कश्मीर, ख़ालिस्तान और भारत के साथ व्यापार पर क्या राय रखते हैं ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री?

किएर स्टार्मर

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ब्रितानी संसद के लिए हुए चुनावों के नतीजे शुक्रवार को आ गए. इनमें लेबर पार्टी ने बीते 14 सालों से सत्ता में काबिज़ कंज़र्वेटिव पार्टी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

चुनावों में 650 सीटों वाली ब्रिटेन की संसद में लेबर पार्टी ने 412 सीटें जीती हैं और पार्टी के नेता किएर स्टार्मर अब देश के नए प्रधानमंत्री बन गए हैं.

लेबर पार्टी के ब्रिटेन की सत्ता में आने के बाद आने वाले वक़्त में भारत के साथ उसके रिश्तों को लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं क्योंकि कश्मीर, कश्मीर में मानवाधिकार, ख़ालिस्तान जैसे कई मुद्दों पर लेबर पार्टी और कंज़र्वेटिव पार्टी की राय अलग-अलग रही है.

स्टार्मर के पीएम पद संभालने के बाद भारतीय मूल के ऋषि सुनक को पीएम पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा है.

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सुनक सरकार के साथ मुक्त व्यापार समझौते को लेकर भारत की अभी बातचीत चल ही रही थी, वहीं कश्मीर मुद्दे पर भी उन्होंने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया था.

ब्रितानी संसद में पाकिस्तानी मूल के लेबर पार्टी के नेता ये मुद्दा पहले भी उठाते रहे हैं और ऋषि सुनक सरकार से उनकी पोज़िशन स्पष्ट करने को कहते रहे हैं.

लेकिन सुनक इन सवालों पर ये स्पष्ट कर चुके हैं कि कश्मीर द्विपक्षीय मुद्दा है और इस मामले में उनका हस्तक्षेप सही नहीं है.

ढाई दशक पहले से रहा है रिश्तों में तनाव

लेकिन भारत के साथ रिश्तों और मुद्दों पर लेबर पार्टी की पोज़िशन कुछ वक़्त पहले तक अलग रही है. इसका एक उदाहरण साल 1997 में नज़र आया था जब भारत अपनी आज़ादी की 50वीं सालगिरह मना रहा था.

उस वक़्त महारानी एलिज़ाबेथ और प्रिंस फ़िलिप के भारत आने का कार्यक्रम तय किया गया था. ब्रिटेन में उस वक़्त टोनी ब्लेयर के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी की सरकार थी.

उस वक़्त भारत पहुंचने से पहले महारानी एलिज़ाबेथ पाकिस्तान में उतरीं और वहां कश्मीर मुद्दे पर बयान दिया. उन्होंने कहा कि दोनों मुल्कों को आपसी बातचीत से ये मुद्दा सुलझाना चाहिए. उनसे साथ आए विदेश मंत्री रॉबिन कुक ने मध्यस्थता का प्रस्ताव तक दे दिया.

भारत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि "लगता है कि ब्रिटेन अपने साम्राज्यवादी इतिहास को भूल नहीं पाया है."

बाद में टोनी ब्लेयर ने आश्वासन दिया कि "कश्मीर पर ब्रिटेन की नीति का सार यही है कि ये मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के ज़रिए हल किया जाना चाहिए."

कश्मीर मुद्दे पर लेबर पार्टी का रुख़

जेरेमी कॉर्बिन
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11 अगस्त 2019 मे लेबर पार्टी के प्रमुख रहे जेरेमी कॉर्बिन ने एक ट्वीट कर कहा कि कश्मीर में स्थिति 'परेशान करने वाली है.'

उन्होंने भारत से अपील की कि यहां हो रहा मानवाधिकार उल्लंघन ख़त्म हो और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत मामले का समाधान खोजा जाए.

उनका ये ट्वीट भारत के जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के फ़ैसले के बाद आया था. भारत ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया था.

कॉर्बिन का ट्वीट कश्मीर मुद्दे पर लेबर पार्टी के रुख़ के अनुसार ही था जिसके अनुसार जम्मू कश्मीर मुद्दे का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत हो सकता है.

इसके बाद क़रीब 100 भारतीय मूल के ब्रितानी लोगों ने जेरेमी कॉर्बिन को पत्र लिखा और इस पर आपत्ति जताई.

इसके बाद 25 सितंबर को लेबर पार्टी का सालाना सम्मेलन हुआ जिसमें एक इमरजेंसी प्रस्ताव पास किया गया.

इसमें कहा गया कि "कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है." साथ ही मांग की गई कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को "कश्मीर जाने की इजाज़त" दी जाए साथ ही वहां के लोगों को खुद के लिए फ़ैसला लेने का अधिकार दिया जाए.

