पीएम मोदी का यह साहस है या नेहरू की दिखाई राह को साध लिया है

मोदी

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रूस का पिछले एक साल से यूक्रेन पर हमला जारी है. 24 फ़रवरी को रूसी हमले का एक साल पूरा हो गया.

इस युद्ध में किसकी जीत होगी और किसकी हार, अब तक तस्वीर साफ़ नहीं हो पाई है. लेकिन इस जंग के कारण पिछले एक साल में दुनिया बुरी तरह से बँट गई है.

भारत भी विदेश नीति के मामले में कई मोर्चों पर जूझता रहा. भारत ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और रूस ने एक लोकतांत्रिक देश यूक्रेन पर हमला किया है.

पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों ने यूक्रेन पर रूसी हमले की खुलकर निंदा की और यूक्रेन का समर्थन किया. एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत पर भी दबाव रहा कि वह रूसी हमले की निंदा करे, लेकिन रूस भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है.

पश्चिमी देशों ने रूस के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. यूरोप के देशों ने रूस से तेल और गैस के आयात में भारी कटौती की है. यूक्रेन में अप्रत्याशित रूप से हथियार भेजे गए हैं ताकि वह अपनी रक्षा ख़ुद कर सके. लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत ने यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की निंदा नहीं की.

मोदी और बाइडन

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रूस से साझेदारी पर नहीं आई आँच

यूक्रेन संकट में भी भारत और रूस की साझेदारी पर अब तक कोई आँच नहीं आई है. पिछले साल सितंबर में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से हुई थी. दोनों नेताओं ने कहा था कि रूस और भारत की दोस्ती अटूट है.

प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति से कैमरे के सामने ही कहा था कि अब युद्ध का ज़माना नहीं है. लेकिन जंग के एक साल होने के बावजूद भारत ने इसके लिए रूस को ज़िम्मेदार नहीं बताया है और न ही इसकी निंदा की है.

एक तरफ़ यूरोप ने रूस से तेल और गैस लेना लगभग बंद कर दिया तो दूसरी तरफ़ भारत का रूस से तेल आयात बढ़ता गया. इस वित्त वर्ष में अब तक रूस से भारत का आयात लगभग 400 फ़ीसदी तक बढ़ा है. आयात में यह उछाल रूस से छूट के साथ मिल रहे कच्चे तेल के कारण है.

मौजूदा वित्त वर्ष के पहले 10 महीने में भारत के लिए मर्चेंडाइज़ आयात के मामले में रूस चौथे नंबर पर रहा. वहीं पहले नंबर पर चीन, दूसरे नंबर पर यूएई और तीसरे नंबर पर अमेरिका है.

वीडियो कैप्शन, अमेरिका क्या भारत में रूस की जगह ले सकता है?

भारत का रूस से आयात इस वित्त वर्ष में 37.31 अरब डॉलर का रहा जो इसी अवधि में पिछले साल महज़ 7.71 अरब डॉलर का था.

भारत के वाणिज्य सचिव सुनील बर्थवाल ने निक्केई एशिया से कहा है, ''भारत ने रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल ख़रीदा है और उसे रिफ़ाइंड कर पेट्रोलियम उत्पाद के रूप में बेचा है.''

इसका नतीजा यह हुआ कि भारत से पेट्रोलियम उत्पाद का निर्यात भी मज़बूती से बढ़ा है.

अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 के बीच भारत से पेट्रोलियम उत्पाद का निर्यात 78.58 अरब डॉलर का हुआ है जो कि पिछले वित्त वर्ष में 50.77 अरब डॉलर का था.

इसके अलावा भारत रूस में निर्मित हथियारों की ख़रीदारी भी लगातार कर रहा है. कहा जा रहा है कि केवल भारत ही नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ के देश पश्चिम के यूक्रेन पर ध्यान केंद्रित करने को खाद्य सुरक्षा, महंगाई और बढ़ते क़र्ज़ जैसे ज़रूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के तौर पर देख रहे हैं.

मोदी और पुतिन

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यूक्रेन संकट में मोदी सरकार की नीति

यूक्रेन पर रूस के हमले में भारत के रुख़ को कई लोग साहसिक बता रहे हैं तो कई लोग इसे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति से जोड़ रहे हैं. वहीं कइयों का मानना है कि भारत अपने हितों के हिसाब से फ़ैसले ले रहा है.

यूक्रेन संकट के दौरान मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति को जिस तरह से आगे बढ़ाया उसके पीछे मुख्य रूप से चार कारण बताए जा रहे हैं.

