नेपाल में सियासी उथल-पुथल क्या भारतीय विदेश सचिव के दौरे से हुई?

प्रचंड

इमेज स्रोत, @PM_nepal_

इमेज कैप्शन, नेपाल दौरे में विनय मोहन क्वात्रा प्रधानमंत्री प्रचंड से मिलते हुए
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा 13 फ़रवरी को नेपाल के दो दिवसीय दौरे पर पहुँचे थे.

क्वात्रा विदेश सचिव बनने से पहले नेपाल में मार्च 2020 से अप्रैल 2022 तक भारत के राजदूत थे. क्वात्रा के इस दौरे को नेपाल में फिर से शुरू हुई राजनीतिक उठापटक से जोड़ा जा रहा है.

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और वर्तमान प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड की पार्टी का गठबंधन दो महीने में ही टूट गया है.

नेपाल में नौ मार्च को राष्ट्रपति चुनाव है और उससे पहले इस गठबंधन के टूटने को कई कसौटियों पर देखा जा रहा है. ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है.

इस गठबंधन के टूटने के पीछे मुख्य कारण राष्ट्रपति चुनाव में नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार रामचंद्र पौडेल के समर्थन में प्रचंड का आना बताया जा रहा है.

ओली की पार्टी का कहना है कि उनके सांसदों के समर्थन से पिछले साल 25 दिसंबर को प्रचंड प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने वादा किया था कि राष्ट्रपति चुनाव में सीपीएन-यूएमएल के उम्मीदवार का समर्थन करेंगे.

प्रचंड पर वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगाते हुए सीपीएन-यूएमएल ने समर्थन वापस ले लिया.

लेकिन नेपाल में इन सारे घटनाक्रम को भारतीय विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा के हालिया दौरे से जोड़ा जा रहा है.

नेपाल और भारत

इमेज स्रोत, @IndiaInNepal

इमेज कैप्शन, विनय मोहन क्वात्रा के साथ नेपाल की विदेश मंत्री बिमला पौडेल

दूतावासों से चलता है नेपाल?

नेपाल के बारे में कहा जाता है कि यहाँ सरकार सिंह दरबार से नहीं बल्कि राजधानी काठमांडू स्थित कुछ दूतावासों से चलती है. काठमांडू स्थित सिंह दरबार के कैंपस में ही सारे मंत्रालयों के दफ़्तर हैं.

काठमांडू स्थित भारतीय और चीनी दूतावास को नेपाल में सत्ता का केंद्र कहा जाता है. आजकल अमेरिकी दूतावास को भी लोग इसी नज़रिए से देखते हैं.

प्रचंड की पार्टी के एक छात्र नेता ने बताया कि विनय मोहन क्वात्रा का दौरा भले ही पहले से तय था, लेकिन उनके दौरे के बाद जो कुछ हुआ वह महज़ संयोग नहीं है.

वीडियो कैप्शन, ‘राम का जन्म नेपाल में हुआ’, कहकर घिरे नेपाल के पीएम?

प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी सेंटर) के उस छात्र नेता ने कहा, ''विनय मोहन क्वात्रा नेपाल में भारत के राजदूत रहे हैं और वह भारत के हितों को साधना बख़ूबी जानते हैं. नेपाल में कहा भी जाता है कि यहाँ की सरकार भारतीय दूतावास से चलती है.

विनय मोहन क्वात्रा की मुलाक़ात प्रधानमंत्री प्रचंड से लेकर अलग-अलग पार्टियों के कई नेताओं से हुई थी. 25 दिसंबर को प्रचंड का ओली के समर्थन से प्रधानमंत्री बनना भारत को रास नहीं आया था. नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों के एकजुट होने को भारत अपने हितों के ख़िलाफ़ देखता है.''

विजयकांत कर्ण डेनमार्क में नेपाल के राजदूत रहे हैं. वह काठमांडू में 'सेंटर फ़ॉर सोशल इन्क्लूज़न एंड फ़ेडरलिज़म' (सीईआईएसएफ़) नाम से एक थिंक टैंक चलाते हैं. उनसे पूछा कि विनय क्वात्रा का नेपाल दौरा और ओली-प्रचंड के अलग होने के बीच क्या कोई संबंध है?

