अमेरिका-भारत के बीच ट्रेड डील का क्या अब कोई मतलब नहीं रह गया?

मोदी और ट्रंप

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इमेज कैप्शन, बीते 6 फ़रवरी को भारत और अमेरिका ने एक संयुक्त बयान में ट्रेड डील के फ़्रेमवर्क की जानकारी दी थी
    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में अवैध करार दिए जाने के बाद ये सवाल उठने लगा है कि अब अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील का क्या होगा.

इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ अंतरिम ट्रेड डील पर सहमति बनने की जानकारी देते हुए भारत पर लगे 50 प्रतिशत टैरिफ़ को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की थी. साथ ही ये दावा किया था कि भारत ने रूसी तेल ख़रीद बंद करने पर रज़ामंदी दे दी है.

इस 50 प्रतिशत टैरिफ़ में 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ था जबकि 25 प्रतिशत टैरिफ़ रूसी तेल ख़रीद को लेकर दंडात्मक रूप से लगाया गया था.

जब शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ़ को 6-3 के मत से ग़ैरक़ानूनी घोषित किया, तो उसके तुरंत बाद ट्रंप ने दूसरे क़ानून (ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122) का सहारा लेते हुए नए सिरे से पहले 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ़ लगाने और फिर शनिवार को इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का एलान किया.

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नया ग्लोबल टैरिफ़ 24 फ़रवरी से 150 दिनों के लिए लागू होगा.

हालांकि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक लंबी प्रेस कॉन्फ़्रेंस की और उसमें भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर पत्रकारों के सवालों के जवाब भी दिए.

इसी दौरान उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले से भारत के साथ समझौते में 'कुछ भी नहीं बदलेगा और भारत भुगतान करना जारी रखेगा.'

कई जानकारों का कहना है कि टैरिफ़ को अवैध ठहराए जाने के बाद, भारत पर लगे पुराने टैरिफ़ का कोई क़ानूनी आधार नहीं बचता है.

भारत- अमेरिका ट्रेड डील में जल्दबाज़ी हुई?

जयराम रमेश
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भारत में प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अमेरिका-भारत ट्रेड डील को लेकर सवाल किए हैं और पूछा है कि 'सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार क्यों नहीं किया गया.

कांग्रेस ने शनिवार को भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को रोककर उसकी शर्तों पर पुनर्विचार करने की मांग की.

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह समझौता 'हताशा' में, जल्दबाजी में किया गया था और अब 'अव्यावहारिक' हो गया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में पूछा, "आख़िर ऐसी क्या मजबूरी थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सुनिश्चित किया कि दो फ़रवरी 2026 की रात राष्ट्रपति ट्रंप ही भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा करें? ...अगर पीएम मोदी अपनी नाज़ुक छवि बचाने को लेकर इतने व्यग्र न होते और केवल 18 दिन और प्रतीक्षा कर लेते, तो भारतीय किसान इस पीड़ा और संकट से बच सकते थे और भारत की संप्रभुता भी सुरक्षित रहती."

उन्होंने आरोप लगाया कि 'भारत-अमेरिका ट्रेड डील दरअसल एक ऐसी कठिन परीक्षा बन गई है, जिसका सामना देश को प्रधानमंत्री की व्यग्रता और आत्मसमर्पण के कारण करना पड़ रहा है.'

कांग्रेस ने इस ट्रेड डील को लोगों से 'विश्वासघात' करने वाला बताया था लेकिन केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का दावा था कि 'इस समझौते में कृषि और डेयरी सेक्टर को सुरक्षित रखा गया है.'

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने 20 फ़रवरी को एक्स पर एक पोस्ट में अपने 15 फ़रवरी के एक लेख का हवाला देते हुए लिखा, "मैंने लिखा था कि अगर राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ़ को सुप्रीम कोर्ट ख़ारिज़ करता है तो भारत और अमेरिका दो अप्रैल 2025 की पहले वाली स्थिति में पहुंच जाएंगे."

पी चिदंबरम ने इसी पोस्ट में पूछा कि 'इस बीच अमेरिका ने भारत से कई रियायतें हासिल कर ली हैं, बिना अपनी ओर से कोई रियायत दिए. उन रियायतों का अब क्या होगा?'

उन्होंने लिखा, "संयुक्त बयान में कहा गया था कि अमेरिका से भारत को निर्यात होने वाले कई उत्पादों पर शून्य शुल्क लागू होगा. यह भी कहा गया था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान आयात करने का इरादा रखता है. साथ ही भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिकी उत्पादों पर गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करेगा, जैसी बातें शामिल थीं. इन वादों का अब क्या होगा."

पूर्व वित्त मंत्री ने लिखा कि एक भारतीय टीम इस समय फ्रेमवर्क समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका में है. अब यह टीम क्या करेगी?

उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से अमेरिका-भारत के बीच घोषित समझौते पर होने वाले असर के बारे में सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है.

ट्रेड डील पर सवाल

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ़ के ख़िलाफ़ 6-3 से फ़ैसला दिया

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने सवाल उठाया कि 'टैरिफ़ की क़ानूनी वैधता पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला है, ये जानते हुए भी नई दिल्ली ने हाल ही में फ़्रेमवर्क ट्रेड डील पर सहमति दी.'

उन्होंने एक्स पर लिखा, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के एजेंडे में टैरिफ़ केंद्रीय भूमिका में बने रहेंगे और इसके संकेत उनके नए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ़ (जिसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने का ट्रंप ने एलान किया है) से मिलता है. हालांकि अदालत के फ़ैसले ने उनकी स्थिति को कमज़ोर किया है."

ब्रह्मा चेलानी ने लिखा, "अंतरराष्ट्रीय समझौतों में भारत की सरकारों का रिकॉर्ड प्रभावशाली नहीं रहा है और अक्सर बातचीत की मेज़ पर हासिल बढ़त छोड़ने का पैटर्न दिखा है. मोदी सरकार ने भी इस कमज़ोर परंपरा को जारी रखा है. यह लद्दाख सीमा क्षेत्रों में चीन की बड़ी घुसपैठ के बाद बीजिंग के साथ हुए समझौतों, ऑपरेशन सिंदूर को रोकने वाले युद्धविराम समझौते और हाल में अमेरिका के साथ हुए फ्रेमवर्क व्यापार समझौते में दिखता है."

उन्होंने लिखा, "अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ़ की वैधता पर फैसला आने वाला है, यह जानते हुए भी नई दिल्ली ने इसी महीने की शुरुआत में वॉशिंगटन के साथ एक फ्रेमवर्क समझौता किया. इसमें भारत की ज़िम्मेदारियां पहले चरण में बहुत साफ़-साफ़, मात्रात्मक और निगरानी के तहत आने वाली हैं, जबकि अमेरिका की प्रतिबद्धताएं चरणबद्ध होंगी, शर्तों पर आधारित होंगी और कई मामलों में वापस ली जा सकती हैं."

ब्रह्मा चेलानी ने कहा है कि इससे भी गंभीर बात यह है कि इस समझौते में व्यापार से इतर प्रतिबद्धताएं भी शामिल हैं. इनमें रूसी तेल आयात को चरणबद्ध तरीके से कम करना और भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (समुद्री क्षेत्र) में उन जहाज़ों के बीच तेल हस्तांतरण रोकना शामिल है, जिन पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं. और भारत ने इस मामले में कार्रवाई भी की है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बीती 16 फ़रवरी को रिपोर्ट किया था कि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों को लागू करने के लिए कथित रूप से ईरान से जुड़े तीन तेल टैंकरों को अपनी जल सीमा में ज़ब्त किया था. हालांकि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गॉर्ड्स कोर (आईआरजीसी) से जुड़ी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने टैंकरों के ईरान से जुड़े होने के दावे का खंडन किया था.

अब भारत पर कितना होगा वास्तविक टैरिफ़?

भारत टैरिफ़

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इमेज कैप्शन, पुराना टैरिफ़ तंत्र ख़त्म होने के बाद ट्रंप ने 15 प्रतिशत का नया ग्लोबल टैरिफ़ लगाने का एलान किया है

बीबीसी संवाददाता ग्रेस एलिज़ा गुडविन की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने वाले देशों, जिनमें ब्रिटेन, भारत और यूरोपीय संघ शामिल हैं, पर भी सेक्शन 122 के तहत 10 प्रतिशत (ट्रंप ने इसे 15 प्रतिशत बढ़ाया है) का ग्लोबल टैरिफ़ लागू होगा.

अधिकारी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन उम्मीद करता है कि ये देश अपने व्यापार समझौतों के तहत किए गए रियायतों का पालन जारी रखेंगे.

लेकिन दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटव के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी असर होगा.

अजय श्रीवास्तव ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में बताया कि ट्रंप ने कहा था कि रेसिप्रोकल टैरिफ़ को 25 प्रतिशत से 18 कर देंगे, जोकि अभी होना था लेकिन उससे पहले सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया और यह रेसिप्रोकल टैरिफ़ अवैध हो चुका है. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने 15 प्रतिशत नया ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है जोकि अस्थाई है और सबके ऊपर लगेगा चाहे एफ़टीए यानी फ़्री ट्रेड अग्रीमेंट हो या न हो.

उनके अनुसार, "अगर आप एफ़टीए करते हैं तो आपको उन्हें कुछ रियायतें देनी पड़ेंगी और एफ़टीए नहीं करते हैं तो बिना किसी रियायत दिए 15 प्रतिशत टैरिफ़ लगेगा."

