इसराइल में सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से क्यों भड़के हुए हैं कट्टर यहूदी?

यहूदी

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    • Author, योलांडे नेल
    • पदनाम, बीबीसी मध्य पूर्व संवाददाता

जब इसराइल का अति रूढ़िवादी (कट्टर धार्मिक) या हरेदी यहूदी समुदाय बड़ी तादाद में इकट्ठा होता है, तो हमें यह देखने को मिलता है कि इनकी आबादी कितनी बड़ी है.

हज़ारों की तादाद में लड़के और पुरुष काले और सफ़ेद कपड़े पहने हुए यरूशलम में मेआ शियरिम की सड़कों पर जमा हैं. ये सभी इसराइली सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फ़ैसले में कहा था कि युवा हरेदी पुरुषों को इसराइली सेना में भर्ती किया जाना चाहिए और अब वे सरकार की तरफ से मिल रहे कुछ ख़ास फ़ायदों के हक़दार नहीं रहेंगे.

इस फ़ैसले के बाद येशिवा में पढ़ाई कर रहे युवा इस बात की चिंता जता रहे हैं कि इससे उनके धार्मिक जीवन जीने के तरीके़ पर ख़तरा पैदा हो जाएगा.

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ये युवा तर्क देते हैं कि उनकी प्रार्थनाएं और आध्यात्मिक अध्ययन इसराइल की सुरक्षा और यहूदियों के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हैं.

प्रदर्शनकारियों का क्या कहना है?

विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले जोसेफ का कहना है कि दो हज़ार सालों से हमें सताया जा रहा है. हम इसलिए ज़िंदा हैं क्योंकि हम टोरा सीख रहे हैं. अब सुप्रीम कोर्ट इसे हमसे छीनना चाहता है. यह फ़ैसला हमारे विनाश की वजह बन सकता है.

वहीं एक और छात्र नाम ना बताने की शर्त पर कहते हैं, "सेना में शामिल होने से हमारी धार्मिक भक्ति से समझौता करना पड़ेगा. हमें जो भी काम वहां पर दिया जाएगा उससे धर्म के प्रति हमारी अस्था कमज़ोर होगी. इसराइली सेना हमें नहीं चाहती और उनको हमारी ज़रूरत भी नहीं है."

इसराइल के इस कट्टर धार्मिक समुदाय का मानना है कि सेना में भर्ती होने से उनकी धर्म के प्रति आस्था कमज़ोर पड़ेगी. सेना में जो काम उनको करने पड़ेंगे वे उनके धार्मिक विश्वास के हिसाब से सही नहीं हैं.

इसराइल का कट्टर यहूदी समाज अपनी धार्मिक पहचान और आध्यात्मिक कर्तव्यों को बनाए रखने के लिए सैन्य सेवा में छूट को ख़ुद के लिए ज़रूरी मानता है.

इसराइल में अहम है हरीदी यहूदियों की भूमिका

इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू

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दशकों से इसराइली समाज में अति-रूढ़िवादियों की भूमिका को लेकर विवाद रहा है. कभी यह इसराइल का एक छोटा समुदाय हुआ करता था, लेकिन अब इस समुदाय की तादाद दस लाख है जो कि इसराइल की कुल आबादी का 12.9 फीसदी है.

यहां तक कि अति-रूढ़िवादी राजनीतिक दल अकसर इसराइली राजनीति में किंगमेकर की भूमिका निभाते देखे जाते हैं. फिलहाल इन दलों ने बिन्यामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार को लगातार अपना समर्थन दिया है. इसके बदले में रूढ़िवादियों को सैन्य सेवा से छूट और अपने संस्थानों के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर जैसे कई फ़ायदे भी मिले हैं.

धार्मिक कट्टर यहूदियों और धर्मनिरपेक्ष यहूदियों के बीच यह टकराव की एक बड़ी वजह है. क्योंकि धर्मनिरपेक्ष यहूदियों का तबक़ा अनिवार्य तौर पर सैन्य सेवाएं भी देता है और टैक्स के एक बड़े हिस्से का भुगतान भी करता है.

