जिनपिंग नए नेता को सौपेंगे प्रधानमंत्री पद, चीन के लिए क्या हैं इसके मायने?

शी जिनपिंग
    • Author, स्टीफ़न मैकडोनेल
    • पदनाम, बीबीसी चीन संवाददाता

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च संगठन नेशनल पीपुल्स कॉन्फ्रेंस की बैठक इस सप्ताह के आख़िर में हो रही है.

इसे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ख़ुद को देश की सत्ता का सर्व शक्तिमान बना लेने के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है.

शी जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी में कुछ ऐसे बदलाव किए हैं, जिनसे पूरी ताक़त उनके पास केंद्रित हो गई है. अब पार्टी में उन्हें दूर-दूर तक कोई चुनौती देता नज़र नहीं आ रहा है.

लेकिन इस बैठक में ख़ुद को सर्व शक्तिमान बना लेने के शी जिनपिंग के रवैये में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. लगभग 3000 प्रतिनिधियों वाली इस बैठक में नया प्रधानमंत्री बनाए जाने का ऐलान हो सकता है.

चीन के प्रधानमंत्री पर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने का ज़िम्मा होता है. अमेरिका के बाद चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है. सैद्धांतिक तौर पर चीन में सत्ता संगठन में प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के बाद दूसरी बड़ी ताक़त होता है.

इस बैठक का पहला दिन रिटायर होने जा रहे मौजूदा प्रधानमंत्री ली केचियांग के नाम होगा. लेकिन बैठक के आख़िर में निश्चित तौर पर ली चियांग को प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान होगा.

ली केचियांग और ली चियांग एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं. ख़ासकर शी जिनपिंग के प्रति वफ़ादारी के मामले में. शी जिनपिंग ने एक दशक पहले भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान शुरू किया था. इसमें पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी गुट के बड़े नेताओं का सफ़ाया हो गया था.

पिछले साल अक्टूबर में पार्टी कांग्रेस की जो बैठक हुई थे उसमें सात सदस्यीय पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी में नई नियुक्तियां हुई थीं.

ली केचियांग (बाईं तस्वीर में जिनपिंग के पीछे), ली चियांग (दाईं तस्वीर में जिनिपंग के पीछे)

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क्या है नई नियुक्तियों के मायने?

इन नई नियुक्तियों से साफ हो गया था कि देश में सबसे ताक़तवर लोगों का समूह अब सिर्फ जिनपिंग के वफादारों का है.

इस सप्ताह के आख़िर में पार्टी कांग्रेस की जो बैठक होगी, उसमें सरकार के अलग-अलग विभागों और मंत्रालयों के प्रमुख बदले जाएंगे और माना जा रहा है कि इन पदों पर जिनपिंग के वफ़ादार ही काबिज़ होंगे.

ऐसा नहीं कि इन वफ़ादारों के अलावा पार्टी में दूसरे लोग मंत्रालय संभालने की काबिलियत नहीं रखते लेकिन क्या शी जिनपिंग उनकी निडर और बगैर लाग-लपेट वाली सलाह मानने के लिए तैयार होंगे.

बीबीसी से एक अनुभवी कारोबारी ने बताया, ''इस तरह के माहौल से एक तरफ़ तो ऐसा ऐसा लगता है कि जिनपिंग अपने नए नेतृत्व के ज़रिये जो करना चाहते हैं वो कर पाएंगे लेकिन दूसरी ओर ऐसा लगता है कि वो अपने ही इको-चैंबर में फंस सकते हैं.''

आख़िर चीन जिस दिशा में बढ़ रहा है उसके लिए इन नियुक्तियों के क्या मायने हैं?

पार्टी में ली चियांग की तरक्की ज़बरदस्त रही है. ली चियांग शंघाई में पार्टी प्रमुख रहे हैं और पिछले साल देश की इस वित्तीय राजधानी में कोरोना के दौरान लोगों की ज़िंदगी को मुश्किल बनाने वाला बेहद कठोर लॉकडाउन इन्हीं की निगरानी में लगाया गया था.

इस लॉकडाउन ने शंघाई के लोगों का जीना दूभर कर दिया था. इसलिए जब शी जिनपिंग ने पार्टी नेतृत्व में उन्हें नंबर दो की पोज़ीशन के लिए चुना तो लोगों को काफ़ी अचंभा हुआ.

लोगों की नाराज़गी लॉकडाउन को लेकर ज़्यादा नहीं थी लेकिन जिस ख़राब ढंग से इसका प्रबंधन किया गया, उससे चीनियों के अंदर भारी असंतोष पैदा हुआ.

शंघाई में दुनिया का सबसे कड़ा लॉकडाउन देखा गया था

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सख़्ती की वजह से लोगों के घरों तक सामान पहुंचाने वाले लोगों को भी घरों में क़ैद रहना पड़ा. लिहाज़ा लॉकडाउन के दौरान घरों में क़ैद करोड़ों लोगों तक न तो सही ढंग से राशन पहुंचा और न दवाइयां.

