भीमा-कोरेगांव हिंसा के बाद कैसे बदली महाराष्ट्र की राजनीति

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- Author, मयूरेश कोण्णूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
1 जनवरी 2018 के दिन महाराष्ट्र में पुणे के पास भीमा-कोरेगांव इलाक़े में हिंसा भड़की थी. जिसकी प्रतिक्रिया राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश में दिखाई दी.
हिंसा के कारणों और प्रतिक्रिया के बाद लंबी न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई. अलग-अलग मामले दर्ज हुए और जांच शुरू हुई. इस घटना का सीधा असर महाराष्ट्र की राजनीति पर भी हुआ और 2019 के चुनाव में देखने को भी मिला.
इस घटना के एक साल के भीतर ही महाराष्ट्र की जनता को लोकसभा और विधानसभा चुनाव से गुज़रना था. इन चुनावों में जो वोटिंग पैटर्न नज़र आया उसमें भीमा-कोरेगांव की उस घटना का सीधा असर देखा जा सकता है.
हिंसा के बाद दलित समुदाय नाराज़ हो गया, उसने न सिर्फ़ सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की बल्कि सड़क पर उतर कर आंदोलन भी किया.
रामदास अठावले की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी आरपीआई दलित समुदाय का बड़ा राजनीतिक प्लेटफॉर्म है.
भीमा कोरेगांव की घटना के बाद सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ़ माहौल बना. बीजेपी सरकार में आरपीआई अठावले गुट शामिल था.

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प्रकाश आंबेडकर की भूमिका
हिंसा के बाद प्रकाश आंबेडकर की भूमिका अहम रही. वह इस पूरे मामले पर काफ़ी आक्रामक नज़र आए जिसकी वजह से आंबेडकर बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए.
यह असर इतना बड़ा था कि प्रकाश आंबेडकर ने मार्च 2018 में वंचित बहुजन आघाड़ी पार्टी की स्थापना की. दलित और पिछड़ों के लिए एक नया नेतृत्व मिला.
वंचित बहुजन आघाड़ी ने 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में नए राजनीतिक समीकरण बनाए. कई कारगर साबित हुए और कई विफल भी. बताया जा रहा है कि इसके कारणों में अहम थी, भीमा-कोरेगांव की हिंसा.

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वंचित बहुजन आघाड़ी और एमआईएम एक साथ
वंचित बहुजन आघाड़ी को दलित समुदाय से काफ़ी समर्थन मिला. लोकसभा चुनाव के पहले प्रकाश आंबेडकर ने एमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन भी कर लिया जिससे राज्य में दलित-मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कोशिश की गई.
प्रकाश आंबेडकर बार-बार यही कहते नज़र आए कि आघाड़ी केवल दलित और मुस्लिम ही नहीं बल्कि सभी पिछड़ों को मुख्य धारा में लाने का एक प्रयास है.
ऐसे भी कयास लगाए जाने लगे कि सत्ताधारी बीजेपी का विरोध करने के लिए वंचित आघाड़ी, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के साथ जा सकती है. लोकसभा चुनाव में ऐसी कोशिश भी हुईं लेकिन कांग्रेस की मानें तो प्रकाश आंबेडकर ने बेतुकी मांग सामने रखी और मामला आगे नहीं बढ़ पाया.
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने प्रकाश आंबेडकर पर 'बीजेपी की बी टीम' होने का आरोप लगाया. इसके पीछे कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति भी थी.
पारंपरिक तौर पर दलित और मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस-एनसीपी के वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है. अगर यह वोट वंचित बहुजन आघाड़ी के पास जाते तो उसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को हो सकता था. लेकिन, आंबेडकर हमेशा इन आरोपों को नकारते रहे.

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वंचित आघाड़ी का कांग्रेस को झटका
आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में वंचित आघाड़ी पार्टी ने कांग्रेस को झटका दे दिया. कांग्रेस सिर्फ़ एक ही सीट पर जीत पाई. अशोक चव्हाण जैसे बड़े नेता को हार का सामना करना पड़ा.
दूसरी ओर वंचित बहुजन आघाड़ी की बात करें तो कुछ इलाक़ों में उनका वोट शेयर बढ़ा था. प्रकाश आंबेडकर हारे लेकिन एमआईएम के इम्तियाज़ जलील औरंगाबाद से सांसद बने.
इसके बाद महाराष्ट्र में मतदाताओं को लेकर पहले से बनी धारणा टूट गई और ये भीमा-कोरेगांव हिंसा के बाद बने नए राजनीतिक माहौल नतीजा था.

