रूस-यूक्रेन संघर्ष: पोलैंड सीमा पर ग़ैर-यूक्रेनी शरणार्थी क्यों हैं निराश?

जगह मिलने का इंतज़ार करते प्रवासी
    • Author, ओक्साना एंटोनेंको
    • पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा

रूस के साथ हो रहे युद्ध से भागकर यूरोपीय संघ के देशों में पहुंच रहे यूक्रेन के नागरिक संघ से हर तरह की मदद की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन यूक्रेन में रह रहे दूसरे देशों के नागरिक, यहां तक कि पिछले 20 साल से जो यूक्रेन में रह रहे थे, वो मौजूदा वक्त में यूरोपीय संघ से अधिक उम्मीद नहीं कर सकते.

नतीजतन बुरी तरह भ्रमित हज़ारों ताजिक, उज़्बेक और पूर्ववर्ती सोवियत संघ के दूसरे देशों के लोग यूरोपीय संघ के देशों से जुड़ी यूक्रेन की सरहद पर मझधार में फंसे हैं.

यूक्रेन में बीते बीस सालों से रह रही शफो कहती हैं, "मेरे बेटे का हाथ बेकार हो गया है. उन लोगों ने हमारा सब कुछ छीन लिया. हम तीन दिन से यहां बैठे हैं और हमें नहीं पता कि आगे क्या करें. वे मुझे ले जाएंगे, लेकिन वे मेरे बेटे को नहीं चाहते. वो पहले ही कह रहा था- मां, किसी को हमारी ज़रूरत नहीं है."

शफो ने मुझसे कहा, "अगर वे हमें ले लेते हैं तो मैं यहीं (यूरोपीय संघ के देश में) रहूंगी."

शफो ताजिकिस्तान की नागरिक हैं. वो बताती हैं कि वो अपना सब कुछ यूक्रेन में छोड़ आई हैं- घर, काम और दोस्त. अब तीन दिन से वो हज़ारों दूसरे प्रवासियों के साथ, पोलैंड के शहर कोर्कज़ोवा के पास एक अस्थायी शरणार्थी केंद्र में रह रही हैं.

जगह मिलने का इंतज़ार करते प्रवासी
इमेज कैप्शन, जगह मिलने का इंतज़ार करते प्रवासी

अब्दुशाकुर भी ताजिकिस्तान के नागरिक हैं और यूक्रेन में बीते बीस सालों से रह रहे थे. वो कहते हैं कि वो मदद के लिए पोलैंड के लिए बहुत आभारी हैं- शरणार्थियों को पोलैंड-यूक्रेन सीमा से मुफ़्त लाया गया, सभी को खाना खिलाया गया और रात भर रहने का ठिकाना दिया. उन्हें मुफ़्त में फ़ोन के सिम कार्ड भी बांटे गए.

वो कहते हैं, "लेकिन यह अस्थायी ठिकाना है. लोग एक शॉपिंग सेंटर में फोल्डिंग बेड पर रह रहे हैं, जहां न तो अपनी जगह है और न ही कपड़े धोने और टॉयलेट की सुविधा है. वे सिर्फ़ इतना कर सकते हैं कि खाना खाएं और सो जाएं."

अब्दुशाकुर बताते हैं कि यूक्रेन से भागे वहां के नागरिक इस केंद्र में नहीं रहते. वे कहते हैं, "ज़्यादातर यूक्रेनी लोग यूरोप में कई लोगों को जानते हैं. वे यहां से जल्दी चले जाते हैं. साथ ही उनके नुमाइंदे (यूक्रेनी मूल के) यहां आते हैं. आज जर्मनी के कुछ लोगों ने कुछ यूक्रेनी लोगों को इकट्ठा किया. उन्हें बताया कि उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए सारा इंतज़ाम किया गया है रहने का ठिकाना है, बच्चों के लिए स्कूल की व्यवस्था है. उन्हें बसों से ले जाया गया. और यहां ऐसे भी लोग हैं जो नहीं जानते कि कल क्या होगा. इनमें ज़्यादातर ऐसे लोग हैं जो यूक्रेन के नहीं हैं."

केंद्र के कोआर्डिनेटर ने बीबीसी को बताया कि यहां 4,000 से ज़्यादा लोगों में से क़रीब 400 यूक्रेन के नागरिक हैं. बाकी पूर्ववर्ती सोवियत देशों, वियतनाम और मध्यपूर्व के देशों से हैं. ये ज़्यादातर आर्थिक प्रवासी हैं जो रातोंरात युद्ध से बचकर भागे हैं और अब शरणार्थी बन गए हैं.

