रूस-यूक्रेन संकट पर नरेंद्र मोदी सरकार के रुख़ की इतनी चर्चा क्यों?

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रूस-यूक्रेन संकट पर भारत के रुख़ की चर्चा काफ़ी हो रही है. कई लोग भारत के रुख़ पर सवाल उठा रहे हैं तो कई लोग इसे बिल्कुल सही ठहरा रहे हैं.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के दो इलाक़े दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में मान्यता दे दी थी. इस पर मंगलवार को भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना पक्ष रखा था.

इन दोनों इलाक़ों को रूस समर्थित विद्रोहियों ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ दोनेत्स्क और लुहांस्क घोषित किया था और 2014 से ही ये यूक्रेन से लड़ रहे हैं. इसके साथ ही पुतिन ने रूसी सैनिकों को भी इन इलाक़ों में जाने का आदेश दिया था.

पुतिन के इसी फ़ैसले को लेकर मंगलवार को यूएन सुरक्षा परिषद की बैठक हुई थी. संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने यूएन सुरक्षा परिषद में भारत का पक्ष रखते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी.

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टीएस तिरुमूर्ति ने कहा था, ''यूक्रेन की पूर्वी सीमा पर चल रहे घटनाक्रम और रूस की ओर से की गई घोषणा पर भारत की नज़र है. रूस और यूक्रेन की सीमा पर बढ़ रहा तनाव गहरी चिंता की बात है. इन घटनाओं से इलाक़े की शांति और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. सभी देशों के सुरक्षा हितों और इस इलाक़े में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता के लिए तनाव को तुरंत कम करने की आवश्यकता है.''

एक तरफ़ पश्चिमी देश पुतिन को आड़े हाथों ले रहे थे तो दूसरी तरफ़ भारत ने न रूस की निंदा की और न ही यूक्रेन की संप्रभुता की बात की. भारत के इस रुख़ पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.

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भारत तटस्थ क्यों नज़र आ रहा है

यूरोपियन काउंसिल के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर काम करने वाले रिचर्ड गोवान ने ट्वीट कर कहा है, ''ग़ैर-नेटो देशों में भारत सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन संकट पर बोला. भारत ने कूटनीति के ज़रिए तनाव कम करने की तमाम बातें कीं, लेकिन रूस की न तो निंदा की और न ही यूक्रेन की संप्रभुता का ज़िक्र किया.''

रिचर्ड ने लिखा है, ''31 जनवरी को यूक्रेन पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वोटिंग हुई थी तब भारत के साथ कीनिया भी वोटिंग से बाहर रहा था. लेकिन मंगलवार को कीनिया ने अचानक अपनी लाइन बदल ली. कीनिया ने कड़े शब्दों में पुतिन की निंदा की है. कीनिया ने कहा है कि पूर्वी यूक्रेन के हालात अफ़्रीका में उपनिवेशवाद के बाद के सरहद पर तनाव की तरह है. कीनिया ने कहा कि अफ़्रीकी देशों को औपनिवेशिक सीमा क्यों मानना चाहिए जब रूस नहीं मान रहा है.''

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यूक्रेन संकट पर भारत के रुख़ को लेकर लोगों की राय बँटी हुई है. भारत के अहम अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय मामलों के संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ''यूक्रेन मामले में रूस को लेकर भारत के रुख़ की जो आलोचना कर रहे हैं, वे बुनियादी तथ्यों की उपेक्षा कर रहे हैं. रूस और भारत के गहरे रिश्ते हैं और भारत अपने हितों के ख़िलाफ़ फ़ैसला नहीं ले सकता.''

स्टैनली कहते हैं, ''जहाँ तक नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात है तो रूस ने क्राइमिया को अपने में मिलाया और डोनबास को मान्यता दी तो बहुत ही तीखी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आई, लेकिन इसराइल ने गोलान या पूर्वी यरुशलम को मिलाया तो उसे मान्यता मिल गई. तुर्की ने सीरिया के क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किया तो बात तक नहीं हुई. हमें असली राजनीति पर बात करनी चाहिए.''

