जंग के माहौल में भारत रूस से तेल ख़रीदना तो चाहता है, क्या घटेंगे दाम?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूक्रेन पर हमले की वजह से यूरोपीय संघ ने रूस से तेल और गैस के आयात में कटौती करने का फ़ैसला लिया है. ब्रिटेन ने भी इस साल के अंत तक रूसी तेल से छुटकारा पाने का फ़ैसला किया है. वहीं अमेरिका ने रूस से आयात किए जाने वाले तेल और गैस पर प्रतिबंध लगा दिया है.
ज़ाहिर है जंग के इस माहौल में इन देशों के इस फ़ैसले से रूस को बहुत ज़्यादा आर्थिक नुक़सान हुआ है.
इस नुक़सान की भरपाई के लिए रूस ने भारत का रुख़ किया है.
रूस चाहता है कि भारत उसका तेल ख़रीदे और आने वाले दिनों में वहाँ अपना निवेश बढ़ाए.
इस बारे में 10 मार्च को रूस के उप-प्रधानमंत्री एलेग्ज़ेंडर नोवाक ने भारत के पेट्रोलियम एवं नेचुरल गैस मंत्री हरदीप पुरी से बात की.
इस बातचीत के बाद रूस की तरफ़ से बयान जारी किया गया. बताया गया कि कैसे भारत रूस से सालाना 1 बिलियन डॉलर के पेट्रोलियम उत्पादों आयात करता है और भविष्य में इसके बढ़ने की पूरी संभावना है.
समचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक भारत कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं को रूस से रियायती कीमतों पर लेने पर विचार कर रहा है.
लेकिन भारत सरकार की तरफ़ से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.
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भारत में तेल की खपत और रूस से आयात
ऐसे में सवाल उठता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत, रूस से कितना और तेल ख़रीद सकता है? और क्या इससे दाम कम होंगे?
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के मुताबिक़ दुनिया के तेल का 12 फ़ीसदी रूस में, 12 फ़ीसदी सऊदी अरब में और 16-18 फ़ीसदी उत्पादन अमेरिका में होता है.
भारत 85 फ़ीसदी तेल आयात करता है, जिसमें 60 फ़ीसदी खाड़ी देशों से लेता है.
तेल आयात करने के लिए भारत सऊदी अरब और अमेरिका पर ज़्यादा निर्भर करता है. इसके अलावा भारत, इराक़, ईरान, ओमान, कुवैत, रूस से भी तेल लेता है और कुछ स्पॉट मार्केट (खुले बाज़ार) से भी ख़रीदता है.
रूस से भारत अपनी ज़रूरत का महज दो फ़ीसदी तेल ही आयात करता है.

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जब यूरोप की तेल की ज़्यादातर ज़रूरतें रूस पूरा करता है, तो भारत मित्र देश होने के बाद भी रूस से केवल 2 फ़ीसदी ही क्यों ख़रीद पाता है?
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "इसका जवाब कुछ हद तक रूस की भौगोलिक स्थिति में भी छिपा है. रूस के वो क्षेत्र जहाँ तेल का उत्पादन होता है, वो पूर्वी इलाके से थोड़ा दूर है. उत्तर से तेल लाने में दिक़्क़त ये है कि वो आर्कटिक क्षेत्र के पास है, जहाँ ज़्यादातर वक़्त बर्फ़ ही रहता है. तीसरा रास्ता है ब्लैक सी का जो इस समय बाधित चल रहा है."
पिछले 10 सालों में भारत ने तेल के आयात में एक देश पर निर्भरता को ख़त्म करने के लिए कई और देशों से तेल ख़रीदना शुरू किया है, जिसमें अमेरिका और रूस भी शामिल हैं.
नरेंद्र तनेजा आगे कहते हैं, "रूस में भारत ने तेल और नैचुरल गैस के क्षेत्र में 16 बिलियन डॉलर का निवेश किया है. लेकिन वो तेल भारत नहीं ख़रीदता, दूसरे देशों को बेच देता है."

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रूस से तेल ख़रीदने में मुश्किल क्या है?
फिलहाल रूस से तेल नहीं ख़रीदने की वजह से भी तेल के दाम दुनिया भर में बढ़े हैं.
ऐसे में माना जा रहा है कि रूस भारत को कम क़ीमत पर भी तेल बेचने को तैयार हो सकता है. बावजूद इसके जानकारों की माने तो भारत के लिए रूस से तेल का आयात बढ़ना, मुश्किल है.
पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं, "रूस से तेल ख़रीदने पर केवल अमेरिका में प्रतिबंध लगे हैं. भारत फिलहाल रूस से तेल ख़रीद तो सकता है, लेकिन रूस से तेल लाने की दिक़्क़त ज़्यादा है. इसके अलावा ख़रीदने पर पेमेंट में परेशानी आ सकती है."
कुछ जानकार मान रहे हैं कि भारत और रूस, रुपये और रूबल में कारोबार के बजाए 'बार्टर सिस्टम' की तर्ज पर कारोबार कर सकते हैं, जैसे ईरान पर प्रतिबंध के दौरान भारत ने किया था.

