जब वाघ-नख से मारा था शिवाजी ने अफ़ज़ल ख़ाँ को - विवेचना

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दिनों ख़बर आई कि वर्ष 1659 में शिवाजी ने जो छोटा हथियार इस्तेमाल किया था, उसे नवंबर में लंदन से भारत वापस लाया जाएगा.
लोहे से बने वाघ-नख का आकार शेर के पंजे की तरह है. इस हथियार का इस्तेमाल शिवाजी ने बीजापुर सल्तनत के जनरल अफ़ज़ल ख़ाँ को मारने के लिए किया था.
ये हथियार इस समय लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में रखा हुआ है.
भारत आने पर इसको मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में रखा जाएगा.
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के दस्तावेज़ों में बताया गया है कि ये हथियार ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर जेम्स ग्रांट डफ़ का है, जिसे उन्हें मराठों के पेशवा के प्रधानमंत्री ने उपहार स्वरूप दिया था.

इमेज स्रोत, Victoria and Albert Museum
अफ़ज़ल ख़ाँ का असली नाम अब्दुल्ला भटारी था. वो लंबी क़द काठी का था, जिसे कई बड़ी लड़ाइयाँ लड़ने का अनुभव था.
वर्ष 1656 के बाद बीजापुर पर हुए औरंगज़ेब की सेना के हमलों से निपटने की ज़िम्मेदारी उसे दी गई थी और उसने उन्हें सफलतापूर्वक अंजाम भी दिया था.
बीजापुर के नए नवाब अली आदिल शाह और मुख्य रानी बेगम बड़ी साहिबा सभी बड़े कामों की ज़िम्मेदारी अफ़ज़ल ख़ाँ को सौंपा करते थे.
मोहम्मद आदिल शाह के शासन पर लिखी किताब ‘मोहम्मदनामा’ में इस बात का ज़िक्र है कि किस तरह अफ़ज़ल ख़ाँ ने सिरा के राजा कस्तूरी रंगा को शाँति समझौते पर दस्तख़्त करने के बहाने अपने ख़ेमे में बुलाकर उसकी हत्या कर दी थी.
जदुनाथ सरकार अपनी किताब ‘शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स’ में लिखते हैं, "जब मोहम्मद आदिल शाह की मौत के बाद बीजापुर रियासत में सत्ता संघर्ष हुआ, तो बड़ी बेगम साहिबा के कहने पर एक के बाद एक तीन वरिष्ठ जनरलों की हत्या कर दी गई थी. इनमें कम से कम एक शख़्स ख़ान मोहम्मद की हत्या में अफ़ज़ल ख़ाँ का हाथ था."

इमेज स्रोत, BR Publication.
अफ़ज़ल ख़ाँ ने ली शिवाजी को पकड़ने की ज़िम्मेदारी
अफ़ज़ल ख़ाँ की शिवाजी के परिवार के प्रति पहले से दुश्मनी थी.
दरअसल शुरू में शिवाजी के पिता शाहजी राजे भोंसले और अफ़ज़ल ख़ाँ बीजापुर सल्तनत के लिए काम किया करते थे.
बाद में दोनों में अनबन हो गई थी और अफ़ज़ल ख़ाँ ने 1648 में देशद्रोह के आरोप में शिवाजी के पिता शाहजी को ज़ंजीरों में जकड़ कर बीजापुर तलब किया था.
शिवाजी और उनकी माँ जीजाबाई का मानना था कि 1654 में शिवाजी के बड़े भाई संभाजी की हत्या में भी अफ़ज़ल ख़ाँ का हाथ था.
शिवाजी के मन में अफ़ज़ल ख़ाँ की छवि एक ऐसे शख़्स की थी, जिसने उनके पिता के साथ बुरा सलूक किया था और उनके भाई की हत्या में भी उसका हाथ था.

