हज़ारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाली पूजा ने क्यों लिया ये काम करने का फ़ैसला

पूजा
इमेज कैप्शन, हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार पुरुष रिश्तेदार करता है, लेकिन पूजा ने इसे तोड़ा.
    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, दिल्ली

दिल्ली में अपने छोटे से फ़्लैट में एक तरफ़ बैठी पूजा शर्मा अपने मोबाइल फ़ोन पर अस्पताल में किसी से बात कर रही हैं.

इस बातचीत के दौरान उन्हें बताया गया कि दक्षिणी दिल्ली के एक अस्पताल में एक लावारिस लाश का पोस्टमार्टम हो चुका है और अब उन्हें इसका अंतिम संस्कार करवाना है.

पूजा अपनी एंबुलेंस लेकर उस अस्पताल पहुंचती हैं. वहां काग़ज़ी कार्रवाई के बाद लाश को उनके हवाले कर दिया जाता है. वह इस लाश को एक आधुनिक इलेक्ट्रिक श्मशान घाट ले जाकर धार्मिक विधि विधान के साथ उसका अंतिम संस्कार कर देती हैं.

वह दिन में कई बार इसी तरह अलग-अलग अस्पतालों के मुर्दाघरों से लावारिस और गुमनाम शव श्मशान घाट में ले जाकर, उनका अंतिम संस्कार करवाती हैं. उनके लिए ये हर दिन का काम है.

लाल रेखा

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सत्ताइस साल की पूजा शर्मा के अनुसार, वह अब तक लगभग पांच हज़ार लावारिस लाशों का अपने हाथों से इसी तरह अंतिम संस्कार कर चुकी हैं.

गुमनाम लाशें शहर के विभिन्न क्षेत्रों में मुर्दा पाए जाने वाले लोगों की होती हैं जिनकी पहचान करने वाला या कोई वारिस और रिश्तेदार सामने नहीं आता.

पूजा शर्मा कहती हैं कि वह उनका अंतिम संस्कार इसलिए करती हैं ताकि कम से कम कोई तो मर जाने के बाद उन लोगों की परवाह करने वाला हो.

वह कहती हैं, "अगर मरने वाला मुसलमान हो तो मैं उन्हें क़ब्रिस्तान ले जाती हूं, अगर इसाई हो तो सिमेट्री ले जाती हूं और अगर सनातनी यानी हिंदू हैं तो उसे श्मशान घाट. मैं अब तक पांच हज़ार से ज़्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करवा चुकी हूं."

पूजा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने के लिए दिल्ली में एक ग़ैर सरकारी संगठन (एनजीओ) भी चलाती हैं. लावारिस लाशों का पता लगाने और उन्हें श्मशान घाट तक पहुंचाने के लिए वह शहर के अस्पतालों और पुलिस से संपर्क में रहती हैं. जब भी जहां भी ज़रूरत होती है, वह वहां पहुंचती हैं.

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पूजा ने बताया कि शुरू में तो उन्होंने सामाजिक सेवा का यह काम अपने माता-पिता से पैसे लेकर या फिर अपने ख़र्चे पर किया.

वो कहती हैं, "लेकिन बाद में सोशल मीडिया पर मेरे बारे में लोगों को पता चला जिसके बाद लोगों ने मेरी मदद करनी शुरू कर दी. मैंने लोगों की मदद से एक एंबुलेंस ख़रीदी जो गुमनाम शवों के अंतिम संस्कार और ग़रीब लोगों की मदद के लिए समर्पित है."

पूजा कहती हैं कि उन्हें यह सब करने का ख़याल अपने सगे भाई की मौत के बाद आया क्योंकि अपने घर में अपने पिता के बाद वही थीं जिन्हें सारा काम करना पड़ा था.

उस वक़्त को याद करते हुए पूजा कहती हैं, "13 मार्च 2022 का दिन था, जब मेरे बड़े भाई की मौत हुई. इसका सदमा मेरे पिता के लिए इतना ज़्यादा था कि वह उसे बर्दाश्त न कर सके और कोमा में चले गए."

