फ़्रांस में धुर-दक्षिणपंथी राजनीति के उभार का क्या होगा यूरोप और दुनिया पर असर?

दक्षिणपंथी फ़्रांसीसी नेता मरीन ले पेन

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    • Author, कात्या एडलर
    • पदनाम, यूरोप एडिटर

पिछले सप्ताह फ़्रांस में संसदीय मतदान के पहले दौर के बाद, यूरोप में ख़बरों की सुर्ख़ियों से लेकर, ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ और सरकारी कार्यालयों में, देश में एक नए दक्षिणपंथी उदय की चर्चा व्यापक रूप से देखने को मिली.

फ़्रांस में मरीन ले पेन की पार्टी-नेशनल रैली ने शानदार प्रदर्शन किया है, हालांकि उन्हें बहुमत मिलता नहीं दिख रहा.

फ़्रांस की सेंट्रिस्ट और लेफ़्टिस्ट पार्टियों ने रविवार के निर्णायक दूसरे दौर से पहले, एक-दूसरे के दावेदारों को मज़बूत करने के लिए रणनीतिक रूप से अपने उम्मीदवारों को वापस ले लिया है.

जानकारों का मानना है कि फ़्रांसीसी चुनावों का पूरी दुनिया पर असर पड़ सकता है. फिर चाहे नेशनल रैली पार्टी को बहुमत मिले या नहीं. या फिर सोशल मीडिया और तकनीक-प्रेमी राष्ट्रपति जॉर्डन बार्डेला फ्रांस के नए प्रधानमंत्री बनें या नहीं.

मतदान के रुझानों के अनुमानों के मुताबिक, नेशनल रैली को किसी भी दूसरे राजनीतिक दल के मुकाबले ज़्यादा सीटें जीतने का अनुमान है. इसका मतलब है कि यूरोपीय संघ के प्रमुख देश फ़्रांस में दशकों से चली आ रही परंपरा टूट भी सकती है.

यूरोपीय संघ का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका झेलने के बाद हुआ था. इसे मूल रूप से एक 'पीस-प्रोजेक्ट' के रूप में डिजाइन किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध में, एक-दूसरे के दुश्मन फ़्रांस और जर्मनी की इसमें अहम भूमिका थी.

इसके बाद दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों को यूरोपीय राजनीति में हाशिए पर धकेल दिया गया. पिछले महीने, विश्व के नेताओं ने उत्तरी फ्रांस में डी-डे के 80 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मुलाकात की थी.

नॉरमैंडी में मित्र देशों के आक्रमण ने नाज़ी जर्मनी को हराने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन अब दक्षिणपंथी या लोक-लुभावन राष्ट्रवादी राजनीतिक दल, नीदरलैंड, इटली और फिनलैंड सहित यूरोपीय संघ के कई देशों में गठबंधन सरकारों का हिस्सा हैं.

दलों की पहचान करना भी है चुनौती

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हालांकि इन दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों की पहचान करने में भी चुनौतियां हैं. इन दलों की नीतियों में अक्सर बदलाव होता रहता है. इनकी नीतियां कई बार देशों के हिसाब से भी बदलती रहती हैं.

उन नीतियों का सामान्यीकरण भी नई बात नहीं है. पूर्व इतालवी प्रधानमंत्री और मध्य-दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ सिल्वियो बर्लुस्कोनी ऐसा करने वाले यूरोपीय संघ के पहले नेता थे.

वर्ष 1994 में, उन्होंने राजनीतिक समूह मोविमेंटो सोशल इटालियनो के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. छह साल बाद, ऑस्ट्रिया के रूढ़िवादियों ने दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के साथ गठबंधन किया था.

इस गठबंधन से यूरोपीय संघ इतना नाराज़ हुआ कि उसने कई महीनों तक ऑस्ट्रिया के साथ आधिकारिक द्विपक्षीय संपर्कों को तोड़ भी दिया था.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, राजनीतिक माहौल के हिसाब से मुख्यधारा की पार्टियों को चुनाव के समय एक अवरोधक के तौर पर काम करना पड़ता था, ताकि अतिवादी यूरोपीय पार्टियां सरकार ना बना सकें.

फ़्रांस में इस राजनीतिक प्रथा को 'कॉर्डन सैनिटेयर' के तौर पर जाना जाता है. यह प्रथा फ़्रांस के लोगों की प्रबल राजनीतिक भावनाओं को भी दर्शाती है.

बात साल 2002 के चुनाव की

साल 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में, कुछ फ़्रांसीसी मतदाताओं ने मतदान केंद्रों पर अपनी नाक पर कपड़े की पिन लगाई थी. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था ताकि वे उस उम्मीदवार को वोट दे सकें, जिसका वे पूरी तरह से समर्थन भी नहीं करते थे.

