भारतीय शहरों में पैदल चलना नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए...

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- Author, शर्लिन मोलन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
भारत के शहरों में फुटपाथ पर चलने वाले किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि उन्हें फुटपाथ पर चलते हुए कितनी बाधाओं को पार करना पड़ता है तो शायद वे उसकी गिनती नहीं बता सकेंगे .
लेकिन वे आपको ये ज़रूर बताएंगे कि ज़्यादातर फुटपाथ की स्थिति ख़राब है.
बेंगलुरु की सड़कों पर बेंगलुरु वॉक्स के संस्थापक अरुण पई ने लोगों से फुटपाथ पर चलने के अनुभव के बारे में जानना शुरू किया.
इस महीने उन्होंने बेंगलुरु में 11 किलोमीटर 'फुटपाथ रन' की शुरुआत की. इसमें उन्होंने हिस्सा लेने वाले लोगों से फुटपाथ पर आने वाली किसी भी रुकावट जैसे कि स्ट्रीट वेंडर, कचरा या टूटी हुई कंक्रीट की गिनती करने के लिए कहा. इसके बाद सभी लोगों को फुटपाथ को रेटिंग करने के लिए भी कहा गया.
पई कहते हैं, "जब आपके पास समस्याओं की सटीक जानकारी होती है, तब अधिकारियों से उन पर कार्रवाई करने के लिए कहना आसान हो जाता है. स्थानीय नेताओं से फुटपाथ की स्थिति ख़राब कहने की जगह आप उनसे फुटपाथ पर ख़ास जगह को ठीक करने के लिए कह सकते हैं".

दिल्ली में दिल्ली बाय साइकिल नाम की एक टूर कंपनी शहर की सड़कों को साइकिल के लिए और पैदल चलने लायक बनाने की वकालत करती है.
ये लोग पैदल चलने के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई तरह के अभियान चलाते हैं. इसमें पैदल चलना और नेताओं से बात करना शामिल है.
देश के बड़े शहरों में भी लोगों के चलने के लिए अच्छे फुटपाथ मिलना बहुत मुश्किल है.
ज़्यादातर फुटपाथ पर वाहन खड़ रहते हैं, रेहड़ी-पटरी वाली दुकानें और कई जगहों पर तो आपको मवेशी भी बैठे हुए मिलेंगे.
अक्सर फुटपाथ तय मानकों के अनुसार भी बने नहीं होते. लोगों के लिए भीड़ और ट्रैफिक के बीच पैदल चलना बहुत मुश्किल हो जाता है.

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'लोगों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है'
पिछले महीने वॉकिंग प्रोजेक्ट नाम के समूह ने मुंबई में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले एक घोषणापत्र जारी किया था.
ऐसा इसलिए किया गया था ताकि शहर की सड़कों की ख़राब स्थिति को लोगों के सामने लाया जाए और स्थानीय नेताओं को इस समस्या पर कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
इसमें कई तरह की मांगें शामिल थीं. जैसे गाड़ियों के लिए बेहतर पार्किंग की जगह, सड़क के पास सामान बेचने वाले लोगों के लिए विशेष क्षेत्र, लोगों के सुरक्षित चलने के लिए चौड़ी सड़क और विकलांग लोगों की सहूलियत के हिसाब से फुटपाथ होना.
वॉकिंग प्रोजेक्ट के संयोजक वेदांत म्हात्रे कहते हैं, "सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहर की लगभग 50 प्रतिशत आबादी पैदल चलने पर निर्भर है. यह अपने निजी वाहनों का इस्तेमाल करने वाले 11 प्रतिशत, टुक-टुक और बसों का इस्तेमाल करने वाले 15 प्रतिशत लोगों की तुलना में बहुत ज़्यादा है".
उन्होंने कहा, "इनकी इतनी संख्या होने के बाद भी जब परिवहन या सड़क सुरक्षा के बारे में नीतियां बनाने की बात आती है तो तब इन पैदल चलने वाले लोगों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है."
सड़क दुर्घटनाओं पर हाल के सरकारी अनुमान के अनुसार दोपहिया वाहन चलाने वाले लोगों के बाद सड़क दुर्घटनाओं में सबसे ज़्यादा पैदल चलने वाले लोगों की मौत हुई है.
साल 2022 में लगभग 10,000 पैदल चलने वाले लोगों की मौत नेशनल हाईवे पर हुई. वहीं लगभग 21,000 से ज़्यादा लोग घायल हुए.
म्हात्रे कहते हैं, "अधिकारी अक्सर सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए स्पीड ब्रेकर या सिग्नल लगाने जैसे तरीकों को अपनाते हैं, लेकिन इन सब चीज़ों से ज़्यादा अच्छे फुटपाथ बनाने की ज़रूरत है जो एक दूसरे से जुड़े हो ताकि उसपर ज़्यादा लोग चल पाए".