ये चार कारण हैं- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ऊर्जा, हथियार और प्रभाव. भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक हैं. जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत थी तब ही सोवियत यूनियन ने 1900 में पहला वाणिज्यिक दूतावास खोला था. लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्माहट शीत युद्ध के दौरान आई.

आज़ादी के बाद से ही भारत की सहानुभूति सोवियत यूनियन से रही है. ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की पॉलिटिकल साइंटिस्ट पिल्लई राजेश्ववरी ने लिखा है कि भारत की सोवियत यूनियन से सहानुभूति उपनिवेश और साम्राज्यवाद विरोधी भावना के कारण भी है.

यह भावना शीत युद्ध के दौरान शीर्ष पर रही. कहा जाता है कि यह भावना कई बार पश्चिम और अमेरिका विरोधी भी हो जाती है. शीत युद्ध के बाद भी भारत की सहानुभूति रूस से ख़त्म नहीं हुई. यूक्रेन युद्ध में भी भारत के रुख़ में कोई परिवर्तन नहीं आया.

यूक्रेन संकट में भारत के रुख़ से पश्चिम को भले निराशा हुई है, लेकिन भारत के विदेश मंत्री ज़ोरदार और आक्रामक तरीक़े से अपनी नीति का बचाव कर रहे हैं.

मोदी और इंडोनेशिया

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

जयशंकर भारत के रुख़ पर यूरोप की निराशा और सवालों का जवाब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से दे रहे हैं. पिछले साल जून महीने के पहले हफ़्ते में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में एक कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''यूरोप इस मानसिकता के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है.''

जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर प्रभाष रंजन ने जयशंकर की इस टिप्पणी को तीन नवंबर, 1948 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में नेहरू के भाषण से जोड़ा था.

नेहरू ने कहा था, ''यूरोप की समस्याओं के समाधान में मैं भी समान रूप से दिलचस्पी रखता हूँ. लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि दुनिया यूरोप के आगे भी है. आप इस सोच के साथ अपनी समस्या नहीं सुलझा सकते हैं कि यूरोप की समस्या ही मुख्य रूप से दुनिया की समस्या है.

समस्याओं पर बात संपूर्णता में होनी चाहिए. अगर आप दुनिया की किसी एक भी समस्या की उपेक्षा करते हैं तो आप समस्या को ठीक से नहीं समझते हैं. मैं एशिया के एक प्रतिनिधि के तौर पर बोल रहा हूँ और एशिया भी इसी दुनिया का हिस्सा है.''

जयशंकर
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यूरोप इस माइंडसेट के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है
एस जयशंकर
भारत के विदेश मंत्री

जयशंकर की इस टिप्पणी का हवाला देते हुए जर्मन चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स ने इसी महीने म्यूनिख सिक्यॉरिटी कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''भारतीय विदेश मंत्री की टिप्पणी में दम है. लेकिन यह केवल यूरोप की समस्या नहीं रहेगी, अगर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नियमों का पालन सख़्ती से किया जाए.''

जर्मन चांसलर 25 और 26 फ़रवरी को भारत के दौरे पर थे. भारत आने पर जर्मन चांसलर ने ट्वीट कर कहा था, ''चुनौती भरे समय में भारत जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है. यूक्रेन पर रूस की आक्रामकता के बहुत ही भयावह नतीजे सामने आए हैं. इसका असर दुनिया पर भी बहुत बुरा पड़ा है. भारत के साथ मिलकर हम युद्ध रोकने की कोशिश कर रहे हैं.''

मोदी और पुतिन

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नेहरू की दिखाई राह पर मोदी सरकार?

भारत जितनी आक्रामकता से पश्चिम के दबाव को ख़ारिज कर रहा है, उसकी बुनियाद क्या है? कई लोगों का मानना है कि भारत का यह रुख़ नया नहीं है, भले कहने का अंदाज़ आक्रामक हुआ है.

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति की बुनियाद गुटनिरपेक्षता में रखी थी. उसके बाद की जितनी सरकारें आईं सबने इस नीति का पालन अपने-अपने हिसाब से किया है.

हंगरी में सोवियत यूनियन के हस्तक्षेप के एक साल बाद 1957 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में बताया था कि भारत ने क्यों इस मामले में यूएसएसआर की निंदा नहीं की.

