दक्षिण चीन सागर में बढ़ता तनाव क्या चीन और अमेरिका को बातचीत के लिए कर रहा है मजबूर?

शी ज़िनपिंग और बाइडन

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन नवंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिले थे
    • Author, लॉरा बिकर
    • पदनाम, चीन संवाददाता

चीन में अमेरिका के राजदूत ने बीबीसी को बताया है कि अपने संबंधों में ‘तमाम विवादों और आपसी होड़’ के बावजूद, चीन और अमेरिका इन दिनों पहले से कहीं ज़्यादा नियमित रूप से आपस में बातें कर रहे हैं ताकि दक्षिणी चीन सागर में संघर्ष की स्थिति पैदा होने से बच सकें.

चीन में अमेरिका के राजदूत निकोलस बर्न्स ने इसी हफ़्ते की शुरुआत में बीजिंग में बीबीसी संवाददाता लॉरा बिकर से बात की थी.

बर्न्स ने कहा, ''हम दोनों देशों की सेनाएं, साउथ चाइना सी और ताइवान जलसंधि में एक दूसरे के बहुत क़रीब तैनात हैं. ऐसे में आप कोई भी ग़लत संकेत नहीं देना चाहेंगे.''

दक्षिण चीन सागर टकराव की आशंका वाला बेहद ख़तरनाक इलाक़ा बन गया है. क्योंकि यहां पर चीन के दावे, ताइवान और फिलीपींस ही नहीं, दोनों के सबसे ताक़तवर साथी अमेरिका के साथ भी तनाव को बढ़ा रहे हैं.

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हाल के महीनों में कई बार चीन और फिलीपींस की नौकाएं एक दूसरे के बेहद क़रीब आ चुकी हैं. ऐसा लग रहा है कि विवादित समुद्री क्षेत्र में दोनों देशों की नौसेनाएं एक दूसरे के साथ लुका-छिपी का ख़तरनाक खेल खेल रही हैं.

दोनों देशों के बीच टकराव की सबसे ताज़ा घटना में तो चीन के तटरक्षक सैनिक, फिलीपींस के एक जहाज़ में सवार हो गए थे और उन्होंने फिलीपींस के सैनिकों पर कुल्हाड़ियों और चाकुओं से हमला किया था.

चीन और अमेरिका के रिश्तों में तनाव और क्यों बढ़ा?

चीन

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इमेज कैप्शन, चीन और फिलीपींस की नौकाएं दक्षिणी चीन सागर में कई बार एक दूसरे के बेहद क़रीब आ चुकी हैं

अमेरिका ने इस इलाक़े में फिलीपींस से लेकर जापान तक के साथ सैन्य गठबंधन बनाया हुआ है.

अमेरिका बार-बार ये भी कहता रहा है कि वो दक्षिणी चीन सागर में अपने सहयोगियों के अधिकारों की हिफ़ाज़त करेगा.

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इसी वजह से चीन के साथ अमेरिका के रिश्ते और भी तनावपूर्ण हो गए हैं, जो यूक्रेन पर रूस के हमले, स्वशासित ताइवान पर चीन की दावेदारी और व्यापार युद्ध की वजह से पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे थे.

अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने कहा कि टकराव के इन मुद्दों पर अभी भी दोनों देश ‘पूरी तरह से बंटे हुए हैं’. पर, ‘जब भी मुमकिन हो’ तब दोनों पक्षों को एक साथ लाकर बातचीत की कोशिश करनी बहुत अहम है.

68 साल के राजनयिक निकोलस बर्न्स ने कहा, ''चीन की सरकार दोनों देशों की सेनाओं के बीच संवाद बढ़ाने को राज़ी हो गई है और ये बात हमारे लिए काफ़ी अहम है. अगर आप किसी तरह के हादसे से बचना चाहते हैं, तो ज़ाहिर है कि आपको लगातार संवाद करते रहना होगा. क्योंकि किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी टकराव का बायस बन सकती है.''

वैसे तो चीन और अमेरिका के बीच तनाव कम हो गया है. लेकिन, अमेरिका में इसी साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की वजह से रिश्तों में एक बार फिर ख़लल पड़ने की आशंका बनी हुई है.