ड्राइवर शरणार्थियों के लिए तख़्तियां लेकर उन्हें बताते हैं कि वे उन्हें कहां लेकर जाएंगें.
इमेज कैप्शन, ड्राइवर शरणार्थियों के लिए तख़्तियां लेकर उन्हें बताते हैं कि वे उन्हें कहां लेकर जाएंगें.

अचानक हुए अवैध?

आर्थिक प्रवासी पहले ही अपना घर छोड़ चुके होते हैं, ऐसे में उनके अपने गृह देशों में उनके रिश्तेदार कम ही होते हैं जो उन्हें किसी भी समय वापस ले जाएं. ये अपनी पूरी ज़िंदगी यूक्रेन में बिताने के लिए तैयार थे, लेकिन अब इनके लिए हालात बदल चुके हैं. और जब पोलैंड और जर्मनी के लोग केवल यूक्रेन के नागरिकों के लिए मानवीय मदद देते हैं, तो बाक़ी देशों के नागरिकों में मन में शक़ पैदा होता है.

वालंटियर पावेल बताते हैं, "हमारे पास जर्मनी के लिए एक बस थी, लेकिन उसके लिए एक शर्त थी- सिर्फ़ यूक्रेन के दस्तावेज़ वाले मुसलमान ही उसमें जा सकते थे. कई बच्चों के साथ वो मांओं को लेने के लिए तैयार थे. मुश्किल पुरुषों के मामले में भी है क्योंकि उन्हें कोई नहीं लेना चाहता."

प्रवासियों या दूतावासों के प्रतिनिधियों के अलावा निजी स्तर पर भी यूक्रेन से भागकर जा रहे लोगों की मदद के लिए सैकड़ों पहल की गई हैं. पावेल कहते हैं, "मैं आपको जर्मनी ले जाऊंगा, मैं आपको वारसॉ ले जाऊंगा, मैं आपको चेक रिपब्लिक ले जाऊंगा" जैसे संदेशों की तख़्तियों के साथ यूरोप से आने वाले लोग शरणाथी केंद्रों पर घंटों ड्यूटी देते हैं.

एक ड्राइवर जो अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते, शरणार्थियों को बेल्जियम ले जाने के लिए तैयार खड़े हैं. हालांकि उनका कहना है कि ग़ैर-यूक्रेनी नागरिकता वाले शरणार्थियों की स्थिति साफ़ न होने के कारण ड्राइवर आमतौर पर अवैध आप्रवासियों को ले जाने का दोषी क़रार दिए जाते हैं, ऐसे में उनमें डर होना लाजमी है.

ड्राइवर ने बताया, "यूक्रेनी दस्तावेज़ उन्हें एक तय समय के लिए यूरोप में रहने का अधिकार देते हैं, मगर लोग डरते हैं कि जिनके पास यूक्रेनी पासपोर्ट नहीं है, उन शरणार्थियों पर दूसरे नियम लागू होते हैं."

प्रवासी

वापस नहीं लौट सकते तो आप रह सकते हैं

बायोमीट्रिक पासपोर्ट वाले यूक्रेन के नागरिक आधिकारिक तौर पर यूरोपीय संघ के देशों की सरहद पार कर सकते हैं और वहां 90 दिन तक रह सकते हैं.

यूक्रेन में युद्ध के कारण पोलैंड के अधिकारियों ने लोगों को देश में आने देने का वादा किया, जिनमें वे लोग भी शामिल थे जिनके दस्तावेज़ युद्ध के दौरान या फिर यूक्रेन से भागने की कोशिश में बर्बाद हो गए थे. वैसे पोलैंड सरकार की वेबसाइट पर "यूक्रेन के नागरिकों के लिए" शीर्षक के तहत भी देश में दाख़िल होने के नियम प्रकाशित किए गए हैं.

बीबीसी से बात करने वाले दूसरे देशों के एक भी शरणार्थी को नहीं पता था कि सरहद पार करने के बाद उसके पास क्या अधिकार होंगे.