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भारत के लिए जटिल स्थिति

द हिन्दू ने आज के संपादकीय में लिखा है कि यूक्रेन और रूस में बढ़ता तनाव भारत के लिए बहुत संवेदनशील वक़्त है. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर जर्मनी और फ़्रांस के दौरे पर हैं और उन्होंने यूरोपियन वार्ताकारों से बात करते हुए कोशिश की कि ध्यान इंडो-पैसिफ़िक पर रहे न कि रूस और यूक्रेन पर.

द हिन्दू ने अपने संपादकीय में लिखा है, ''इसी बीच पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान रूस दौरे पर रवाना हुए हैं और भारत की नज़र बनी हुई है. तनाव का जो वक़्त है, वह किसी भी लिहाज से भारत के लिए ठीक नहीं है. रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की डिलिवरी की प्रक्रिया चल रही है और अमेरिका अब इस मामले में भारत के ख़िलाफ़ काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन ऐक्ट (CAATSA) के तहत प्रतिबंध लगा सकता है. इस टकराव में भारत के लिए जटिल स्थिति पैदा हो गई है.''

अमेरिकी पत्रिका 'फ़ॉरेन अफ़ेयर्स' ने 22 फ़रवरी को यूक्रेन-रूस संकट पर भारत की नीति को लेकर एक लेख प्रकाशित किया है. इस लेख का शीर्षक है कि 'भारत की गुटनिरपेक्षता लड़खड़ा रही है'. इसी लेख में तीन फ़रवरी को यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा के बयान का ज़िक्र है.

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अमेरिका और रूस के बीच बंटा भारत

'फ़ॉरेन अफ़ेयर्स' ने लिखा है, ''तीन फ़रवरी को कुलेबा ने दुनिया के दूसरे हिस्से के एक देश भारत से खुली अपील की थी. कुलेबा ने कहा था कि अगर भारत रूस को बिना लाग लपेट के कहता है कि रूसी कार्रवाई उसे स्वीकार नहीं है तो यह हमारे समर्थन में एक मज़बूत संदेश होगा और इसका असर भी पड़ेगा.''

फ़ॉरेन अफ़ेयर्स ने कुलेबा के बयान पर लिखा है, ''कुलेबा ने यह अपील की है तो इसके पीछे वजहें भी हैं. भारत विश्व मंच पर एक अहम देश है और उसके संबंध रूस के साथ अमेरिका से भी अच्छे हैं. अगर भारत रूस की आलोचना करता तो कम से कम ये पता चलता कि रूसी रूख़ को लेकर चिंता पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है. इससे एक संदेश जाता कि भारत लोकतंत्र के समर्थन में मज़बूती से खड़ा है और नई दिल्ली अमेरिका से भविष्य की साझेदारी को लेकर आशान्वित है. यह यूक्रेन पर चीन के रुख़ से भी अलग होता. चीन अभी यूक्रेन पर बहुत ही सतर्कता से शांत है.''

फ़ॉरेन अफ़ेयर्स ने लिखा है, ''भारत के लिए अभी बहुत ही जटिल स्थिति है. भारत कोई भी क़दम उठाता है तो उसके हित प्रभावित हो सकते हैं. अगर रूस की आलोचना करता है तो भारत एक अहम और ऐतिहासिक दोस्त को अलग-थलग कर देगा. ऐसी स्थिति में रूस चीन के और क़रीब जाएगा. चीन को भारत के लिए सबसे बड़े ख़तरे के तौर पर देखा जाता है.

अगर भारत रूस का खुलकर समर्थन करता है तो अमेरिका से रिश्ते प्रभावित होंगे. अमेरिका और भारत की क़रीबी बहुत पुरानी नहीं है लेकिन सामरिक साझेदारी के तौर पर बहुत ही अहम है. अगर भारत कुछ भी नहीं कहता है तो रूस और अमेरिका दोनों को नाराज़ कर सकता है. भारत को अस्थिर और अविश्वसनीय पार्टनर को तौर पर देखा जाएगा.''