निकोलस बर्न्स ने कहा, ''हमने चीन को चेतावनी दी है कि वो हमारे चुनाव में किसी तरह की दख़लंदाज़ी करने से बाज़ आए.''

उन्होंने ये भी कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में चीन की दख़लंदाज़ी की आशंका से अमेरिका ‘बेहद चिंतित’ है.

इससे पहले, इसी साल की शुरुआत में एफबीआई के अधिकारियों ने बताया था कि चीन, अमेरिकी चुनावों के दौरान लोगों के बीच टकराव बढ़ाने की कोशिशें जारी रख सकता है, और वो ऑनलाइन दुनिया में ग़लत जानकारी फैलाने में भी मददगार बन सकता है.

अमेरिकी राजदूत ने कहा कि एफबीआई के पास इस बात के भी सुबूत हैं कि चीन के अधिकारी उनके देश के ख़िलाफ़ ‘साइबर हमले’ करा रहे हैं.

चीन हमेशा ही सरकार प्रायोजित साइबर हमलों के इल्ज़ाम से इनकार करता रहा है और ख़ुद को इस तरह के अपराध का शिकार बताता रहा है.

चीन के ख़िलाफ़ सख़्ती दिखाने की होड़

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इमेज कैप्शन, निकोलस बर्न्स 2022 से बीजिंग में अमेरिकी राजदूत के तौर पर तैनात हैं

जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप दोनों ही चीन के प्रति सख़्ती दिखाने के मामले में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं. दोनों को लगता है कि इस रणनीति से उनको काफ़ी वोट मिल सकते हैं.

मई महीने में राष्ट्रपति बाइडन ने चीन में बनी इलेक्ट्रिक कारों, सोलर पैनल और दूसरे सामानों पर व्यापार कर की नई किस्त लगाने का एलान किया था.

जिसकी वजह से अब चीन में बनी बहुत कम इलेक्ट्रिक कारें ही अमेरिका में दाख़िल हो पा रही हैं.

लेकिन निकोलस बर्न्स ने इस बात से इनकार किया कि बाइडन प्रशासन ने घरेलू राजनीतिक दबाव की वजह से चीन पर ये व्यापार कर थोपे हैं.

बर्न्स ने कहा कि ये एक ‘आर्थिक क़दम’ है, जिसका मक़सद अमेरिकी नागरिकों का रोज़गार बचाना है.

इस बीच चीन ने चेतावनी दी है कि वो भी अपनी ओर से व्यापार कर लगाकर अमेरिका पर पलटवार कर सकता है.

हालांकि, इस प्रतिद्वंदिता के बावजूद, कुछ उम्मीदें जगाने वाली बातें भी हुई हैं.

हमारे साथ इंटरव्यू करने से पहले निकोलस बर्न्स ने चीन के जलवायु प्रतिनिधि से बात की थी. क्योंकि दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले दोनों देश यानी अमेरिका और चीन नुक़सानदेह उत्सर्जन कम करने के तौर-तरीक़े तलाशने में जुटे हैं.

फेंटानिल नाम की ड्रग को अमेरिका में दाख़िल होने से रोकने के लिए भी चीन के साथ ‘उच्च स्तरीय बातचीत’ चल रही है. निकोलस बर्न्स इस बातचीत को ‘बेहद अहम’ बताते हैं.

चीन के लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त बर्ताव के आरोप

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बारे में समझते चीनी स्टूडेंट्स

अमेरिकी राजदूत की ज़्यादातर बैठकें चीन के मंत्रियों के साथ होती हैं. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाक़ात के मौक़े तभी आते हैं, जब अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन जैसे नेता दौरे पर आते हैं.

दोनों देशों ने अपने यहां के ‘नागरिकों की आवाजाही’ को बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जताई है. ऐसा तब हो रहा है, जब चीन में पढ़ने आने वाले अमेरिकी छात्रों की तादाद 2011 में 15 हज़ार से घटकर अब केवल 800 रह गई है.

शी जिनपिंग को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में कम से कम पचास हज़ार अमेरिकी छात्र पढ़ने के लिए अमेरिका आएं.