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
दोस्ती का नाटक
जब बीजापुर में शिवाजी की गतिविधियाँ बढ़ गईं, तो बड़ी बेगम साहिबा ने अपने दरबारियों से पूछा कि वहाँ कोई ऐसा शख़्स है, जो शिवाजी को कुचलने की क्षमता रखता हो? सबसे पहले अफ़ज़ल ख़ाँ ने इस अभियान में जाने की हामी भरी.
डेनिस किनकेड अपनी किताब ‘शिवाजी द ग्रैंड रेबेल’ में लिखते हैं, "खुले दरबार में अफ़ज़ल ख़ाँ ने ऐलान किया कि वो शिवाजी को बंदी बनाकर लाएगा और वो भी बिना अपने घोड़े से उतरे हुए. वो उसे चूहे की तरह एक पिंजड़े में बंद कर राजधानी लाएगा ताकि यहाँ के लोग उसका उपहास कर सकें."
"निजी तौर पर वो शिवाजी को पकड़ने के बारे में इतना आश्वस्त नहीं था. जब उसने बड़ी बेगम साहिबा से मशविरा किया, तो उन्होंने सलाह दी कि वो शिवाजी से दोस्ती का झूठा नाटक कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करे."

इमेज स्रोत, rupa publications
अफ़ज़ल ख़ाँ का ज़ुल्म
अफ़ज़ल ख़ाँ ने शिवाजी को पकड़ने के अभियान की शुरुआत अप्रैल 1659 में की.
वो अपने साथ दस हज़ार सैनिकों को लेकर गया. सबसे पहले वो वाई की तरफ़ बढ़ा जहाँ वो कुछ समय तक शासन कर चुका था.
रास्ते में उसने पंढरपुर के कई मंदिरों को नुक़सान पहुँचाया. वहाँ के व्यापारियों, पुजारियों और किसानों से कहा गया कि वो उसकी सेना का ख़र्चा उठाएँ जो क़रीब ढाई लाख रुपए प्रति माह था.
जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "अफ़ज़ल ख़ाँ ने पलटन के देशमुख बाजाजी नायक निंबाल्कर को धमकी दी कि अगर उन्होंने उसे दो लाख रुपए की फ़िरौती नहीं दी, तो वो उनको हाथी से कुचलवा देगा."
"निंबालकर ने दो लाख रुपए देकर अपनी जान छुड़ाई. शिवाजी को इस बात का अंदाज़ा था कि अफ़ज़ल ख़ाँ की इन भड़काने वाली कार्रवाई का उद्देश्य उन्हें अपने गढ़ से बाहर खुले में निकलवाना था. लेकिन वो अफ़ज़ल ख़ाँ के झाँसे में नहीं आए."

इमेज स्रोत, Rao Saheb G.K
अफ़ज़ल ख़ाँ ने बनवाया लोहे का पिंजड़ा
शुरू में अफ़ज़ल ख़ाँ उत्तर में पूना जा कर शिवाजी के गढ़ में हमला करना चाहता था, लेकिन इसकी ख़बर मिलते ही शिवाजी पूना से हट गए क्योंकि वो जगह लड़ाई के लिए उपयुक्त नहीं थी.
उन्होंने जावली ज़िले को अपना ठिकाना बनाया. इस बीच अफ़ज़ल ख़ाँ ने एक लोहे का पिंजड़ा बनवाना शुरू कर दिया जिसमें शिवाजी को क़ैद कर वो बीजापुर ले जाने वाला था.
यहाँ से दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच चतुर कूटनीति का दौर शुरू हुआ.
वैभव पुरंदरे शिवाजी की जीवनी ‘शिवाजी इंडियाज़ ग्रेट वॉरियर किंग’ में लिखते हैं, "शुरू में शिवाजी को धमकाने और डराने के बाद अफ़ज़ल ख़ाँ ने अचानक उनके प्रति दयालुता का दिखावा शुरू कर दिया. शिवाजी ने भी ये आभास दिया जैसे वो अपने से कहीं ताक़तवर अफ़ज़ल ख़ाँ का सामना करने से डर रहे हों."

