यौन हिंसा पीड़ितों को मुफ़्त इलाज पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जो कहा, उससे क्या बदलेगा?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बलात्कार के ख़िलाफ़ इंसाफ़ के लिए संघर्षशील एक लड़की को इलाज के लिए काफ़ी परेशान होना पड़ा.
यह परेशानी दिल्ली हाईकोर्ट के सामने पहुँची. कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया. इसके बाद 21 दिसंबर को बलात्कार और एसिड हमले की शिकार संघर्षशील स्त्रियों के इलाज के लिए कई दिशा-निर्देश दिए.
इसके दायरे में वे नाबालिग लड़के भी शामिल हैं, जिनके साथ यौन हिंसा हुई है. क़ानून के जानकारों ने इन दिशा-निर्देशों का स्वागत किया है.
हालाँकि, उनका कहना है कि अभी भी क़ानून में मुफ़्त में इलाज का प्रावधान है लेकिन इसे हासिल करने में काफ़ी मुश्किल आती है. उनका मानना है कि हाईकोर्ट के ताज़ा निर्देश से आम लोगों और अस्पताल कर्मचारियों के बीच जागरूकता बढ़ेगी.

फ़ैसले में कोर्ट ने भी माना है कि क़ानून में मुफ़्त इलाज का प्रावधान पहले से है. स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देश भी हैं. इसके बावजूद यौन हिंसा और एसिड अटैक के सर्वाइवर को निःशुल्क इलाज मिलने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.
इसी पसमंज़र में हाईकोर्ट ने कुछ नए दिशा-निर्देश भी दिए. कोर्ट के मुताबिक, ये दिशा-निर्देश केंद्र और राज्य सरकार की ओर से चलाए जाने वाले अस्पतालों, निजी अस्पतालों, क्लिनिक या नर्सिंग होम- सब पर लागू होंगे. इसमें हर तरह का इलाज शामिल है. जैसे- मुफ़्त में प्राथमिक चिकित्सा देना, जाँच और अस्पताल में भर्ती करना.
केस क्या था?

इमेज स्रोत, Getty Images
एक पिता पर अपनी बेटी से कई बार बलात्कार करने का आरोप है. मामला निचली अदालत से दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचता है. सुनवाई के दौरान इस साल सितंबर में अदालत लड़की की सेहत की जाँच के निर्देश देती है. इस निर्देश में वह कहती है कि सभी जाँच मुफ़्त में हो. उसे दवाइयाँ भी दी जाएँ.
बाद की सुनवाई के दौरान रेप सर्वाइवर के वकील ने कहा कि उन्हें मुफ़्त में इलाज लेने में काफ़ी दिक़्क़त आई. बार-बार लीगल सर्विस अथॉरिटी की मदद लेनी पड़ी.
कई बार की गुज़ारिश के बाद, उन्हें एक निजी अस्पताल में इलाज मिला. वकील ने कोर्ट से कहा कि हर अस्पताल को यह बताने की ज़रूरत है कि उन्हें क़ानूनी तौर पर इन मामलों में मुफ़्त इलाज देना ज़रूरी है.
तब हाईकोर्ट ने क्या फ़ैसला दिया?