अब्दुशाकुर कहते हैं, "मैंने इसके बारे में नहीं सोचा, हो सकता है ये मेरी ग़लती हो. मैंने ख़ुद से यह नहीं पूछा कि हमें क्या करना चाहिए, कहां गुहार लगानी है. मैंने इसके बारे में नहीं सोचा, क्योंकि हर कोई बदहवास था, हर कोई थका हुआ था. हम सरहद पार कर गए, और ईश्वर का शुक्र है कि हम ज़िंदा थे. सरहद पार आ गए हैं तो अब हम सोच रहे हैं कि आगे क्या करना है."

यूरोपीय संघ में 5 मार्च से अस्थायी संरक्षण दिशानिर्देश लागू हैं, जिसके अनुसार यूक्रेन के शरणार्थियों को एक साल के लिए यूरोपीय संघ में रहने का अधिकार है. हालात को देखते हुए ये अवधि बढ़ाई जा सकती है.

अज़रबैजान के एक छात्र, जो अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते, कहते हैं कि "चेकप्वाइंट पर दो कतारें हैं, यूक्रेनी बाईं तरफ़ हैं और विदेशी दाईं तरफ़ हैं. उन्होंने हमें एक बस में बैठाया और हमें यहां ले आए. ऐसा लगता है कि बस में एक भी यूक्रेनी नहीं था."

इन लोगों को जिस केंद्र में रखा गया है, वो यूक्रेन और पोलैंड की सरहद पर कारचोवा-क्राकोवेट्स चेकपॉइंट से 10 मिनट की ड्राइव की दूरी पर है. और यह इस इलाक़े के पांच शिविरों में से इकलौता ऐसा है, जहां हमने पाया कि यूक्रेनी नागरिकों की तुलना में दूसरे देश के नागरिकों की संख्या अधिक है.

हालांकि, इस केंद्र का सबसे नज़दीकी चेकप्वाइंट एकमात्र ऐसी जगह नहीं है, जहां से दूसरे देशों के नागरिक सरहद पार कर रहे हैं.

पोलैंड के शहर मेड्यका के पास शागिनी चेकप्वाइंट पर काम करने वाले वालंटियर फर्नांडो बताते हैं, "यहां लोगों के दो ग्रुप सरहद पार कर रहे हैं. पहला यूक्रेनी लोग हैं जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं. वे बस से आते हैं. यह समूह ज़्यादा संगठित है. दूसरे वे लोग हैं जो यूक्रेन में प्रवासी के तौर पर रह रहे थे. इनमें से अधिकतर 30 घंटे तक पैदल चल कर आते हैं और थकान से चूर होते हैं. वे लड़ाई के बारे में और तमाम चीज़ों के बारे में बात करते हैं."

कुछ महीने पहले ही पोलैंड और बेलारूस की सरहद पर प्रवासियों की समस्या थी.

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पोलैंड और बेलारूस की सीमा का प्रवासी संकट

ग़ौरतलब है कि कुछ महीने पहले ही पोलैंड और बेलारूस की सरहद पर भी प्रवासियों की समस्या थी.

मध्यपूर्व से आए हजारों प्रवासी कई दिन तक पोलैंड की सरहद पर डटे रहे. प्रवासियों और पोलैंड के सुरक्षाबलों के बीच झड़पें भी हुईं. तब इस देश के अधिकारियों ने कहा था कि शरणार्थी बेलारूस की एलेक्जेंडर लुकाशेंको सरकार के हाईब्रिड हथियार हैं.

पोलैंड अभी भी दूसरे देशों के शरणार्थियों को शक़ की नज़र से देखता है.

पोलैंड के शहर रेज़ेसज़ाओ के टैक्सी ड्राइवर जान बताते हैं, "इस लहर में आए प्रवासी यूक्रेनी शरणार्थियों की भीड़ में मिल जाते हैं और सरहद पार कर जाते हैं. मैंने ऐसे कई देखे. उन्होंने मुझे जर्मनी ले जाने के लिए 500 यूरो की पेशकश की थी. लेकिन वे शरणार्थी नहीं थे, वे युद्ध से बचकर भागे लोग नहीं हैं. उनके पास सूटकेस नहीं थे. वे सलीके से कपड़े पहने हुए थे."

