फ़्रांस में रिकॉर्ड तोड़ मतदान, इस चुनाव को इतिहास की दिशा बदलने वाला क्यों कहा जा रहा है?

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फ़्रांस में रविवार को संसदीय चुनावों के लिए पहले दौर का मतदान हो रहा है. माना जा रहा है कि ये चुनाव ऐतिहासिक साबित हो सकते हैं.
हाल में संपन्न हुए यूरोपीय चुनावों में अच्छे प्रदर्शन के बाद धुर-दक्षिणपंथियों को उम्मीद है कि वो मध्यमार्गी पार्टियों के गठबंधन वाली मैक्रों सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकेंगे.
यूरोपीय चुनावों के नतीजे आने के बाद तीन सप्ताह पहले फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने अचानक जल्द चुनाव करवाने की घोषणा की थी, जिसके बाद रविवार को मतदान का पहला दौर कराया जा रहा है.
जिन उम्मीदवारों को 12.5 फ़ीसदी से अधिक वोट मिलेंगे वो अगले दौर में पहुंचेंगे. मतदान का अगला दौर सात जुलाई को कराया जाएगा.
फ़्रांस के संसदीय चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान हुआ है. स्थानीय समयानुसार शाम पांच बजे तक 60 फ़ीसदी मतदान हुआ जो दो साल पहले हुए चुनावों से 20 फ़ीसदी अधिक है.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि यह दिखाता है कि इस बार बहुत कुछ दांव पर है. ओपिनियन पोल्स में धुर-दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी को बढ़त हासिल है जिसके बाद लेफ़्ट विंग गठबंधन है.

मैक्रों ने जल्द चुनावों की घोषणा क्यों की?
इसी महीने नौ जून को राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने टेलीविज़न पर दिए एक संदेश में कहा था कि देश में जल्द संसदीय चुनाव करवाए जाएंगे.
अचानक हुई इस घोषणा से एक दिन पहले यूरोपीय चुनाव हुए थे जिनमें फ़्रांस ने भी हिस्सा लिया था. इसमें धुर-दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली का प्रदर्शन मध्यमार्गी गठबंधन से बेहतर था.
मैक्रों ने कहा कि वो इस तरह बर्ताव नहीं कर सकते जैसे कुछ हुआ ही न हो, इसलिए उन्होंने जल्द चुनाव करवाने का फ़ैसला किया है.
चूंकि ये चुनाव संसद के लिए कराए जा रहे हैं, तो इसका असर मैक्रों के कार्यकाल पर नहीं पड़ेगा. अभी उनके कार्यकाल के ख़त्म होने में तीन साल का वक़्त है.
कई जानकारों का कहना है कि जल्द चुनाव करवाने की मैक्रों की घोषणा से उन्हें आश्चर्य नहीं हुआ. उनका कहना है कि मैक्रों के सामने कोई विकल्प नहीं बचा था.
दो साल पहले हुए चुनावों में वो पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाए थे जिस कारण नए क़ानून और सुधार पास करने में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा है.
हाल के वक्त में उनकी लोकप्रियता कम हुई है, पोल्स में उनका गठबंधन भी तीसरे स्थान पर पहुंच गया है. जल्द चुनाव करा कर वो गठबंधन को होने वाले नुक़सान को कम करने की उम्मीद रखते हैं.
मैक्रों का कहना है कि वो लोगों की इच्छा के अनुसार "प्रतिक्रिया" दे रहे हैं और उन्हें अधिक स्पष्टता लाने का मौक़ा दे रहे हैं, भले ही उसका मतलब नेशनल रैली को सरकार बनाने का मौक़ा देना हो.
क्यों महत्वपूर्ण हैं ये चुनाव?

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बीबीसी संवाददाता हू शोफ़ील्ड कहते हैं कि ये चुनाव केवल फ़्रांस ही नहीं बल्कि यूरोप के लिए इतिहास की दिशा बदलने वाला साबित हो सकता है.
वो कहते हैं कि कुछ वक्त पहले तक ये कल्पना से परे था कि फ़्रांस जैसे देश में कोई धुर-दक्षिणपंथी पार्टी जिसके मूल में यहूदी विरोधी विचारधारा हो और जो कई मामलों में कड़ा रुख़ रखती हो सरकार बना सकती है.
ये चुनाव एक तरह ये से साबित कर सकता है कि ये देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर से आगे बढ़ने लगा है. फासीवाद, रूढ़िवाद, राष्ट्रवाद और रिपब्लिकन फ्रंट जैसे राजनीतिक शब्द चर्चा में इस्तेमाल तो किए जाते हैं लेकिन उनका अर्थ कम होता जा रहा है.
हू शोफ़ील्ड कहते हैं, इससे ये भी पता चलता है कि "नेशनल रैली जैसी लोकप्रिय दक्षिणपंथी पार्टी को वोट देने में शर्म की भावना क्यों खत्म हो गई है."
मैदान में कौन-कौन हैं?