इमेज स्रोत, Juggernaut Publication
अफ़ज़ल ख़ाँ और शिवाजी के बीच चिट्ठियों का आदान-प्रदान
कुछ दिनों बाद अफ़ज़ल ख़ाँ ने अपने एक दूत कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी के ज़रिए शिवाजी को एक संदेश भिजवाया.
उन्होंने लिखा- "तुम्हारे पिता मेरे बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं. इसलिए तुम मेरे लिए अजनबी नहीं हो. मैं बादशाह आदिल शाह से कहकर दक्षिणी कोंकण में तुम्हारे क़ब्ज़े की ज़मीन और जागीर की पुष्टि करा दूँगा. मैं तुम्हारे द्वारा कब्ज़ा किए गए क़िलों को भी मान्यता दिलवा दूँगा. अगर तुम बादशाह से मिलना चाहते हो तो मैं इसका इंतज़ाम भी करवा दूँगा. अगर तुम वहाँ न जाना चाहो तो तुम्हें वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से छूट भी मिल सकती है."
शिवाजी ने अफ़ज़ल के दूत को उचित सम्मान दिया. रात को वो उनके शिविर में जा कर उनसे गुप्त रूप से मिले और उनसे पूछा कि अफ़ज़ल ख़ाँ की असली मंशा क्या है?
वो कुलकर्णी से इतना निकलवाने में सफल हो गए कि अफ़ज़ल उनके ख़िलाफ़ एक गहरा षड्यंत्र रच रहा है.
शिवाजी ने इस पत्र का जवाब अफ़ज़ल ख़ाँ के दूत के ज़रिए न भिजवा कर अपने दूत पंताजी गोपीनाथ के हाथ भिजवाया.
उन्होंने लिखा, "आपने कर्नाटक के सभी राजाओं पर जीत दर्ज की. मेरे प्रति आपने जो दयालुता दिखाई है, वो बड़ी चीज़ है. आप इस दुनिया के अनमोल रत्न हैं, जिसमें ज़रा भी धोखाधड़ी नहीं है."
"अगर आप इस जंगल का वैभव देखना चाहते हैं, तो जावली आकर इसे ख़ुद अपनी आँखों से देखिए. इससे मेरे मन में आपके प्रति सारी शंकाएँ दूर हो जाएँगी और मेरा सम्मान भी बढ़ेगा. अगर आप यहाँ आते हैं, तो मैं अपने हाथों से अपनी तलवार आपके सामने पेश करूँगा."

इमेज स्रोत, Maharashtra Government.
शिवाजी और अफ़ज़ल ख़ाँ की मुलाक़ात तय हुई
शिवाजी के इस कूटनीतिक पत्र का ऐसा असर हुआ कि अफ़ज़ल ख़ाँ न सिर्फ़ जावली जाने के लिए तैयार हो गया, बल्कि उसने प्रतापगढ़ क़िले के नीचे एक पहाड़ी पर शिवाजी से मिलने की भी हामी भर दी.
अफ़ज़ल ख़ाँ को लिखे शिवाजी के पत्र का आख़िरी वाक्य था कि ‘ये आमंत्रण सिर्फ़ आपके लिए नहीं, बल्कि आपकी सेना के लिए भी है.’ अफ़ज़ल ख़ाँ के लिए इस वाक्य का काफ़ी वज़न था.
जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "शिवाजी ने अपने लोगों को निर्देश दिए कि अफ़ज़ल ख़ाँ के सैनिकों को बेरोकटोक उनके इलाक़े में आने दिया जाए. तय हुआ कि 10 नवंबर, 1659 की दोपहर अफ़ज़ल ख़ाँ शिवाजी से मिलेगा. वो एक पालकी पर हथियार समेत प्रतापगढ़ क़िले के नीचे लगाए शामियाने में उतरेगा. वो अपने साथ दो या तीन सैनिकों को ला सकता है. शिवाजी को भी अपने हथियार और उतने ही सैनिक लाने की अनुमति दी गई. सहमति बनी कि जैसे ही अफ़ज़ल ख़ाँ वहाँ पहुँचेगा, शिवाजी क़िले से उतर कर उपहारों के साथ अफ़ज़ल ख़ाँ का स्वागत करेंगे."