नेहरू ने कहा था, ''दुनिया में साल दर साल और दिन ब दिन कई चीज़ें घटित होती रहती हैं, जिन्हें हम व्यापक रूप से नापसंद करते हैं. लेकिन हमने इनकी निंदा नहीं की है क्योंकि जब कोई समस्या का समाधान खोज रहा होता है तो उसमें निंदा से कोई मदद नहीं मिलती है.''

द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है कि नेहरू की यह नीति भारत को टकराव की स्थिति में राह दिखाती रही है. ख़ासकर तब जब टकराव भारत के साझेदारों के बीच होता है.

सोवियत यूनियन का चाहे 1956 में हंगरी में हस्तक्षेप हो या 1968 में चेकोस्लोवाकिया में या फिर 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सब में भारत की लाइन कमोबेश यही रही है.

2003 में जब अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया तब भी भारत का रुख़ इसी तरह का था. स्टैनली जॉनी ने लिखा है कि यूक्रेन पर हमले में रूस की निंदा नहीं करना और संयुक्त राष्ट्र के निंदा प्रस्ताव में वोटिंग से बाहर रहना मौलिक रूप से भारत के तटस्थता वाले ऐतिहासिक रुख़ से अलग नहीं है.

चीन और भारत

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लेकिन बात केवल भारत की नहीं है. भारत की तरह अन्य मिडिल पावर वाले देश- दक्षिण अफ़्रीका, इंडोनेशिया और यूएई का रुख़ भी यूक्रेन संकट में भारत की तरह ही रहा है.

यहाँ तक कि तुर्की नेटो का हिस्सा है और नेटो खुलकर यूक्रेन के साथ है, लेकिन अर्दोआन की लाइन बिल्कुल अलग है. यूक्रेन के ख़िलाफ़ प्रतिबंध में तुर्की नेटो का सदस्य होने के बावजूद शामिल नहीं हुआ है.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन संकट में भारत के रुख़ को ढुलमुल बताया था. पिछले साल अप्रैल में अमेरिका के डिप्टी एनएसए दलीप सिंह भारत आए थे और उन्होंने कहा था कि रूस से भारत व्यापार जारी रखता है तो इसके नतीजे भुगतने होंगे. लेकिन भारत ने इन धमकियों की फ़िक्र बिल्कुल नहीं की.

अमेरिका को ही अपना अंदाज़ बदलना पड़ा. अब अमेरिका न चाहते हुए भी भारत के रूस से तेल ख़रीदने का विरोध नहीं कर रहा है. आठ फ़रवरी को अमेरिका की यूरोपियन और यूरेशियाई मामलों की असिस्टेंट सेक्रेटरी कैरेन डॉनफ़्रिड ने मीडिया से एक टेलिकॉन्फ़्रेंस में कहा था कि यूक्रेन संकट में भारत के रुख़ को लेकर अमेरिका असहज नहीं है.

डॉनफ़्रिड ने कहा था, ''मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अमेरिका भारत के ख़िलाफ़ किसी तरह के प्रतिबंध पर विचार नहीं कर रहा है. भारत के साथ हमारा संबंध बेहद अहम है.''

मोदी और ब्रिक्स

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रूस से तेल ख़रीदने के मामले में भी भारतीय विदेश मंत्री ने भारत का पक्ष बिना लाग लपेट के कई बार रखा है. पिछले साल दिसंबर महीने में एस जयशंकर ने संसद में कहा था कि भारत की रिफ़ाइनरी कंपनियों को जहाँ अच्छी डील मिलेगी, वहाँ से तेल ख़रीदेंगी.

एस जयशंकर ने कहा था, ''मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हम रूस से तेल ख़रीदने के मामले में अपनी कंपनियों को कोई निर्देश नहीं दे सकते. उन्हें जहाँ अच्छा विकल्प मिलेगा, वहाँ जाकर सौदा करेंगी. यह बाज़ार पर निर्भर करता है. यह एक संवेदनशील नीति है कि भारतीयों के हक़ में जो डील अच्छी होगी, हम उसके साथ जाएंगे और हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं.''

अमेरिका ने यूक्रेन पर रूस के हमले को लोकतंत्र और खुली दुनिया पर हमला बताने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश कामयाब नहीं रही. भारत भी अमेरिका की इस सोच में शामिल नहीं हुआ. रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध में भी मुख्य रूप से पश्चिम के देश शामिल हैं.