हालांकि दोनों ही पक्षों के बीच तनाव का मामला और कट्टर यहूदियों का विरोध ऐसे समय पर सामने आया है जब इसराइल ग़ज़ा पर अभी तक के अपने सबसे लंबे युद्ध संघर्ष का सामना कर रहा है. इसके अलावा इसराइल लेबनान में हिज़बुल्लाह लड़ाकों के साथ भी युद्ध कर रहा है.

राजनीतिक हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रख रहे हैं नेतन्याहू?

हाल ही में हर्ज़लिया में एक सम्मेलन में मोर शमगर नाम की एक महिला ने इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को फ़टकार लगाते हुए पूछा था, "मेरा बेटा पहले ही 200 दिनों से रिज़र्व में है! आप उसे कितने साल तक रखना चाहते हैं? आपको शर्म क्यों नहीं आती?"

मोर शमगर का बेटा दक्षिणी इसराइल में टैंक कमांडर के तौर पर तैनात है. शमगर की इस हताशा भरी टिप्पणी को सोशल मीडिया पर भी ख़ूब शेयर किया गया था.

सेना के लीडर्स सैन्य जनशक्ति में कमी की शिकायत कर रहे हैं. वहीं शमगर का कहना है कि उन्होंने पहले प्रधानमंत्री नेतन्याहू की पार्टी को ही वोट दिया था. लेकिन अब उनका मानना है कि सरकार ने स्थिति को बहुत ख़राब तरीक़े से संभाला है. सैन्य मसौदे के मुद्दे पर सरकार ने इसराइल के राष्ट्रीय हितों से पहले अपनी पार्टी के राजनीतिक हितों को आगे रखा है.

शमगर का कहना है, "नेतन्याहू और उनके साथी यह सोचकर बड़ी गलती कर रहे हैं कि वे जनता को चकमा दे सकते हैं. क्योंकि जब आप देश की आधी आबादी पर ये नियम लागू कर सकते हैं कि उसे सेना में जाना है तो आप दूसरी आधी आबादी को इससे छूट नहीं दे सकते. यह धर्मनिरपेक्ष बनाम धर्म नहीं है. मैं इसे समानता के मुद्दे के तौर पर देखती हूं. आप ऐसे क़ानून नहीं बना सकते जो आधी आबादी को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दे."

सेना में जाने के मुद्दे पर अति-रूढ़िवादी लोगों को मिली व्यापक छूट को ख़त्म करने के लिए सार्वजनिक समर्थन भी मिल रहा है.

इस बात का संकेत इस साल की शुरुआत में इसराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के एक सर्वेक्षण में मिला है.

सर्वेक्षण के मुताबिक़ 70 फीसदी इसराइली यहूदी अति-रूढ़िवादी लोगों के लिए सैन्य सेवा से पूरी तरह छूट समाप्त करना चाहते हैं.

सरकार का समर्थन कर रहे हैं कट्टर धार्मिक राजनीतिक दल

प्रदर्शनकारी

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हालांकि पहले की धमकियों के बावजूद अभी तक कट्टर धार्मिक राजनीतिक दलों ने सेना भर्ती के मुद्दे पर नेतन्याहू सरकार का समर्थन करना नहीं छोड़ा है. एक पुराने विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी जारी हैं. विधेयक के मुताबिक़ हरेदी समुदाय के लोगों को आंशिक तौर पर सेना में भर्ती किया जा सकेगा. लेकिन पहले इस विधेयक को हरेदी नेता ख़ारिज भी कर चुके हैं.

यरूशलम में एक अति-रूढ़िवादियों के प्रार्थना करने की जगह पर, सुबह की सेवा के लिए अलग-अलग उम्र के पुरुष अपनी प्रार्थना शॉल में लिपटे हुए इकट्ठा होते हैं. इन लोगों की रूढ़िवादी जीवनशैली यहूदी क़ानून और रीति-रिवाज़ों की सख़्त व्याख्या पर आधारित है.

