रूस-यूक्रेन संघर्ष: रूस पर प्रतिबंध लगाकर क्या उसे रोका जा सकेगा -दुनिया जहान

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24 फरवरी 2022 - रूस के सरकारी टेलीविज़न पर सवेरे राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक संदेश प्रसारित किया गया. पुतिन ने कहा पड़ोसी यूक्रेन के ख़िलाफ़ 'विशेष सैन्य अभियान' के सिवा उनके पास कोई और विकल्प नहीं.
इसके कुछ घंटों बाद रूसी सेना ने पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की तरफ से यूक्रेन पर हमला बोल दिया. सोवियत संघ का हिस्सा रहा यूक्रेन यूरोप पर दूसरा सबसे बड़ा देश है.
रूस के हमले से अंतरराष्ट्रीय समुदाय हरकत में आया, संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा समेत कई देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए.
लेकिन रूस पहला ऐसा देश नहीं जिस पर आर्थिक पाबंदियां लगाई गई हैं. इससे पहले क्यूबा, इराक़, दक्षिण अफ्रीका और उत्तर कोरिया पर भी इस तरह दबाव बनाया गया था.
तो इस सप्ताह हम सवाल कर रहे हैं कि क्या आर्थिक प्रतिबंध रूस पर लगाम लगाने में कारगर साबित होंगे. और फिर, अब तक जिन देशों पर प्रतिबंध लगे, क्या उनमें कोई बदलाव दिखा.
क्यूबा
डॉ. क्रिस्टोफ़र सबाटीनी चैटम हाउस में सीनियर रीसर्च फैलो हैं. वो लातिन अमेरिका और अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़े मामलों के जानकार हैं.
1960 में क्यूबा के प्रधानमंत्री फिदेल कास्त्रो ने देश में मौजूद अमेरिकी स्वामित्व वाली कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और अमेरिका से आयात पर टैक्स बढ़ा दिया. जवाब में उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉनएफ़ कैनेडी ने क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए.
वो कहते हैं, "उस वक्त कोशिश थी कि क्यूबा सरकार को तेल रिफाइनरी से लेकर फैक्ट्रियों, यहां तक कि कसीनो, गोल्फ कोर्स तक के राष्ट्रीयकरण के लिए हरजाना देने को मजबूर किया जाए. शुरूआती दौर में व्यापार को लेकर प्रतिबंध लगाए गए, फिर बाद में अमेरिकी नागरिकों के वहां जाने पर भी रोक लगा दी गई."
प्रतिबंध लगे तो लोगों की मुश्किलें बढ़ी, नाराज़गी बढ़ी. आर्थिक परेशानियों के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराया गया. अमेरिका को उम्मीद थी अर्थव्यवस्था पर नकेल कसी गई तो क्यूबा कम्यूनिस्ट नेताओं के साथ अपने संबंध तोड़ देगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, कम्यूनिस्ट मुल्कों के साथ उसका सहयोग और बढ़ा.
वक्त के साथ क्यूबा पर लगे प्रतिबंधों का दायरा भी बढ़ता गया. लेकिन जिस उद्देश्य से उन्हें लगाया गया था, वो पूरा नहीं हुआ.
डॉ. क्रिस्टोफ़र सबाटीनी कहते हैं, "1960 में क्यूबा सोवियत संघ का क्लाइंट स्टेट बना, यानी ऐसा देश जो आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य मामले में दूसरे पर निर्भर था. सोवियत संघ का विघटन हुआ तो वेनेज़ुएला के साथ उसके मज़बूत रिश्ते बने. ह्यूगो चावेज़ क्यूबा को प्रतिदिन एक लाख बैरल कच्चा तेल देते थे जिसका आधा वो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच देता. अमेरिका ने 1992 और 1996 में क़ानून पास कर प्रतिबंध और कड़े किए, लेकिन ये उम्मीद करना ग़लत था कि क्यूबा के लोग वहां सत्ता परिवर्तन करेंगे."