प्रचंड

इमेज स्रोत, @cmprachanda

विजयकांत कर्ण कहते हैं, ''नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों के एकजुट होने से भारत असहज रहा है. इसके पीछे कारण भी हैं. दो देशों का द्विपक्षीय संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्टेट टू स्टेट होता है, लेकिन नेपाल में चीन अपने हितों के कम्युनिस्ट पार्टियों के ज़रिए साधता है.

चीन की कोशिश रहती है कि नेपाल की सारी कम्युनिस्ट पार्टियां एकजुट रहें. चीन को इसका फ़ायदा भी मिलता है. नवंबर 2017 में ओली और प्रचंड मिल कर चुनाव लड़े थे. फ़रवरी 2018 में ओली पीएम बने और कुछ महीने में ही दोनों ने अपनी पार्टियों का विलय कर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बना लिया था.''

विजयकांत कर्ण कहते हैं, ''ओली और प्रचंड के साथ आने का फ़ायदा चीन को ख़ूब मिला. इसी सरकार ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड में शामिल होने का फ़ैसला किया था. तब यहाँ चीनी दूतावास सत्ता का केंद्र बन गया था.

यहां तक कि ओली चीन से प्रत्यर्पण संधि भी करने वाले थे. लेकिन नेपाल के भीतर से ही इसका विरोध हुआ और भारत-अमेरिका का भी दबाव था, इसलिए यह नहीं हो सका था. चीन नेपाल के साथ प्रत्यर्पण संधि कर तिब्बती शरणार्थियों को अपने यहाँ ले जाने में सफल होता.''

''2020 में चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के ख़िलाफ़ जब हांगकांग के स्थानीय लोग सड़क पर थे, तब नेपाल की ओली सरकार ने कहा था कि हांगकांग चीन का अभिन्न हिस्सा है और नेपाल चीन के साथ खड़ा है. तब ओली सरकार से कई लोगों ने पूछा था कि नेपाल कश्मीर के मामले में इस तरह से मुखर होकर क्यों नहीं बोलता है?''

विजकांत कर्ण मानते हैं कि विनय क्वात्रा के दौरे को नेपाल में ओली-प्रचंड के अलग होने से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जा सकता है, लेकिन कई बार चीज़ें इत्तेफ़ाक़ से हो जाती हैं.

ओली

इमेज स्रोत, Getty Images

राष्ट्रपति चुनाव

नेपाल में राष्ट्रपति का पद भारत की तरह ही है. नेपाल में भी राष्ट्रपति के पास बहुत अधिकार नहीं होते हैं. लेकिन नेपाल की वर्तमान राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी का कार्यकाल बहुत ही विवादित रहा है.

बिद्या देवी भंडारी केपी शर्मा ओली की वफ़ादार मानी जाती हैं. केपी शर्मा ओली को 2021 में प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी, लेकिन बिद्या देवी भंडारी की वफ़ादारी पर इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था.

जून 2021 में शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने तो बिद्या देवी भंडारी कई बिलों को राष्ट्रपति की हैसियत से अटकाती रहीं. नागरिता बिल इन्हीं में से एक है.

वीडियो कैप्शन, भारत नेपाल के बीच अब गौतम बुद्ध को लेकर क्यों हुआ विवाद?

नेपाली कांग्रेस के नेता कंचन झा कहते हैं कि प्रचंड को पता था कि अगर ओली की पार्टी से कोई राष्ट्रपति बनेगा तो बिद्या देवी भंडारी की तरह ही अड़ंगा डालता रहेगा. ऐसे में प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पौडेल को समर्थन करना ठीक समझा.

कंचन झा कहते हैं, ''बिद्या देवी भंडारी ने कई ऐसे काम किए जो भारत को भी रास नहीं आया होगा. नागरिकता बिल अगर पास हो गया होता तो मधेसियों के हक़ में होता. भारत की ओर से जो अघोषित नाकाबंदी हुई थी, वह नागरिकता के सवाल पर ही थी.

ऐसे में भारत के लिए राष्ट्रपति चुनाव भी अहम है. भारत नहीं चाहता है कि कोई ऐसा राष्ट्रपति बने जो हमेशा अड़ंगा डालता रहे. विनय मोहन क्वात्रा नेपाल के नेताओं को अच्छी तरह से समझते हैं. उनके जेहन में भी यह बात थी कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों का एकजुट होना भारत के लिए ठीक नहीं है.''

