ट्रंप का नया 10% ग्लोबल टैरिफ़ कैसे काम करेगा, क्या भारत पर भी अब इतना ही लगेगा?

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- Author, ग्रेस एलिज़ा गुडविन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल वैश्विक टैरिफ़ लगाते वक़्त अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया.
सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसले में कहा कि ट्रंप 1977 के क़ानून 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' यानी आईईपीए का उपयोग करके दुनिया के लगभग हर देश से आयात पर टैरिफ़ नहीं लगा सकते थे.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने टैरिफ से हासिल क़रीब 130 अरब डॉलर के रिफ़ंड की संभावना खुली छोड़ी है. यह मुद्दा आगे किसी अन्य अदालती विवाद में जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के कुछ घंटों बाद ट्रंप ने एक वैकल्पिक क़ानून, ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122, के तहत एक घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जो उन्हें सभी देशों के सामान पर नया अस्थायी 10 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की अनुमति देता है.
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आइए समझते हैं कि टैरिफ़ को लेकर आगे क्या हो सकता है और कौन से सवाल अभी भी बाक़ी हैं.

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कौन से टैरिफ़ अवैध पाए गए और क्यों?
20 फ़रवरी को जारी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल उन टैरिफ़ पर लागू होता है, जिन्हें ट्रंप ने आईईपीए के तहत लागू किया था.
यह क़ानून राष्ट्रपति को आपात स्थिति में व्यापार नियंत्रित करने की शक्ति देता है.
ट्रंप ने फ़रवरी 2025 में इस क़ानून का पहली बार उपयोग करते हुए चीन, मेक्सिको और कनाडा से आने वाले सामान पर टैरिफ़ लगाया था. ट्रंप ने कहा था कि फेंटानिल की तस्करी एक आपात स्थिति है.
कुछ महीनों बाद, जिसे ट्रंप ने "लिबरेशन डे" कहा, उन्होंने टैरिफ़ दायरा बढ़ाते हुए लगभग सभी देशों पर 10 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक लगा दिए.
इस क़दम के पीछे अमेरिकी व्यापार घाटे को "असाधारण और असामान्य ख़तरा" बताया गया.
अदालत ने कहा कि नए टैरिफ़ लगाने की संवैधानिक शक्ति कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं. साथ ही आईईपीए का मक़सद राजस्व जुटाना नहीं है.
हालांकि, पिछले साल लगाए गए कुछ टैरिफ़ इस फ़ैसले से प्रभावित नहीं हैं.
इनमें स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों पर लगाए गए उद्योग-विशेष टैरिफ़ शामिल हैं, जिन्हें ट्रंप ने ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट 1962 की धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लागू किया था. ये टैरिफ़ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद जारी रह सकते हैं.

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ट्रंप ने अलग क़ानून के तहत नया टैरिफ़ लगाया
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ट्रंप ने एक बहुत कम परिचित और कभी इस्तेमाल न होने वाले अमेरिकी क़ानून (धारा 122) के तहत अमेरिका को होने वाले सभी आयात पर 10 प्रतिशत के ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की.
यह धारा राष्ट्रपति को 150 दिनों के लिए 15% तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार देती है, उसके बाद कांग्रेस से उसे मंज़ूर कराना होगा, इसका मतलब है कि यह समाधान भी अस्थायी है.
हालांकि ये भी संभावना है कि ट्रंप सांसदों को दरकिनार करके कोई रास्ता निकाल सकते हैं.
दक्षिणपंथी रुझान वाले एक थिंक टैंक कैटो इंस्टीट्यूट के अनुसार, इस धारा में स्पष्ट रूप से इस बात पर प्रतिबंध नहीं लगाया है कि अगर 150 दिन की सीमा ख़त्म हो जाती है तो राष्ट्रपति नई इमर्जेंसी की घोषणा करते हुए इसे फिर से लागू नहीं कर सकते.
व्हाइट हाउस के मुताबिक़, ट्रंप धारा 122 का इस्तेमाल बुनियादी अंतरराष्ट्रीय भुगतान समस्याओं के समाधान और अमेरिकी व्यापार को फिर से संतुलित करने के लिए कर रहे हैं.
दूसरी ओर इस बात पर भी विचार कर रहे हैं कि क्या ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत टैरिफ़ लगा सकते हैं.
यह क़ानून अमेरिकी ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव (वर्तमान में जैमीसन ग्रीयर) दूसरे देशों के ट्रेड व्यवहार की जांच सकते हैं. अगर वो इसे 'भेदभाव' वाला या 'पक्षपाती' पाते हैं तो टैरिफ़ लगा सकते हैं.
ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट 1962 की धारा 232 के तहत भी, अमेरिकी प्रशासन टैरिफ़ लगाना जारी रख सकता है, जिसका ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में व्यापक इस्तेमाल किया था.
यह प्रावधान ट्रंप प्रशासन को उन आयातों पर शुल्क लगाने की अनुमति देता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा माने जाते हैं. हालांकि, इसके लिए पहले जांच ज़रूरी होती है, इसलिए ऐसे टैरिफ़ लागू करने में समय लगता है.
एक अर्थशास्त्री ने बीबीसी से कहा कि जांच और निष्कर्ष की अनिवार्यता, एक बार टैरिफ़ लागू हो जाने के बाद उन्हें चुनौती देना और हटाना भी कठिन बना सकती है.
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि सेक्शन 122 के साथ धारा 232 और धारा 301 टैरिफ़ को मिलाने से "2026 में टैरिफ़ राजस्व में लगभग कोई असर नहीं पड़ेगा."
उनके अनुसार, इससे आईईईपीए टैरिफ़ के नुकसान की भरपाई हो जाएगी.