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
शिवाजी ने अपने सैनिकों को जंगल में छिपाया
बैठक से एक दिन पहले शिवाजी ने अपने सैनिक जनरलों को बुलाकर कहा कि वो चुपचाप अपने सैनिकों को जंगल में तैनात कर दें और उनसे सावधान की मुद्रा में रहने के लिए कह दें.
शिवाजी को अपने जासूसों से ये पता चला कि अफ़ज़ल ख़ाँ के दल में बहुत से सुनार भी हैं, जो रास्ते में व्यापार करने की गरज से अपना सामान भी साथ लाए थे.
शिवाजी ने अफ़ज़ल ख़ाँ से अनुरोध किया कि वो उन सुनारों को प्रतापगढ़ भेज दें ताकि वो उनके ज़ेवरात ख़रीद कर बीजापुर की सल्तनत को तोहफ़े में दे सकें.
अफ़ज़ल ने उन सुनारों को तुरंत शिवाजी के पास रवाना किया और शिवाजी ने ये जताने के लिए कि उनकी मंशा साफ़ है, उनसे न सिर्फ़ बहुत सारे ज़ेवरात ख़रीदे बल्कि क़िले में उनको अपना मेहमान भी बनाया. बैठक से पूर्व शिवाजी ने अपने वरिष्ठ सहयोगियों की एक बैठक बुलाई.
जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "उन्होंने उन्हें निर्देश दिए कि अगर वो उस बैठक से जीवित वापस नहीं लौटते हैं तो किस तरह राज्य का प्रशासन चलाया जाएगा. अगर अफ़ज़ल ख़ाँ अपने शब्दों से फिर जाता है तो वो तोप का एक गोला दागने का आदेश देंगे. उसे सुनते ही शिवाजी के सैनिक अफ़ज़ल ख़ाँ के सैनिकों पर टूट पड़ेंगे."
अफ़ज़ल ख़ाँ अपने तीन सैनिकों के साथ शिवाजी से मिलने पहुँचा
10 नंवबर, 1659 की सुबह प्रतापगढ़ क़िले के प्रांगड़ में एक शामियाना लगाया गया.
उसकी छत को बहुत अच्छी तरह सजाया गया और फ़र्श पर क़ीमती कालीनें बिछाई गईं.

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
शिवाजी और अफ़ज़ल अपने साथ लाए तीन सहयोगी
वैभव पुरंदरे लिखते हैं, "शिवाजी ने सूर्य देवता को प्रणाम कर भवानी देवी की पूजा की और अपने आप को इस मुलाक़ात के लिए तैयार किया. दिन के भोजन के बाद उन्होंने एक सफ़ेद पोशाक पहनी. उसके नीचे उन्होंने लोहे का जिरह बख़्तर पहना. अपने सिर की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी कढ़ी हुई पगड़ी के नीचे एक लोहे की टोपी पहनी. अपनी दाहिनी आस्तीन में उन्होंने एक हथियार ‘बिछुआ’ रखा. अपने बाएँ हाथ में उन्होंने लोहे का शेर के पंजे की शक्ल का एक वाघ-नख इस तरह रखा कि उस पर किसी की सीधी नज़र न पड़ सके."
"उनके साथ उनके दो विश्वस्त सहयोगी जीवा महाला और संभाजी कावजी गए. जीवा को तलवार चलाने में महारत हासिल थी. दोनों के पास एक पट्टा (बिना मुड़ी तलवार) और फ़िरंग (विदेश में बनी तलवार और ढाल) था."
शिवाजी के एक दरबारी कृष्णाजी अनंत सभासद मराठी में लिखी गई शिवाजी की जीवनी ‘सभासद बखर’ में लिखते हैं, "जब अफ़ज़ल शिवाजी से मिलने निकला तो उसके साथ क़रीब एक हज़ार सैनिक थे. शिवाजी के दूत पंताजी गोपीनाथ ने अफ़ज़ल ख़ाँ के पास जाकर कहा कि इतने सैनिकों को अपने साथ ले जाना पहले से तय हुई शर्तों का उल्लंघन होगा."
"शिवाजी इतने सैनिकों को देख कर क़िले में वापस चले जाएँगे और हो सकता है कि ये मुलाक़ात न हो पाए. यह सुनकर अफ़ज़ल ने अपने सैनिकों को रोक लिया. वो अपने साथ सिर्फ़ 10 विश्वस्त सैनिकों को ले गया, जिसे उसने बैठकस्थल से कुछ दूरी पर खड़ा किया और अपने साथ उसने अपने तीन सहयोगी रखे."

