दिल्ली चुनाव में यूपी-बिहार के मतदाताओं का रुख़ क्या रहेगा

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ग़ाज़ियाबाद की सीमा से सटे दिल्ली के बाहरी इलाक़े में पुश्ता रोड के ऊपर दिल्ली-देहरादून हाईवे का निर्माण लगभग पूरा हो गया है.
यहीं, वज़ीराबाद रोड पर नए मेट्रो स्टेशन खजूरी ख़ास का काम तेज़ी से चल रहा है. पुश्ता रोड और कच्ची कॉलोनी के बीच एक नाला है, जिसके एक छोर से कई गलियां कच्ची खजूरी कॉलोनी में दाख़िल होती हैं.
ये कॉलोनी पिछले एक दशक में एक बड़ी आबादी का रिहायशी इलाक़ा बन चुकी हैं. यहाँ कुछ औरतें नालियों के पानी को घर में जाने से रोकने के लिए मशक़्क़त कर रही हैं.
दिल्ली की इस बाहरी कॉलोनी में अधिकतर प्रवासी रहते हैं. एक दशक पहले तक यहां छोटे-छोटे घर और झुग्गियां थीं. अब ये कॉलोनी नाम की ही कच्ची है, यहां अधिकतर मकान पक्के और कई मंज़िला हैं.
सड़के हैं, बिजली हैं और पानी है लेकिन गंदगी भी बेशुमार है.

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मोहम्मद ज़ाहिद का परिवार बिहार से यहाँ आकर बसा था लेकिन अब यह परिवार दिल्ली का वोटर है.
ज़ाहिद कहते हैं, “बिजली, पानी, साफ़-सफ़ाई अपनी जगह हैं लेकिन दिल्ली में दो ही सबसे बड़े मुद्दे हैं, एक बेरोज़गारी और दूसरा लोगों के बीच बढ़ रही नफ़रत.”
ज़ाहिद कहते हैं, “सरकार अगर रोज़गार की समस्या का समाधान कर दे तो बाक़ी सभी मसले अपने आप ही हल हो जाएंगे. लेकिन, सरकार रोहिंग्या और बांग्लादेशियों का मुद्दा उठा रही है.”
कच्ची खजूरी में कई लोग बिजली और पानी की व्यवस्था पर संतोष ज़ाहिर करते हैं लेकिन अधिकतर यहां पसरी गंदगी की तरफ़ इशारा करते हैं.
दिल्ली में 1797 कच्ची कॉलोनियां हैं, जिनमें से अधिकतर में दिल्ली से बाहर से आए प्रवासी रहते हैं. इनमें भी सबसे बड़ी तादाद बिहार और पूर्वी यूपी से आए लोगों की हैं. इन्हें पूर्वांचली कहा जाता है.
अवैध प्रवासियों की पहचान का अभियान

हाल के दिनों में दिल्ली पुलिस ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना के आदेश के बाद अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान के लिए अभियान चलाया है.
दिल्ली पुलिस के जवान झुग्गी-बस्तियों और कच्ची कॉलोनियों में अवैध रोहिंग्या या बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए दस्तावेज़ जांच रहे हैं.
हालांकि, ये रिपोर्ट लिखे जाने तक ऐसी कोई जांच कच्ची खजूरी इलाक़े में नहीं हुई थी. लेकिन, लोग इस तरह के अभियान पर सवाल ज़रूर उठाते हैं.
कई साल से यहीं रह रहे एक व्यक्ति अपना नाम ना ज़ाहिर करते हुए सवाल करते हैं, “दिल्ली में गिने-चुने अवैध प्रवासी होंगे लेकिन उनके बहाने सभी को परेशान किया जा रहा है.”
दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और बीजेपी इसे लेकर आमने-सामने हैं.
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दावा किया है कि बीजेपी रोहिंग्या और बांग्लादेश से आए लोगों की पहचान के बहाने पूर्वांचल से आए लोगों पर निशाना साध रही है.
एक प्रेस वार्ता में केजरीवाल ने कहा, “यूपी-बिहार से आकर बसे लोग, जो 30-40 सालों से दिल्ली में रह रहे हैं, दिल्ली के निर्माण का काम कर रहे हैं, उन्हें रोहिंग्या या बांग्लादेशी कैसे कहा जा सकता है.”
“बीजेपी एक सोची-समझी घिनौनी साज़िश के तहत ऐसा कर रही है क्योंकि दिल्ली के पूर्वांचल समाज आम आदमी पार्टी का वोटर है.”
केजरीवाल के इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए दिल्ली बीजेपी के नेता बिपिन बिहारी कहते हैं, “आम आदमी पार्टी ने अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या लोगों को दिल्ली में बसाकर एक वोट बैंक बनाया है लेकिन दिल्ली के एलजी ने इस पर जांच बैठा दी है.”
अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के नाम पर राजनीति?