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1992 में क्यूबा डेमोक्रेटिक एक्ट के तहत ये सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कि सोवियत संघ के पतन के बाद क्यूबा को कहीं से मदद न मिले. इसके बाद क्यूबन लिबर्टी एंड डेमोक्रेटिक सोलिडेरिटी एक्ट के तहत क्यूबा के बहुपार्टी गणतंत्र न बनने तक पाबंदियां हटाने पर रोक लगा दी गई.
वो कहते हैं, "60 साल बीत गए, लेकिन क्यूबा पर प्रतिबंधों का असर नहीं दिखा. प्रतिबंधों के ज़रिए न तो उसे गणतांत्रिक मुल्क बनने के लिए मजबूर किया जा सका और न ही दूसरे उद्देश्य पूरे हुए. अर्थव्यवस्था के सामने मुश्किलें तो आईं और कुछ मामलों में लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता भी ख़त्म हुई. लेकिन वो सरकार पर पहले से ज़्यादा निर्भर होने लगे क्योंकि अर्थव्यवस्था का नियंत्रण सरकार के हाथ में था. इससे अप्रवासन की समस्या भी गहराई."
जुलाई 2020 तक अकेले अमेरिका में क्यूबा के 13 लाख से अधिक लोग थे.
क्यूबा का नेतृत्व अब बदल चुका है लेकिन न तो कम्यूनिस्ट पार्टी बदली है और न ही वहां का सिंगल पार्टी सिस्टम. ऐसा भी नहीं लगता कि प्रतिबंधों को हटाने के लिए रखी गई शर्तें, आने वाले वक्त में पूरी होंगी. तो फिर प्रतिबंध जारी रखने की क्या वजह है?
डॉ. क्रिस्टोफ़र सबाटीनी बताते हैं, "ये पूरी तरह से राजनीतिक मामला है. फ्लोरिडा में क्यूबन-अमेरिकी सीनेटरों का एक समूह है जिनके लिए ये निजी समस्या है. उनके परिवारों को क्यूबा छोड़कर भागना पड़ा था. उनका मानना है क्यूबा को सज़ा देना ज़्यादा ज़रूरी है. और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में फ्लोरिडा अहम है, यहां से 29 इलेक्टोरल वोट हैं."
क्यूबा पर प्रतिबंध डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार ने लगाए थे और फिर डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों ने ही उन्हें और कड़ा किया.
ओबामा के दौर में प्रतिबंधों में कुछ राहत दी गई. लेकिन फिर रिपब्लिकन पार्टी की डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने य़े फ़ैसला पलटा और क्यूबा को एक बार फिर आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देश की सूची में डाल दिया. ट्रंप के बाद आए बाइडन ने अभी तक इस फ़ैसले को नहीं बदला है.

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दक्षिण अफ्रीका और इराक़
क्यूबा पर प्रतिबंधों का नतीजा उम्मीद के अनुरुप नहीं दिखा. कहा जाता है कि इस मामले में दक्षिण अफ्रीका अच्छा उदाहरण है, लेकिन यहां भी परदे के पीछे कहानी कुछ अलग है.
ली जोन्स लंदन के क्वीन मैरी युनिवर्सिटी में पॉलिटिकल इकोनॉमी एंड इंटरनेशनल रिलेशन्स के प्रोफ़ेसर हैं. वो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े मामलों के जानकार हैं.
1948 के दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति लागू थी जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक गोरों को फायदा पहुंचाना था. 1960 में शार्पविल में रंगभेद नीति का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई.
दक्षिण अफ्रीका के ओलंपिक खेलों में उसके हिस्से लेने पर रोक लगा दी गई. उस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए, लेकिन उसने इनसे बचने का रास्ता ढूंढ लिया.
