रूस यूक्रेन संकट: बम धमाकों के बीच सूमी में कैसे बीते वो 13 दिन.. भारतीय छात्रों की आपबीती..

इमेज स्रोत, BBC
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तारीख़- 7 मार्च
वक्त- सुबह के आठ बजे
यूक्रेन के सूमी शहर की एक यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में हर तरफ एक नाउम्मीदी और उदासी पसरी है. छात्र अपना सामान पैक किए 12 दिन से बैठे हैं. इस उम्मीद में कि आज यहां से बाहर निकलने का कोई ना कोई रास्ता निकल आएगा. लेकिन जैसे जैसे वक्त बीतता है, कोई मदद ना मिलने से छात्रों के बीच मायूसी बढ़ती जाती है.
नाश्ते का वक्त हो चुका है. भूख लगी है और हॉस्टल नंबर 3 के किचन में इंडक्शन चूल्हे पर अंडे उबाले जा रहे हैं. इन अंडों के सहारे दिन कटेगा. अगला निवाला कब मिलेगा छात्रों को ये भी नहीं मालूम.
सूमी स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी के इस हॉस्टल में करीब 300 भारतीय छात्र पिछले 12 दिनों से ऐसे ही इंतज़ार की घड़ियां गिन रहे हैं. एक एक पल उन पर भारी पड़ रहा है. छात्रों के मुताबिक इस यूनिवर्सिटी में छह हॉस्टल हैं और कुल मिलाकर यहां करीब 700 भारतीय छात्र हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बात कर यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी. इसके बाद मंगलवार 8 मार्च को इन्हें सूमी से निकाल लिया गया. समाचार एजेंसी पीटीआई ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के हवाले से बताया है कि ये लोग बसों से पोल्तावा शहर के लिए रवाना हो गए हैं.
हॉस्टल में रह रहे छात्र महताब रजा से बीबीसी ने जब वीडियो कॉल पर जब संपर्क किया तो उन्होंने कैमरे के जरिए हॉस्टल का पूरा हाल दिखाया. ये हॉस्टल एक वक्त छात्रों की चहल-पहल से गुलज़ार रहता था लेकिन अब यहां अजीब सा सन्नाटा पसरा है. एक कमरे में कुछ छात्र हाथ मुंह धोकर तैयार हो रहे हैं तो कुछ पहले से ही तैयार बैठे हैं. हॉस्टल का कमरा अब किसी बेस कैंप की तरह दिखाई दे रहा है.
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'अंडे खाकर कर रहे हैं गुज़ारा'
किचन में राशन नहीं है. खाली बर्तन और खाली पानी की बोतलें बता रही हैं कि खाने पीने की किल्लत कितनी बड़ी है. उबले हुए कुछ अंडों से थोड़ी भूख तो मिटेगी लेकिन दोपहर और रात के खाने का क्या होगा इसका कोई इंतज़ाम दिखाई नहीं दे रहा है.
हॉस्टल में रह रही पंजाब की रहने वाली छात्रा मुस्कान ने ज़िदगी का ऐसा कठिन दौर पहले कभी नहीं देखा था. बीबीसी से बातचीत में मुस्कान बताती हैं, ''भगवान का शुक्र है कि बाहर बर्फबारी हो गई थी और हमने बर्फ़ को पिघलाकर तीन दिन काम चलाया. एक दिन तो ऐसा था कि बिजली भी नहीं थी और हम पीने के पानी के लिए इंडक्शन चूल्हे पर बर्फ़ तक नहीं पिघला पाए थे''. तीन दिन बाद पानी आया तो थोड़ी राहत मिली लेकिन पेट भरने की दिक्कत अब भी कायम है.
मुस्कान कहती हैं, ''भारतीय एंबेसी वॉलंटियर के ज़रिए हमें पानी और खाना पहुंचाती है. लेकिन वो सिर्फ़ 35-50 लोगों के लिए होता है. ये खाना 700 बच्चों के लिए काफ़ी नहीं है. ये खाना एक दिन के लिए होता है, अगले दिन हमें फिर से खाने की चिंता होती है ''

