कौन हैं हरियाणा में रहने वाले मराठा?

रोड मराठा के युवा जुलूस निकालते हुए

इमेज स्रोत, FACEBOOK/CSVP

इमेज कैप्शन, रोड मराठा के युवा जुलूस निकालते हुए
    • Author, निरंजन छानवाल
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

क्या आपने कभी भूपिंदर भोसले और सतिंदर पाटिल जैसे नाम सुने हैं?

इसकी संभावना कम है लेकिन हरियाणा की रोड मराठा समुदाय के बहुत से लोग ऐसे नामों को जानते हैं. इनकी पहचान की कहानी, इनकी उत्पत्ति की तरह ही रोचक है.

यह सब 257 साल पहले शुरू हुआ था जब सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व वाली मराठा सेना वर्तमान हरियाणा के पानीपत गई थी. अफ़ग़ानिस्तान के राजा अहमद शाह अब्दाली के साथ मराठाओं की जंग हुई.

14 जनवरी 1761 को मराठा बुरी तरह से लड़ाई हार गए और उस दिन तकरीबन 40 से 50 हज़ार मराठा जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया.

इस समुदाय की जड़ों को लेकर 10 साल तक अध्ययन करने वाले इतिहासकार डॉक्टर वसंतराव मोरे कहते हैं, "कुछ जवान भागने में सफ़ल रहे और पास के इलाकों में छिप गए. वह मराठाओं के रूप में ख़ुद के पहचाने जाने से डरे हुए थे इसलिए उन्होंने रोड के जवानों के रूप में ख़ुद को पहचान दिया जाना चुना. रोड पड़ोसी साम्राज्य के राजा थे."

मोरे आगे कहते हैं, "रोड उनकी असली जड़ों के बारे में नहीं जानते थे लेकिन उन्होंने उनकी जितना रक्षा कर सकते थे उतनी करने की कोशिश की. इनकी कुछ परंपराएं वैसी ही हैं जैसे महाराष्ट्र में होती हैं. इनकी हिंदी में कुछ मराठी शब्द पाए जाते हैं. आइन-ए-अकबरी में रोडों का कोई ज़िक्र नहीं है. इनका संदर्भ केवल पानीपत की लड़ाई के बाद पाया जाता है."

पानीपत का युद्ध स्मारक

इमेज स्रोत, NIRANJAN CHHANWAL/BBC

इमेज कैप्शन, पानीपत का युद्ध स्मारक

पहचान में बदलाव

पानीपत स्थित हथकरघा व्यापारी नफ़े सिंह इस समय 72 साल के है. न ही उन्हें मराठी आती है और न ही वह कभी महाराष्ट्र गए लेकिन उन्हें कभी भी कोई महाराष्ट्र का शख़्स मिल जाता है तो वह ख़ुशी से झूम उठते हैं.

नफ़े सिंह कहते हैं, "1761 के बाद सभी मराठा महाराष्ट्र वापस लौट गए. उनमें से कुछ कुरुक्षेत्र और करनाल के अंदर जंगलों में रह गए. वे अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित थे. इनमें से केवल 250 लोग बचे. इनमें से जो भी उनके बारे में पूछता तो वह राजा रोड के बारे में बताते. कुछ की पहचान पीढ़ियों तक जारी रही. और तो और अगली पीढ़ी अपनी असली पहचान के बारे में भूल गई."

वह आगे कहते हैं, "हमारी जड़ें महाराष्ट्र में हैं. हमारे पूर्वज महाराष्ट्र से संबंध रखते थे. हम कभी गुज्जर, जाट या राजपूतों में अपनी पहचान के निशान नहीं ढूंढ पाए."

डॉक्टर मोरे द्वारा लिखी गई किताब रोड मराठों का इतिहास पढ़ने वाले नफ़े सिंह कहते हैं, "साल 2000 में हमें अपनी असली पहचान के बारे में पता चला. पूर्व नौकरशाह वीरेंद्र सिंह ने रोडों की जड़ों के बारे में जानने की शुरुआत की. कोल्हापुर के इतिहासकार डॉक्टर वसंतराव मोरे ने उनकी मदद की."

नफ़े सिंह और सुल्तान सिंह

इमेज स्रोत, NIRANJAN CHHANWAL/BBC

इमेज कैप्शन, नफ़े सिंह और सुल्तान सिंह

कितने हैं रोड मराठा?

आज रोड गर्व से ख़ुद को 'रोड मराठा' बताते हैं. वे मुख्य रूप से पानीपत, करनाल, सोनीपत, कैथल और रोहतक के इलाकों में रहते हैं. रोडों की कुल जनसंख्या के बारे में जानकारी नहीं है लेकिन डॉक्टर मोरे हरियाणा में रोड मराठाओं की कुल आबादी छह से आठ लाख बताते हैं.

अपनी नई पहचान प्राप्त करने के बाद रोड एक समुदाय के झंडे तल एकजुट हो रहे हैं. 'रोड मराठा जागृति मंच' ने अपने समुदाय के युवाओं के लिए करनाल और पानीपत में हॉस्टल स्थापित किए हैं.