पिछले साल नवंबर में जब जिनपिंग अमेरिका गए थे तो सैन फ्रांसिस्को में उन्होंने कहा था, ''ये हमारी सबसे बड़ी ख़्वाहिश है कि दोनों देशों के नागरिकों के बीच हेल-मेल और सहयोग बढ़े.''

लेकिन, अमेरिकी राजदूत बर्न्स आरोप लगाते हैं कि चीन की सरकार गर्मजोशी बढ़ाने वाले इन बयानों को बहुत गंभीरता से नहीं लेती.

बर्न्स कहते हैं, ''सैन फ्रांसिस्को में शिखर सम्मेलन के बाद से अलग-अलग ऐसी 61 घटनाएं हो चुकी हैं, जब सुरक्षाबलों या फिर चीन के सरकारी मंत्रालयों ने अपने नागरिकों को अमेरिकी दूतावास में कूटनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से रोका है. या फिर उन्होंने अमेरिका के साझा दौरे पर जाने से अपने लोगों को रोक दिया है. इस वजह से हमारे लिए दोनों देशों की जनता को क़रीब लाना काफ़ी मुश्किल हो गया है.''

वहीं दूसरी तरफ़ चीन के छात्र और अकादमिक क्षेत्र के विद्वानों का आरोप है कि अमेरिका के सीमा अधिकारी उनके साथ नाइंसाफ़ी भरा बर्ताव करते हैं.

वॉशिंगटन में चीन के दूतावास ने तो इस बारे में औपचारिक रूप से शिकायत भी दर्ज कराई थी और अमेरिकी अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि वो, चीन के नागरिकों से ‘ग़ैर-ज़रूरी’ पूछताछ करते हैं. बेवजह तंग करते हैं. उनके वीज़ा रद्द कर देते हैं, और कई बार तो अमेरिका में पढ़ रहे चीनी नागरिकों को वाजिब दस्तावेज़ होने के बावजूद अमेरिका पहुंचते ही वापस कर दिया गया था.

यूक्रेन युद्ध चीन और अमेरिका के बीच तनाव की वजह

यूक्रेन

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इमेज कैप्शन, चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह तो यूक्रेन का युद्ध है

अमेरिका ने चीन के दौरे पर जाने वाले अपने नागरिकों के लिए ‘लेवल 3’ की एडवाइज़री जारी की है, जिसमें उनसे अपनी यात्रा पर ‘पुनर्विचार’ करने की गुज़ारिश की जाती है.

निकोलस बर्न्स ने इस बात से इनकार किया कि ये एडवाइज़री उनके देश की ‘आम लोगों को एक दूसरे के क़रीब लाने की गुज़ारिश’ से उलट है. उन्होंने कहा कि ये तो बस एक एहतियाती क़दम है.

बर्न्स कहते हैं कि, ‘यहां बहुत से अमेरिकी नागरिक चीन की जेलों में क़ैद हैं, जिनके बारे में हमारा मानना है कि उन्हें हिरासत में लेना और क़ानूनी कार्रवाई करना ग़लत था. मैं चीन की जेलों में क़ैद अमेरिकी नागरिकों से मिलता रहता हूं और हम चाहते हैं कि उनको रिहा किया जाए.’

बर्न्स ने कहा कि चीन ने कई अमेरिकी नागरिकों के अपना देश छोड़कर जाने पर रोक लगा रखी है, और उनके पासपोर्ट एयरपोर्ट पर ज़ब्त कर लिए गए और इस वजह से वो चीन से नहीं जा सके.

वहीं, चीन ने अमेरिका को उन देशों की लिस्ट से अलग रखा है, जिनके नागरिकों को 15 दिनों के चीन दौरे के लिए वीज़ा की ज़रूरत नहीं होती. हाल ही में जब ऑस्ट्रेलिया के साथ चीन ने अपने रिश्तों में सुधार किया था, तो उसे इस फ़ेहरिस्त में शामिल कर लिया गया था.

हाल के दिनों में आमतौर पर चीन और अमेरिका के संबंध तनावपूर्ण रहते आए हैं. पर, आम नागरिकों के बीच संपर्क संबंध सुधारने का एक आसान लक्ष्य है. लेकिन, आज ये मक़सद हासिल करना भी इतना मुश्किल हो गया है कि ये दोनों देशों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास का प्रतीक बन गया है.