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फुटपाथ बनाने से कई लोगों को मिलेगा फायदा
अध्ययनों से पता चलता है कि फुटपाथ बनाने से पैदल चलने वाले लोगों को तो लाभ मिलता ही है. साथ ही कई और लोगों को भी इसका फायदा मिल सकता है.
साल 2019 में शोधकर्ताओं ने चेन्नई की 100 किलोमीटर लंबी सड़कों पर नए फुटपाथ बनाने के प्रभावों का अध्ययन किया. इसमें उन्होंने पाया कि फुटपाथ बनाने से पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है.
उन्होंने बताया कि नए फुटपाथ बनने के बाद सर्वे में शामिल 9 फ़ीसदी से 27 प्रतिशत लोगों ने कार या मोटरसाइकिल जैसे वाहनों का इस्तेमाल करने के बजाए पैदल चलना शुरू कर दिया है. इसमें हवा में ग्रीनहाउस गैस और प्रदूषण के कणों में कमी आई.
उन्होंने यह भी पाया कि नए फुटपाथ बनने से महिलाओं और कम वेतन वालों को भी लाभ मिला है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो पैदल चलकर पैसे बचा सकते हैं.
सर्वे से पता चला कि विकलांग लोगों और महिलाओं की फुटपाथ इस्तेमाल करने की अलग-अलग ज़रूरतें हो सकती है. इसलिए उनकी इन ज़रूरतों को समझकर हम उनके लिए सुविधाओं को बढ़ा सकते हैं.

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म्हात्रे कहते हैं, "भारत में लोगों को अच्छे फुटपाथ के बारे में जानकारी नहीं है. ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने शायद कभी दूसरे देशों की यात्रा नहीं की है या उन्होंने कभी अच्छी तरह से बने फुटपाथ नहीं देखे हैं."
उनका मानना है कि यही वजह है कि भारत में लोग फुटपाथ की ख़राब हालत या कमी से परेशान नहीं होते हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि ज़्यादातर लोग यह समझते हैं कि पैदल चलना एक मनोरंजन का काम है और इंसान इसे स्वस्थ्य रहने के लिए करते हैं. इसलिए वे केवल पार्कों में ही पैदल चलने के बारे में सोचते हैं.
लेकिन वास्तव में लोग कई कारणों से पैदल चलते हैं जैसे कि काम पर जाना या बाज़ार जाना. इसलिए हमें पार्कों के अलावा और भी सुविधाओं के बारे में सोचने की ज़रूरत है.
म्हात्रे कहते हैं, "पैदल चलना शहर में घूमने का सबसे किफायती और पर्यावरण को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है. इस कारण हमारे नेताओं को पैदल चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर सार्वजनिक परिवहनों की तरह ही ध्यान देने की ज़रूरत है.''
सिविल इंजीनियरिंग की प्रोफ़ेसर गीतम तिवारी का कहना है कि मुख्य समस्या यह है कि कारों के लिए ट्रैफिक जाम को ठीक करने पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया जाता है.
वह कहती हैं, "ट्रैफिक कम करने के लिए अधिकारी अक्सर फुटपाथों को छोटा कर देते हैं या उन्हें पूरी तरह से हटा देते हैं. यह एक समस्या है क्योंकि इससे लोगों के लिए बसों और मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहनों तक पैदल पहुंचना मुश्किल हो जाता है.
उनका कहना है कि यह बात सुनने में अजीब लगे, लेकिन भीड़- भाड़ को जारी रहने देने और पैदल यात्रियों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर ध्यान देने से लंबे समय में ट्रैफिक को कम करने में मदद मिलेगी.
गीतम तिवारी का यह भी कहना है कि केंद्र सरकार को राज्यों के लिए इंडियन रोड कांग्रेस की ओर से तय किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य कर देना चाहिए.
यह एक राष्ट्रीय संगठन है जो सड़कों और हाईवे के लिए मानकों को तय करता है.
गीतम तिवारी का कहना है कि शहर ख़ुद की नॉन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट पॉलिसी (एनएमटीपी) भी बना सकते हैं. जो शहरों को पैदल और साइकिल से चलने वाले लोगों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करेंगी.
उन्होंने कहा, "फिलहाल भारत में केवल कुछ ही शहरों ने एनएमटीपी का इस्तेमाल किया है, लेकिन अब समय आ गया है कि ज़्यादातर शहर इस दिशा में आगे बढ़ें."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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