ब्रिटेन: ऋषि सुनक के जाने और किएर स्टार्मर के आने से भारत पर क्या असर होगा?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, लंदन
खेल की ज़ुबान में कहें तो अगर कोई टीम मैच से पहले ही हार मान लेती है, तो इससे समर्थकों का हौसला पूरी तरह टूट जाता है.
चार जुलाई को हुए आम चुनाव में ज़बर्दस्त शिकस्त खाने वाली ब्रिटेन की कंज़र्वेटिव पार्टी के करोड़ों समर्थकों के ऊपर ये बात बख़ूबी लागू होती है.
मतदान की तारीख़ आने से काफ़ी पहले ही कंज़र्वेटिव पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने जीत की उम्मीद का दामन छोड़ दिया था.
वो मतदाताओं से यही अपील कर रहे थे कि लेबर पार्टी को भारी बहुमत के साथ सत्ता की कमान न सौंपें.
कंज़र्वेटिव पार्टी के इन नेताओं का कहना था कि अगर उन्हें पर्याप्त सीटें मिलती हैं, तो वो एक असरदार विपक्ष की भूमिका निभाना चाहेंगे.
कंज़र्वेटिव पार्टी की हार के कारण क्या रहे?

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सबसे बड़ा सवाल यही है कि कंज़र्वेटिव पार्टी को पिछले कई दशकों की सबसे शर्मनाक पराजय का सामना क्यों करना पड़ा? जानकार इसके पीछे कई कारण बताते हैं.
मिडिलसेक्स यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई मामलों की जानकार डॉक्टर नीलम रैना कहती हैं कि, ‘कंज़र्वेटिव पार्टी की इतनी बड़ी हार के पीछे एक के बाद एक आए स्कैंडल रहे हैं, जिनकी वजह से लोकतंत्र को चोट पहुंची. इनसे राजनीति पर हमारे विश्वास को चोट पहुंची.’
लंदन स्थित थिंक टैंक चैटम हाउस में एशिया प्रशांत प्रोग्राम में दक्षिण एशियाई मामलों के रिसर्च फेलो डॉक्टर क्षितिज बाजपेयी मानते हैं कि टोरी या कंज़र्वेटिव पार्टी की शर्मनाक चुनावी शिकस्त की एक बड़ी वजह ये भी थी कि वो पिछले 14 बरस से सरकार चला रहे थे और जनता उनसे ऊब चुकी थी. वो कहते हैं, ''इस हार के पीछे एक के बाद एक की गईं ग़लतियां और घोटाले रहे.’'
इनमें से ज़्यादातार घोटालों पर से तो हाल के दिनों में ही पर्दा उठा था.
कुप्रबंधन के मामले

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कंज़र्वेटिव पार्टी की सरकार पर कोविड-19 महामारी से निपटने के तौर तरीक़े को लेकर भी सवाल उठे; उस वक़्त के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और उनकी सरकार के मंत्रियों ने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन किया.
विवाद बढ़ा तो, बोरिस जॉनसन की जगह एलिज़ाबेथ ट्रस को प्रधानमंत्री बनाया गया.
लेकिन, उनकी आर्थिक नीतियां इतनी ख़राब थीं कि लिज़ ट्रस केवल 40 दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकीं.
इसके बाद भारतीय मूल के पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने सत्ता संभाली.
सुनक की सरकार लोगों की आर्थिक तंगहाली, महंगाई और बेरोज़गारी जैसी चुनौतियों से जूझती रही. हाल ही में सट्टेबाज़ी का एक घोटाला भी सामने आया, जिसमें ऋषि सुनक के क़रीबी और उनकी सरकार के सदस्य भी शामिल थे.
डॉक्टर नीलम रैना कहती हैं कि बोरिस जॉनसन के उलट, लिज़ ट्रस और ऋषि सुनक दोनों को पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना था.

