ट्रंप के दावे, मोदी सरकार की चुप्पी: क्या हैं भारत-अमेरिका ट्रेड डील से जुड़े वो तीन सवाल जिनके नहीं मिले जवाब

मोदी और ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर जो बड़े दावे किए हैं उन पर भारत ने स्थिति साफ़ नहीं की है
    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

सोमवार दो फरवरी को भारत और अमेरिका ने एक नए व्यापार समझौते या ट्रेड डील की घोषणा की.

पिछले कुछ वक़्त से दोनों देशों के बीच रिश्तों में चल रही तल्ख़ी के मद्देनज़र इस समझौते ने रिश्तों में सुधार की उम्मीदें जगाई हैं.

लेकिन समझौते की शर्तों और समयसीमा के बारे में न के बराबर जानकारी सार्वजानिक की गई है. हालांकि, भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार शाम को कहा कि अमेरिका के साथ भारत की ट्रेड डील पर अंतिम दौर की बातचीत में ब्योरे तय किए जा रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस डील के बारे में जो कुछ लिखा उसमें से बहुत सी बातों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भारत सरकार की तरफ़ से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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और इसी वजह से इस डील से कई ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं जिनके जवाब अभी तक मालूम नहीं हैं.

1. क्या वाक़ई भारत अब रूस से तेल नहीं ख़रीदेगा?

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि भारत रूस से तेल ख़रीदना बंद करने पर राज़ी हो गया है

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि भारत रूस से तेल ख़रीदना बंद करने पर राज़ी हो गया है

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि भारत रूस से तेल ख़रीदना बंद करने और अमेरिकी तेल की ख़रीद बढ़ाने पर राज़ी हो गया है. उन्होंने यह तक कहा कि भारत वेनेज़ुएला से भी तेल ख़रीद सकता है.

लेकिन भारतीय पक्ष ने इन बयानों पर कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं दी है. तो क्या यह दावा सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी भी हो सकता है?

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जाने-माने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर बिस्वजीत धर कहते हैं कि जहां अमेरिका ने बहुत कुछ बोला है, वहीं भारत में इस पर सरकार ने चुप्पी साधी हुई है.

प्रोफेसर धर कहते हैं, "देखिए हमारी सरकार का आधिकारिक रुख़ था कि हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा का अपने हिसाब से निर्धारण करेंगे. और उसका बड़ा साफ़ संकेत था कि हमें अगर रूस से सस्ते में तेल मिल रहा है तो हम वहीं से खरीदेंगे. तो एक तरह से जो एक संप्रभु देश का नज़रिया है उसे हमारी सरकार ने साफ़ तौर पर कहा था. अभी राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कहा है कि हम रूस से तेल नहीं खरीदेंगे, यह भारत सरकार के पहले अपनाये गए रुख़ के उलट है. मतलब यह है कि अमेरिका अब हमें डिक्टेट कर रहा है कि कैसे हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा को हासिल करें. तो मेरे हिसाब से यह तो बहुत बड़ा कम्प्रोमाइज़ है."

अपनी बात को जारी रखते हुए वह कहते हैं, "भारत की तरफ़ से अभी तक कोई आधिकारिक खंडन नहीं आया है. मेरी बात तब तक मान्य रहेगी जब तक भारत सरकार यह नहीं कहती कि ट्रंप ने जो कहा है वह ठीक नहीं है और हमारा नज़रिया अलग है. जब तक वह नहीं आएगा तब तक राष्ट्रपति ट्रंप का ट्रूथ सोशल ही ट्रूथ रहेगा."

मोहन कुमार फ्रांस में भारत के राजदूत रह चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और बहुपक्षीय वार्ता के क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं.

वह कहते हैं, "समझौते की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है. इसलिए इस पर टिप्पणी करना फ़िलहाल मुश्किल है. दस्तावेज़ देखे बिना यह कहना मुश्किल है कि असल में क्या तय हुआ है. कोई न कोई औपचारिक दस्तावेज़ ज़रूर होगा और उसी के आधार पर आगे बात की जा सकती है. मेरी जानकारी में भारत ने पहले ही रूसी तेल की ख़रीद काफ़ी कम कर दी है."

2. क्या भारत 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदेगा?

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद ख़रीदेगा.