इमेज स्रोत, Krishnaji Sabhasad
अफ़ज़ल ख़ाँ ने शिवाजी की गर्दन को अपनी गिरफ़्त में लिया
जब शिवाजी तक ख़बर पहुँच गई कि अफ़ज़ल ख़ाँ शामियाने में पहुँच चुका है, तो शिवाजी ने क़िले से नीचे उतरना शुरू किया.
जब शिवाजी शामियाने में घुसे तो अफ़ज़ल ख़ाँ वहाँ बने एक चबूतरे पर खड़े हुए थे.
डेनिस किनकेड लिखते हैं, "अफ़ज़ल ख़ाँ ने शिवाजी को देखते ही चिल्लाना शुरू कर दिया कि एक साधारण ज़मींदार का लड़का किस तरह राजकुमारों की तरह अपने शामियाने को सजा सकता है? शिवाजी ने जवाब दिया कि ये गद्दे और कालीनें उनके अपने आराम के लिए नहीं बल्कि बीजापुर रियासत के प्रतिनिधि के स्वागत में बिछाई गई हैं जो उनके साथ बीजापुर के राजमहल भेजी जाएँगी. अफ़ज़ल खाँ को ये बात अच्छी लगी और उसने मुस्कुराते हुए शिवाजी को गले लगाने के लिए अपनी बाँहें फैला दीं."
शिवाजी क़द में अफ़ज़ल ख़ाँ से बहुत छोटे थे और सिर्फ़ उसके कंधे तक आते थे.
जब ये दोनों गले मिल रहे थे तभी शिवाजी ने अपने आप को असहज महसूस किया. एक सेकेंड से भी कम समय में अफ़ज़ल ख़ाँ ने अपने बाएँ हाथ से शिवाजी की गर्दन को अपनी बाँहों में जकड़ लिया.
ये एक पहलवान की पकड़ थी. फिर उसने अपने दाहिने हाथ से खंजर से शिवाजी पर वार किया.
उन्होंने चूँकि अपने कपड़ों के नीचे जिरह बख़्तर पहन रखा था, इसलिए उसका उन पर कोई असर नहीं हुआ.
डेनिस किनकेड आगे लिखते हैं, "शिवाजी ने अफ़ज़ल ख़ाँ की पकड़ से निकलने की कोशिश की लेकिन उसने और ज़ोर से शिवाजी की गर्दन को जकड़ लिया. तब शिवाजी ने साँप की तरह मुड़ते हुए पहले अपनी बाँह को आज़ाद कराया और बाईं हथेली में छिपे वाघ-नख को अफ़ज़ल की पीठ में घुसा दिया. फिर उन्होंने दाएँ हाथ से बिछुए से अफ़ज़ल के पेट पर वार किया. अफ़ज़ल ख़ाँ दर्द में चिल्ला कर बोला- धोखा ! धोखा ! इसने मुझ पर हमला किया. इसे तुरंत मार डालो.’’