मौजूदा समय में भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ़ की गणना में जो कन्फ़्यूज़न है उसे समझाते हुए अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात के 55 प्रतिशत हिस्से पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगा था. अब इसकी जगह 15 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ़ लगेगा."

वह कहते हैं, "बाकी बचे 45 प्रतिशत भारतीय निर्यात के लगभग आधे हिस्से पर अमेरिका ने पूरी दुनिया के लिए पहले ही टैरिफ़ से छूट दे रखी है जिसमें स्मार्टफ़ोन, दवाएँ, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स हैं. अब जो बचे हुए प्रोडक्ट हैं जैसे स्टील और एल्यूमीनियम, उस पर अमेरिका ने पूरी दुनिया के देशों पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा रखा है. कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर 25% टैक्स है. और ये जो फ़ार्मूला है ये पूरी दुनिया पर एक समान लागू होगा."

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध इस आधार पर घोषित किया कि इसका अधिकार अमेरिकी कांग्रेस को है.

क्या भारत- अमेरिका ट्रेड डील का आधार ख़त्म हो गया?

भारत और अमेरिका ट्रेड डील

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से टैरिफ़ के ग़ैरक़ानूनी घोषित किए जाने के बाद ट्रंप ने दावा किया कि 'भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में कुछ भी नहीं बदलेगा और वो भुगतान करेंगे, जबकि अमेरिका को कुछ भी भुगतान नहीं करना होगा.'

लेकिन जानकारों का कहना है कि ट्रंप के दावे का कोई क़ानूनी आधार नहीं है.

अजय श्रीवास्तव का भी कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच जिस ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है उसका बस एक ही क़ानूनी आधार है, छह फ़रवरी को जारी संयुक्त बयान.

उनके अनुसार, "संयुक्त बयान में एक बहुत स्पष्ट शर्त लिखी हुई है कि दोनों देशों में कोई भी अगर अपने टैरिफ़ को मॉडिफ़ाई करता है तो दूसरा देश कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा. अब अमेरिका में टैरिफ़ मॉडिफ़ाई हो गए हैं तो हमें फिर से देखना पड़ेगा. और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि हमें कोई फ़ायदा नहीं है और इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है."

अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो 15% का नया ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है, इसकी भी बुनियाद बहुत कमज़ोर है और इसे भी चुनौती दी जाएगी.

दरअसल जिस धारा 122 के तहत ट्रंप ने नए ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है उसके अनुसार, सिर्फ़ 150 दिनों तक अधिकतम 15% टैरिफ़ लगाया जा सकता है लेकिन इसमें भी एक शर्त है कि ये तब लागू किया जा सकता है जब भुगतान संतुलन की समस्या हो. साथ ही ये क़ानून उस समय की बात करता है जब फ़िक्स एक्सचेंज रेट हुआ करता था.

अजय श्रीवास्तव का कहना है, "इस समय न तो अमेरिका को भुगतान संतुलन की समस्या है और न ही वहां फ़िक्स एक्सचेंज रेट का मामला है. इसीलिए अभी से लोग कहने लगे हैं कि इसे चुनौती दी जाएगी और बहुत जल्द अमेरिका को इसे भी वापस लेना पड़ेगा."

भारत को क्या करना चाहिए?

नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, एक्सपर्ट का कहना है कि भारत को ट्रेड डील पर पुनर्विचार करना चाहिए

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ गई है, अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को अपने ट्रेड डील की शर्तों पर फिर से पुनर्विचार करना चाहिए.

वह कहते हैं, "हमने जो पहले ट्रेड डील वार्ता की थी, अब सब चीज़ें बदल गई हैं और अब हमें उससे निकल जाने का सोचना पड़ेगा या नई शर्तों पर फिर से बातचीत करनी पड़ेगी."

उनका कहना है, "जो पुरानी डील थी वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो गई है और और इस समय अमेरिका में टैरिफ़ को लेकर इतनी अस्थिरता चल रही है कि भारत को इस सबसे निकल जाना चाहिए और शांति से देखना चाहिए कि अमेरिका और दुनिया में क्या हो रहा है. ट्रेड डील की बात कुछ समय के लिए भूल जानी चाहिए."

अजय श्रीवास्तव के अनुसार, 'भारत को अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील पर पुनर्विचार करना चाहिए.'

हालांकि केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, "हमने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ़ पर दिए गए फ़ैसले को देखा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बारे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी की है. अमेरिकी प्रशासन ने कुछ क़दमों का एलान किया है. हम इन सभी घटनाक्रम का असर समझने के लिए उनका अध्ययन कर रहे हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.