उनका कहना है, "अपने पिता की हालत और बड़े भाई की मौत के बाद अब जो करना था वह मुझे ही करना था. ऐसे में जब हिम्मत करके सब ख़ुद करने की ठान ली तो पता चला कि भाई का अंतिम संस्कार करने के लिए तो घर में कुछ भी नहीं है."

पूजा ने बताया, "पारंपरिक तौर पर केवल पुरुष ही अंतिम संस्कार कर सकता है मगर जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने यह सब ख़ुद करने की ठानी और हिम्मत करके विधि विधान से आगे निकलकर अपने भाई का अंतिम संस्कार ख़ुद अकेले किया."

अपनी इस व्यक्तिगत तकलीफ़ और मुश्किल की घड़ी में किसी के साथ न होने के अनुभव ने उनके मन पर गहरा असर डाला. पूजा बताती हैं कि उन्होंने सोचा कि जब समाज में लोग मदद के लिए आगे नहीं आते तो उन लोगों को तो कोई पूछने वाला नहीं होगा जिनका इस दुनिया में कोई नहीं.

पूजा ने फ़ैसला किया कि वह उन गुमनाम और लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार ख़ुद करवाएंगी जिनका इस दुनिया में कोई वारिस नहीं.

धारणाएं तोड़ने की चुनौतियां

हालांकि, पूजा बताती हैं कि उनके लिए यह रास्ता आसान नहीं था. इस काम में उन्हें बहुत सी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा. वो कहती हैं कि उनके काम में रुकावट भी डाली गई. बरसों से चले आने वाले रस्मो-रिवाज़ को तोड़ने की वजह से वह आलोचना का शिकार भी बनीं.

पूजा ने बीबीसी से कहा, "हमने बचपन से सुना कि महिलाएं श्मशान घाट नहीं जातीं. मैं यह काम करके समाज की सोच और पुरानी परंपरा को तोड़ने की कोशिश कर रही थी, मगर हमारा समाज यह सब बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था. समाज को लगता था कि एक महिला यह सब आख़िर क्यों कर रही है."

लेकिन पूजा कहती हैं कि ये सामाजिक सेवा की भावना थी और इसलिए वो समाज के आगे डटी रहीं. वो कहती हैं कि धीरे-धीरे उनका विरोध करने वालों की संख्या कम हो गई और साथ खड़े होने वालों की संख्या बढ़ने लगी.

पूजा ने उस परंपरा को तोड़ा जिसके तहत हिंदू धर्म में मरने वालों का अंतिम संस्कार घर का पुरुष सदस्य ही करता है.

पूजा कहती हैं, "मैंने पढ़ना शुरू किया. मैंने वेदों को पढ़ा, ग्रंथों को पढ़ा और दूसरे धर्म की किताबें भी पढ़ीं. उन किताबों को पढ़ने के बाद मुझे यह पता चला कि किसी भी धार्मिक पुस्तक में यह नहीं लिखा है कि एक महिला अंतिम संस्कार नहीं कर सकती."

लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना बेहद मुश्किल काम तो है ही मगर इस काम और इसके पीछे की सामाजिक सेवा की भावना ने पूजा के व्यक्तिगत जीवन पर भी गहरा असर डाला.

पूजा शर्मा ने बताया, "जब मैंने यह काम शुरू किया तो मेरे आस-पास के लोगों ने मुझसे बातचीत बंद कर दी. उन्हें लगता था कि मेरे पीछे आत्माएं चलती हैं."

"मेरे परिवार वालों से कहा जाता है कि तुम्हारी बेटी की शादी नहीं होगी. लोग कहते कि यह जिस घर में जाएगी उसे तबाह कर देगी. यहां तक कि मेरी बचपन की सहेलियां भी मुझसे बात नहीं करती थीं."

लेकिन यह सभी मुश्किलें भी पूजा को उनके रास्ते से हटा नहीं सकीं.

पूजा कहती हैं, "यह दुनिया खुलकर जीने के लिए है. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैं हर धर्म के लोगों की बिना भेदभाव सेवा कर रही हूं. मेरे लिए सब बराबर हैं. अगर हम सभी मिलजुल कर काम करें और एकदूसरे का साथ दें तो यह दुनिया भी ख़ूबसूरत हो जाएगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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