पार्टी के सालाना सम्मेलन में ये प्रस्ताव पारित तो हो गया लेकिन मामला यहीं से हाथ से फिसलने लगा. लेबर पार्टी के प्रस्ताव को लेकर भारतीय मूल के ब्रितानी नागरिकों ने पार्टी के विरोध में आवाज़ उठानी शुरू की.

उन्होंने कॉर्बिन को पत्र लिखा और कहा कि लेबर पार्टी का रुख़ भारत विरोधी है जिससे वो नाराज़ हैं.

कश्मीर मुद्दे पर लेबर पार्टी ने लिया यू-टर्न

लेबर पार्टी के चेयरमैन इयान लेवरी

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इमेज कैप्शन, लेबर पार्टी के चेयरमैन इयान लेवरी

बढ़ते विरोध को लेकर लेबर पार्टी में चिंता बढ़ने लगी क्योंकि पार्टी के समर्थकों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग शामिल हैं.

लेबर पार्टी के चेयरमैन इयान लेवरी ने भारतीय मूल के नागरिकों को पत्र लिखकर कहा कि "लेबर पार्टी किसी भी देश के राजनीतिक मामलों में बाहरी मुल्क के हस्तक्षेप का विरोध करती है."

उन्होंने लिखा, "हम मानते हैं कि अपने भविष्य को लेकर कश्मीर के लोगों के अपने अधिकार हैं, लेकिन कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे भारत और पाकिस्तान को मिलकर हल करना चाहिए."

उन्होंने ये स्पष्ट किया, "कश्मीर के मसले पर लेबर पार्टी न तो भारत का और न ही पाकिस्तान का समर्थन करती है."

हालांकि माना जाता है कि 2019 की घटना के बाद से लेबर पार्टी को 'भारत विरोधी' के रूप में देखा जाने लगा.

जेरेमी कॉर्बिन के नेतृत्व में पारित हुए कश्मीर प्रस्ताव के कारण लेबर पार्टी को वहां रहने वाले भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोगों का उतना समर्थन नहीं मिल पाया और पार्टी को चुनावों में 59 सीटों का नुक़सान उठाना पड़ा.

2019 के चुनाव में कंज़र्वेटिव पार्टी को 365 सीटें मिली थीं जबकि लेबर पार्टी के खाते में 203 सीटें आईं. कंज़र्वेटिव को 47 सीटों का फायदा हुआ था.

इसके कुछ महीने बाद 30 अप्रैल 2020 को किएर स्टार्मर ने लेबर फ्रैंड्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के लोगों से मुलाक़ात की.

इसके बाद उन्होंने कहा, "भारत से जुड़े सभी संवैधानिक मामले, भारतीय संसद का मसला हैं और कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे भारत और पाकिस्तान को मिलकर शांतिपूर्वक तरीके से हल करना चाहिए. लेबर पार्टी एक इंटरनेशनलिस्ट पार्टी है और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा खड़ी है."

उन्होंने इस दौरान कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो भारत के साथ और भी मज़बूत व्यापारिक रिश्ते बनाएंगे और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर वैश्विक मंच पर साथ मिलकर काम करेंगे.

लेकिन उनके इस बयान पर विवाद थमा नहीं. मुस्लिम काउंसिल ऑफ़ ब्रिटेन ने उनके इस बयान के बारे में उनसे स्पष्टीकरण मांगा.

जवाब में किएर स्टार्मर ने लिखा, "कश्मीर पर हमारा रुख़ नहीं बदला है. हम कश्मीरी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के पिछले प्रस्तावों का समर्थन करते हैं और उन्हें मान्यता देते हैं. लेकिन हम कहना चाहते हैं कि इस संघर्ष के अंत के लिए स्थायी समाधान तभी मिल सकेगा जब भारत और पाकिस्तान और कश्मीर के लोग साथ मिलकर काम कर सकें."

यूके, लेबर और ख़ालिस्तान मुद्दा

लंदन में विरोध प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने विरोध प्रदर्शन

ब्रिटेन में ख़ालिस्तान का मुद्दा उस वक़्त सामने आया जब बीते साल मार्च में लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह ने प्रदर्शन किया. इनमें ब्रिटेन के सिख समुदाय के कई लोग शामिल थे.

इनमें से कई लोगों के हाथ में ख़ालिस्तान के समर्थन में झंडे थे, कई लोग 'वारिस पंजाब दे' संगठन के प्रमुख और ख़ालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह के ख़िलाफ़ हो रही कार्रवाई को रोकने की मांग कर रहे थे.

