यूक्रेन युद्ध: क्या आख़िर में पुतिन खोजेंगे इज़्ज़त बचाने का रास्ता?

बर्बाद हथियार

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    • Author, जॉन सिंपसन
    • पदनाम, वर्ल्ड अफ़ेयर्स एडिटर

भयानक से भयानक लड़ाइयां भी एक ना एक दिन ख़त्म होती हैं. कई बार, जैसा कि 1945 में हुआ था, युद्ध का एकमात्र नतीजा अंतिम सांस तक लड़ाई होता है.

अधिकतर बार, हालांकि, युद्ध किसी समझौते के साथ समाप्त हो जाते हैं जो सभी को बराबर संतुष्ट तो नहीं करते लेकिन बहुत हद तक कम से कम ख़ूनख़राबे को तो रोक ही देते हैं.

और अक्सर, भयानक और कड़वाहट भरी लड़ाइयों के बाद भी, दोनों पक्ष कभी ना कभी, धीरे-धीरे पुराने और कम दुश्मनी वाले संबंध बहाल कर ही लेते हैं.

अगर हम भाग्यशाली हैं तो हम कह सकते हैं कि इस समय हम रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान इसी प्रक्रिया को शुरू होते देख रहे हैं.

जो आक्रोश है, ख़ासकर यूक्रेन की तरफ़, वो आने वाले कई दशकों तक रहेगा. लेकिन दोनों ही पक्ष फिलहाल शांति चाहते हैं और उन्हें शांति की ज़रूरत भी है.

यूक्रेन को इसलिए शांति चाहिए क्योंकि रूस की भारी बमबारी में उसके शहर बर्बाद हो रहे हैं.

जहां तक रूस का सवाल है, यूक्रेन के राष्ट्रपति ने दावा किया है कि अभी तक की लड़ाई में रूस मारे गए सैनिकों और बर्बाद हुए हथियारों के मामले में चेचन्या के दोनों युद्धों से अधिक नुक़सान उठा चुका है.

हालांकि यूक्रेन के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना असंभव है.

वीडियो कैप्शन, यूक्रेन पर हमले के विरोध में रूस छोड़ रहे हैं लोग

लेकिन जहां तक शांति-समझौते का सवाल है, कोई भी ऐसे समझौते पर ख़ुशी-ख़ुशी हस्ताक्षर नहीं करता जो उसके अपने पतन का कारण बनने जा रहा हो.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपनी साख बचाते हुए युद्ध के समाधान के रास्ते खोज रहे हैं.

वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की एक कूटनीतिज्ञ और राजनयिक के तौर पर पहले ही अपने कोशल दिखा चुके हैं.

रूस को अपने देश से बाहर करने के लिए वो हर वो बात कहना और करना चाहते हैं जो उन्हें और उनके देश के लोगों को स्वीकार्य हो.

ज़ेलेंस्की के लिए इस समय एक ही मक़सद है- इन भीषण परिस्थितियों से यूक्रेन को स्वतंत्र और एकजुट देश के तौर पर बाहर निकालना, ना की रूस का कोई प्रांत बनना, जैसा कि पुतिन ने शुरूआत में सोचा था कि वो यूक्रेन को रूस का एक प्रांत बना लेंगे.

राष्ट्रपति पुतिन के लिए फिलहाल एक ही बात मायने रखती है कि वो यूक्रेन पर विजय की घोषणा कर सकें. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उनके प्रशासन का हर व्यक्ति ये समझ रहा है कि इस ग़ैर ज़रूरी आक्रामण में रूस की नाक टूट गई है.

इससे भी फ़र्क नहीं पड़ता है कि बीस प्रतिशत से अधिक रूसी नागरिक ये बात जानते समझते हैं कि पुतिन ने अपनी सपनों की दुनियां में, अपने घर को ही जुए में दांव पर लगा दिया था और वो ये जुआ हार गए हैं.

संघर्ष देश की बाकी आबादी का समर्थन बनाए रखना है जो टीवी पर दिख रही हर बात पर यक़ीन करती है, भले ही ऐसे पल भी आएं जब स्क्रीन पर बहादुर संपादक मारीना ओव्स्यानिकोवा ने पोस्टर दिखाते हुए कहा कि जो कुछ लोगों को बताया जा रहा है वो प्रोपागेंडा है.

रूस के सरकारी टीवी चैनल पर एक महिला संपादक ने युद्ध को लेकर विरोध दर्ज कराया

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इमेज कैप्शन, रूस के सरकारी टीवी चैनल पर एक महिला संपादक ने युद्ध को लेकर विरोध दर्ज कराया

सवाल ये है कि ऐसा क्या है जिससे पुतिन रूस की बहुसंख्यक आबादी को इस भीषण लड़ाई से एक विजेता के तौर पर बाहर निकलते हुए दिखाई दें.

