पीएम मोदी की रूस यात्रा, राष्ट्रपति पुतिन के साथ मीटिंग में क्या रहेगा एजेंडा

2021 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर आए थे.

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इमेज कैप्शन, 2021 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर आए थे.
    • Author, उपासना भट्ट
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉस्को के दौरे पर जा रहे हैं. वो 8-9 जुलाई को रूस में रहेंगे.

फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था उसके बाद से यह उनकी पहली रूसी यात्रा है.

साथ ही लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा है.

पश्चिम देशों के दबाव के बावजूद यूक्रेन हमले को लेकर भारत ने अपने पुराने सहयोगी रूस की खुलकर आलोचना नहीं की है. हालांकि संघर्ष को ख़त्म करने का लगातार आह्वान किया.

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भारतीय मीडिया और टिप्पणीकार ज़ोर देते हैं कि इस दौरे का मक़सद, मॉस्को और बीजिंग के बीच बढ़ती क़रीबी के बीच रूस के साथ दिल्ली के रिश्ते की अहमियत को दिखाना और पश्चिम के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश करना है.

रूसी अख़बारों ने कहा है कि यह दौरा दिखाता है कि भारत ने "मॉस्को को अलग थलग करने की पश्चिमी कोशिशों" को नकार दिया है.

कितना अहम है ये दौरा

मोदी और पुतिन

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लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहली द्विपक्षीय यात्रा है. पिछले महीने ही जी7 शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में हिस्सा लेने वो इटली गए थे.

अपने पहले के दोनों कार्यकाल में मोदी ने चुनाव में जीत के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए पड़ोसी देशों को चुना था, लेकिन यह दौरा मौजूदा भूराजनीतिक वास्तविकताओं का प्रतिबिम्ब है.

मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया है कि दोनों देशों के बीच शिखर सम्मेलन 2021 से ही आयोजित नहीं हुआ है.

सितम्बर 2022 में उज़्बेकिस्तान में हुए शांघाई कोऑपरेशन आर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी ने दुनिया में "कूटनीति और संवाद" की अहमियत पर ज़ोर देते हुए पुतिन से कहा था कि "यह युद्ध का युग नहीं है."

भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत-रूस के रिश्ते को "अटूट दोस्ती" बताया था.

जब से यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ है, भारत मॉस्को के साथ अपने रिश्ते को लेकर पश्चिमी दबाव के आगे झुका नहीं है और घरेलू हितों का हवाला देते हुए रियायती दरों पर रूस से तेल ख़रीद रहा है.

मोदी ने पिछली बार 2019 में व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फ़ोरम में हिस्सा लेने के लिए रूस का दौरा किया था.

एजेंडे में क्या है?

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दो जुलाई को क्रेमलिन ने कहा था कि "दौरे की तैयारियां अपने अंतिम चरण" में हैं, जबकि 28 जून को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ज़िक्र किया था कि "अगले द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन की तैयारियां चल रही हैं."

क्रेमलिन प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने इस दौरे को "बहुत अहम" बताया है और कहा है कि दोनों नेता क्षेत्रीय, वैश्विक सुरक्षा, द्विपक्षीय संबंध और व्यापार पर चर्चा करेंगे.

मीडिया में भारत सरकार के सूत्रों के हवाले से कहा गया कि बातचीत में डिफ़ेंस, तेल और गैस प्रमुख एजेंडा होंगे.

न्यूज़ रिपोर्टों के अनुसार, दशकों तक, भारत रक्षा उपकरणों के लिए रूस पर बहुत अधिक निर्भर रहा है और वो नहीं चाहेगा कि रूस चीन की ओर अधिक झुके.

प्रभावशाली अख़बार 'द हिंदू' ने लिखा कि यूक्रेन युद्ध, व्यापार, रूस पर प्रतिबंधों के चलते भुगतान के मुद्दे को हल करने, रक्षा हार्डवेयर की आपूर्ति, प्रस्तावित चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मैरिटाइम कॉरिडोर में निवेश और प्रमुख मिलिटरी लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट पर बातचीत होने की उम्मीद है.

यूक्रेन युद्ध में रूस की ओर से लड़ रहे भारतीयों का संवेदनशील मुद्दा भी इस बातचीत में शामिल होने की संभावना है.

भारत ने रूसी सेना में इस तरह की भर्तियों को रोकने की लगातार मांग की है. उसका कहना है कि "इस तरह की गतिविधियां हमारी साझेदारी के अनुरूप नहीं होंगी."