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बीजेपी की जीत में वंचित आघाड़ी की भूमिका
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने लोकसभा चुनाव का विश्लेषण करते हुए कहा था, "भीमा-कोरेगांव हिंसा के बाद सही मायने में प्रकाश आंबेडकर का नेतृत्व सामने आया. वंचित आघाड़ी और एमआईएम के उम्मीदवार भले ही नहीं जीते लेकिन कांग्रेस और एनसीपी का वोट बैंक तोड़ने में वो सफल रहे.
रवीश कुमार ने कहा था, "नांदेड़ में अशोक चव्हाण की हार के पीछे वंचित आघाड़ी ही कारण है. बीजेपी की सफलता में उनकी भूमिका अहम रही है."
भीमा-कोरेगांव हिंसा के बाद हुए लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का ध्रुवीकरण साफ़ नज़र आया. ये भी कहा जा रहा था इसका असर विधानसभा चुनाव में भी दिखाई देगा.

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'अगला विपक्ष नेता वंचित आघाड़ी का'
वंचित बहुजन आघाड़ी का दबदबा इस तरह से बढ़ रहा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि "महाराष्ट्र का अगला विपक्षी नेता वंचित आघाड़ी का होगा."
लोकसभा चुनाव मे वंचित आघाड़ी को अच्छी संख्या में वोट मिले थे. इस पार्टी का वोट शेयर बढ़ा था.
कहा जा रहा था कि महाराष्ट्र के जातीय राजनीतिक माहौल को देखते हुए लोकसभा के मुक़ाबले विधानसभा में वंचित आघाड़ी का पलड़ा भारी रहेगा. छोटे चुनाव क्षेत्र में पार्टी को मिले वोट को देखते हुए यह कयास लगाया जा रहा था कि इसके उम्मीदवार जीतेंगे.
लेकिन, तब असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम से वंचित आघाड़ी का गठबंधन नहीं हो सका. दलित और मुस्लिम समुदाय को एकसाथ लाने का प्रयास विफल रहा.
कांग्रेस के साथ वंचित आघाड़ी की बातचीत चल रही थी लेकिन उससे कुछ ठोस निकलकर नहीं आया. विधानसभा चुनाव के प्रचार में अनुच्छेद 370 का मुद्दा ही हावी रहा. साल भर पहले जिस भीमा-कोरेगांव के मुद्दे को लेकर राजनीति में जो उफ़ान था वह पीछे छूट गया.

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नहीं जीता एक भी उम्मीदवार
विधानसभा चुनाव में वंचित बहुजन आघाड़ी को एक भी सीट नहीं मिली लेकिन उनके उम्मीदवारों को अच्छे वोट मिले. आँकड़ों का विश्लेषण करें तो 10 विधानसभा क्षेत्रों में उनके उम्मीदवार दूसरे पायदान पर रहे.
21 चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें पार्टी के उम्मीदवार भले ही तीसरे नंबर रहे हों लेकिन उन्होंने पहले और दूसरे पायदान पर खड़े उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी है जिससे एक बात साफ़ होती है कि राज्य में वंचित-बहुजन समुदाय के वोट एकजुट हो गए हैं.
पुराने समीकरण बदलते जा रहे हैं.
महाराष्ट्र की राजनीति
जानेमाने पत्रकार अरुण खोरे पिछले कई सालों से महाराष्ट्र के दलित वोट और उस पर राज्य में होने वाली राजनीति पर नज़र बनाए हुए हैं. खोरे की बात मानें तो भीमा-कोरेगांव का सीधा असर महाराष्ट्र की राजनीति पर हुआ है.
अरुण खोरे कहते हैं, "एक बात ज़रूर हुई है कि प्रकाश आंबेडकर का नेतृत्व सामने आया है. महाराष्ट्र में पुरोगामी, वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के जिन लोगों का अलग-अलग नेतृत्व था उन्हें एक विकल्प मिल गया. लेकिन, पुराने और नए नेतृत्व में तालमेल होना ज़रूरी था जो नहीं हो पाया और इस कारण दोनों का नुकसान हो गया."
अरुण खोरे का मानना है, "एक बात सामने आ गई है कि भीमा कोरेगांव मामले के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों बड़ी पार्टियां दलित समुदाय की जनभावना समझने में नाकामयाब रही हैं. खासकर बीजेपी ने भीमा कोरेगांव का आकलन अपनी सुविधा के अनुसार किया. कुछ लोगों की जांच हुई, कुछ पर कार्रवाई भी की गयी, जिसके चलते बीजेपी का दलित जनाधार टूट गया."