इमेज स्रोत, Getty Images
जस्टिस प्रतिभा सिंह और जस्टिस अमित शर्मा की खंडपीठ ने यह दिशा-निर्देश दिए हैं.
हाईकोर्ट ने पहले क़ानून के कुछ प्रावधानों को दोहराया. भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 397 के मुताबिक़, किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल को बलात्कार, एसिड अटैक सर्वाइवर और यौन हिंसा से पीड़ित लड़कों का इलाज मुफ़्त में करना ज़रूरी है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के भी दिशा-निर्देश हैं. ये दिशा-निर्देश कहते हैं कि किसी भी यौन हिंसा के सर्वाइवर को मुफ़्त में सारा इलाज मिलना चाहिए. इसमें अस्पताल में भर्ती होना, दवाइयाँ और मेडिकल जाँच भी शामिल हैं. अगर मरीज़ को बाहर से दवाई लेनी पड़ रही है तो इसके भी पैसे उन्हें वापस मिलने चाहिए.
नाबालिगों के यौन शोषण से जुड़े क़ानून, 'लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम' (पॉक्सो) में भी सर्वाइवर के इलाज से जुड़े कई प्रावधान हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि इन सबके बावजूद ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जहाँ इलाज पाने में कई दिक़्क़तें होती हैं.
इसलिए कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए.
क्या हैं दिशा-निर्देश?
ये दिशा-निर्देश किसी भी तरह के बलात्कार, एसिड हमले और नाबालिग लड़के-लड़कियों के साथ होनी वाली यौन हिंसा के मामले में लागू होंगे.
कोर्ट के मुताबिक,
- जब भी ऐसे मामलों में कोई भी पीड़ित या सर्वाइवर महिला या नाबालिग लड़का अस्पताल या डॉक्टर के पास जाएं तो उन्हें जैसे भी इलाज की ज़रूरत हो, वह मुफ़्त में मिलनी चाहिए. इसमें प्राथमिक चिकित्सा, सभी तरह की जाँच, ऑपरेशन या अस्पताल में भर्ती होना शामिल है.
- उनकी जाँच तुरंत की जाए. अगर ज़रूरत पड़े तो यौन संचारित रोगों जैसे- एचआईवी संक्रमण के इलाज की व्यवस्था की जाए.
- उन्हें शारीरिक और मानसिक काउंसिलिंग दी जाए.
- क्या वे गर्भवती हैं, इसकी जाँच की जाए. जरूरत पड़े तो गर्भनिरोधक दिए जाएँ.
- स्त्री-रोग विशेषज्ञ उनकी जाँच करें और सलाह दें.
- अगर आपातकालीन स्थिति है तो उन्हें भर्ती करने के लिए पहचान पत्र दिखाने पर ज़ोर नहीं दिया जाए.
- हर अस्पताल और क्लिनिक पर बोर्ड लगाए जाएँ. इस पर लिखा हो: "यहाँ यौन हिंसा, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और एसिड हमले के पीड़ितों का मुफ्त में इलाज उपलब्ध है.'' ये बोर्ड अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा, दोनों में होने चाहिए. यही नहीं, ये बोर्ड ऐसी जगहों पर लगाया जाए जो लोगों को आसानी से दिखे.
- इसके बारे में स्वास्थ्य केंद्रों पर काम करने वाले सभी लोगों, जैसे- डॉक्टरों, नर्सों और बाक़ी कर्मचारियों को जागरूक किया जाए. उन्हें ये बताया जाए कि इसका पालन नहीं करने पर उन्हें भारतीय न्याय संहिता की धारा-200 के तहत एक साल तक की सज़ा हो सकती है.
- अगर पीड़ित को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजा जा रहा है तो उन्हें एम्बुलेंस की सुविधा दी जाए.
- अगर पुलिस को पता चले कि मुफ़्त में इलाज नहीं मिल रहा है तो वे शिकायत दर्ज करें. साथ ही, पीड़ित को पास के अस्पताल लेकर जाएँ.
- ऐसी हालत में पुलिस को स्थानीय लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को केस के बारे में बताना चाहिए. वहाँ से उन्हें मुफ़्त में एक वकील मिलना चाहिए ताकि उन्हें क़ानूनी मदद भी मिल सके.
- ऐसे यौन उत्पीड़न के मामलों के बारे में जब भी लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को पता चले तो उन्हें ये देखना चाहिए कि पीड़ित को मुफ़्त में इलाज मिल रहा है या नहीं.
- कोर्ट ने कहा कि इन दिशा-निर्देर्शों को हर अदालत, पुलिस थानों और अस्पतालों को भेजा जाए. इससे उन्हें मालूम रहेगा कि इन मामलों में उन्हें मुफ़्त में इलाज देना और दिलवाना है. साथ ही ये दिशा-निर्देश दिल्ली और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजा जाए, ताकि वे यह जानकारी बाक़ी लोगों को भी दे सकें.
चूँकि ये फ़ैसला दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया है, इसलिए ये दिल्ली के हर अस्पताल और मेडिकल क्लिनिक पर लागू होगा. बाक़ी देश में इन दिशा-निर्देशों को कैसे लागू करना है, ये केंद्र सरकार पर निर्भर करेगा.
क़ानून के जानकारों का इस पर क्या कहना है?
क़ानून के जानकारों ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है. संजना श्रीकुमार वकील हैं और यौन हिंसा से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं. उनका कहना है, "ये बहुत अच्छा फ़ैसला है. इसमें कई चीज़ों को स्पष्ट किया गया है."
उन्होंने कहा, "सबसे पहले तो फ़ैसले में यह साफ़ किया गया है कि किस तरह का इलाज मुफ़्त में देना है. पहले चीज़ें बहुत स्पष्ट नहीं थीं कि किस तरह का इलाज मुफ्त में मिलना चाहिए. अब यह साफ़ हो गया है कि सिर्फ़ प्राथमिक चिकित्सा ही नहीं, जाँच और सर्जरी वग़ैरह भी मुफ़्त मिलनी चाहिए.''
वह कहती हैं कि ऐसे फ़ैसलों से क़ानूनी आधार पर सुविधा लेने में मदद मिलती है. उनके मुताबिक, "भले ही क़ानून में कोई चीज़ दी हुई है पर जब किसी कोर्ट का फ़ैसला भी वही कहता है तो उससे वह अधिकार लेने में आसानी होती है.''
लेकिन उन्होंने कहा कि अब भी कुछ दिक़्क़तें हैं, जो क़ायम हैं.
वह कहती हैं, "एक दिक़्क़त है. मान लीजिए, यौन हिंसा की वजह से ऐसी कोई परेशानी हो जाती है जिसके लिए लंबे इलाज की ज़रूरत हो तो ऐसे में क्या करना होगा? यही नहीं, मुफ़्त में इलाज लेने के लिए आपको पुलिस में शिकायत दर्ज करानी होती है. बताना होता है कि आपके साथ यौन हिंसा हुई है. कई बार स्त्रियाँ इलाज तो चाहती हैं लेकिन क़ानूनी कार्रवाई नहीं करना चाहतीं. ऐसी सूरत में ये दिशा-निर्देश उनकी सहायता नहीं कर पाएगा."