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लेकिन सुभाष गर्ग इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, " ईरान के साथ प्रतिबंधों के वक़्त दोनों देशों ने 'बार्टर सिस्टम' की तरह का सिस्टम अपनाया था. भारत जितना तेल ईरान से ख़रीद रहा था, उतनी कीमत का गेहूं, ईरान भारत से ख़रीद लेता, जिससे पैसों के लेन देन की ज़रूरत नहीं पड़ती. लेकिन उस वक़्त, शिपिंग लाइन चालू थी, फिर भी भारत ईरान से उतना तेल नहीं ख़रीद पा रहा था जितने की ज़रूरत थी. ईरान को रुपये में कारोबार से दिक़्क़त नहीं थी. ईरान को उस वक़्त ज़्यादा ज़रूरत थी, इस वजह से वो संभव हो पाया.
लेकिन रूस और भारत के बीच तेल आयात करने के लिए इस समय परिस्थितियां अलग है.
रूस से तेल भारत आए कैसे इसमें ही दिक़्क़त है तो 'बार्टर सिस्टम' चल नहीं सकता. ब्लैक सी से व्यापार बाधित है और साइबेरिया साइड पर रूस अपने ही सामान नहीं पहुँचा पा रहा. दूसरी दिक़्क़त है रूस और भारत के बीच निर्यात और आयात एक जैसा नहीं है. भारत रूस से ख़रीदता ज़्यादा है और बेचता कम है. तीसरी समस्या है ना रूस रुपये में कीमत लेने का इच्छुक है और ना भारत रूबल लेने का, तो ईरान वाला मामला यहां नहीं चल सकता."
चीन ने रूस से गैस और तेल लेने के लिए पाइपलाइन बिछा रखी है जो भारत के पास नहीं है.
इसके अलावा युद्ध के माहौल में रूस से तेल लाने वाले जहाज मिलना मुश्किल है और अगर वो मिल भी जाए तो इस समय उनका बीमा करना मुश्किल है.
नरेंद्र तनेजा भारत की मुश्किल का एक दूसरा पक्ष भी बताते हैं.
वो कहते हैं, " भारत में 5.2 मिलियन बैरल तेल की ख़पत रोज़ होती है. भारत तेल में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है. रूस से भारत एक लाख या दो लाख बैरल तेल मँगवा भी लेते हैं तो उससे भारत में तेल की कीमतों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भारत में तेल का अर्थशास्त्र ही ऐसा है."
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तेल की कीमतें नियंत्रित कैसे रखें ?
पाँच राज्यों में चुनाव ख़त्म होने के बाद अटकलें लगाई जा रही है कि जल्द ही तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिसकी वजह से ज़रूरी सामान महंगे हो सकते हैं.
सोमवार को राज्यसभा में बोलते हुए पेट्रोलियम एवं नैचुरल गैस मंत्री ने तेल की कीमतों पर कहा, " जब जनता को राहत देने की ज़रूरत थी तो 5 नवंबर को केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम किए. हम आगे भी जनता को राहत देने के लिए क़दम उठाने के लिए तैयार है. लेकिन तब 9 राज्यों ने ऐसे क़दम नहीं उठाए. टैक्स कम करना एक रास्ता है, लेकिन हमें सामान की ख़रीद के समय लोगों को राहत देने के लिए क़दम उठाना है."
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भले ही यूक्रेन और रूस के बीच जंग ने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का ताज़ा कारण हो, लेकिन कोविड महामारी और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के खोज और खनन में जितना निवेश होना चाहिए वो नहीं हुआ है. इस वजह से आने वाले दिनों में कीमतों में बढ़ोतरी अब एक स्थायी समस्या बन सकती है. ऐसा कई जानकार मानते हैं.
ऐसे में टैक्स में राहत देने के अलावा भारत सरकार ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती.
नरेंद्र तनेजा के मुताबिक़ तेल की कीमतें नियंत्रित रखने के लिए सरकार के पास तीन विकल्प हैं, जो बहुत आसान नहीं है.
- पहला - सरकार के साथ साथ जनता को भी तेल के संरक्षण पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
- दूसरा - कोशिश करनी चाहिए की ब्लेंडिंग में इथेनॉल का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा करें, जो आसान नहीं.
- तीसरा - तेल के पारंपरिक निर्यातकों से भारत कह सकता है कि रूस हमें सस्ता तेल दे रहा है, वो भी अपना दाम कम करें. यानी की कीमतों में कुछ बारगेन करें.
हालांकि सुभाष गर्ग कहते हैं कि कोई तरीका नहीं जिससे भारत का बढ़ता तेल का बिल आने वाले दिनों में कम हो सके.
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