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राष्ट्रपति ट्रंप के दावे का एक और अहम पहलू यह है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद ख़रीदेगा.

हालांकि असलियत यह है कि भारत का कुल सालाना अमेरिकी आयात अभी 50 अरब डॉलर से भी कम है. ऐसे में इस स्तर तक पहुंचना दशकों का काम हो सकता है. तो क्या यह दावा हवाई है?

प्रोफ़ेसर बिस्वजीत धर कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप का यह कहना कि भारत कृषि उत्पाद अमेरिका से आयात करेगा बहुत महत्वपूर्ण है.

वह कहते हैं, "हमारे प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को बड़े साफ़ तौर पर कहा था कि हमारे किसानों के हितों से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा. इससे कृषि से जुड़े एक बड़े तबके को राहत मिली थी कि अमेरिकन कंपनियों का दबदबा इस मार्केट में नहीं रहेगा और भारत के जो छोटे किसान हैं उनकी रोज़ी-रोटी सुरक्षित है."

"बात हमारे देश की खाद्य सुरक्षा की भी है. साठ के दशक में अमेरिका हम पर हुक़्म चलाता था क्योंकि हम अमेरिका से आयात पर निर्भर थे. तब से लेकर अब तक ऐसे हालात बने कि आज हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हम आत्मनिर्भर हैं. अब उस आत्मनिर्भरता के ऊपर आंच आती दिख रही है."

प्रोफ़ेसर धर के मुताबिक़, अमेरिका की कृषि सचिव ने जो कहा उस पर भी ध्यान देना होगा. वह कहते हैं, "उन्होंने कहा है कि हम भारत को निर्यात करेंगे और हमारे (अमेरिकी) किसानों को उनको बहुत बड़ा फ़ायदा मिलने वाला है. तो आधिकारिक तौर पर उनकी तरफ से यह आ रहा है. कृषि और ऊर्जा- जो दो मौलिक चीज़ें हैं हमारे देश के लिए- वहां पर अगर हम अमेरिका के ऊपर इम्पोर्ट-डिपेंडेंट (आयात पर निर्भर) हो जाते हैं, जो हमने पहले बिल्कुल मना कर दिया था और कहा था कि इन पर हम समझौता नहीं करेंगे और ये हमारे संप्रभु फ़ैसले रहेंगे, तो मुझे इस बात से दिक़्क़त हो रही है कि यह जो डील है यह विश्वासघात न हो गया हो."

पीयूष गोयल ने मंगलवार शाम में कहा था, ''इंडिया और यूएस डील के तहत एग्रीकल्चर और डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर को लेकर, उनको संरक्षण दिया गया है.''

गोयल ने कहा कि जैसे ही अंतिम सहमति बन जाती है, सारा विवरण सार्वजनिक किया जाएगा.

भारत अमेरिका के बीच व्यापार समझौता यूरोपीय संघ के साथ किए गए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद हुआ है

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तो भारत के अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान ख़रीदने की क्या संभावना है?

मोहन कुमार कहते हैं कि इसका जवाब समझने के लिए पहले उस पूरे दायरे (यूनिवर्स) को देखना होगा जिसके बारे में वह बात कर रहे हैं.

"क्या यह उन चीज़ों पर लागू होता है जिन पर बातचीत के दौरान काम शुरू हो चुका है या जो चीज़ें हम पहले से खरीद रहे हैं? और फिर समय अवधि का सवाल भी है. मुझे लगता है उन्होंने "गोइंग फॉरवर्ड" शब्द का इस्तेमाल किया है. इसका मतलब है कि यह आगे आने वाले समय में एक लंबी अवधि में होगा. यह देखने की ज़रूरत होगी कि दोनों पक्षों ने किस समय अवधि पर सहमति बनाई है.

अतीत में कई ऐसे मौक़े आए हैं जब ट्रंप अपनी कही गई बातों या दावों से पीछे हटते दिखे हैं. क्या भारत के साथ हुई डील पर उनके किए गए दावों का भी यही हश्र हो सकता है?

प्रोफ़ेसर धर कहते हैं कि ऊर्जा और कृषि दोनों ही राष्ट्रपति ट्रंप के लिए मौलिक मुद्दे हैं.