इमेज स्रोत, Swarajmag.com
अफ़ज़ल ख़ाँ और उसके साथियों की मौत
ये सुनते ही कुछ ही दूरी पर खड़े अफ़ज़ल ख़ाँ और शिवाजी के सैनिक उनकी तरफ़ दौड़े.
सैयद बंदा ने अपनी तलवार से शिवाजी के सिर पर हमला किया. लेकिन उनकी पगड़ी के अंदर लोहे की टोपी ने उन्हें बचा लिया.
तभी जीवा महाला ने अपनी तलवार से सैयद के दाहिने हाथ पर हमला कर उसे बेकार कर दिया.
वैभव पुरंदरे लिखते हैं, "घायल अफ़ज़ल ख़ाँ को उसके अंगरक्षक शामियाने से निकाल कर पालकी पर बैठाने में सफल हो गए. शिवाजी के लोगों ने उनका पीछा किया. सबसे पहले शंभूजी कावजी ने पालकी उठाने वालों के पैरों पर वार किया."
"पालकी नीचे गिरने के बाद उन्होंने अफ़ज़ल ख़ाँ का सिर काट लिया. वो उसे शिवाजी के पास ले गए. मराठा सैनिकों ने एक एक कर अफ़ज़ल के भतीजों रहीम ख़ाँ, अब्दुल सईद और उसके मराठा हिंदू साथियों पीलाजी, शंकराजी मोहिते और कुलकर्णी को मार डाला. शिवाजी के साथियों में एक अबीसीनियन मुस्लिम इब्राहीम सिद्दी भी था."

इमेज स्रोत, Webduniya.
शिवाजी के सैनिकों ने हमला बोला
थोड़ी ही देर में क़िले से बिगुल बजा दिया गया. इसे सुनते ही जंगल में छिपे शिवाजी के सैनिकों ने बाहर निकल कर चारों तरफ़ से अफ़ज़ल ख़ाँ के सैनिकों पर हमला बोल दिया.
अफ़ज़ल ख़ाँ के सैनिकों पर ये हमला अचानक किया गया था, जिसकी उन्हें दूर-दूर तक उम्मीद नहीं थी.
कुछ सैनिकों ने तो तुरंत मैदान छोड़ दिया, लेकिन कुछ सैनिकों ने शिवाजी के सैनिकों का मुक़ाबला किया लेकिन वो चारों तरफ़ से घिर चुके थे और ऐसी जगह लड़ रहे थे जहाँ लड़ने का उन्हें कोई तजुर्बा नहीं था.
कुछ दिनों बाद अंग्रेज़ों की राजापुर फ़ैक्टरी में पहुँचने वाली रिपोर्ट में कहा गया कि इस लड़ाई में क़रीब 3000 सैनिक मारे गए.

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "इस लड़ाई के बाद शिवाजी के सैनिकों के हाथ काफ़ी धन लगा. उन्होंने 4000 घोड़े, 1200 ऊँट, 65 हाथी और 10 लाख रुपए नकद अफ़ज़ल ख़ाँ के सैनिकों से छीने. ऐलान किया गया कि जो लोग हथियार डालना चाहते हैं, वो अपने दाँतों में घास का एक टुकड़ा दबा लें. जिन लोगों ने ऐसा किया उन लोगों की जान बख़्श दी गई."
लड़ाई में मरने वाले शिवाजी के सैनिकों की विधवाओं को उन्होंने पेंशन की घोषणा की.
जब अफ़ज़ल ख़ाँ की हार की ख़बर बीजापुर पहुँची, तो पूरे राज्य में शोक छा गया. बड़ी बेगम साहिबा ने अपने आप को एक कमरे में बंद कर खाना पीना छोड़ दिया.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