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इन संसदीय चुनावों में लगभग एक दर्जन पार्टियां अपनी किस्मत आज़मा रही हैं. हालांकि मुख्य लड़ाई तीन महत्वपूर्ण पार्टियों और गठबंधनों के बीच है.
नेशनल रैली (आरएन)
ये धुर-दक्षिणपंथी पार्टी है जो हाल में यूरोपीय चुनावों में मज़बूत प्रदर्शन के बाद फ़िलहाल चुनावों में आगे चल रही है. हाल के वक्त में ये गठबंधन यहूदी विरोधी और चरमपंथ के समर्थन के अपनी मूल विचारधारा से खुद को अलग कर चुकी है हालांकि आप्रवासन का कड़ा विरोध करती है.
अगर ये पार्टी सत्ता में आई तो ये विदेशी मूल के माता-पिता के बच्चों को स्वत: मिलने वाली फ्रांसीसी नागरिकता के अधिकार को ख़त्म कर सकती है.
इसका नेतृत्व 28 साल के जॉर्डन बारडेला कर रहे हैं और पार्टी जीती तो ये देश के अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन सकते हैं.
न्यू पॉपुलर फ्रंट अलायंस
चुनावों में फिलहाल दूसरे नंबर पर चल रहा है वामपंथी पार्टियों का गठबंधन, जिसमें सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट, ग्रीन्स और फ्रांस अनबाओड (एलएफ़आई) शामिल हैं. ये सभी पार्टियां धुर-दक्षिणपंथियों को सत्ता से बाहर रखने के इरादे से एक साथ आई हैं.
ये गठबंधन मौजूदा सरकार की विवादित पेंशन सुधारों को हटाने, न्यूनतम वेतन को बढ़ाने और बिना दस्तावेज़ वाले प्रवासियों के लिए एक बचाव एजेंसी बनाने का काम करना चाहता है.
एनसेंबल अलायंस
ये मध्यमार्गी पार्टियों का गठबंधन है जो इसी विचारधारा के साथ अपील कर रहा है, हालांकि पोल्स इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि लोगों का झुकाव दक्षिणपंथी और वामपंथी पार्टियों की तरफ होने लगा है.
जानकारों का कहना है कि ये भी संभव है कि इस गठबंधन के कुछ उम्मीदवार दूसरे चरण तक न पहुंच सकें.
फ़्रांस में कैसे होते हैं चुनाव?

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मतदान स्थानीय समनयानुसार सवेरे आठ बजे शुरू हुआ. ये प्रक्रिया शाम के आठ बजे कर पूरी कर ली जाएगी.
मतदाता फ़्रांस की संसद (असेंबली नेशियोनेल) के लिए 577 प्रतिनिधियों, जिन्हें डिप्टी कहा जाता है, उन्हें चुनने के लिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं.
सरकार बनाने के लिए या, संसद में पूर्ण बहुमत के लिए 289 सीटें चाहिए. पहले दौर में वो सभी उम्मीदवार चुनाव की दौड़ से बाहर कर दिए जाएंगे जो वोटरों से 12.5 फ़ीसदी वोट नहीं पा सके.
जो भी उम्मीदवार 50 फ़ीसदी वोट हासिल करेगा या अपने चुनाव क्षेत्र के कुल वोटरों की संख्या के हिसाब से कम से कम एक चौथाई वोट हासिल करेगा उसे जीता माना जाएगा. हालांकि ऐसा कम ही मामलों में होता है.
मौजूदा वक्त में पॉपुलर हो रही धुर-दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली को उम्मीद है कि उनके कुछ उम्मीदवारों को रविवार को हो रहे मतदान में इस तरह की जीत मिल सकेगी.
फ़्रांस में सेमी-प्रेसिडेन्शियल सिस्टम की प्रणाली है जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मामलों को संभालते हैं.
प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है, और राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रमुख होता है.
फ़्रांस में 2002 के बाद से संसदीय चुनाव, राष्ट्रपति चुनाव के ठीक बाद कराए जाते रहे हैं.
अगला संसदीय चुनाव 2027 में होना है, लेकिन मैक्रों ने इसी साल चुनाव करवाने का फ़ैसला किया है. इससे चुनावों का क्रम बिगड़ जाएगा.
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