"अमेरिका भारत को कह रहा था कि आप रूस से तेल ख़रीदकर उसकी वॉर मशीन को फंड नहीं करेंगे. राजनीतिक तौर पर ट्रंप के लिए यह ज़रूरी बात थी. दूसरी बात कृषि की. कृषि की जो पूरी लॉबी है उन्होंने बड़े तौर पर ट्रंप के लिए वोट किया था साल 2024 में. अमेरिका के कृषि प्रधान राज्यों में 70 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट ट्रंप के लिए आया और इसीलिए आया था क्योंकि उन्होंने कहा था कि मैं बड़ी सी ट्रेड डील करूंगा बड़े देशो के साथ- इंडिया, चाइना के साथ- और आप मुझे वोट दीजिए."

अपनी बात जारी रखते हुए वह कहते हैं, "तो वहां पर भी उनका पॉलिटिकल कमिटमेंट (राजनीतिक प्रतिबद्धता) है और अगर वह यह सब कह रहे हैं और होता नहीं है तो उनके लिए पॉलिटिकल फॉलआउट (राजनीतिक नतीजा) ठीक नहीं होगा, सही नहीं होगा, काफी नुक़सान पहुंचाने वाला होगा. इसलिए मैं कह रहा हूं कि अगर वह कह रहे हैं कि भारत 500 अरब डॉलर का आयात करेगा तो ऐसे ही नहीं कह सकते हैं क्योंकि इस बयान के ग़लत साबित होने पर राजनीतिक परिणाम काफ़ी गंभीर हो सकते हैं."

3. क्या भारत अमेरिका पर सभी टैरिफ और ग़ैर-टैरिफ बाधाएं हटाएगा?

नरेंद्र मोदी, एस जयशंकर

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सोशल मीडिया ट्रूथ सोशल पर अपने पोस्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर समस्त टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं 'ज़ीरो' या शून्य कर देगा.

लेकिन भारत ने अब तक किसी भी आधिकारिक बयान में इसका ज़िक्र नहीं किया है. भारत परंपरागत रूप से कृषि, जीएम खाद्य उत्पादों और संवेदनशील श्रेणियों में विदेशी आयात के प्रति सतर्क रहता है और इन क्षेत्रों में बाज़ार खोलने की संभावना बेहद कम मानी जाती है.

प्रोफ़ेसर धर कहते हैं कि अतीत में भारत का रुख़ यह रहा है कि विकसित देशों को ज़्यादा टैरिफ़ और विकासशील देशों को कम टैरिफ़ देना चाहिए. "अब यह बात पूरी तरह से उलट गई है. जो बयान आए हैं उनके मुताबिक़ अमेरिका ज़ीरो परसेंट टैरिफ देगा."

वह कहते हैं, "ट्रंप के आने से पहले भारत पर जो टैरिफ़ औसतन सिर्फ़ ढाई फ़ीसदी लगता था वह अब 18 फ़ीसदी हो गया है और भारत जो अमेरिका पर लगाता था अगर वह शून्य हो जाता है तो ये तो बिल्कुल ही एक तरह से उलटफेर हो गया है. भारत का बहुत ज़्यादा घाटा है इसमें. हमारे वित्त मंत्री ने भी कहा कि एमएसएमई को सपोर्ट करना है क्योंकि उनकी क्षमता कम है. अब आप अगर मार्केट को पूरी तरह से खोल देते हैं तो एमएसएमई का बहुत बड़ा नुक़सान है."

मोहन कुमार कहते हैं, "दो बातें हैं. पहली बात-वह किन-किन चीज़ों (उत्पादों) की बात कर रहे हैं? क्या उसमें सेवाएं (सर्विसेज़) भी शामिल हैं या नहीं? यह सबसे पहले देखना होगा. दूसरी बात- इसे शून्य तक कम करने का मतलब क्या है? क्या इसे छह महीने में करना है, एक साल में, पांच साल में या दस साल में? इसके लिए फिर उसी समझौते की छोटी-छोटी बातों (फ़ाइन प्रिंट) को देखना पड़ेगा."

दोनों देशों के बीच हुई डील के फ़ाइन प्रिंट के बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. इसके बावजूद मोहन कुमार कहते हैं, "यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक समझौता है".

"यह बेहद अहम है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि यह समझौता यूरोपीय संघ के साथ किए गए हमारे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तुरंत बाद हुआ है."

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