प्रचंड और मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय भी इस बात को मानते हैं कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता को भारत बहुत पसंद नहीं करता है. कम्युनिस्ट पार्टियों को वैचारिक रूप से चीन के क़रीब माना जाता है.

रंजीत राय कहते हैं, ''प्रचंड का नेपाली कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बनना और ओली के समर्थन से पीएम रहने में फ़र्क़ है. भारत चाहता था कि सरकार में नेपाली कांग्रेस की मज़बूत मौजूदगी रहे. अब ओली के हटने के बाद प्रचंड सरकार में नेपाली कांग्रेस के सांसद भी अहम मंत्रालय हासिल करेंगे.

लेकिन इस सरकार के लिए यह भी ज़रूरी था कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी कोई उन्हीं का वफ़ादार रहे. ओली की पार्टी से कोई राष्ट्रपति बनता तो नेपाली कांग्रेस या प्रचंड के लिए काम करना आसान नहीं होता.''

रंजीत राय कहते हैं, ''प्रचंड और ओली के रिश्ते पहले ही बहुत ख़राब हो चुके थे. दोनों एक-दूसरे से ज़्यादा शेर बहादुर देउबा के साथ सहज महसूस करते हैं. प्रचंड अब नेपाली कांग्रेस के साथ सरकार में रहेंगे और मुझे लगता है कि ओली से अलग होकर उन्होंने अपनी ग़लती सुधार ली है.

एक आशंका और है जो कि सच साबित हो सकती है. संभव है कि प्रचंड को कुर्सी से हटाने के लिए ओली शेर बहादुर देउबा के सामने पीएम बनने का प्रस्ताव पेश करें. देउबा 80 साल के हो गए हैं और उनके लिए भी तीन साल इंतज़ार करना आसान नहीं होगा.''

मोदी-प्रचंड

इमेज स्रोत, Getty Images

आमंत्रित हस्तक्षेप

दीप कुमार उपाध्याय भारत में नेपाल के राजदूत रहे हैं. उन्हें लगता है कि नेपाल के राजनेता ख़ुद ही बाहरी हस्तक्षेप को आमंत्रित करते हैं.

दीप कुमार उपाध्याय कहते हैं, ''विनय क्वात्रा भारत के विदेश सचिव हैं,लेकिन उनकी मुलाक़ात प्रधानमंत्री से सीधे होती है. प्रधानमंत्री ही नहीं राष्ट्रपति से लेकर तमाम विपक्षी नेता मिलते हैं. होना तो यह चाहिए था कि क्वात्रा नेपाल में अपने समकक्ष से मिलते. बहुत होता तो विदेश मंत्री से मिल लेते.

भारत में नेपाल के राजदूत के लिए वहाँ के विदेश मंत्री से भी मिलना इतना आसान नहीं होता है. नेपाल के प्रधानमंत्री को अपने विदेश सचिव और विदेश मंत्री पर भरोसा होता तो विनय क्वात्रा की बात उनके ज़रिए ही सुन लेते. लेकिन यहाँ की राजनीति बहुत निचले स्तर पर चली गई है. किसी को किसी पर भरोसा नहीं है.''

दीप कुमार उपाध्याय कहते हैं कि नेपाल के राजनेता अपनी ग़लतियों की इल्ज़ाम भारत पर नहीं लगा सकते हैं. वह कहते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल में भारत का माइक्रोमैनेजमेंट न के बराबर हो गया है.

रंजीत राय ने नेपाल में 'इन्वाइटेड इंटरफ़ेयर' यानी आमंत्रित हस्तक्षेप की एक मिसाल अपनी किताब 'काठमांडू डिलेमा रीसेटिंग इंडिया नेपाल टाइज़' में भी दी है.

नेपाल

इमेज स्रोत, @IndiaInNepal

इमेज कैप्शन, नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के साथ भारतीय विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा

रंजीत राय ने लिखा है, ''नेपाल में नए इंस्पेक्टर-जनरल ऑफ़ पुलिस की नियुक्ति होनी थी. नेपाल के तत्कालीन गृह मंत्री ने मुझसे नए आईजीपी के उम्मीदवारों के बारे में पूछा. मैंने दूतावास में अपने सहकर्मियों से इस बारे में मश्वरा किया तो मुझे सलाह मिली कि वरिष्ठता के आधार पर ही नियुक्ति ज़्यादा ठीक है.

