पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंध कैसे रहेंगे? अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग ने क्या बताया?

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"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पाकिस्तान की ओर से किसी भी तरह के वास्तविक या कथित उकसावे का भारत की ओर से जवाब दिए जाने की पहले की तुलना में अधिक संभावना है."
ये लिखा गया है अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग समुदाय की 31 पन्ने की उस रिपोर्ट में जिसमें दुनिया पर मंडराते ख़तरे का आकलन किया गया है. ये अमेरिका की सभी खुफ़िया विभागों के इनपुट पर आधारित वार्षिक रिपोर्ट है, जिसे अमेरिका के ऑफ़िस ऑफ़ डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस ने जारी किया है.
इसमें पाकिस्तान के साथ भारत के टकराव के ख़तरे को वैश्विक चिंता का विषय बताते हुए दुनिया भर के अहम मुद्दों में शुमार किया है.
इसमें लिखा गया है कि "भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का बना रहना ख़ास तौर पर चिंता का विषय है क्योंकि दोनों परमाणु हथियार सम्पन्न देश हैं और उकसावा चाहे कम ही क्यों न हो टकराव का ख़तरा बना रहता है."
रिपोर्ट में भारत के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के दौर में किसी भी उकसावे पर प्रतिक्रिया की अधिक संभावना भी जताई गई.
इसमें लिखा गया, "भारत विरोधी चरमपंथी समूहों को समर्थन देने का पाकिस्तान का एक लंबा इतिहास रहा है. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की ओर से कथित या वास्तविक उकसावे पर सैन्य प्रतिक्रिया की संभावना पहले की तुलना में अधिक है."
साथ ही यह भी बताया गया कि किसी सूरत में दोनों देश एक दूसरे से भिड़ सकते हैं.
रिपोर्ट में लिखा गया है कि, "महज़ बढ़ते तनाव की धारणा से ही दोनों देशों में टकराव का ख़तरा बढ़ जाता है, ये उकसावा कश्मीर में हिंसक अशांति या भारत में आतंकी हमले जैसी चीज़ें हो सकती हैं."

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भारत का चीन के साथ कैसा संबंध रहेगा?
इसी रिपोर्ट में ये भी लिखा गया कि भारत और चीन के बीच संबंध भी तनावपूर्ण बने रहेंगे.
ऑफ़िस ऑफ़ डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस (ओडीएनआई) का कहना है कि चीन के साथ भारत के संबंध 2020 में हुई हिंसक झड़प के मद्देनज़र तनावपूर्ण रहेंगे जो पिछले कुछ दशकों की अपनी सबसे गंभीर स्थिति में है.
रिपोर्ट में यह आकलन किया गया कि विवादित सीमा पर दोनों देशों की सेना की तैनाती इन दो परमाणु शक्तियों के बीच सशस्त्र टकराव के ख़तरे को बढ़ाती है, जो कि अमेरिका के लोगों और हितों के लिए ख़तरा हो सकता है और अमेरिकी दखल को न्योता दे सकता है.
इसके पहले के गतिरोधों ने यह दिखाया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर छोटी-छोटी झड़पों के धीरे-धीरे बड़ा होने समुचित गुंजाइश है.
इस रिपोर्ट का इशारा दो साल पहले लद्दाख के गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प की ओर था.
जून 2020 में दोनों मुल्कों की सेनाएं उस मुकाम पर पहुंच गईं जहां शांतिपूर्ण संबंध ख़त्म हो जाते हैं.
तब भारतीय सेना ने बताया था कि "गलवान घाटी में तनाव कम करने की प्रक्रिया के दौरान हिंसक झड़प हुई जिसमें दोनों ही पक्षों को नुक़सान उठाना पड़ा है. भारतीय पक्ष की ओर से एक अधिकारी और दो सैनिकों ने जान गंवाई है."
रूस-यूक्रेन और चीन-ताइवान पर क्या कहती है रिपोर्ट?
यह रिपोर्ट तब आई है जब रूस ने यूक्रेन की सीमा पर अपने सैनिक तैनात कर दिए थे. रिपोर्ट में रूस के बारे में बताया गया कि रूस आने वाले दशकों में एक प्रभावशाली शक्ति बना रहेगा. साथ ही वो अमेरिका के लिए बदलते भूराजनीतिक माहौल में एक चुनौती बना रहेगा.
इसमें लिखा गया है, "हमारा अनुमान है कि रूस, अमेरिकी सेना के साथ सीधा संघर्ष नहीं चाहता है. रूस ने यूक्रेनी सीमा पर अपने सैनिक तैनात कर रखे हैं. वहां और सेना भेजी जा रही है. दिसंबर 2021 के मध्य में, रूस ने एक बयान जारी कर नेटो से एक औपचारिक गारंटी मांगी थी कि जिसमें यूक्रेन को नेटो में नहीं शामिल करना भी शामिल था."
वहीं इस रिपोर्ट में लिखा गया कि चीन, ताइवान को 'चीन में मिलाने' की भरपूर कोशिश करेगा.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बार-बार कहते रहे हैं कि "ताइवान के साथ चीन का फिर से एकीकरण ज़रूर होगा."
"हम उम्मीद करते हैं कि यह दरार और बढ़ेगी क्योंकि चीन अपनी सैन्य गतिविधियों को इस द्वीप के आसपास करना जारी रखेगा. हालांकि, ताइवान के नेता चीन की तरफ़ से एकीकरण के प्रयासों को रोकने का पुरज़ोर प्रयास करेंगे."
ताइवान पर चीन के नियंत्रण से सेमीकंडक्टर चिप्स के वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा क्योंकि ताइवान का इसके उत्पादन पर वर्चस्व है.
ताइवान दक्षिण पूर्वी चीन के तट से क़रीब 100 मील दूर स्थित एक द्वीप है. चीन मानता है कि ताइवान उसका एक प्रांत है, जो अंतत: एक दिन फिर से चीन का हिस्सा बन जाएगा. वहीं, ताइवान ख़ुद को एक आज़ाद मुल्क मानता है. जहां उसका अपना संविधान है और लोगों की चुनी हुई सरकार का शासन है.
पश्चिम के जानकारों की नज़र में अगर ताइवान पर चीन का नियंत्रण हो जाता है तो वह पश्चिमी प्रशांत महासागर में अपना दबदबा दिखाने के लिए आज़ाद हो जाएगा. उसके बाद गुआम और हवाई द्वीपों पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने को भी ख़तरा हो सकता है. हालांकि चीन का दावा है कि उसके इरादे पूरी तरह से शांतिपूर्ण हैं.

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अल-क़ायदा पर रिपोर्ट में क्या लिखा है?
इसी रिपोर्ट में बताया गया कि चरमपंथी समूह अल-क़ायदा की अफ़ग़ानिस्तान में उपस्थित में कमी आई है और इसके एक्यूआईएस यानी भारतीय प्रायद्वीप में अल-क़ायदा भी कमज़ोर पड़ गया है.
हालांकि इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भले ही अल-क़ायदा ने अपने वैश्विक अभियानों पर रोक लगा दी है लेकिन यह अफ़ग़ानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाए रखने की पूरी कोशिश करेगा.
इसमें लिखा गया है कि अल-क़ायदा ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी की सराहना की है और इस समूह के तालिबान शासन के साथ अपने संबंध बनाए रखने की संभावना है.
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