शरणार्थी

मारिया का अनुभव

मारिया दूसरी बार युद्ध से जान बचाकर भागी हैं. वो यूक्रेन के उस इलाक़े में पैदा हुईं और पली-बढ़ीं, जो रूस-समर्थित स्वघोषित आज़ाद गणतंत्र समर्थकों के नियंत्रण में यानी देश के पूर्वी हिस्से में है. उन्हें 2014 में लड़ाई के चलते वहां से जाना पड़ा. वो पहले रूस में शरणार्थी शिविर में रहीं और फिर यूक्रेन के ओडेसा शहर में.

वो बताती हैं, "एक दिन अचानक (2014 में) रूसी झंडे के साथ टैंक मेरे घर के पास से गुजरे. एक घंटे बाद उन्होंने एक रॉकेट लॉन्चर तैनात कर दिया. मेरा परिवार हमेशा से यूक्रेन का समर्थक रहा है. इसलिए बहुत से लोग हमें बांदेरा (एक मशहूर यूक्रेनी राष्ट्रवादी नेता) पुकारते हैं. मैं वहां ऐसे हालात में नहीं रह सकती थी."

मारिया बताती हैं, "इस बार जब हमने ओडेसा छोड़ा, तो हालात ज़्यादा अस्थिर थे. मेरे पति और मैं ये जगह छोड़ना नहीं चाहते थे लेकिन हम और हमारी बेटी डर गई थी. रात में लगातार सायरन बजता था इसलिए हम गलियारे में फर्श पर सोते थे. हमारे पास कोई कामकाज नहीं था और जितना भी पैसा बचा था वो तेज़ी से ख़र्च हो रहा था. आसपास कोई रिश्तेदार नहीं था. इसलिए हमने यहां से जाने का फ़ैसला किया."

मारिया के पति उज़्बेकिस्तान के नागरिक हैं. इसलिए जाने से पहले उन्होंने उज़्बेक दूतावास से संपर्क किया. दूतावास ने पूरे परिवार को ताशकंद पहुंचाने का वादा किया. हालांकि, आवास केंद्र से पहले से ही बता दिया गया था कि सिर्फ़ उज़्बेक नागरिकों को ही ले जाया जाएगा. गुज़ारिशों और बातचीत में क़रीब एक हफ़्ता निकल गया.

प्रवासी

जब पूरा परिवार उज़्बेकिस्तान पहुंच गया तो मैंने उनसे संपर्क किया.

मारिया ने बताया, "उज़्बेकिस्तान में हमारे कुछ रिश्तेदार हैं. हम फ़िलहाल यूरोपीय संघ नहीं गए, क्योंकि हमें एक महीने में यूक्रेन लौटने की उम्मीद थी. हमें उम्मीद है कि लड़ाई ख़त्म हो जाएगी. हम समझते हैं कि यूरोपीय संघ में रहना भी एक ज़िम्मेदारी है. आख़िरकार, मदद के कुछ तरीक़े और कुछ शर्तें हैं. आप अपने पीछे बुरी यादें नहीं छोड़ना चाहते."

विक्टर भी उज़्बेकिस्तानी नागरिक हैं. उनकी पत्नी यूक्रेन की नागरिक हैं. ये पूरा परिवार ताशकंद जा रहा था, लेकिन जब दूतावास ने उनकी पत्नी की यूक्रेनी नागरिकता की वजह से उन्हें ले जाने से मना कर दिया. इसके बाद इस दंपत्ति ने अपनी योजना बदल दी और अब वे हैमबर्ग में हैं.

उन्होंने बताया, "यह इत्तेफ़ाक़न ही हो गया. हमें अचानक एक वालंटियर मिला जिसने हैमबर्ग जाने की पेशकश की. मैंने और मेरी पत्नी ने मशविरा किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि जर्मनी में हमारे बच्चे की परवरिश और तरक़्क़ी के बेहतर मौक़े होंगे."

इस परिवार का हैमबर्ग में कोई नहीं है, लेकिन जिस कीएव शङर को छोड़ कर वे भागे हैं, वहां भी उनका कोई नहीं था. अब वे एक जर्मन ड्राइवर के साथ रहते हैं, जिसने उन्हें पोलैंड की सरहद पर लिफ़्ट दी थी.

विक्टर बताते हैं, "शेल्टर होम में प्रवासियों के लिए जगह नहीं थी और ड्राइवर ने हमें उनके साथ रहने की पेशकश की. रात दो बजे हम शरणार्थी के दर्जे के लिए आवेदन करने की कतार में लग जाएंगे. वहां बहुत लंबी लाइन लगती है."

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