प्रोफ़ेसर ली जोन्स कहते हैं, "वहां एक तरह का अपराधी नेटवर्क बन गया. तेल को लेकर लगे प्रतिबंध से बचने के लिए कोयले से तेल बनाया जाने लगा. ये महंगा था लेकिन एक विकल्प तो था. यहां तस्करी भी तेज़ी से बढ़ी. लेकिन 80 के दशक में चीज़ें बदलने लगीं. यहां बड़े पैमाने पर रंगभेद नीति विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए और स्थिति पर काबू पाना सरकार के लिए मुश्किल होने लगा."
1986 में सरकार ने देशव्यापी आपातकाल लगा दिया. आर्थिक प्रतिबंध और कड़े किए गए. विदेशी बैंकों के कर्ज देने पर रोक लगी और उन्होंने सरकार को दिया कर्ज़ वापिस मांगा.
प्रोफ़ेसर ली जोन्स कहते हैं, "लोगों की नाराज़गी कम करने के लिए सरकार ढांचागत सुधार करना चाहती थी लेकिन प्रतिबंधों के कारण ये मुश्किल था. ऐसे में सरकार ने विरोध को ख़त्म करने का फ़ैसला किया, लेकिन ये समस्या का हल नहीं था."

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1989 में एफ़डब्ल्यू डी क्लार्क राष्ट्रपति बने, और उन्होंने रंगभेद नीति ख़त्म करने का ऐलान किया और आख़िरकार 1993 में प्रतिबंध हटा लिए गए. प्रोफ़ेसर ली जोन्स कहते हैं कि यहां प्रतिबंधों का असर तो दिखा लेकिन इसके लिए दबाव बनाना आसान नहीं था.
प्रोफ़ेसर कहते हैं, "पश्चिमी मुल्क अपनी पीठ थपथपाना पसंद करते हैं. वो दक्षिण अफ्रीका को एक सफल उदाहरण के रूप में पेश करते हैं. लेकिन असल में उसपर प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिका पर काफी दबाव था. शीतयुद्ध के दौर में दक्षिण अफ्रीका के साथ अमेरिका के अच्छे संबंध थे. वो वामपंथी सरकारों वाले देशों से घिरा ग़ैर-कम्यूनिस्ट मुल्क था. लेकिन दक्षिण अफ्रीका में बदलाव आया तो अमेरिका ने कहा कि ये प्रतिबंधों के कारण हुआ."
इधर अफ्रीका बदलाव से गुज़र रहा था, तो उधर मध्यपूर्व के एक देश पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी हो रही थी.
2 अगस्त 1990 को इराक़ ने कुवैत पर हमला कर दिया. उसपर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगा दिए. लक्ष्य था इराक़ को कुवैत से बाहर जाने और कथित विनाशकारी हथियार नष्ट करने के लिए बाध्य करना.
अमेरिका और उसके सहयोगी इराक़ को कुवैत से बाहर निकालने में सफल हुए, लेकिन फिर, क्यूबा की तरह यहां भी प्रतिबंधों का उद्देश्य बदल गया, अब ये सत्ता परिवर्तन था.
प्रोफ़ेसर ली जोन्स समझाते हैं, "यहां की आबादी पहले ही मुश्किलें झेल रही थी, वो हिस्सों में बंटी थी. अगर आप किसी तरह अपना गुज़ारा कर रहे हैं और सरकार राशन देकर आपकी मदद कर रही है तो ये उम्मीद करना बेवकूफ़ी थी कि लोग विद्रोह करेंगे."
13 साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ पर लगे प्रतिबंध हटाए. लेकिन तब तक अमेरिका के नेतृत्व में इराक़ पर हमला और इराक़ के नेता सद्दाम हुसैन की सरकार का पतन हो चुका था. इस पूरे मामले से ये सवाल पैदा हुआ कि लाखों बेगुनाहों को मुसीबत में डालना कितना जायज़ था.
वो कहते हैं, "इसकी बड़ी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है. इराक़ी समुदाय हमले से बुरी तरह प्रभावित हुआ. इसे सफलता मानें तो, किस कीमत पर? इसके बाद से संयुक्त राष्ट्र ने किसी और देश के ख़िलाफ़ व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाए."

