अमेरिकी मीडिया ने बताया- सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ़ रद्द करने के फ़ैसले का असर क्या होगा

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अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की टैरिफ़ नीति को अवैध बताकर रद्द कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से ट्रंप के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है.
अमेरिकी राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के जजों पर हमला बोल रहे हैं.
ट्रंप ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को हास्यास्पद बताया.
उन्होंने कहा, "मुझे अदालत के कुछ सदस्यों पर शर्म आती है. हमारे देश के लिए जो सही है, उसे करने का साहस न दिखाने पर बिल्कुल शर्म आती है."
उन्होंने जजों पर व्यक्तिगत हमला बोला और रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों की ओर से नियुक्त जजों को भी नहीं छोड़ा.
हालांकि ट्रंप को सभी राजनीतिक परंपराओं को तोड़ने और ख़ुद को चुनौती देने वालों को सार्वजनिक रूप से फटकराने के लिए जाना जाता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों पर तीखे हमले को अमेरिकी मीडिया में स्वस्थ परंपरा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है.
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अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक संपादकीय लेख में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट पर हमला बोलकर ट्रंप ने अपना का कद घटाया है.
जबकि ब्लूमबर्ग ने लिखा है कि इस फ़ैसले से अब 170 अरब डॉलर के रिफ़ंड को लेकर लड़ाई छिड़ेगी.
'ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी मांगनी चाहिए'
वॉल स्ट्रीट जर्नल के संपादकीय बोर्ड ने लिखा है, "राष्ट्रपति ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी मांगनी चाहिए."
डब्ल्यूएसजे ने लिखा है, "शुक्रवार को जिन जजों पर उन्होंने आरोप लगाए और जिस संस्था (न्यायपालिका) पर हमला किया, उसके लिए उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए. संभव है कि ट्रंप ऐसा न करें, लेकिन टैरिफ़ मामले में अदालत से मिली हार पर उनकी प्रतिक्रिया को उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के सबसे ख़राब पलों में गिना जा सकता है."
अख़बार ने लिखा, "यह सही है कि ट्रंप अदालत से नाराज़ हैं, जिसमें उनके प्रमुख 'इमरजेंसी' टैरिफ़ नीति को 6-3 के फ़ैसले से पलट दिया गया. अन्य राष्ट्रपतियों ने भी अपने ख़िलाफ़ आए फ़ैसलों की आलोचना की है. लेकिन ट्रंप ने जजों पर विदेशी हितों से प्रभावित होने और देश के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया."
अख़बार ने ट्रंप के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा, "टैरिफ़ पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला गहरे तौर पर निराशानजक है और मैं कोर्ट के कुछ सदस्यों को लेकर शर्मिंदा हूं, बिल्कुल शर्मिंदा हूं क्योंकि जो देश के लिए सही है, उसे करने का उन्होंने साहस नहीं दिखाया."
अख़बार ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप का 'इशारा बहुमत का फ़ैसला लिखने वाले मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स और सहयोगी जज नील गोरसुक और एमी कोनी बैरेट की ओर था.' इन तीनों ने तीन उदारवादी जजों के साथ मिलकर उनके टैरिफ़ को अवैध ठहराया.

वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, "ट्रंप ने लिबरल जजों को "हमारे राष्ट्र के लिए कलंक" कहा. लेकिन उन्होंने विशेष रूप से तीनों कंजर्वेटिव जजों पर तीखी टिप्पणी की.''
अख़बार ने लिखा है कि यह बयान ट्रंप के लिहाज से भी बेहद सख़्त माना जा रहा है.
उन्होंने बिना किसी पहचान या सबूत के यह संकेत दिया कि जज संदिग्ध विदेशी हितों के कहने पर अमेरिका के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. जब उनसे जज गोरसुक और बैरेट के बारे में पूछा गया, जिन्हें उन्होंने ख़ुद नियुक्त किया था, तो ट्रंप ने उन्हें "अपने परिवारों को शर्मसार करने" वाला बताया.