दरअसल ये मतदाता दक्षिणपंथी पार्टियों को जीतने से रोकना चाहते थे. मरीन ले पेन के पिता कई वर्षों तक दक्षिणपंथी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे. उनकी पार्टी में नाज़ी नेतृत्व वाली वेफेन एसएस इकाई के पूर्व फ़्रांसीसी सदस्य भी शामिल थे.

वर्ष 2024 में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए मरीन ले पेन की अपने पिता की पार्टी का नाम बदलकर, उसकी छवि को बेहतर करने की एक दशक की महत्वाकांक्षा काफ़ी हद तक सफल रही है.

फ़्रांस के मध्य दक्षिणपंथी- लेस रिपब्लिकेंस के नेताओं ने रविवार को कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करने के लिए नेशनल रैली पार्टी के साथ एक समझौता किया है.

इस समझौते के बाद दक्षिणपंथी दलों को राजनीति से दूर रखने का सुरक्षा घेरा भी टूट गया है. यह फ़्रांस में राजनीतिक भूचाल का भी एक संकेत है.

मरीन ले पेन के बारे में एक अहम बात ये है कि जो लोग उनका समर्थन करते हैं, वे अब इस बात को स्वीकार करते हुए शर्मिंदा नहीं होते. फ़्रांस में नेशनल रैली को अतिवादी विरोधी आंदोलन के तौर पर नहीं देखा जाता है.

कई लोगों के लिए यह पार्टी विश्वसनीय राजनीतिक दल के तौर पर सामने आई है, फिर चाहे इसके आलोचक कुछ भी दावा कर रहे हों.

धुर दक्षिणपंथियों बढ़ता भरोसा?

वोटिंग करते हुए फ़्रांसीसी नागरिक

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इमेज कैप्शन, मरीन ले पेन जैसे राजनेताओं को फ़्रांस में लोक-लुभावनवादी नेता माना जाता है.

फाइनेंशियल टाइम्स अख़बार के लिए इप्सोस पोल के मुताबिक़, "फ़्रांसीसी मतदाता अपनी अर्थव्यवस्था और पब्लिक फंड को मैनेज करने के लिए किसी भी पार्टी के मुक़ाबले नेशनल रैली पर ज़्यादा भरोसा करते हैं. वो भी तब, जब इस पार्टी के पास सरकार चलाने के लिए ज़रूरी अनुभव की कमी है.

हालांकि ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि अगर पारंपरिक राजनेताओं ने अपने मतदाताओं का बेहतर ख़्याल रखा होता, तो क्या उदारवादी हलकों में फैले आक्रोश और निराशा के बीच, यूरोप के लोक-लुभावन नेताओं के लिए अपनी पकड़ मज़बूत करने के अवसर कम होते?

मरीन ले पेन जैसे राजनेताओं को फ़्रांस में लोक-लुभावनवादी नेता माना जाता है. ये नेता आम लोगों की बात सुनने, उनकी ओर से बोलने और सरकार के ख़िलाफ़ उनका बचाव करने का दावा करते हैं.

यहां तक कि 'वे' और 'हम' का तर्क भी काफी कारगर सिद्ध हो रहा है. ख़ासतौर पर तब, जब मतदाता चिंतित महसूस करते हैं और सरकार उनको नज़रअंदाज़ करती है.

इसका उदाहरण अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, बीते गुरुवार को यूके चुनाव में लेबर पार्टी की अप्रत्याशित जीत और जर्मनी की विवादास्पद प्रवासी विरोधी एएफ़डी पार्टी की सफलताओं में देखा जा सकता है.

राष्ट्रपति मैक्रों के बारे में क्या सोचते हैं फ़्रांसीसी

फ्रांस में कई लोग राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक पूर्व मर्चेंट बैंकर, अभिमानी, विशेषाधिकार से घिरे और पेरिस के बाहर आम लोगों की चिंताओं से दूर रहने वाले नेता के तौर पर देखते हैं.

मैक्रों को लेकर यह भी विचार है कि वे एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए राष्ट्रीय पेंशन आयुसीमा बढ़ाकर और ईंधन की कीमतें बढ़ाने की कोशिश करके मुश्किल जीवन को और भी कठिन बना दिया है.

इसके अलावा मैक्रों के लिए यह भी चिंता की बात है कि बेरोज़गारी दर को कम करने में उनकी सफलता, कोविड महामारी और ऊर्जा संकट के आर्थिक प्रभावों को कम करने की कोशिश में ख़र्च अरबों यूरो को काफी हद तक भुला दिया गया है.

वहीं नेशनल रैली पार्टी ने अपने अभियान का ज़्यादातर हिस्सा, बढ़ती महंगाई पर केंद्रित किया है. पार्टी ने गैस और बिजली पर करों में कटौती करने और कम आय वालों के लिए न्यूनतम वेतन बढ़ाने का वादा किया है.