वीरेंद्र शर्मा कई बरस तक साउथॉल से लेबर पार्टी के सांसद रह चुके हैं. हालांकि, इस बार वो चुनाव नहीं लड़े. वीरेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘'मैं अपनी सीट किसी नौजवान नेता के लिए छोड़ना चाहता था.''
कंज़र्वेटिव पार्टी के कई नेताओं के साथ वीरेंद्र शर्मा की अच्छी दोस्ती है. हो सकता है कि इस चुनाव के नतीजों को लेकर शर्मा का आकलन पूरी तरह निरपेक्ष न हो. लेकिन, उनका मानना है कि टोरी पार्टी की अंदरूनी कलह और नेतृत्व में बार-बार किए जाने वाले बदलावों की वजह से उसका ये हाल हुआ है.
शर्मा कहते हैं, ''अगर आप बार बार जनरल ही बदलते रहेंगे तो फिर आप जंग कैसे जीतेंगे? पिछले कुछ सालों में ही चार प्रधानमंत्रियों ने कुर्सी संभाली. पार्टी के भीतर कोई एकता नहीं थी और अपने 14 बरस के राज में टोरियों ने अर्थव्यवस्था को बिगड़ते जाने दिया.''
कंज़र्वेटिव पार्टी के तमाम नेता दिल खोलकर किएर स्टार्मर की इस बात के लिए तारीफ़ कर रहे हैं कि उन्होंने लेबर पार्टी को पूरी तरह बदल दिया.
टोरी पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने बीबीसी के एक कार्यक्रम में माना कि अगर लेबर पार्टी की कमान अब भी जर्मी कोर्बिन के हाथ में होती, तो वो चुनाव हार जाती.
हालांकि उन्होंने कहा कि स्टार्मर ने लेबर पार्टी को पूरी तरह से बदल डाला. टोरी पार्टी के सांसद को कहते सुना गया कि, ‘2019 में आख़िर किसने ये कल्पना की थी कि लेबर पार्टी अगला चुनाव भारी बहुमत से जीत जाएगी.’
जब जर्मी कोर्बिन लेबर पार्टी के नेता थे, तो भारत उनसे बेहद नाख़ुश था.
भारत के साथ रिश्ते सुधारना स्टार्मर के लिए चुनौती

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जर्मी कोर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 2019 में अपने सालाना जलसे में एक प्रस्ताव पारित किया था. इस प्रस्ताव में घोषणा की गई थी कि कश्मीर में मानवीय संकट पैदा हो गया है.
प्रस्ताव में इस बात को भी बहुत ज़ोर दिया गया था कि कश्मीर को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए. भारत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.
तब लेबर पार्टी के नेता किएर स्टार्मर ने सफ़ाई दी थी कि कश्मीर, भारत और पाकिस्तान का आपसी मसला है. हालांकि, तब तक बात बिगड़ चुकी थी.
किएर स्टार्मर ने वादा किया है कि वो भारत के साथ रिश्ते सुधारेंगे. लेबर पार्टी के पूर्व सांसद वीरेंद्र शर्मा मानते हैं कि, ''स्टार्मर के राज में भारत और ब्रिटेन के संबंध ख़ूब फलेंगे फूलेंगे.''
पिछली संसद में लेबर पार्टी के छह सांसद भारतीय मूल के थे. इस बार ये तादाद दो गुना बढ़ जाएगी. स्टार्मर एक संतुलित और व्यवहारिक नेता हैं. वो सुनिश्चित करेंगे कि दोनों देशों के रिश्तों में सुधार हो.’
लेकिन, चैटम हाउस के क्षितिज वाजपेयी आगाह करते हैं कि भारत और ब्रिटेन के रिश्तों का आगे का सफ़र फिसलन भरा हो सकता है.
वाजपेयी का कहना है कि, “ऐसे कई मसले अभी दबे हुए हैं, जो लेबर पार्टी की सरकार के दौरान ब्रिटेन और भारत के रिश्तों में कड़वाहट की वजह बन सकते हैं. इसमें लेबर पार्टी का मूल्यों पर आधारित विदेश नीति पर चलने का झुकाव भी शामिल है.”
स्टार्मर की दुविधा

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“ऐसी नीति में मानव अधिकारों जैसे मसलों पर काफ़ी ज़ोर दिया जाता है; इसके अलावा उन्हें मतदाताओं के कई तबक़ों को ख़ुश करना होता है- ब्रिटेन में भारतीय मूल के लगभग 15 लाख लोग रहते हैं. वहीं, पाकिस्तानी मूल के भी लगभग 12 लाख लोग वहां बसते हैं; इसके अलावा ऐसे संगठन भी ब्रिटेन में सक्रिय हैं, जो भारत की संप्रभुता को चुनौती देते हैं; इन बातों के अलावा विश्व के व्यापक राजनीतिक और भू-राजनीतिक बदलावों का भी भारत और ब्रिटेन के रिश्तों पर उल्टा असर हो सकता है.”
डॉक्टर नीलम रैना को उम्मीद है कि अगर नई सरकार में डेविड लैमी को विदेश मंत्री बनाया जाता है, तो भारत और ब्रिटेन के संबंध काफ़ी बेहतर होंगे. डॉक्टर रैना कहती हैं कि, “डेविड लैमी को दक्षिणी एशियाई मामलों की अच्छी समझ है. लेकिन, हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की मौजूदा सरकार एक गठबंधन सरकार है. इससे एक संतुलन बनता है, जो भारत और ब्रिटेन के रिश्तों को आगे ले जाने के लिए बहुत अहम हो जाता है.”
डॉक्टर क्षितिज वाजपेयी मानते हैं कि किएर स्टार्मर सरकार के राज में ये अपेक्षा की जा सकती है कि, “भारत और ब्रिटेन के संबंधों में उच्च स्तर की निरंतरता देखने को मिलेगी.”
किएर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने भारत के साथ अपने संबंध नए सिरे से स्थापित करने के लिए काफ़ी प्रयास किए हैं. जब जर्मी कोर्बिन, लेबर पार्टी के नेता थे तब भारत के साथ उनके रिश्ते बहुत ख़राब हो गए थे. स्टार्मर और उनकी पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि वो भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहते हैं.
मुक्त व्यापार समझौता: कोई तय समय-सीमा नहीं