तूबा फ़िरदौस सामाजिक कार्यकर्ता और वकील हैं. वह ब्रेव सोल्स फाउंडेशन के साथ मिलकर यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए काम करती हैं.
वह बताती हैं कि क़ानून में मुफ़्त इलाज का प्रावधान है. इसके बावजूद 10 में से क़रीब आठ मामलों में इलाज में कई दिक्कतें आती हैं.
वह कहती हैं, "सरकारी अस्पतालों में चीज़ें बहुत धीरे चलती हैं. उनके पास संसाधनों की कमी रहती है. वहीं, निजी अस्पताल ऐसे मामलों में कुछ करने में घबराते हैं. वह पुलिस में शिकायत की कॉपी माँगते हैं या इलाज से पहले पुलिस से बात करना चाहते हैं."
"ऐसे में हमें अदालत जाना पड़ता है. फिर अदालत आदेश देता है कि मुफ़्त में इलाज मिलना चाहिए. इन सब चीज़ों में वक़्त लगता है."

ऐसे कई मामले पहले भी सामने आए हैं जहाँ क़ानून के विरुद्ध जा कर निजी अस्पतालों ने एसिड अटैक पीड़ित को मुफ़्त में इलाज देने से मना किया है. इस बात पर सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की थी कि ऐसा नहीं होना चाहिए. क़ानून के विशेषज्ञों ने हमें बताया कि कई मामलों में अस्पताल पैसे भी माँगते हैं.
संजना श्रीकुमार कहती हैं कि कई ऐसे केस होते हैं जहाँ यौन हिंसा करने वाले, कोई रिश्तेदार या जान- पहचान वाले होते हैं. ऐसी स्थिति में स्त्रियाँ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं करना चाहतीं. इससे भी मुफ़्त इलाज मिलने में कई दिक्कतें आती हैं.
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-5 (एनएफ़एचएस-5) के मुताबिक़, 18-49 साल की महिलाओं में छह प्रतिशत के साथ यौन हिंसा हुई थी. हिंसा करने वाले ज़्यादातर लोग, नज़दीकी रिश्तेदार या जान-पहचान वाले थे.
आँकड़ों के मुताबिक, जिन महिलाओं की शादी हुई थी, उनमें 96 फ़ीसदी मामलों में यौन हिंसा करने वाला व्यक्ति पति था. जिन महिलाओं की शादी नहीं हुई थी, उनके साथ यौन हिंसा करने वालों में नज़दीकी रिश्तेदार, प्रेमी, दोस्त, पिता, भाई शामिल थे. सिर्फ़ पाँच फ़ीसदी मामलों में किसी अनजान व्यक्ति ने यौन हिंसा की थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

