क्या कहते हैं नेशनल रैली पार्टी के समर्थक

फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों

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इस तरह की चुनावी घोषणाओं और प्राथमिकता के बाद नेशनल रैली पार्टी के समर्थकों का कहना है कि अब इसे धुर-दक्षिणपंथी पार्टी कहना सही नहीं है.

इसके पीछे वे पार्टी के पक्ष में बढ़ते जन समर्थन का दावा करते हैं और कहते हैं कि पार्टी को ले पेन जैसे वरिष्ठ नेता के नेतृत्व में, उसकी नस्लवादी जड़ों की वजह से कलंकित नहीं किया जाना चाहिए.

इटली में भी इसी तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं. इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी कभी फासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी की प्रशंसा करती थीं.

मेलोनी की ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी की जड़ें फासीवाद के बाद की हैं, लेकिन अब वे यूरोपीय संघ की सबसे स्थिर सरकारों में से एक की मुखिया हैं.

मेलोनी ने हाल ही में अपनी पार्टी के यूथ विंग के एक बैठक की निंदा भी की थी. उस बैठक में सदस्यों को फासीवादी सलामी देते हुए फ़िल्माया गया था.

मेलोनी ने कहा था कि उनकी पार्टी में 20वीं सदी के अधिनायकवादी शासनों की याद के लिए कोई भी जगह नहीं है. हालांकि आलोचकों ने इटली के मीडिया को प्रभावित करने के प्रयासों और एलजीबीटीक्यू के अधिकारों पर मेलोनी के रुख की आलोचना भी की है.

लेकिन प्रवासियों को लेकर मेलोनी की ठोस योजनाओं की तारीफ़ भी हुई है. उन्हें सराहने वालों में यूरोपियन यूनियन कमीशन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी शामिल हैं.

क्या होगा फ़्रांस और यूरोप में इसका असर

फ़्रांस इलेक्शन में वोट डालते नागरिक

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राह इतनी भी नहीं आसान

यूरोप में प्रवासियों के मुद्दे पर धुर-दक्षिणपंथी नेताओं की बयानबाज़ी और पारंपरिक मुख्यधारा के राजनेताओं के बयान के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है.

मुख्यधारा के नेता भी जान-बूझकर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश के तहत अपने भाषणों को आकार देते हैं. डेनमार्क के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क रूटे और खुद इमैनुएल मैक्रों भी ले पेन की लोकप्रियता के बाद ऐसा करने लगे हैं.

हालांकि एक मुश्किल यह भी है कि मुख्यधारा के नेता, प्रवासियों के मुद्दे पर दक्षिणपंथी दलों की नकल करते हुए, अनजाने में ही प्रवासियों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ रखने वाले दलों को ज़्यादा सम्मानित, स्वीकार्य और चुनाव जीतने की संभावना वाले दल बना रहे हैं.

नीदरलैंड के आम चुनावों में भी हाल ही में माइग्रेशन विरोधी नेता गीर्ट वाइल्डर्स का शानदार प्रदर्शन रहा है. उन पर नफ़रत फ़ैलाने वाले भाषण देने का आरोप अक्सर लगता रहा है.

ऐसे में यह ज़रूरत भी महसूस की जा रही है कि धुर-दक्षिणपंथी दल वाले ठप्पे पर भी बहस होनी चाहिए, क्योंकि हर पार्टी की बनावट भी अहम है.

लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस तरह से मेलोनी को स्वीकृति मिल रही है, वह ले पेन के लिए अभी भी दूर की कौड़ी ही है. नेशनल रैली पार्टी का दावा है कि बीते रविवार को उसे संसदीय बहुमत मिल गया है.

सर्वेक्षणों के मुताबिक, संसद में गतिरोध की संभावना है या फिर ले पेन विरोधी दल मिलकर गठबंधन सरकार बना सकते हैं.

अगर फ़्रांस में गठबंधन की सरकार बनती है तो ज़ाहिर है इससे मैक्रों की ताकत भी घटेगी. घरेलू स्तर पर राजनीतिक अस्थिरता का मतलब है कि फ्रांस और जर्मनी जैसी बड़ी यूरोपीय शक्तियां भी अनिश्चितता महसूस करेंगी.

ग़ज़ा और यूक्रेन में जारी जंग के बीच, अमेरिका में ट्रंप की दोबारा जीत की संभावना है. ऐसे में यूरोप के लिए बिना नेतृत्व के रहना अनिश्चितता भरा हो सकता है.

मतदाता भी ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और मरीन ले पेन के समर्थकों को लगता है कि उनका समय जल्द ही आ रहा है.

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