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टैरिफ़ का रिफ़ंड मिलेगा?
ट्रंप ने टैरिफ़ लगाने के पक्ष में यह तर्क दिया है कि इससे मिलने वाली रक़म अमेरिकी ट्रेजरी में जाती है और देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करती है.
कई रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी उत्पाद आयात करने वाली कंपनियों से अमेरिकी सरकार ने अब तक अरबों डॉलर वसूले हैं. अनुमान है कि यह राशि करीब 130 अरब डॉलर के आसपास है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आईईईपीए के तहत लगाए गए ट्रंप के टैरिफ़ क़ानूनी नहीं थे, लेकिन उसने यह नहीं बताया कि यह राशि शुल्क चुकाने वालों को कैसे लौटाई जाएगी.
ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में संकेत दिया कि संभावित रिफ़ंड कई सालों के क़ानूनी विवाद में फंसे रह सकते हैं.
फ़ैसले के बाद वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी कहा कि रिफ़ंड का मुद्दा सालों तक खिंच सकता है.
डलास में एक कार्यक्रम के दौरान बेसेंट ने कहा कि आईईईपीए टैरिफ़ के जरिए पहले से जुटाई गई राशि "विवाद में" है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने रिफ़ंड पर कोई निर्देश नहीं दिया.
इस मुद्दे पर फ़ैसला अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट की ओर से दिए जाने की संभावना है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रिफ़ंड होता है तो अधिकतर बड़ी कंपनियों को ही मिलेगा, क्योंकि छोटी कंपनियों के पास जटिल प्रक्रिया पूरी करने के संसाधन नहीं होते.
लिबरल थिंक टैंक ग्राउंडवर्क कलेक्टिव में पॉलिसी एंड एडवोकेसी प्रमुख एलेक्स जैकेज़ ने बीबीसी के मीडिया साझेदार सीबीएस से कहा कि फ़ैसले से पहले ही 1,000 से अधिक कंपनियां टैरिफ़ रिफंड की मांग कर चुकी थीं.
उनके अनुसार यह संख्या और बढ़ सकती है.
इलिनॉय के डेमोक्रेटिक गवर्नर जेबी प्रिट्जकर ने भी मांग की कि व्हाइट हाउस हर अमेरिकी परिवार को अवैध टैरिफ़ के बदले 1,700 डॉलर का रिफ़ंड चेक जारी करे.
ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से अमेरिकियों को टैरिफ़ रिबेट चेक जारी करने के विचार का ज़िक्र कर चुके हैं.

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अब कौन से टैरिफ़ लागू हैं?
व्हाइट हाउस के अनुसार, 24 फ़रवरी से नए 10 प्रतिशत टैरिफ़ लगभग सभी आयातों पर लागू होंगे, चाहे वे किसी भी देश से आए हों.
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने वाले देशों, जिनमें ब्रिटेन, भारत और यूरोपीय संघ शामिल हैं, पर भी सेक्शन 122 के तहत 10 प्रतिशत का ग्लोबल टैरिफ़ लागू होगा, न कि पहले तय की गई दर.
अधिकारी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन उम्मीद करता है कि ये देश अपने व्यापार समझौतों के तहत किए गए रियायतों का पालन जारी रखेंगे.
कुछ वस्तुओं को "अमेरिकी अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों" के कारण या शुल्क को व्यवस्थित करने के लिए छूट दी जाएगी.
इनमें कुछ महत्वपूर्ण खनिज, धातुएं, ऊर्जा उत्पाद, प्राकृतिक संसाधन, खाद्य फसलें, दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक्स, कार और ट्रक, और एयरोस्पेस उत्पाद शामिल हैं.
व्हाइट हाउस फ़ैक्ट शीट के अनुसार "सूचनात्मक सामग्री (जैसे किताबें), दान और साथ लाए गए निजी सामान" पर भी टैक्स नहीं लगेगा.
हालांकि कई श्रेणियों के लिए अधिसूचना व्यापक है और इसमें साफ़ नहीं है कि किन-किन वस्तुओं को छूट मिलेगी.
एक अन्य महत्वपूर्ण छूट अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा ट्रेड डील (यूएसएमसीए) के तहत आने वाले उत्पादों को है.
ये वस्तुएं आईईईपीए टैरिफ़ से भी मुक्त थीं. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी कई बार कह चुके हैं कि यूएसएमसीए छूट के कारण कनाडा उन देशों में है, जहां टैरिफ़ दर अपेक्षाकृत कम है.
इसी तरह कोस्टा रिका, डोमिनिकन गणराज्य, अल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास और निकारागुआ से आने वाले टेक्सटाइल और परिधान, डोमिनिकन रिपब्लिक-सेंट्रल अमेरिका एफ़टीए के तहत शुल्क मुक्त रहेंगे.
साथ ही ट्रंप ने कहा कि वह कम क़ीमत वाले उत्पादों पर टैरिफ़ बनाए रखेंगे.
पिछले वर्ष उन्होंने 'डी मिनिमिस' नामक छूट को ख़त्म कर दिया था, जिसके तहत 800 डॉलर या उससे कम मूल्य की वस्तुओं पर अमेरिका में टैरिफ़ नहीं लगता था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