लेकिन, चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह तो यूक्रेन का युद्ध है.

ऐसा लगता है कि अमेरिका को इस बात का यक़ीन है कि जंग के मैदान में रूस की कामयाबी पर चीन ही लगाम लगा सकता है. और, अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने ये कहते हुए अमेरिका का संदेश दोहराया कि रूस के हमले को चीन का जो समर्थन है, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा, ''इस युद्ध में चीन निरपेक्ष नहीं है. चीन अपना असली रंग दिखा रहा है. वो रूस की मदद कर रहा है. आज जब पुतिन, यूक्रेन की जनता पर ये बर्बर युद्ध थोप रहे हैं, तो चीन उनका समर्थन कर रहा है. हमें पता है कि चीन की कंपनियां रूस को क्या सामान भेज रही हैं और हमें ये भी पता है कि इन खेपों से रूस के इस युद्ध को जारी रखने पर क्या असर पड़ रहा है.''

'संबंध सुधरे लेकिन आगे का सफ़र आसान नहीं'

अमेरिका-चीन

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इमेज कैप्शन, अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से व्यापार युद्ध चल रहा है

निकोलस बर्न्स ने कहा कि चीन की ऐसी दसियों हज़ार कंपनियां हैं, जो इस युद्ध में रूस की मदद कर रही हैं.

उन्होंने बताया, ''अमेरिका ने बहुत बड़ी तादाद में चीन की कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया है और अगर चीन की सरकार रूस की मदद से पीछे नहीं हटती, तो हम आगे और प्रतिबंध लगाने को भी तैयार हैं.''

अमेरिकी राजदूत की बातों में, पिछले हफ़्ते इटली में जी-7 की बैठक में दिए गए बयानों की गूंज सुनाई देती है. जी-7 की बैठक में कहा गया था कि चीन के सहयोग की वजह से यूक्रेन के युद्ध में रूस को फ़ायदा हो रहा है.

जी-7 देशों के नेताओं ने चीन की उन कंपनियों पर और प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी, जो उनके मुताबिक़, रूस को प्रतिबंधों से पार पाने में मदद कर रही हैं.

चीन ने इन चेतावनियों को ‘अहंकार, पूर्वाग्रह और झूठ से लबरेज़ बयान’ क़रार दिया था.

फिर भी कुछ लोग इसे 2022 के हालात से सुधार ही कहेंगे. उस समय अमेरिकी संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स) की स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद, ग़ुस्से से भड़के चीन ने अमेरिका के साथ कैबिनेट स्तर की सभी वार्ताएं बंद कर दी थीं.

इसके बाद, 2023 में चीन और अमेरिका के रिश्ते उस वक़्त फिर बिगड़ गए थे, जब विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन चीन के दौरे पर आने वाले थे.

हालांकि, जब अमेरिका ने उत्तरी अमेरिका के आसमान में उड़ रहे चीन के एक जासूसी ग़ुब्बारे को मार गिराया था, तो ब्लिंकन ने अपना दौरा रद्द कर दिया था.

दोनों देशों के संबंध पिछले साल नवंबर में उस वक़्त जाकर स्थिर हुए थे, जब सैन फ्रांसिस्को में जो बाइडन और शी जिनपिंग की मुलाक़ात हुई थी.

निकोलस बर्न्स कहते हैं, ''राजदूत के तौर पर उनके कार्यकाल के पहले दो साल बेहद मुश्किल भरे रहे थे. चीन के अधिकारियों के साथ उनकी बातचीत बहुत कम हो पाती थी.''

हालांकि, अब वो कहते हैं कि, 'दोनों देशों के संबंध ‘तुलनात्मक रूप से बेहतर’ हुए हैं. लेकिन, बर्न्स मानते हैं कि आगे का सफ़र काफ़ी मुश्किल दिख रहा है.

वो कहते हैं कि इस वक़्त दोनों देशों के बीच बेहद कठिन होड़ चल रही है और आने वाले लंबे समय तक ये हालात बने रहने वाले हैं.

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