खाने-पीने की चीज़ों की भारी किल्लत पैदा हो गई. लेकिन जब तक डिलीवरी सामान्य हुई तब तक लोग सड़े टमाटरों की तस्वीरें पोस्ट करने लगे थे.

अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि मजबूरी में लोग इन टमाटरों से काम चला रहे थे.

लेकिन शहर में लॉकडाउन के खत्म होते-होते तक लोग इससे बुरी तरह आजिज़ आ चुके थे और उन्हें घरों में बंद रखने के लिए लगाए बाड़े तोड़े जाने लगे थे.

लोग गार्ड्स से लड़ रहे थे. लोगों को सरकार की ज़ीरो-कोविड पॉलिसी से नफ़रत हो गई थी.

जब ली चियांग को पार्टी में नंबर दो की जगह दी गई तो लोगों ने सवाल उठाए कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान लॉजिस्टिक प्रबंधन में इतनी बुरी तरह नाकाम रहने वाले शख़्स को देश चलाने की ज़िम्मेदारी कैसे दी जा सकती है.

लेकिन उनका अतीत उन्हें एक दूसरे शख़्स के तौर पर भी पेश करता है. हाल के कुछ वर्षों में कुछ कारोबारियों के बीच उन्हें एक इनोवेटर के तौर पर देखा गया है, जो पार्टी की कठोर नीतियों के बीच उनके लिए राह तलाशता रहा है.

चीन में यूरोपियन यूनियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के प्रमुख जोर्ग वुतके कहते हैं, ''वो स्मार्ट और अच्छे ऑपरेटर हैं लेकिन निश्चित तौर पर उन्हें ये पद शी जिनपिंग के प्रति वफादारी की वजह से ही मिला है. अगर राष्ट्रपति शी जिनपिंग ली चियांग से कहें कि कूद जाओ तो वो पूछेंगे कि कितनी ऊंचाई से?''

वुतके का कहना है कि वो 1990 के दशक से कारोबार में हैं और वर्षों तक कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उनका साबका पड़ता रहा है.

उनका कहना है कि कारोबारी समुदाय और आम उपभोक्ताओं दोनों ज़ीरो-कोविड पॉलिसी एक जैसा असर महसूस कर रहे हैं.

वो कहते हैं, ''ज़ीरो कोविड पॉलिसी के ट्रॉमा की वजह से लोग खर्च करने में हिचक रहे हैं. ये बड़ी चिंता है. वो जोखिम लेने से डर रहे हैं और फैसले बहुत सोच-समझ कर रहे हैं. शंघाई में ये ट्रॉमा खासतौर पर है और विदेशी निवेश के लिहाज़ से ये शहर अब उतना आकर्षक नहीं रह गया है.''

हालांकि वुतके इन हालात के लिए सिर्फ ली चियांग को ज़िम्मेदार नहीं मानते. दूसरे कारोबारियों का भी यही मानना है.

ली चियांग को ही शंघाई में टेस्ला को लाने का श्रेय दिया जाता है. अमेरिका के बाहर ये टेस्ला की पहली फैक्ट्री थी. कंपनी को अपने वेंचर के तहत ही इसे लगाने की इजाज़त दी गई. इसके लिए चीनी पार्टनर कंपनी की शर्त नहीं रखी गई थी. जबकि दूसरी कार कंपनियों के लिए ऐसी शर्त रखी गई थी.

कुछ हलकों में ली चियांग ज्यादा उदारवादी माने जाते हैं जो नियमों में बदलाव के लिए तैयार रहते हैं.

फिर भी अभी ये साफ नहीं है कि उन्हें इतनी ताकत मिल पाएगी कि वो नियमों में बदलाव कर सकें. कहा जा रहा है कि वो ऐसा करने से नहीं हिचकेंगे क्योंकि उन्हें शी जिनपिंग का समर्थन हासिल है.

2016 में ली चियांग पूर्वी चीन के धनी प्रांत जियांगसु के पार्टी सेक्रेट्री बनाए गए. ये प्रांत अपनी टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए जाना जाता है. उस वक्त उन्होंने अलीबाबा के फाउंडर जैक मा और कारोबारी जगत के दूसरे दिग्गजों से मीटिंग रखी थी. चियांग इस प्रांत में कारोबार का माहौल बेहतर बनाने की सलाह मांग रहे थे.

लेकिन वो कोई और दौर था. हाल के वर्षों में शी जिनपिंग ने इन पर नकेल कसने का आदेश दिया है. उनका मानना था कि ये कंपनियां इतनी ताकतवर हैं वो अपना ही नुकसान कर लेंगी. इस दौरान ताकतवर कंपनियों के प्रमुखों का ''गायब'' होना आम हो गया है ताकि पार्टी में अनुशासन देखने वाले उनसे पूछताछ कर सकें. हालिया मामला बिलिनेयर बैंक बाओ फान का है. कई अहम टेक्नोलॉजी सौदे उन्होंने ही करवाए थे.

