताओं को इस बात का यक़ीन नहीं था कि 'एबल आर्चर 83' असल में एक युद्धाभ्यास था. उन्हें तो ये असली जंग की तैयारी लगा, जिसमें पश्चिमी देशों से एटमी हमले का डर भी सोवियत संघ को था.

नेट जोंस कहते हैं कि सोवियत नेताओं का ये डर असली था. सवाल ये उठता है कि नैटो का ये सालाना युद्धाभ्यास, 1983 में सोवियत संघ को युद्ध की तैयारी क्यों लगा?

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सोवियत संघ को युद्ध की आशंका

नेट जोंस और उनके साथी इसके लिए सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी के दस्तावेज़ों की भी पड़ताल कर रहे हैं. इसके अलावा यूक्रेन में रखे दस्तावेज़ भी खंगाले जा रहे हैं.

नेट जोंस बताते हैं कि, 'हमें 1984 का सोवियत संघ का एक सैनिक दस्तावेज़ मिला है. इसमें 'एबल आर्चर 83' की विस्तार से समीक्षा की गई है. इस पर नज़र डालें तो साफ़ लगता है कि सोवियत संघ के नेता 'एबल आर्चर 83' से डरे हुए थे.'

लंदन स्थित थिंक टैंक आरयूएसआई के उप-निदेशक मार्टिन चामर्स कहते हैं कि, 'सोवियत नेता वाक़ई डरे हुए थे. उन्हें 1941 की याद आ गई थी, जब हिटलर ने अचानक ही सोवियत संघ पर हमला बोल कर उसे कमोबेश तबाह कर दिया था. वो इसी नज़रिए से अमरीका की सोवियत संघ को तबाह करने की योजना को देख रहे थे.'

सोवियत संघ

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इमेज कैप्शन, सोवियत संघ के तत्कालीन मुखिया यूरी आंद्रोपोव ने केजीबी एजेंट्स को किसी भी तरह की न्युक्लियर एक्टिविटी पर नज़र रखने को कहा था.

1983 में सोवियत संघ के नेता यूरी आंद्रोपोव थे. वो केजीबी के प्रमुख रह चुके थे और पुराने दौर के सोवियत नेता थे, जो कम्युनिस्ट पार्टी में बहुत निचले स्तर से तरक़्क़ी कर के सबसे ऊंची पायदान पर पहुंचे थे. मगर जब वो सर्वे-सर्वा बने, तब तक आंद्रोपोव बीमार थे और बुरी तरह से डरे हुए इंसान थे.

नेट जोंस बताते हैं कि, 'मुझे एक दस्तावेज़ मिला, इसमें आंद्रोपोव ने केजीबी के अधिकारियों से कहा कि आप को हर हाल में किसी एटमी हमले के ख़तरे से आगाह करना है. हर दो हफ़्ते में केजीबी अधिकारियों को किसी संभावित न्यूक्लियर हमले से जुड़ी जानकारी देनी थी.'

अब चूंकि सोवियत संघ के नेता यही सुनना चाहते थे, तो पश्चिमी देशों में तैनात केजीबी के एजेंटों ने यही संदेश उन तक पहुंचाया.

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केजीबी एजेंट्स ने क्या कहा?

जोंस कहते हैं कि, 'पश्चिमी देशों के ये केजीबी एजेंट पश्चिमी देशों के क़रीब थे. उन्हें पता था कि सोवियत संघ पर कोई भी एटमी हमला नहीं होने वाला है. लेकिन उन्होंने वही बताया जो उनके आला अधिकारी सुनना चाहते थे. जब उनके डिस्पैच मॉस्को पहुंचे, तो सोवियत नेताओं को लगा कि उन पर न्यूक्लियर अटैक बस होने को ही है. इसी दौरान 'एबल आर्चर 83' युद्धाभ्यास हो गया.'

नेट जोंस की नज़र में ये सोवियत संघ के ख़ुफ़िया सिस्टम की नाकामी थी.

रूसी रक्षा मंत्री

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लेकिन, पश्चिमी देशों के नेताओं को भी पहला एटमी हमला करने वाले युद्धाभ्यास के ख़तरों का एहसास नहीं था. जोंस की नज़र में ये तो न्यूक्लियर हथियारों की रेस शुरू करने वाला युद्धाभ्यास था. परंपरागत युद्धाभ्यास-ऑटम फोर्ज भी सोवियत संघ की सीमा के बेहद क़रीब किया गया. फिर आपने एटमी हथियारों के हमले की कल्पना भी कर डाली.

'एबल आर्चर 83' पर अमरीकी राष्ट्रपति को दी गई ख़ुफ़िया रिपोर्ट 1990 तक सार्वजनिक नहीं हुई थी. लेकिन इस युद्धाभ्यास के कुछ महीनों बाद ही ब्रिटिश पीएम मार्गरेट थैचर और अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन तक सोवियत संघ से ख़ुफ़िया रिपोर्ट आनी शुरू हो गई थी. वो इस बात से सदमे में आ गए थे कि सोवियत संघ ये समझ रहा है कि अमरीका और ब्रिटेन उस पर एटमी हमला करने वाले हैं.

नैटो देशों के सैनिक

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राहत की बात ये रही कि अगले कुछ महीनों में सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच तनाव कम हुआ. रीगन ने नए सोवियत प्रधानमंत्री मिखाइल गोर्बाचेव के साथ मिलकर एटमी हथियारों में कटौती के कई समझौते किए.

लेकिन, 'एबल आर्चर 83' के सबक़ आज तक प्रासंगिक हैं. आज जब कि एक बार फिर से रूस और अमरीका के बीच तनातनी बढ़ गई है. युद्ध की धमकियां दी जा रही हैं, तो दोनों देशों को 'एबल आर्चर 83' से मिले सबक़ याद रखने चाहिए.

क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूक्लियर हथियार घटाने वाली संधि से अलग होने की घोषणा कर दी है. वहीं, रूस, चीन और अमरीका अपने-अपने परमाणु हथियारों को नए सिरे से बना रहे हैं.

अमरीका ने रूस पर न्यूक्लियर मिसाइल समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया है.

मार्टिन चार्म्स कहते हैं कि, 'हथियारों के नियंत्रण के समझौतों के टूटने से फ़िक्र बढ़ेगी. दोनों ही खेमे एक-दूसरे पर आरोप लगाएंगे और युद्ध की तैयारी बढ़ा देंगे. इससे भयंकर संकट उठ खड़ा होगा. ऐसे माहौल में अगर 'एबल आर्चर 83' जैसी ग़लतफ़हमी पैदा हुई, तो वो और भी ख़तरनाक होगी.'

वहीं 'एबल आर्चर 83' पर रिसर्च में उम्र खपाने वाले नेट जोंस कहते हैं, 'जब तक एटमी हथियार हैं, तब तक ग़लतफ़हमी से युद्ध की आशंका बनी रहेगी.'

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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