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भारत के रुख़ की वजह क्या है

फ़ॉरेन अफ़ेयर्स की इस टिप्पणी पर द हेरिटेज फ़ाउंडेशन में दक्षिण एशिया के रिसर्च फ़ेलो जेफ़ एम स्मिथ ने ट्ववीट कर कहा है, ''यह तार्किक बात है लेकिन मुझे लगता है कि भारत की क्षमता का आकलन कुछ ज़्यादा ही किया गया है. रूस के फ़ैसले को भारत प्रभावित नहीं कर सकता है. कम से कम यूक्रेन के मामले में तो और नहीं क्योंकि उसके लिए यह बहुत ही संवेदनशील मामला है. पुतिन किसी की नहीं सुन रहे हैं और न ही किसी दोस्त के दबाव में आएंगे.''

जेफ़ एम स्मिथ ने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा है, ''मुझे लगता है अगर कोई ख़ूनी हमला होता है तो भारत पर रूस की निंदा करने का दबाव बढ़ेगा. लेकिन मैं इस बात से असहमत हूँ कि अभी तक भारत का जो रुख़ रहा है, उससे ईयू से रिश्ते ख़राब हुए हैं. इसे देखना बहुत अहम है कि भारत ने अपने बयान में साफ़ कहा है कि यूक्रेन संकट का समाधान केवल कूटनीतिक वार्ता से ही संभव है. इसका मतलब यही है कि भारत किसी भी सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं कर रहा है.''

द ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में सीनियर फ़ेलो तन्वी मदान ने यूक्रेन संकट में रूस को लेकर भारत के रुख़ का समर्थन किया है. तन्वी मदान का कहना है कि यूक्रेन संकट में भारतीय रुख़ की जो आलोचना कर रहे हैं वे रूस से भारत के संबंधों की उपेक्षा कर रहे हैं.

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तन्वी मदान ने ट्वीट कर कहा है, ''भारत और रूस के संबंधों के दो आयाम हैं. एक आधिकारिक है जिस पर लोग बात कर रहे हैं और एक पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. सकारात्मक पहलू यह है कि रूस एक साझेदार के तौर पर भारत को सैन्य तकनीक और अन्य मामलों में मदद करता है जो बाक़ी नहीं करेंगे. नकारात्मक पहलू यह है कि रूस चीन के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के हितों को चोट पहुँचा सकता है. भारत रूस को एक समर्थक या अपने हितों को नुक़सान पहुँचाने वाले के तौर पर देखता है. भारत का रुख़ हमेशा से यही रहा है कि रूस से अधिकतम समर्थन लिया जा सके और उसके विरोध से बचा जा सके.''

वीडियो कैप्शन, रूस के हमले के बीच क्या बोला यूक्रेन?

तन्वी मदान ने लिखा है, ''सैन्य आपूर्ति के मामले में रूस भारत को नुक़सान पहुँचा सकता है. अुनमान के मुताबिक़ भारत के 50-80 फ़ीसदी तक सैन्य उपकरण रूस में बने हुए हैं. इसका मतलब है कि भारत को सामान्य स्थितियों में भी रूस से स्पेयर पार्ट्स, टेक, मेंटेनेंस और आपूर्ति की ज़रूरत पड़ती है. कई लोग शायद इस बात को भूल रहे हैं कि भारत के लिए फ़िलहाल ये हालात सामान्य नहीं हैं. दो साल पहले शुरू हुआ चीन-भारत का सीमा विवाद ख़त्म नहीं हुआ है. ऐसे में रूस से सैन्य आपूर्ति और अहम हो जाती है.''

तन्वी कहती हैं, ''कई लोग कहते हैं कि ये चिंताएं अमूर्त हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. हमें पता है कि पुतिन को जब महसूस होता है कि उन्हें अपमान सहना पड़ रहा है तो फिर उनका सामना करना मुश्किल होता है. जो कोई भी उन्हें नाराज़ करता है, उसे छोड़ते नहीं हैं. कई बार सामने वाले को वैसा ही नुक़सान पहुँचाते हैं, जैसे कि उनको होता है.''

(कॉपी - रजनीश कुमार)

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