लेबर पार्टी के कुछ नेताओं पर ख़ालिस्तान का समर्थन करने का भी आरोप लगाया जाता रहा है.

बर्मिन्घम एजबैस्टन से जीतकर संसद पहुंची प्रीत कौर गिल को ख़ालिस्तान समर्थक माना जाता है. इस साल मार्च में आम आदमी पार्टी नेता राघव चड्ढा के साथ उनकी तस्वीर सामने आई थी जिसे बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट किया.

उन्होंने लिखा, "राघव चड्ढा प्रीत कौर गिल के साथ क्या कर रहे हैं, जो खुलेआम 'के' के अलगाववाद की वकालत करती हैं, ब्रिटेन में 'के' के लिए धन जुटाती हैं, लंदन में इंडिया हाउस के बाहर हिंसक विरोध प्रदर्शनों को फंड करती हैं, अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लगातार भारत विरोधी, मोदी विरोधी, हिंदू विरोधी सामग्री पोस्ट करती हैं? "

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प्रीत कौर गिल ने इससे पहले इसी साल फरवरी में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आरोप लगाया था कि भारत के साथ नाता रखने वाले एजेंट यूके में सिखों को निशाना बना रहे हैं. उन्होंने इस पर रक्षा मंत्री से जवाब देने को कहा था.

इससे पहले उन्होंने ब्रितानी नागरिक जगतार सिंह जोहाल (जग्गी जोहाल) की रिहाई की मांग की थी. हत्याओं में शामिल होने के आरोप में जोहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं.

लेबर पार्टी की एक और काउंसिलर परबिन्दर कौर ने ख़ालिस्तान का समर्थन कर रहे बब्बर खालसा को सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी थी जिसके लिए पार्टी ने उनके ख़िलाफ़ जांच शुरू की थी.

बब्बर खालसा को 1985 में एयर इंडिया के एक विमान को बम से उड़ाने के लिए जाना जाता है जिसमें 329 लोगों की मौत हुई थी.

इससे पहले 2022 में उन्होंने दिलावर सिंह बब्बर नाम के एक पुलिस अधिकारी को शहीद कहा था. दिलावर ने आत्मघाती हमले में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की थी.

वहीं स्लॉ से लेबर सांसद तनमनजीत सिंह ढेसी ने भी जम्मू कश्मीर से 370 हटाए जाने के भारत सरकार के फ़ैसले को ग़लत बताया था.

11 अगस्त 2019 के जेरेमी क़र्बिन के ट्वीट को उन्होंने री-ट्वीट किया था. वो कई बार ब्रितानी संसद में भारत में मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाते रहे हैं.

चुनावों से पहले कट्टर विचारधारा से किनारा

किएर स्टार्मर

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इमेज कैप्शन, चुनाव अभियान के दौरान किएर स्टार्मर

मामला इतना ही है ऐसा नहीं है. 2019 में चुनावों में मिली हार के बाद लेबर पार्टी पहले ही अपनी बिगड़ती छवि को लेकर चिंतित थी.

2021 में बाइ-इलेक्शन के दौरान उत्तरी इंग्लैंड में एक पर्चे का इस्तेमाल किया गया जिसमें पूर्व पीएम बोरिस जॉनसन भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी से हाथ मिला रहे हैं. पर्चे में लिखा था "ऐसे टोरी नेता का भरोसा न करें जो आपके पक्ष में न हो."

इसका ज़बर्दस्त विरोध हुआ. कंज़र्वेटिव पार्टी के एक नेता रिचर्ड होल्डन ने सवाल किया कि "क्या इसका मतलब है कि किएर स्टार्मर कभी भी भारतीय पीएम के साथ हाथ मिलाते नहीं दिखेंगे."

इन सभी घटनाओं के बाद लेबर पार्टी ने 2024 में होने वाले अगले चुनावों से पहले अपनी छवि पर काम करने पर अधिक ध्यान दिया. और इस साल चुनाव होने से ठीक पहले लेबर पार्टी ने कहा कि वो पार्टी के भीतर भारत विरोधी भावना को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध है और पार्टी भारत के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध बनाएगी.

चुनावों से पहले ब्रिटेन के लंदन में साउथ एशियन कम्युनिटी के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए लेबर पार्टी की चेयर एनिलीज़ डॉड्स ने दावा किया था कि "किएर स्टार्मर के नेतृत्व में पार्टी को भरोसा है कि पार्टी के सभी सदस्य अब कट्टर विचारधारा से दूर हैं."