सबसे पहले तो, एक लिखित भरोसा, हो सकता है यूक्रेन के संविधान में इसे शामिल किया जाए कि, यूक्रेन कभी भी निकट भविष्य में नेटो का सदस्य नहीं बनेगा. राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने पहले ही इसके लिए रास्ता तैयार कर लिया है.

उन्होंने पहले नेटो से यूक्रेन में नो फ्लाइ ज़ोन स्थापित करने के लिए कहा और फिर ऐसा न करने के लिए इस सैन्य गठबंधन की तीखी आलोचना की. बाद में उन्होंने ये भी कहा कि वो नहीं जानते थे कि नेटो इस तरह व्यवहार केरगा और ये संगठन सदस्य बनने के लायक है भी या नहीं.

अगर राजनीतिक नज़रिए से देखा जाए तो यूक्रेन के लिए इससे बेहतर स्थिति नहीं होगी. नेटो पर ज़िम्मेदारी डाल दी जाएगी और वो आसानी से इसे स्वीकार भी कर लेगा और उधर यूक्रेन को अपने रास्तेपर चलने की आज़ादी मिलेगी.

ये तो आसान हिस्सा था. मुश्किल ये है कि यूक्रेन और यूक्रेन के लोग यूरोपीय संघ का भी हिस्सा बनना चाहते हैं और रूस इसका भी इतना ही बड़ा विरोधी है जितना यूक्रेन के नेटो में शामिल होने का. हालांकि इस परिस्थिति से बाहर निकलने के भी रास्ते हैं.

यूक्रेन के लिए सबसे मुश्किल होगा अपनी ज़मीन पर रूस के क़ब्ज़े को स्वीकार करना जो रूस ने उस अंतरराष्ट्रीय समझौतों को धता बताते हुए किया है जो उसने यूक्रेन की सीमाओं की रक्षा के लिए किया था.

2014 में यूक्रेन ने क्रामिया को गंवा दिया था और हो सकता है कि यूक्रेन इस पर रूस के अधिकार को स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाए. रूस स्पष्ट रूप से पूर्वी यूक्रेन के उन इलाक़ों पर नियंत्रण बरक़रार रखना चाहेगा जो प्रभावी रूप से अभी उसके नियंत्रण में ही हैं. या हो सकता है इससे भी अधिक की चाह रूस रखे.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: रूस के 'भाड़े के सैनिक'

1939 में जोजेफ़ स्टालिन ने फ़िनलैंड पर आक्रमण किया था, जो कभी रूसी साम्राज्य का ही हिस्सा था. स्टालिन पूरा भरोसा था कि उनकी सेना को फ़िनलैंड पर नियंत्रण करने में समय नहीं लगेगा, ऐसा ही पुतिन ने 2022 में यूक्रेन के बारे में सोचा था. स्टालिन के जनरलों ने उन्हें भरोसा दिया था कि वो सही हैं. उन्हें अपनी जान का डर था, सच ये था कि स्टालिन सही नहीं थे.

सर्दियों में शुरू हुआ ये युद्ध 1940 तक खिंच गया, सोवियत सेनाओं की शर्मनाक हार हुई, फ़िनलैंड को एक महाशक्ति का सामना करने का राष्ट्रीय गौरव प्राप्त हुआ. फिनलैंड को कुछ ज़मीन गंवानी पड़ी क्योंकि स्टालिन और पुतिन जैसे निरंकुश शासकों को इस तरह के हालात से विजेता के रूप में बाहर निकलते हुए दिखना होता है.

लेकिन फिनलैंड ने सबसे अहम और सबसे अजेय चीज़ अपने पास रखी. वो थी फ़िनलैंड की आज़ादी. फ़िनलैंड एक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र राष्ट्र बना रहा.

जैसा की आज के हालात हैं, यूक्रेन ने रूस के कई आक्रमण नाकाम किए हैं और पुतिन की सेनाएं कमज़ोर और असंगठित नज़र आ रही हैं. ऐसे में लगता है कि यूक्रेन भी वो कर पाएगा जो फ़िनलैंड ने किया था.

जब तक पुतिन की सेनाएं राजधानी कीएव और यूक्रेन के अन्य बड़े इलाक़ों पर कब्ज़ा ना कर लें, यूक्रेन एक राष्ट्र के तौर पर स्वतंत्र बना रहेगा, जैसे की 1940 में फिनलैंड बना रहा था.

क्राइमिया और पूर्वी यूक्रेन के हिस्सों को गंवाना एक कड़वा, बड़ा और पूरी तरह से अन्यायपूर्ण नुक़सान होगा. लेकिन यदि पुतिन को ये युद्ध जीतना है तो उन्हें अब तक इस्तेमाल किए गए सभी हथियारों से ख़तरनाक हथियार इस्तेमाल करने होंगे.

युद्ध के तीसरे सप्ताह में हालात कुछ ऐसे हैं कि किसी को भी इस बात पर गंभरीता से शक नहीं होना चाहिए कि इस युद्ध में जीत किसकी होने जा रही है.

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