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प्रतिबंधों की रणनीति
डॉ क्लारा पोर्टेला स्पेन के यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेलेन्सिया में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफ़ेसर हैं. प्रतिबंधों से जुड़े मामलों में वो यूरोपीय संसद को सलाह भी देती हैं.
वो कहती हैं, "इराक़ मामले के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ये स्पष्ट हो गया कि किसी भी देश पर व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाए जाने चाहिए. टार्गेटेड यानी कुछ ख़ास चीज़ों पर प्रतिबंध लगाने का रास्ता अपनाया जाने लगा, जैसे कुछ लोगों या संस्थानों पर पाबंदी लगाना."
इसका पहला उदाहरण था लीबिया. 1988 में न्यू यॉर्क जा रहा एक यात्री विमान ब्रिटेन के पास हादसाग्रस्त हो गया. इस मामले में दो लीबियाई नागरिकों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. लीबिया के उन्हें सौंपने से इनकार करने पर उसपर प्रतिबंध लगाए गए.
डॉ क्लारा कहती हैं, "उस पर विमानन सेक्टर से जुड़े प्रतिबंध लगाए गए. लीबिया से आने-जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और विमानों के पुर्ज़ों की उसकी सप्लाई पर पाबंदी लगाई गई. इसका असर भी हुआ. लीबिया ने उन दो लोगों को प्रत्यर्पित किया. उन पर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में मुकदमा चलाया गया."
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सिएरा लियोन और अंगोला जैसी जगहों पर अस्थिरता का कारण बन रहे विद्रोही समूहों पर लगाम लगाने के लिए भी इस तरह के प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया गया है.
वो कहती हैं, "ये ऐसे समूह थे जो हीरों का अवैध कारोबार करते थे, इन्हें ब्लड डायमंड या कॉन्फ्लिक्ट डायमंड भी कहा जाता है. इससे मिले पैसों का इस्तेमाल ये हथियार खरीदने में करते. हीरों के कारोबार पर रोक लगी तो असर इन समूहों की कमाई पर पड़ा."
इस तरह के मामलों से उम्मीद जागी कि किसी एक चीज़ को लक्ष्य बनाकर लगाए प्रतिबंध काम कर सकते हैं. हालांकि डॉ क्लारा कहती हैं हमेशा ऐसा हो ये ज़रूरी नहीं.
डॉ क्लारा कहती हैं, "दुर्भाग्य ये है कि हर जगह इस तरह के प्रतिबंध सफल नहीं हुए. लंबे समय से सोमालिया पर हथियारों की सप्लाई को लेकर प्रतिबंध हैं. उत्तर कोरिया पर भी प्रतिबंध हैं. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि ये प्रभावी रहे. प्रतिबंध असल में एक बड़ी रणनीति का हिस्सा होते हैं जिसमें कूटनीति की भी जगह होती है, लेकिन बदलाव हो ये ज़रूरी नहीं."
प्रतिबंधों को लेकर ऐसी रणनीति बनाना मुश्किल है जो शत-प्रतिशत प्रभावी हों. मतलब ये कि यूक्रेन में रूस को रोकने के लिए सही रणनीति तैयार करना पश्चिमी देशों के लिए आसान काम नहीं.
दांव पर काफी कुछ
पश्चिमी देशों ने रूस को चेतावनी दी थी कि यूक्रेन पर हमला किया तो ऐसे प्रतिबंध लगाए जाएंगे जिनके बारे में कभी सुना न गया हो. लेकिन इससे रूस रुका नहीं.
सू एकर्ट वॉशिंगटन में मौजूद सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में सीनियर असोसिएट हैं. वो इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट में भी सीनियर एडवाइज़र हैं. वो प्रतिबंधों की रणनीति और उनके असर से जुड़े मामलों की जानकार हैं.
वो कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए रूस पर आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तकनीकी साजोसामान से जुड़ी पाबंदियां लगाई गई हैं. उसे अलग-थलग करने की हर कोशिश की जा रही है."