मैंने नेपाल के गृह मंत्री को बता दिया कि अगर आईजीपी का चयन वरिष्ठता के आधार पर होता है तो ज़्यादा अच्छा रहेगा. एक और मौक़े पर दूसरे नए आईजीपी के चयन का मामला दूतावास में आया. तब चार कैंडिडेट थे. चारों कैंडिडेट मुझसे मिलने इंडिया हाउस आए और सबने भारत के साथ सहयोग की बात अपने-अपने तरीक़े से कही.''

रंजीत राय ने लिखा है, ''मैंने किसी को नहीं बुलाया था. इस बार गृह मंत्री और गृह मंत्री की पार्टी के अध्यक्ष की पसंद आईजीपी के रूप में दो अलग-अलग व्यक्ति थे. टकराव की स्थिति थी. पार्टी अध्यक्ष की पसंद का बंदा ही आईजीपी बना, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस नियुक्ति को अमान्य क़रार दिया था.

फिर कोई नया आईजीपी बना. गृह मंत्री के पसंदीदा उम्मीदवार ने पुलिस सेवा से इस्तीफ़ा दे दिया और सीपीएम-यूएमएल में शामिल हो गया. बाद में वह इसी पार्टी से सांसद बन गए. भारत पर माइक्रोमैनेजमेंट का आरोप लगता है, लेकिन यह हमेशा भारत की ओर से नहीं होता है.''

नेपाल और भारत

इमेज स्रोत, @IndiaInNepal

प्रचंड की कुर्सी कब तक बचेगी?

पुष्प कमल दाहाल प्रचंड पिछले साल 25 दिसंबर को तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे.

प्रचंड के पीएम बनने के बाद से ही कयास लगने शुरू हो गए थे कि उनकी कुर्सी कब तक सुरक्षित रहेगी.

प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी सेंटर) के महज़ 32 सांसद हैं जबकि सरकार बनाने के लिए 138 सांसदों का समर्थन चाहिए.

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने प्रचंड को समर्थन दिया था. ओली की पार्टी के पास 78 सीटें हैं. इसके अलावा पाँच अन्य पार्टियों का भी प्रचंड को समर्थन मिला था.

पिछले साल नवंबर में नेपाल में चुनाव हुआ था और प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस से गठबंधन किया था. नेपाली कांग्रेस को 89 सीटें मिली थीं, लेकिन प्रचंड पीएम बनना चाहते थे. नेपाली कांग्रेस तैयार नहीं हुई तो प्रचंड ने ओली से हाथ मिला लिया था. प्रचंड और ओली के साथ आने के बाद नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद अलग-थलग पड़ गई थी.

10 जनवरी को प्रचंड को नेपाल की संसद में बहुत साबित करना था और नेपाली कांग्रेस ने भी प्रचंड के समर्थन में ही वोट कर दिया था.

नेपाल के रक्षा मंत्री हरि प्रसाद उप्रेती के साथ भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

इमेज स्रोत, @SpokespersonMoD

इमेज कैप्शन, नेपाल के रक्षा मंत्री हरि प्रसाद उप्रेती के साथ भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

नेपाली कांग्रेस के इस क़दम से ओली की पार्टी असहज हो गई थी. ऐसा माना जा रहा था कि नेपाली कांग्रेस और प्रचंड अपने गठबंधन में वापस आ गए हैं, ऐसे में ओली की इस सरकार में बहुत नहीं चलेगी.

सोमवार को ओली की पार्टी ने प्रचंड से अपना समर्थन वापस ले लिया. ओली की पार्टी के कोटे के सभी मंत्रियों ने इस्तीफ़ा भी दे दिया है.

यूएमएल से पहले राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने प्रचंड की सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के पास 14 सांसद हैं. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता रवि लामिछाने को भी नागरिकता के मुद्दे पर प्रचंड कैबिनेट में गृह मंत्री से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

रवि ने इस्तीफ़े के बाद अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के कोटे के सभी मंत्रियों को सरकार से इस्तीफ़ा दिलवा दिया था.

ओली और प्रचंड के संबंध 2020 के बाद से ही ख़राब होने लगे थे. ऐसा तब है, जब दोनों नेताओं ने 2018 में सत्ता में आने के कुछ महीने बाद अपनी पार्टियां का आपस में विलय कर लिया था. विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनी थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)