एशिया से महज़ तीन देश जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर हैं जो यूक्रेन के ख़िलाफ़ पश्चिम के प्रतिबंध में शामिल हैं. चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसने रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंधों को ख़ारिज कर दिया. भारत ने भी रूस से व्यापार बंद नहीं किया और इसका नतीजा हुआ कि पश्चिम के प्रतिबंध बहुत कामयाब नहीं रहे.

कहा जा रहा है कि शीत युद्ध के बाद यूक्रेन संकट सबसे अहम वैश्विक संकट है. भारत ने पिछले 30 सालों में रूस के अलावा पश्चिम से भी संबंध सुधारे हैं. ऐसे में भारत के लिए किसी एक का पक्ष लेना आसान नहीं था.

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इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ नरेंद्र मोदी

अमेरिका के पास नैतिक अधिकार नहीं

कई लोग इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि अमेरिका के पास अब नियम आधारित दुनिया की बात करने का नैतिक अधिकार नहीं है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अगर नियम आधारित दुनिया को मानता तो यमन में सऊदी अरब को रोकता, गोलान और पूर्वी यरुशलम पर इसराइल को रोकता, तुर्की को सीरिया में रोकता. ख़ुद को इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और लीबिया में रोकता. ज़ाहिर है यूक्रेन पर रूस के हमले के मामले में अमेरिका के नैतिक तर्क को लोग उसके अतीत के आईने में देख रहे हैं. लोगों का कहना है कि नियम केवल रूस के लिए नहीं हो सकता.

क्लेमेंट मान्याथेला दक्षिण अफ़्रीका में रेडियो 702 पर एक लोकप्रिय और प्रभावी टॉक शो के होस्ट हैं. वह अपने शो में भी यूक्रेन संकट को लेकर कई तरह के सवाल पूछते हैं. पुतिन ने यूक्रेन पर हमला करना क्यों ज़रूरी समझा? यूक्रेन को हथियार देकर क्या नेटो युद्ध की आग में घी डाल रहा है? जब अमेरिका ख़ुद ही कई देशों पर हमला कर चुका है, ऐसे में उसकी बात दुनिया के बाक़ी देश क्यों सुनेंगे?

क्लेमेंट मान्याथेला ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा है, ''अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया. लीबिया पर हमला किया. इन हमलों को लेकर अमेरिका का अपना तर्क है. इन तर्कों से हम बिल्कुल सहमत नहीं हैं. अब अमेरिका कोशिश कर रहा है कि पूरी दुनिया रूस के ख़िलाफ़ हो जाए. ज़ाहिर है कि यह भी अस्वीकार्य है. किसी दूसरे देश पर हमले के तर्क को मैं अब तक नहीं समझ पाया हूँ. सच कहिए तो ऐसा लगता है कि अमेरिका हमें धमका रहा है.''

चीन और ईरान

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यूक्रेन पर हमले को लेकर दुनिया कैसे बंटी है

वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''यूक्रेन संकट में दुनिया बुरी तरह से बँट गई है. इसके साथ यह भी दिखा कि बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में अमेरिका की भी एक सीमा है. इसके ठोस उदाहरण हैं. पुतिन को अलग-थलग करने की कोशिश नाकाम रही है.

यह बहुत ही प्रत्याशित था कि चीन और ईरान पुतिन को अलग-थलग करने में साथ नहीं देंगे, लेकिन भारत ने पिछले हफ़्ते घोषणा की थी कि यूक्रेन संकट के बाद से रूस के साथ उसका व्यापार 400 फ़ीसदी बढ़ा है.

रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ का स्वागत अफ़्रीका के नौ देशों ने किया. लावरोफ़ का स्वागत करने वाले दक्षिण अफ़्रीका के विदेश मंत्री नालेदी पंडोर भी थे. पंडोर ने रूस को अपना दोस्त बताया है.''

वॉशिगंटन पोस्ट से जोहानिसबर्ग स्थित डेमोक्रेसी वर्क्स फ़ाउंडेशन के प्रमुख विलियम गमेदे ने कहा, ''बाइडन को लगता है कि रूस का यूक्रेन पर हमला तानाशाही व्यवस्था और लोकतंत्र की लड़ाई है. लेकिन ऐसा नहीं है. दक्षिण अफ़्रीका, भारत और ब्राज़ील ने रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी खेमे में शामिल होने से इनकार कर दिया.''

एक तरफ़ अमेरिका यूक्रेन पर रूसी हमले को नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और लोकतंत्र के ख़िलाफ़ बताने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ़ पुतिन यूक्रेन पर हमले को नेटो से जंग बता रहे हैं. रूस कोशिश कर रहा है कि यह लड़ाई पश्चिम बनाम बाक़ी दुनिया के रूप में देखी जाए.