दिल्ली में अवैध रोहिंग्या या बांग्लादेशी लोगों की संख्या कितनी है, इसका कोई आंकड़ा नहीं है.
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने दिसंबर महीने में 175 से अधिक संदिग्धों की पहचान करने का दावा किया है, जबकि दस से अधिक अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू की है.
वहीं, चुनाव आयोग ने, फ़र्ज़ी आधार कार्ड के आधार पर वोटर पहचान पत्र बनाने का आवेदन देने के लिए कई लोगों पर मुक़दमा भी दर्ज कराया है.
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और दिल्ली पुलिस और चुनाव आयोग की कार्रवाइयों के बीच इस विवाद ने दिल्ली में रह रहे पूर्वांचल के लोगों को राजनीति के केंद्र में ला दिया है.
बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को जवाब देने के लिए बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मैदान में उतार दिया. सम्राट चौधरी ने दिल्ली पहुंचकर केजरीवाल को निशाने पर लिया.
केजरीवाल पर पूर्वांचल के लोगों को बरगलाने का आरोप लगाते हुए सम्राट चौधरी ने कहा, “दिल्ली के एक बड़े नेता पूर्वांचल के लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं.”
रोज़ी रोटी कमाने दिल्ली आए पूर्वांचल के लोगों का यूं तो कई क्षेत्रों में दबदबा है, लेकिन दिल्ली में इनकी आबादी का बड़ा हिस्सा कच्ची कॉलोनियों और झुग्गियों में रहता है.
हालांकि पूर्वांचल से आए अधिकतर लोगों के लिए रोहिंग्या या अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा मायने नहीं रखता है. इनके लिए रोज़ी-रोटी और रोज़गार का मुद्दा ज़्यादा अहम है.
संख्या बल में भारी

दिल्ली में पूर्वांचल से आए लोगों की तादाद बढ़ रही है और ये कई सीटों के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करते हैं. ख़ासकर बाहरी दिल्ली के बाहरी इलाक़ों में बड़ी तादाद में पूर्वांचली रहते हैं.
लोकनीति के सह-निदेशक संजय कुमार कहते हैं, “पूर्वांचली वोटरों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है, जो ग़रीब या निम्न आय वर्ग से आते हैं.”
“इनकी संख्या का सही आकलन करना मुश्किल है, क्योंकि कभी इसकी गणना नहीं हुई है. लेकिन, अलग-अलग अनुमान हैं.”
“कुछ लोग यहां तक कहते हैं कि दिल्ली में पूर्वांचल मूल के लोगों की संख्या पचास फ़ीसद के क़रीब है. लेकिन मैं ये मानता हूं कि दिल्ली में कम से कम 30 प्रतिशत तो पूर्वांचली मतदाता हैं.”
“अगर सीटों की संख्या की बात करें, तो मोटे तौर पर 70 में से 20-22 सीटें ऐसी हैं, जहाँ पूर्वांचल वोटर निर्णायक संख्या में हैं.”
संजय कुमार कहते हैं, “पूर्वी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली, उत्तर पूर्वी दिल्ली, बाहरी दिल्ली या यूं कहें कि केंद्रीय दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के महंगे इलाक़ों को छोड़कर जो इलाक़े हैं, वहां लगभग हर जगह पूर्वांचल से आए लोगों की बड़ी तादाद है. अधिकतर प्रवासी बाहर से आकर बसे और उन्होंने उन्हीं बाहरी इलाक़ों में घर बनाए जो उनकी आर्थिक पहुँच में थे.”
संजय कुमार कहते हैं, “पिछले 10 साल में पूर्वांचल के लोगों की राजनीतिक ताक़त भी बढ़ी है और राजनीति में उनकी संख्या भी बढ़ी है.”
कितनी हिस्सेदारी?

हालांकि, पूर्वांचल के लोगों का मानना है कि उन्हें आबादी के हिसाब से राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है.
शाहदरा की झुग्गी में रहने वाले प्रकाश पासवान कहते हैं, “पूर्वांचल और बिहार के लोगों को सिर्फ़ मतदाता बनाकर ही रखा गया है.”
“चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर आम आदमी पार्टी, सभी हमें मतदाता ही समझते हैं, जब टिकट देने की बारी आती है तो हमें दोयम दर्जे का समझा जाता है.”
वहीं पूर्वांचल जन कल्याण समिति से जुड़े अधिवक्ता दया शंकर यादव कहते हैं, “भले ही पूर्वांचल के लोगों की संख्या बढ़ी है, लेकिन राजनीति में उस हिसाब से भागीदारी नहीं है, किसी भी पार्टी में.”
“भागीदारी नहीं होने की वजह से ना उनके मुद्दे उठ पाते हैं और ना ही समस्याओं का समाधान हो पाता है.”
हालांकि, दया शंकर यादव ये स्वीकार करते हैं कि पिछले कुछ सालों में पूर्वांचल के लोगों का राजनीतिक महत्व बढ़ा है और अब सभी दल उन्हें रिझाने की कोशिश कर रहे हैं.
दया शंकर कहते हैं, “हमारी समिति छठ पर्व का आयोजन कराती है जो पूर्वांचल की संस्कृति का प्रतीक है. पहले हमें बहुत संघर्ष करना पड़ता था लेकिन अब दिल्ली सरकार पूरा सहयोग करती है.”
“इस साल हमारे लिए सभी व्यवस्थाएं सरकार ने करके दीं, हमें चंदा तक नहीं करना पड़ा.”
“इसका साफ़ मतलब है कि राजनीतिक दल अब ये समझ रहे हैं कि दिल्ली में सत्ता तक पहुंचने के लिए पूर्वांचल के मतदाता अहम हैं और उन्हें नाराज़ नहीं किया जा सकता है.”
विश्लेषक भी ये मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में पूर्वांचल के लोगों की राजनीतिक ताक़त बढ़ी है और पार्टियां उन्हें अपनी तरफ़ आकर्षित करने के प्रयास कर रही हैं.
संजय कुमार कहते हैं, “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो संख्या के हिसाब से पूर्वांचल के लोगों का प्रतिनिधित्व नज़र नहीं आएगा.”
“लेकिन, पिछले 10 सालों में दिल्ली की राजनीति में बदलाव आया है.”
“अब राजनीतिक दल पूर्वांचल के मतदाताओं के महत्व को समझ रहे हैं और उन्हें अपनी तरफ़ आकर्षित करने के प्रयास कर रहे हैं. टिकट बँटवारे में भी इसका ध्यान रखा जा रहा है.”
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