अख़बार ने लिखा कि 'इस तरह की भाषा किसी उग्र समर्थक को किसी जज के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए उकसा सकती है. यह 2020 में सीनेटर चक शूमर की उस टिप्पणी जितना गंभीर माना जा रहा है, जब उन्होंने जज गोरसुक और ब्रेट कावीनॉ से कहा था कि "आपने बवंडर खड़ा किया और आपको क़ीमत चुकानी होगी."'
अख़बार के अनुसार, उम्मीद जताई जा रही है कि सभी नौ जज अगले सप्ताह स्टेट ऑफ' द यूनियन संबोधन में एकसाथ उपस्थित रहेंगे.
अख़बार ने लिखा है, "यह वही अदालत है, जिसने राष्ट्रपति इम्युनिटी (छूट) के मामले में ट्रंप के पक्ष में फ़ैसला दिया था, जो उनके लिए व्यक्तिगत रूप से अधिक महत्वपूर्ण था. अदालत के फ़ैसले से उन्हें हैरान नहीं चाहिए था. शुरुआत से ही चेतावनी दी गई थी कि आपात शक्तियों का इस तरह इस्तेमाल अवैध साबित हो सकता है. ग़लती जजों की नहीं बल्कि उनकी अपनी टैरिफ़ नीति को लेकर ज़िद की है."

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अब शुरू हो सकती है अरबों डॉलर के रिफ़ंड की लड़ाई
एक अन्य प्रतिष्ठित अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने कहा है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अरबों डॉलर के रिफ़ंड को लेकर नई लड़ाई शुरू हो सकती है.
ब्लूमबर्ग ने एक लेख में लिखा है, "राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति के एक अहम औजार को सुप्रीम कोर्ट से रद्द किए जाने के बाद हज़ारों कंपनियां और आयातक अमेरिकी सरकार को चुकाए गए क़रीब 170 अरब डॉलर तक के टैरिफ़ वापस पाने के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई शुरू करने की तैयारी में हैं."
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फ़ैसला सुनाते हुए रिफ़ंड के मुद्दे पर कुछ नहीं कहा.
ट्रंप ने कहा, "वे महीनों तक फ़ैसला लिखते हैं और इस पर चर्चा तक नहीं करते. अब हम अगले पांच साल अदालत में रहेंगे."
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, "अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह तुरंत एक अन्य प्रावधान के तहत 10 प्रतिशत का नया वैश्विक टैरिफ लगाने की योजना बना रहे हैं. लेकिन इससे रिफंड की मांग को लेकर कंपनियों की ओर से दायर होने वाले मुक़दमों की बाढ़ नहीं रुकेगी."
ब्लूमबर्ग ने अनुमान लगाया है कि 'ट्रंप प्रशासन की इस हार का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. किसी भी संभावित रिफ़ंड प्रक्रिया का पैमाना और दायरा अभूतपूर्व होगा.''
''बड़ी और छोटी, सार्वजनिक और निजी, कई तरह की कंपनियां हाल के महीनों में इस स्थिति के लिए ख़ुद को तैयार कर रही थीं कि अगर जज ट्रंप के फ़ैसले को रद्द कर दें तो वे चुकाए गए टैरिफ़ वापस पाने की कोशिश कर सकें.'
ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, "रीटेल कंपनी कॉस्टको होलसेल कॉर्प और अमेरिकी एल्युमिनियम उत्पादक अलकोआ कॉर्प जैसी बड़ी औद्योगिक कंपनियां भी मुक़दमा दायर करने वालों में शामिल हैं. इनके साथ प्रमुख उपभोक्ता ब्रैंड और सैकड़ों छोटी कंपनियां भी अदालत पहुंची हैं. अधिकांश कंपनियां अमेरिका में स्थित हैं, लेकिन इनमें विदेशी कंपनियों की घरेलू सहायक इकाइयां भी शामिल हैं."
"सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में अमेरिकी आयातकों के लिए एक बड़ा सवाल यह अनुत्तरित रह गया है कि पिछले एक साल में इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) के तहत सरकार की ओर से वसूली गई रक़म को वापस पाने की संभावना और प्रक्रिया क्या होगी. ट्रंप प्रशासन के ख़िलाफ़ 6-3 से फैसला आया, जिसमें जस्टिस ब्रेट कावनॉ ने असहमति दर्ज की."
कावनॉ ने लिखा, "आज अदालत यह नहीं बताती कि सरकार को क्या आयातकों से वसूले गए अरबों डॉलर लौटाने चाहिए और अगर हां तो कैसे. लेकिन यह प्रक्रिया संभवतः 'अफ़रातफ़री' वाली साबित होगी, जैसा कि नवंबर में हुई मौखिक बहस के दौरान स्वीकार किया गया था."
ब्लूमबर्ग के अनुसार, "अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन ने अब तक इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत लगाए गए टैरिफ़ से अनुमानित 170 अरब डॉलर वसूले हैं. यही क़ानून इस मामले के केंद्र में था."
"अदालत ने कहा कि आईईईपीए का इस्तेमाल कर टैरिफ़ लगाना क़ानूनी नहीं था, लेकिन जजों ने यह नहीं बताया कि आयातकों को रिफ़ंड का अधिकार है या नहीं. इस मुद्दे को निचली अदालत पर छोड़ दिया गया है. अब यह मामला आगे की क़ानूनी प्रक्रिया के लिए यूएस कोर्ट ऑफ़ इंटरनेशनल ट्रेड में जाएगा."

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सुप्रीम के फ़ैसले के 6 अहम संदेश
न्यूयॉर्क टाइम्स ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इसका व्यापक आर्थिक, संवैधानिक और राजनीतिक असर होगा.
अख़बार ने इसे राष्ट्रपति के लिए बड़ा झटका बताते हुए लिखा है, "जजों का 6-3 का फ़ैसला ट्रंप के लिए बड़ा झटका साबित हुआ और उनके दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाने की कोशिशों पर अदालत की ओर से लगाया गया अपेक्षाकृत दुर्लभ अंकुश था.''
''ट्रंप बार-बार टैरिफ़ को अपने एजेंडे का अहम हिस्सा बताते रहे हैं. अदालत में मिली हार का असर केवल व्यापार पर ही नहीं बल्कि उनकी पूरी आर्थिक और विदेश नीति की रणनीति पर पड़ेगा."
राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ़ के ख़िलाफ़ फ़ैसले के लिए वोट देने वाले जजों को मूर्ख कहा और नए टैरिफ़ लगाने की बात कही लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, "इस बार उनकी शक्तियों पर अधिक सख़्त सीमाएं होंगी."
अख़बार के अनुसार, दूसरा अहम संदेश है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी स्वतंत्रता को दिखाया है.
"एक साल पहले पद संभालने के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को कई फ़ैसलों में राहत दी थी. इन फ़ैसलों ने उनकी सरकार की आक्रामक नीतियों, जैसे माइग्रेशन, सरकारी एजेंसियों की स्वतंत्रता और ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों से जुड़े मामलों में, कम से कम अस्थायी रूप से रास्ता साफ़ किया था.''
''टैरिफ़ से जुड़ा यह फ़ैसला पहली बार था, जब अदालत ने उनके दूसरे कार्यकाल के किसी कार्यकारी आदेश की वैधता पर अंतिम निर्णय दिया. मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स जूनियर ने बहुमत का फ़ैसला लिखा.''
''ट्रंप के पहले कार्यकाल में नियुक्त तीन कंजर्वेटिव जजों में से दो, एमी कोनी बैरेट और नील एम गोरसुक, ने भी मुख्य न्यायाधीश का साथ देते हुए राष्ट्रपति की प्रमुख आर्थिक नीति को ख़ारिज किया."