सुल्तान सिंह कहते हैं, "यह मंच रोड मराठाओं के इतिहास को लेकर जागरूकता फैलाता है."

रोड मराठाओं की संख्या सीमित और कुछ इलाकों में ज़रूर फैली हुई हो लेकिन राजनेता उनसे दूर नहीं हैं.

एक स्थानीय पत्रकार मनोज ढाका बताते हैं, "अब रोड मराठा समुदाय राजनीतिक रूप से अपना अस्तित्व साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता रोड मराठाओं के कार्यक्रम में शामिल होते हैं."

महाराष्ट्र के नेताओं ने यहां आना शुरू किया है. इस क्षेत्र में जब एनसीपी नेता उदयराजे भोंसले आए तो बीजेपी ने भी गोपीनाथ मुंडे को यहां भेजा.

मराठा जागृति मंच का पोस्टर

इमेज स्रोत, NIRANJAN CHHANWAL/BBC

शिवाजी के लिए नया प्यार

रोड मराठा हिंदी बोलते हैं, स्थानीय हरियाणवी खाना खाते हैं और हरियाणवी त्यौहार मनाते हैं. वह स्थानीय कपड़े और पगड़ी पहनते हैं.

हालांकि, इनके उपनामों में मराठी जैसे पवार, चव्हाण, भोंसले, सावंत, बोडेल और शेलार्स जैसे दूसरे नाम भी होते हैं. इसके अतिरिक्त अब इन्होंने 'मराठा' को एक प्रत्यय के रूप में जोड़ना शुरू कर दिया है.

पहचान की राजनीति के आज के दौर में रोड समुदाय के लोग अपनी जड़ों को लेकर गर्व महसूस करते हैं और इनका कोई भी समारोह शिवाजी के नारे के साथ शुरू होता है. समुदाय के युवाओं ने छत्रपति शिवाजी विद्यार्थी परिषद स्थापित की है और इन्होंने शिवाजी की राजधानी रही रायगढ़ और उनके जन्मस्थान सिंदखेड राजा का दौरा आयोजित करते हैं.

परिषद के गौरव मराठा कहते हैं, "हम शिवाजी महाराज के आदर्शों का पालन कर रहे हैं. हम अपने लोगों को एकजुट और समाज के लिए काम करते हैं."

पानीपत युद्ध का एक चित्रण

इमेज स्रोत, BRITISH LIBRARY

इमेज कैप्शन, पानीपत युद्ध का एक चित्रण

हार का जश्न क्यों?

14 जनवरी को पानीपन की लड़ाई हारने पर रोड मराठा इस दिन को 'शौर्य दिन' के रूप में मनाते हैं.

गौरव मराठा कहते हैं, "सिर्फ़ मराठा ही नहीं बल्कि जाट, पटेल और कुर्मी भी स्मारक का दौरा करते हैं."

जश्न का कारण पूछने पर गौरव कहते हैं, "हालांकि, मराठा लड़ाई हारे थे लेकिन मराठा सेना बहादुरी से लड़ी थी."

लड़ाई का मैदान कहे जाने वाले 'काला आम' में एक स्मारक भी है. ऐसा माना जाता है कि जब ज़मीन खून से भर गई थी तो पेड़ काले पड़ गए थे. करनाल से पानीपत तक रोड मराठा एक बाइक रैली में भाग लेंगे. इंदौर के आध्यात्मिक गुरु भय्युजी महाराज और नागपुर के शाही परिवार के मुधोजीराजे भोंसले समारोह में भाग लेंगे.

'काला आम' स्थित स्मारक

इमेज स्रोत, RAVINDRA MANJREKAR/BBC

इमेज कैप्शन, 'काला आम' स्थित स्मारक

एक अलग कहानी भी

डॉक्टर मोरे के प्रसिद्ध सिद्धांत पर सवाल खड़े करते हुए इतिहासकार पांडुरंग बल्कावडे कहते हैं, "पानीपत की तीसरी लड़ाई के दस साल बाद महदजी शिंदे और तुकोजी होल्कर के नेतृत्व में मराठाओं ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया. उस समय उन्होंने पानीपत, सोनीपत, बाग़पत आदि पर भी कब्ज़ा किया. इस वजह से कुछ मराठा सैनिक यहीं रह गए. इसके बाद मराठा साम्राज्य कमज़ोह हुआ और 1800 के आसपास उत्तरी क्षेत्र से उसकी पकड़ छूट गई. कुछ मराठा सैनिकों ने वापस जाना तय किया. उन सैनिकों के वंशज रोड मराठा कहलाए.

इस वंशावली के डीएनए टेस्ट किए जाने का सवाल जब पूछा गया तो डॉक्टर मोरे कहते हैं कि इसकी ज़रूरत नहीं थी और उनकी बात सही साबित होगी.

लेकिन ऐसे सवाल युवा रोड मराठाओं को परेशान नहीं करते, वह अपनी नई पहचान के साथ ख़ुश हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)