उन्होंने कहा कि "अगर इस बारे में (भारत विरोधी भावना के बारे में) कोई सबूत मिलते हैं, चाहे वह किसी भी समूह के लोग हों, मैं इस बारे में कुछ न कुछ करूंगी."

उन्होंने प्रवासी समुदाय से अपील की कि वो किसी भी पार्टी नेता के बारे में उन्हें जानकारी दे सकते हैं जो उनकी राय में भविष्य में लेबर पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भारत और ब्रिटेन के क़रीबी संबंधों के लिए ख़तरा पैदा कर सकता हो.

आने वाले वक़्त में कैसे होंगे भारत और ब्रिटेन के रिश्ते?

वीडियो कैप्शन, पीएम मोदी के लिए कैसा होगा नई ब्रिटिश सरकार का रुख़?

रुचि घनश्याम नवंबर 2018 से जून 2020 तक ब्रिटेन में भारत की उच्चायुक्त थीं. उन्होंने बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद को बताया, "उस वक़्त (5 अगस्त 2019 के बाद) ब्रिटेन में विरोध प्रदर्शन हुए. भारत के विरोध में लंदन ही नहीं दुनिया के कुछ और देशों में भारत विरोधी प्रदर्शन हुए थे. इनमें लेबर पार्टी के समर्थक शामिल थे."

"लेकिन अब लेबर पार्टी खुद कह रही है कि वो अब पहले वाली पार्टी नहीं है, हम देख सकते हैं कि ये एक मध्यमार्गी लेबर पार्टी है जिसमें कट्टर विचार अब नहीं हैं."

वो कहती हैं, "किएर स्टार्मर ने चुनाव अभियान के वक्त ये स्पष्ट कहा है कि वो भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं और मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत आगे बढ़ाना चाहते हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि आने वाले वक्त में भारत और ब्रिटेन के रिश्तों में फर्क आना चाहिए."

"अगर फर्क आएगा तो ये कि ये सरकार स्पष्ट बहुमत के साथ है, इसलिए ब्रेग्ज़िट और कोविड जैसे मुद्दों पर यूके के भीतर ही मतभेद थे, अब वो नहीं होगा."

"रही मुक्त व्यापार समझौते की बात तो, दोनों की तरफ से इसे लेकर फिलहाल सकारात्मक रवैया रहा है और उम्मीद है कि ये आगे भी ऐसे ही बरकरार रहेगा. जैसा मुझे दिखता है ये आगे देखने वाली सरकार है, तो भारत के साथ और मुद्दों पर भी बात आगे बढ़ सकती है."

लेबर पार्टी के मेनिफ़ेस्टो में भारत को लेकर क्या है?

लेबर पार्टी का मेनिफ़ेस्टो
इमेज कैप्शन, लेबर पार्टी के मेनिफ़ेस्टो का पहला पन्ना

142 पन्ने के अपने मेनिफ़ेस्टो में लेबर पार्टी ने लिखा है कि, "पार्टी अपने सहयोगियों और क्षेत्रीय ताकतों के साथ आधुनिक साझेदारियां बनाएगी और उन्हें मज़बूत करेगी."

भारत का ज़िक्र 126 नंबर पन्ने पर है. इसमें लिखा गया है, "हम भारत के साथ एक नई रणनीतिक साझेदारी बनाना चाहते हैं, जिसमें मुक्त व्यापार समझौते के साथ-साथ सुरक्षा, शिक्षा, तकनीक और जलवायु परिवर्तन जैसे सेक्टर में सहयोग को गहरा करना शामिल होगा."

"हम रीजनल सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और निवेश के मामलों में खाड़ी भर के सहयोगियों के साथ अपने सहयोग को मज़बूत करेंगे."

मेनिफे़स्टो में पाकिस्तान का ज़िक्र उस हिस्से में है जहां जलवायु परिवर्तन की बात की गई है. इसमें लिखा गया है, "हम अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों, ख़ासकर जलवायु परिवर्तन का असर झेल रहे सहयोगियों के साथ मिलकर तेज़ी से आगे बढ़ेंगे, जिनमें पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल हैं."

वहीं चीन के बारे में इसमें लिखा गया है कि बीते 14 सालों में कंज़र्वेटिव्स की असंगति के कारण चीन के साथ रिश्तों पर असर पड़ा है. लेबर पार्टी रिश्तों को मैनेज करने के लिए एक दीर्घकालिक और रणनीतिक नज़रिया लाएगी.

मेनिफ़ेस्टो में लिखा है, "हम जहां संभव होगा वहां सहयोग करेंगे, जहां ज़रूरत होगी वहां कॉम्प्टीशन करेंगे और जहां चुनौती देनी होगी वहां चुनौती देंगे."

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