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बीजेपी विरोधी गठबंधन की शुरुआत
पत्रकार अभय देशपांडे के अनुसार भीमा कोरेगांव मसले के चलते महाराष्ट्र के सामाजिक ढांचे को ठेस पहुंची, जिसका असर राजनीति पर भी दिखाई दिया.
अभय देशपांडे कहते हैं, "आज जो बीजेपी विरोधी गठबंधन सामने आया है, उसकी शुरुआत भीमा-कोरेगांव के बाद हुई. विरोधी एकजुट होना शुरू हो गए. 2014 के चुनाव में दलित समुदाय ने भी बीजेपी को समर्थन दिया. 2019 में यह दलित समाज अपनी भूमिका में वापस लौटा लेकिन उसका फायदा कांग्रेस को नहीं हुआ, तब उसके सामने वंचित बहुजन आघाड़ी का विकल्प खड़ा हुआ था. मतों के इस विभाजन का फायदा बीजेपी को हुआ."
अभय देशपांडे के मुताबिक, "लेकिन विधानसभा परिणाम में इसका विपरीत देखने को मिला. लोकसभा चुनाव के दौरान 227 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन आगे था. विधानसभा चुनाव का ये आंकड़ा 116 चुनाव क्षेत्र तक नीचे आ गया. बीजेपी के दलित, ओबीसी और मराठा वोटों में कमी आ गई."

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दलित समुदाय एकसाथ
वैभव छाया आंबेडकरी विचारधारा के युवा चेहरे के तौर पर उभर कर सामने आए हैं. वह अलग-अलग विषयों पर अपनी राय रखते हैं.
वैभव का कहना है, "भीमा कोरेगांव के बाद जो दलित सुमदाय टुकड़ों में बंटा था वो एकसाथ आ गया. जिसके कारण प्रकाश आंबेडकर का नेतृत्व सामने आया."
"लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति पर इसका आगे क्या असर होता है यह देखना ज़रूरी है. किसी भी घटना का स्थायी परिणाम नहीं हो सकता लेकिन भीमा कोरेगांव हिंसा के ज़ख्म अब तक भरे नहीं हैं."
भीमा कोरेगांव की घटना का असर सिर्फ़ चुनाव के परिणाम या फिर वंचित बहुजन आघाड़ी तक सीमित नहीं रखा जा सकता. यह राजनीतिक चर्चा का विषय है.
मसलन एल्गार परिषद के बाद पुणे पुलिस की जांच और उसके बाद शुरू हुआ गिरफ़्तारी का सिलसिला. इन गिरफ़्तारियों के राजनीतिक परिणाम देश में दिखाई दिए. अब तक उसकी प्रतिक्रिया दिख रही है.
महाराष्ट्र में अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास आघाड़ी की सरकार बनी है. सरकार बनने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार ने पुणे पुलिस की जांच पर सवाल खड़े किए हैं. जांच की मांग भी की है. इससे भी एक राजनीतिक माहौल बनता नज़र आ रहा है.
वहीं भीमा-कोरेगांव मामले में हिंदुत्ववादी नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े पर मामले दर्ज हुए हैं. इसे भी राजनीतिक रंग दिया जा रहा है.
ये साफ़ है कि भीमा-कोरेगांव का असर महाराष्ट्र की राजनीति पर अब भी देखा जा रहा है और इसके आगे भी कायम रहने की संभावना है.
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