निश्चित तौर पर ली चियांग ने पहले इस तरह की कार्रवाइयों को प्रोत्साहित नहीं किया होगा.

ली चियांग

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शी जिनपिंग और ली चियांग का साथ काफी लंबा

जियांगसु से पहले चियांग झेझियांग में थे. उस समय इस प्रांत के पार्टी चीफ शी जिनपिंग थे. उस समय ली चियांग उनके चीफ ऑफ स्टाफ थे. उस वक्त दोनों खुद से बड़े पार्टी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए देर रात तक काम करते थे.

शी जिनपिंग की ऐसी कोई साझा पृष्ठभूमि रिटायर हो रहे प्रधानमंत्री ली केचियांग के साथ नहीं रही है. ली केचियांग एक तरह से जिनपिंग के प्रतिस्पर्द्धी ही माने जाते रहे हैं. माना जाता है कि वो राष्ट्रपति पद के दावेदार थे. फ़र्ज़ कीजिये कि अगर शी जिनपिंग की जगह केचियांग राष्ट्रपति होते तो चीन आज कैसा होता.

ली केचियांग एक शानदार अर्थशास्त्री रहे हैं. उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति के ठीक बाद पेकिंग यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री ली थी. ली केचियांग कम्युनिस्ट यूथ लीग से पार्टी में ऊंचे पद तक पहुंचे. कम्युनिस्ट यूथ लीग एक प्रतिस्पर्द्धी शक्ति केंद्र रहा है.

लेकिन जिनपिंग से प्रतिस्पर्द्धा में सर्वोच्च पद गंवाने के बाद वो प्रधानमंत्री पद तक सीमित होकर रह गए.

एक समय ली केचियांग ने चीन के शहरों की गलियों में सामान बेचने वालों को दोबारा अपना कारोबार करने के अनुमति दी थी. चीन की अर्थव्यवस्था को इससे मज़बूती मिलने का अंदाज़ा लगाया जाता है.

माना जाता है कि इससे चीन में कारोबार का माहौल और जीवंत हुआ था. लेकिन कारोबार करने उतरे लोगों को जल्द ही पुलिस की वजह से वापस लौटना पड़ा.

ली केचियांग को हु जिंताओं का साथ देते देखा गया था. पिछली बार पार्टी कांग्रेस में हु जिंताओ को शी के आदेश के बाद मंच से उतार दिया गया था.

चीन

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हालांकि अभी तक इसका पता नहीं चल पाया कि वे बीमार होने की वजह से मंच से ले जाए गए थे क्या वे फिर अपने लोगों को पार्टी में प्रमोशन न मिलने पर आवाज़ उठा रहे थे.

पूरी दुनिया में उन्हें कैमरे पर बाहर ले जाते देखा था. जब वो बाहर जा रहे थे तो उन्होंने ली केचियांग का कंधा दोस्ताना अंदाज़ में थपथपाया था और पीएम ने तब अपना सिर मोड़ कर इसका जवाब भी दिया था.

ली केचियांग अपने मज़बूत आर्थिक ट्रैक रिकॉर्ड के लिए जाने जाएंगे. लेकिन उनके कार्यकाल के आख़िरी दिन ज़ीरो-कोविड पॉलिसी से पैदा संकट से घिरे रहे.

उन्होंने कहा था कि अर्थव्यवस्था में भारी दबाव में है लिहाज़ा अधिकारी इस तरह काम करें कि ग्रोथ पर असर न पड़े.

चीन में ज़ीरो कोविड पॉलिसी से मची उथल-पुथल, रियल एस्टेट सेक्टर में संकट और युवाओं के बीच ऊंची बेरोज़गारी दर, टेक्नोलॉजी क्रैकडाउन और सर्विस इंडस्ट्री को हुए बड़े नुकसान से देश को झटका लगा है.

वुतके कहते हैं, ''माओ अर्थव्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने के दौर में भी बचे रहे क्योंकि लोगों के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था."

"लेकिन अब लोगों का जीवनस्तर काफी अच्छा हो गया. फिर भी मध्य वर्गीय माता-पिताओं को लग रहा है कि उनके बच्चों को उनसे अच्छी जिंदगी नहीं मिलने वाली.''

बहरहाल इस साल की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस और खासकर इसमें तरक्की पाने वाले लोगों पर लोगों की बारीक निगाहें होंगी.

खासकर उन लोगों की जो इकोनॉमी पर नज़र रखे हुए हैं.

लेकिन अगर इकोनॉमी को दुरुस्त करना है तो चीन को अपने नेताओं के सोचे गए सभी कदम एक साथ उठाने होंगे. अगर चीन सभी मोर्चों पर अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहता है तो मुश्किल सवाल खड़े होने शुरू हो जाएंगे.

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