भारतीय मीडिया में क्या कहा जा रहा है?

पुतिन और शी जिनपिंग

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भारतीय मीडिया और विश्लेषक कहते हैं कि मोदी का रूस दौरा मॉस्को के बीजिंग की ओर आ रहे झुकाव को संतुलित करना है.

रूस में भारत के पूर्व राजदूत रहे वेंकटेश वर्मा ने द हिंदू से कहा, "कोविड के कारण और अंतरारष्ट्रीय परिस्थितियों में तेज़ी से आ रहे बदलाव के बीच बाधित नियमित शिखर सम्मेलन में अब ये ज़रूरी हो गया था कि दोनों पक्ष आपसी संबंधों में गिरावट की अंतरराष्ट्रीय जगत की धारणा को ग़लत साबित करें. हालांकि दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक साझेदारी को फिर से रिचार्ज करना भी ज़रूरी था."

तीन जुलाई को फ़र्स्टपोस्ट वेबसाइट के एक लेख में कहा गया, "रूस और अमेरिका के बीच बिगड़ते संबंध और मॉस्को की चीन के प्रति बढ़ती निर्भरता के दौर में मोदी के दौरे की टाइमिंग महत्वपूर्ण है."

हिंदी अख़बार नवभारत टाइम्स में 30 जून को छपे एक लेख में कहा गया कि मोदी जानते हैं कि पश्चिम इस दौरे को क़रीब से देख रहा है, इसलिए उन्होंने "संतुलन साधने के लिए इस दौरे को एक दिन तक के लिए सीमित कर दिया है."

इसमें आगे कहा गया है, "इस दौरे का सबक है कि भारत अभी भी मध्य मार्ग अपनाने के लिए तैयार है और किसी के दबाव में या किसी एक कैंप में शामिल नहीं होने वाला. भारत ने स्पष्ट किया है कि वो वॉशिंगटन और मॉस्को दोनों से बात करेगा."

रूसी मीडिया में क्या है चर्चा?

रूसी मीडिया

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रूसी अख़बारों ने कहा कि अपने तीसरे कार्यकाल में पहले द्विपक्षीय दौरे के लिए मॉस्को को चुनना भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" को दिखाता है.

एक निजी अख़बार नेवाविसिमाया गैज़ेटा ने कहा, "रूस को अलग थलग करने की पश्चिमी कोशिशों को भारत ने ख़ारिज कर दिया है."

इसमें राजनीतिक विश्लेषक एलेक्सेई कुप्रियानोव के हवाले से कहा गया कि रूस और भारत के बीच व्यापारिक असहमतियां हैं, लेकिन उनके बीच कोई राजनीतिक विवाद नहीं है.

कुप्रियानोव ने आगामी दौरे को 'बड़ी सफलता' क़रार दिया.

वेदोमोस्ती बिज़नेस डेली ने लिखा कि यूक्रेन युद्ध भारत के लिए हानिकारक है और इस पर बात होने की संभावना है. लेकिन इसमें अनुमान लगाया गया है कि दोनों नेताओं के बीच सैन्य-तकनीकी सहयोग, भारत को होने वाले रूसी हाइड्रोकार्बन की आपूर्ति और "वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं में सुधार" पर ख़ास बातचीत होगी.

एक अन्य प्रभावशाली बिज़नेस डेली कोमेरसैंट ने लिखा कि पुतिन से मिलकर मोदी "भारत की राणनीतिक स्वायत्तता" और "ग़ैर पश्चिमी दुनिया के नेता" की अपनी महत्वाकांक्षा को दर्शाते हैं.

धुर दक्षिणपंथी रूसी मीडिया और विश्लेषक ने इस दौरे को अमेरिकी कूटनीति की असफलता बताया है.

धुर दक्षिणपंथी टारग्रैड टीवी चैनल ने दौरे को 'सोने पर सुहागा', 'अमेरिकियों को रूस का अंतिम झटका' बताते हुए इसे ग्लोबल साउध के देशों का अमेरिका की बजाय रूस की ओर झुकाव क़रार दिया.

मशहूर ब्लॉगर यूरी पोदोल्याका ने एक टेलीग्राम पोस्ट में लिखा कि मोदी दिखाना चाहते हैं कि रूस की तरह ही उनका देश वैश्विक "शक्ति पर अमेरिका के एकाधिकार के ख़िलाफ़" है. इस पोस्ट पर 15 लाख व्यूज़ हैं.

(सैंड्रो ग्विंडाडज़े के अतिरिक्त इनपुट के साथ.)

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