सू एकर्ट कहती हैं कि हालात अभूतपूर्व हैं ज़रूर, लेकिन प्रतिबंधों के ज़रिए कामयाबी मिल सकती है.
वो कहती हैं, "रूस की मुद्रा रूबल लुढ़ककर अब तक के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. ये भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि रूस को कहीं और से समर्थन न मिले. लेकिन प्रतिबंधों का असर दिखने में वक्त लगता है. ये कोई बिजली का स्विच नहीं जिसे आप एक झटके में ऑफ़ कर दें."

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लेकिन रूस के मामले में दांव पर काफी कुछ है. वो दुनिया में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा निर्यातक है. उससे गैस खरीदने पर रोक लगाना प्रभावी रास्ता हो सकता है, लेकिन इसका असर उल्टा भी पड़ सकता है.
वो कहती हैं, "अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का कहना है कि उनकी कोशिश है कि प्रतिबंधों का असर यूरोपीय मुल्कों पर न पड़े. यूरोपीय संघ गैस की अपनी 40 फीसदी ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर है. और कोविड महामारी से उबर रही अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं."
इस बारे में अंदाज़ा लगाना भी बेहद मुश्किल है कि राष्ट्रपति पुतिन का अगला कदम क्या होगा. वो पहले ही इन प्रतिबंधों को ग़ैर-क़ानूनी करार दे चुके हैं. उन्होंने अपने परमाणु हथियारों को भी हाई अलर्ट पर रखा है. ऐसे में चिंता बढ़ना लाज़मी है क्योंकि इससे जो हालात पैदा होंगे, उसका असर पूरी दुनिया पर दिखेगा.
सू एकर्ट कहती हैं, "कुछ प्रतिबंधों को लेकर पश्चिमी मुल्कों के खुलकर सामने नहीं आने की एक वजह ये हो सकती है कि आपको बातचीत की कुछ गुंजाइश रखनी होती है. कहीं ऐसा न हो कि रूसी अर्थव्यवस्था इस कदर अस्थिर हो जाए कि पुतिन को लगे कि अब हारने को कुछ बचा नहीं."
हालांकि वो ये भी कहती हैं, "लेकिन अगर आपने अभी कदम नहीं उठाया तो सवाल ये उठेगा कि यूक्रेन के बाद रूस सोवियत संघ का हिस्सा रहे किसी और मुल्क की तरफ अपने हाथ बढ़ाए तो क्या होगा. मुझे लगता है कि आपको जोखिम उठाकर ये रास्ता चुनना ही होगा."

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लौटते हैं अपने सवाल पर- रूस पर प्रतिबंध लगाकर क्या उसे रोका जा सकेगा.
प्रतिबंध तब कारगर होते हैं जब मुल्क साथ मिलकर काम करते हैं और उनका इस्तेमाल एकमात्र विकल्प के रूप में नहीं किया जाता. उद्देश्य बदलना और बेहद कड़ी शर्तें भी स्थिति बिगाड़ सकती हैं.
आख़िर में प्रतिबंध कितने कारगर होंगे ये निर्भर करता है कि उस देश की प्रतिक्रिया पर जिसपर ये लगाए गए हैं. यानी केवल व्लादिमीर पुतिन जानते हैं कि ये प्रतिबंध उन्हें अपना रास्ता बदलने के लिए बाध्य कर सकते हैं या नहीं.
प्रोफ़ेसर ली जोन्स के अनुसार प्रतिबंधों के पीछे सोच ये है कि हर व्यक्ति की एक क़ीमत होती है, यदि मुश्किलें बढ़ा दी जाएं तो व्यक्ति को पीछे हटना होगा.
हालांकि वो ये भी कहते हैं कि अगर पुतिन, रूस और नेटो के बीच एक बफर स्टेट बनाना चाहते हैं तो स्थिति चाहे जितनी भी बिगड़ जाए, वो अपना रास्ता बदलेंगे, ये कहा नहीं जा सकता.
प्रोड्यूसर- मानसी दाश
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