हालांकि अति-रूढ़िवादी लोगों को सेना में इकट्ठा करने की कोशिशों के बाद भी इस दिशा में काफी कम काम हो पाया है. केवल एक बटालियन नेत्ज़ाह येहुदा ही रूढ़िवादियों की लिंगभेद की मांगों को पूरा करने के लिए स्थापित की जा सकी है. इस बटालियन में कोषेर भोजन, रोज़ाना के धार्मिक कामों और प्रार्थना के लिए अलग से वक़्त निर्धारित किया गया है.

रूढ़िवादी रब्बी का क्या कहना है?

रब्बी येहोशुआ फ़ेफ़र
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लेकिन एक अति-रूढ़िवादी रब्बी येहोशुआ फ़ेफ़र जो कि कट्टर यहूदियों को इकट्ठा करने पर काम कर रहे हैं और बटालियन का समर्थन करने वाले एक एनजीओ के बोर्ड में हैं, उनका मनना है कि अभी इस मामले पर सरकार और ज़्यादा समझौते भी कर सकती है. सेना में एक नई हरेदी ब्रिगेड का गठन होना चाहिए.

रब्बी येहोशुआ फ़ेफ़र कहते हैं, "यह हरेदीम पर निर्भर करता है कि वे बातचीत के लिए आगे आएं और कहें कि हम वास्तविक रियायतों के लिए तैयार हैं. हम अपनी परंपराओं से बाहर निकलने के लिए तैयार हैं. ताकि सरकार भी इस मामले में सक्रियता के साथ कुछ कदम उठा सके जिससे ज़्यादा हरेदी सेवा कर सकें."

रब्बी येहोशुआ फ़ेफ़र का सुझाव है कि हज़ारों युवा अति-रूढ़िवादी पुरुष जो मौजूदा वक़्त में पूरी समय तक टोरा का अध्ययन नहीं करते हैं. ऐसे युवा खुद को अकादमिक कठोरता के लिए उपयुक्त नहीं पाते हैं. ऐसे युवाओं को अपनी उम्र के अन्य यहूदी इसराइलियों की तरह सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

इसके अलावा रब्बी फ़ेफ़र ने इसराइली सेना से 'पीपुल्स आर्मी' के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए कट्टर यहूदियों के साथ विश्वास बनाने और संबंधों को बेहतर बनाने की अपील भी की.

रब्बी के मुताबिक़, "अभी बहुत काम किया जाना बाकी है. बहुत समायोजन होना बाकी है. लेकिन वे रॉकेट साइंस नहीं है." अभी तक अति-रूढ़िवादी मसौदे को लागू करने की प्रक्रिया भी धीरे-धीरे ही आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है.

येशिवा छात्रों के तौर पर रजिस्टर्ड हैं हज़ारों हरीदी यहूदी

इसराइल में प्रदर्शन करते कट्टर धार्मिक यहूदी

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इसराइल में अभी 60 हज़ार से ज़्यादा अति-रूढ़िवादी पुरुष येशिवा छात्रों के तौर पर रजिस्टर्ड हैं और उनके सैन्य सेवा करने से छूट मिल रही है. लेकिन पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सेना को इस समुदाय से केवल 3000 अतिरिक्त लोगों को ही भर्ती करने की योजना पर काम करने को कहा गया है.

हालांकि इसके बाद भी मेआ शियरिम में रात के वक़्त कुछ प्रदर्शनकारियों ने उग्र व्यवहार दिखाते हुए पुलिस पर पत्थर फेंके. इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने यरूशलम में दो अति-रूढ़िवादी नेताओं की कार पर भी हमला कर दिया. इन नेताओं को लेकर प्रदर्शनकारियों का मनना था कि वे सैन्य मसौदे के मामले पर सरकार का साथ दे रहे हैं, जिससे उनको काफ़ी निराशा हुई है.

अगर ऐतिहासिक रूप से देखें तो यह समुदाय एक अलग-थलग रहने वाला समूह या वर्ग है जो बदलाव का विरोध करता रहा है. लेकिन मसौदे और सुप्रीम कोर्ट के फै़सले को देखकर ऐसा लगता है कि इसराइल में बढ़ते सार्वजनिक दबाव और युद्ध के व्यापक होने की आशंकाओं के बीच जल्द ही बड़े बदलाव किए जाएंगे.

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