कभी भी गिर सकती है हॉस्टल की इमारत
इन सबके बीच एक दहशत हमेशा सिर पर मंडराती रहती है. रह रह कर धमाकों की आवाज सुनाई देती है. ठीक से नींद नहीं आती और हर वक्त यही लगता कि कहीं वो भी हमले में मारे ना जाएं. पंजाब के कपूरथला की छात्रा गुरलीन ने बीबीसी से बातचीत में बताया, ''हम ये सोच कर सोते हैं कि कल उठ पाएंगे या नहीं.''
गुरलीन इस वक्त सूमी स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल नंबर तीन में रह रही हैं. गुरलीन कौर के मुताबिक हॉस्टल के हालत जर्जर हैं. किसी हमले से बचने के लिए एक मात्र ठिकाना हॉस्टल के नीचे बना बंकर है. गुरलीन कौर बताती हैं, ''ये 9 मंजिल की बिल्डिंग है. हमें सायरन बजते ही बंकर में भागना पड़ता है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. यहां बंकर में डर लगता है. यहां के बंकर सुरक्षित नहीं है. नीचे हॉस्टल की देखरेख करने वाले बता रहे थे कि किसी हमले में इतनी बड़ी बिल्डिंग तुम्हारे ऊपर गिर सकती है''

'साथ रहेंगे तो डर को बांट पाएंगे''
हॉस्टल में रह रहे महताब रजा बताते हैं, "हॉस्टल नंबर 6 रूस-यूक्रेन की सीमा के करीब है तो वहां से भी बच्चे हमारे हॉस्टल में शिफ्ट कर गए हैं. जो बच्चे बाहर फ्लैट किराए पर लेकर रह रहे थे वो भी डर की वजह से हॉस्टल आ गए हैं. हम लोग एक साथ रहेंगे तो डर को बांट पाएंगे''
यूक्रेन में फंसे भारतीयों की वतन वापसी के लिए चलाए गए ऑपरेशन गंगा के तहत अब तक 76 विमानों से 16,000 से ज़्यादा नागरिकों को भारत लाया जा चुका है. संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत टीएस तिरुमूर्ति ने सुरक्षा परिषद को मंगलवार को जानकारी दी कि भारत अब तक यूक्रेन से 20 हजार भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहा है.
भारत ने संयुक्त राष्ट्र परिषद से कहा कि भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों से 'सुमी में फंसे छात्रों को बाहर निकालने के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाने का कई बार निवेदन किया है'
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सेनेटरी पैड की कमी से जूझ रही हैं लड़कियां
2018 में मेडिकल की पढ़ाई के लिए पंजाब से यूक्रेन आई मुस्कान बताती हैं, ''एक लड़की के तौर पर बात करें तो सबसे पहले माहवारी की समस्या बड़ी है. इस हालात में सेनेटरी नैपकिन या पैड मिलना बहुत मुश्किल है. कुछ वॉलंटियर से मदद मिल रही है लेकिन ये काफ़ी नहीं है. दो तीन दिन से पानी नहीं था. ना पीने के लिए था और ना साफ करने के लिए. टायलेट सब गंदे हो गए हैं''
बमबारी के बीच फंसे भारतीय छात्रों के सामने परेशानी सिर्फ़ खाने-पीने की ही नहीं है. मुस्कान बताती हैं कि कुछ बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा रहा है. ''अभी कुछ दिन पहले एयर स्ट्राइक हुआ था उस दिन लड़कियों को पैनिक अटैक आ गया था. हमने एंबुलेंस बुलाने की कोशिश की लेकिन एंबुलेंस नहीं आई. जो बच्चे होश में वापिस आए वो अभी भी उसी हालात में हैं. वो नार्मल नहीं हुए हैं''
राजस्थान के रहने वाले मोहित सोलंकी बताते हैं, ''घरवाले बहुत परेशान हैं. एक घंटे के लिए भी अगर मैं इंटरनेट बंद कर देता हूं तो वे घबरा जाते हैं. बंकर में बम की आवाज़ से हम कांप उठते हैं''.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय का कहना है युद्ध के 11 दिनों में लगभग 17 लाख लोग यूक्रेन छोड़ चुके हैं. द्वितीय विश्वयुद्द के बाद ये सबसे बड़ा शरणार्थी संकट है.
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ऐसी ही बात उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के रहने वाले दिनेश बताते हैं, ''दो दिन पहले ब्लास्ट पर ब्लास्ट हो रहे थे. खिड़की से दिख रहा था कि धमाकों की वजह से आसमान का रंग बदल गया है. हम बहुत घबरा गए थे. घर वापिस जाने की हमारी उम्मीदें टूट गईं थी''

मोहित सोलंकी और दिनेश के लिए घर वापिस लौटने के अलावा एक और बड़ी परेशानी है. दोनों सूमी स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में आख़िरी वर्ष के छात्र हैं. कुछ ही महीनों में दोनों को यूक्रेन से मेडिकल की डिग्री मिलने वाली थी लेकिन अब बिना डिग्री के लौट रहे हैं.
दिनेश बताते हैं, ''अभी ना तो यूक्रेन की यूनिवर्सिटी ने कुछ कहा है और ना ही भारत से कोई जानकारी मिल रही है कि हमारी डिग्री का क्या होगा ''
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