दिल्ली स्थिति जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र में डॉक्टर राजन कुमार असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. डॉक्टर राजन कुमार कहते हैं, ''यूक्रेन पर रूसी हमले को लोकतंत्र बनाम तानाशाही व्यवस्था की लड़ाई के रूप में पेश करने की कोशिश अमेरिका ने की, लेकिन ग्लोबल साउथ के देशों ने इस पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया.

सबको पता है कि सऊदी अरब में राजशाही व्यवस्था है और अमेरिका अपने हितों के लिए उसकी हर बात मानता है. हम ये भी नहीं कह सकते हैं कि यूक्रेन पर हमले को लेकर पूरी दुनिया रूस के ख़िलाफ़ हो गई है.

भारत और चीन में दुनिया की क़रीब 36 फ़ीसदी आबादी रहती है और दोनों देश रूस के ख़िलाफ़ नहीं हैं. यहाँ तक कि इंडोनेशिया, यूएई, दक्षिण अफ़्रीका और पाकिस्तान भी अमेरिका की नहीं सुन रहे हैं.''

सऊदी अरब

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बदलता वर्ल्ड ऑर्डर

दूसरी तरफ़ अमेरिका का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन पर हमले को लेकर रूस के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव में 193 देश वोटिंग में शामिल हुए और इनमें से 141 देशों ने रूस के ख़िलाफ़ वोट किया. इस लिहाज़ से देखें तो लगता है कि यूक्रेन संकट में ज़्यादातार देश पश्चिम के साथ हैं. लेकिन रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध में महज़ 33 देश ही शामिल हैं. जिन देशों में दो तिहाई आबादी रहती है, उन्होंने रूस की निंदा करने से इनकार कर दिया.

डॉक्टर राजन कुमार कहते हैं, ''जिन 141 देशों के समर्थन की बात कही जा रही है, उनमें बड़ी संख्या में ऐसे देश भी हैं, जिनकी कोई स्वतंत्र विदेश नीति नहीं है. इन्हें तोलमोल कर अपने पक्ष में किया जा सकता है.''

यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद मोदी सरकार की विदेश नीति को डॉक्टर राजन कुमार स्वतंत्र और दबाव मुक्त बताते हैं. वो कहते हैं कि भारत की विदेशी में ऐसे तीन दौर आए जब यहाँ की सरकार ने अमेरिका के दबाव में झुकने से इनकार कर दिया और अपने हितों की रक्षा मज़बूती से की.

राजन कुमार कहते हैं, ''पहला दौर नेहरू का था, जब उन्होंने पश्चिम के दबदबे के सामने झुकने से इनकार कर दिया था. नेहरू ने गुटनिरपेक्षता की राह खोजी थी जिसमें सोवियत यूनियन से सहानुभूति थी. अमेरिका को यह क़तई अच्छा नहीं लगता था, लेकिन नेहरू ने इसकी चिंता नहीं की थी.

दूसरा दौरा इंदिरा गांधी का था जब उन्होंने बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग किया जबकि अमेरिका इसके ख़िलाफ़ था. इंदिरा गांधी ने भी बहुत ही साहस और बुद्धि से काम लिया था.

तीसरा दौर मोदी का है जिन्होंने यूक्रेन पर रूसी हमले में पश्चिम के दबाव को तिनके भर भी स्वीकार नहीं किया. मोदी के साहस को भी देखें तो इसकी राह नेहरू ने दिखाई थी क्योंकि भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता की नीति की निरंतरता है.''

यूक्रेन पर रूस के हमले को बदलते वर्ल्ड ऑर्डर के रूप में भी देखा जा रहा है और इस बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में भारत अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है.

2008 में जॉर्जिया युद्ध और 2014 में क्राइमिया को यूक्रेन से छीनकर रूस में मिलाने को बदलते वर्ल्ड ऑर्डर के शुरुआती संकेत के रूप में देखा जा रहा था. फिर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को बुला लिया और तालिबान के ख़िलाफ़ 20 साल की लड़ाई को तालिबान के हवाले कर दिया.

पिछले साल 2022 में रूस ने एक बार फिर से यूक्रेन पर हमला कर दिया. इन घटनाक्रमों को बदलते वर्ल्ड ऑर्डर से जोड़ा जा रहा है क्योंकि अमेरिका इन्हें रोकने में नाकाम रहा है.

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