अख़बार ने लिखा कि नाराज़गी के बावजूद ट्रंप ने यह संकेत नहीं दिया कि वह फ़ैसले को नहीं मानेंगे.
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ तीसरा अहम संदेश है कि क़ीमतों पर तुरंत बड़ा असर होने की संभावना कम है, "टैरिफ़ ने फ़र्नीचर, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे विदेश में बने कई सामानों की क़ीमतों पर दबाव डाला था.''
''लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस फ़ैसले से क़ीमतों में तुरंत गिरावट की संभावना कम है. ट्रंप नए टैरिफ़ लगाने की तैयारी कर रहे हैं. इसलिए कंपनियां तत्काल कोई क़दम नहीं उठाने जा रहीं, ख़ासकर जब टैरिफ़ दरें अभी अनिश्चित हैं."
चौथी बात है कि बड़े वैश्विक व्यापार साझीदार सतर्कता बरत रहे हैं.
"सीमित प्रतिक्रिया से साफ़ है कि ओटावा से लेकर नई दिल्ली तक अधिकारी समझते हैं कि यह फ़ैसला ट्रंप की टैरिफ़ नीति का अंत नहीं है. कनाडा और मेक्सिको के भी लिए इस फैसले का तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ा. लेकिन 10 प्रतिशत के नए टैरिफ़ लगाने की चेतावनी से इन देशों के हालात और कठिन बन सकते हैं. यूरोपीय संघ ने भी फ़ैसले का जश्न नहीं मनाया."
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ पांचवीं सबसे बड़ी बात है संघीय बजट को लेकर बढ़ी अनिश्चितता.
"राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ़ नीति, अमेरिकी मैन्यूफ़ैक्चरिंग को बढ़ाने या व्यापार घाटा कम करने में संघर्ष करती रही है.
लेकिन इसने भारी क़र्ज़ में डूबी संघीय सरकार के लिए राजस्व का नया स्रोत ज़रूर खोला. अब यह स्पष्ट नहीं है कि इस अतिरिक्त आमदनी का क्या होगा.
सर्वदलीय कांग्रेसनल बजट ऑफिस के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले ट्रंप के टैरिफ़ से अगले नौ सालों में लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर का राजस्व आने का अनुमान था.
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ कोर्ट ने जिन टैरिफ़ को रद्द किया, इस अनुमानित राजस्व में उसका आधा हिस्सा है. येल बजट लैब ने इसका असर लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर आंका."
हालांकि ट्रंप ने 10 प्रतिशत नए टैरिफ़ का एलान करते हुए कहा, "अंतिम नतीजा हमें ज़्यादा पैसा दिलाएगा."
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इस फ़ैसले की छठी बात है रिफ़ंड का मुद्दा.
"इस फ़ैसले से यह संभावना बनी है कि प्रशासन को हज़ारों आयातकों को 100 अरब डॉलर से अधिक की टैरिफ़ राशि लौटानी पड़ सकती है.
हालांकि, अदालत ने यह नहीं बताया कि यह प्रक्रिया कैसे पूरी होगी. व्यापार क़ानून विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों की ओर से आयात शुल्क वापस पाने की कोशिश में महीनों या सालों तक क़ानूनी लड़ाई चल सकती है.
अदालत ने रिफंड प्रक्रिया शुरू करने का दायित्व निचली अदालतों और यूएस कोर्ट ऑफ़ इंटरनेशनल ट्रेड पर छोड़ दिया है."
"यह प्रक्रिया कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन और ट्रेजरी विभाग की ओर से लागू की जाएगी. जिन आयातकों ने टैरिफ़ चुकाए हैं, वे सीधे तौर पर रिफ़ंड के योग्य हैं. लेकिन जिन अन्य व्यवसायों को लागत का भार ख़ुद उठाना पड़ा, वे भी मुक़दमे के ज़रिए क्षतिपूर्ति मांग सकते हैं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि अधिक क़ीमत चुकाने वाले उपभोक्ताओं को कोई मुआवजा मिलेगा या नहीं."
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