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अगर लेबर पार्टी की सरकार भारत के साथ रिश्ते सुधारने को अपने एजेंडे का हिस्सा बनाती है, तो किएर स्टार्मर के लिए भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तख़त करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी.
डॉक्टर क्षितिज वाजपेयी कहते हैं, “संभावित विदेश मंत्री डेविड लैमी ने संकेत दिया है कि वो जल्दी से जल्दी मुक्त व्यापार समझौते को पूरा करना चाहते हैं और इसके लिए वो जुलाई का महीना ख़त्म होने से पहले ही भारत के दौरे पर जाएंगे. ख़बरों के मुताबिक़ 26 बिंदुओं में से ज़्यादातर पर दोनों देशों में सहमति बन चुकी है.”
जब ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हुआ था (ब्रेग्ज़िट), तब दावा किया गया था कि इससे प्रवासियों की तादाद में काफ़ी कमी आएगी. लेकिन, ब्रेग्ज़िट के बाद से आज की तारीख़ में ब्रिटेन में प्रवासियों की आबादी सबसे ज़्यादा हो चुकी है.
भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तख़त की राह में एक बड़ा रोड़ा ब्रिटेन आकर बसने वाले भारतीय कामगारों को वर्क परमिट जारी करने का है. लेबर पार्टी का घोषित लक्ष्य ये है कि वो वैध प्रवासियों की संख्या को कम करेगी और अवैध प्रवासियों को ब्रिटेन में दाख़िल होने से रोकेगी.
ब्रिटेन में रह रहे बहुत से वैध भारतीय प्रवासी आईटी सेक्टर में काम करने वाले पेशेवर हैं. वो वर्क परमिट पर ब्रिटेन में रह रहे हैं और ब्रिटेन के तकनीकी क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है. वैसे ब्रिटेन में कुछ अवैध भारतीय प्रवासी भी रहते हैं. इनकी संख्या बहुत कम है.
लेबर पार्टी की नीति में हुनरमंद प्रवासियों के कौशल का आर्थिक लाभ लेने के साथ-साथ प्रवासियों की कुल संख्या में कमी लाने के बीच संतुलन बनाने का है. ये पार्टी की व्यापाक राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है.
मानवधिकार पर रुख़

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ब्रिटेन में रह रहे 6.85 लाख प्रवासियों में सबसे ज़्यादा संख्या भारतीय मूल के लोगों की है.
अपने नेशनल हेल्थ सिस्टम और आईटी सेक्टर को दुरुस्त करने के लिए ब्रिटेन को और हुनरमंद के साथ पेशेवर लोगों की दरकार है. इसके साथ-साथ उसकी ख़्वाहिश ये भी है कि ये हुनरमंद लोग सिर्फ़ भारत के न हों, दूसरे देशों से भी आएं.
लेबर पार्टी पारंपरिक रूप से विचारधारा पर आधारित विदेश नीति पर चलती रही है. मानव अधिकारों के रिकॉर्ड लेकर लेबर पार्टी अक्सर भारत और दूसरे देशों की आलोचना करती रही है.
भारत की सरकार ने इसे कभी नहीं पसंद किया है. अगर किएर स्टार्मर, भारत के साथ अच्छे रिश्ते क़ायम करना चाहते हैं, तो फिर उनको भारत सरकार को ये यक़ीन दिलाना होगा कि वो ज़्यादा व्यवहारिक विदेश नीति पर चलेंगे.
पिछली संसद में लेबर पार्टी के 15 सांसद पाकिस्तानी मूल के थे जबकि भारतीय मूल के केवल 6 सांसद थे. ज़ाहिर है कि लेबर पार्टी की सरकार पर पाकिस्तानी मूल के लोगों का दबाव होगा.
अब ये देखना होगा कि ब्रिटेन की नई सरकार इन दोनों के बीच किस तरह संतुलन बनाती है.
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