जजों की मौखिक टिप्पणी क्या क़ानून के बराबर है? संभल और अजमेर मामले पर क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एक मौखिक टिप्पणी की थी.
इस टिप्पणी के बाद मस्जिदों के नीचे मंदिरों के अस्तित्व की जांच के लिए सर्वे कराए जाने की मांग की झड़ी सी लग गई है.
उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के लिए ट्रायल कोर्ट ने एडवोकेट कमिश्नर को नियुक्त किया था. 19 नवंबर के बाद 24 नवंबर को हुए दूसरे सर्वे के दौरान संभल में हिंसा भड़की.
पुलिस ने हिंसा में चार लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है.
इस बाद एक अन्य अदालत ने राजस्थान के अजमेर शरीफ़ दरगाह के नीचे मंदिर के अस्तित्व का पता लगाने के लिए सर्वे कराने की मांग वाली एक याचिका को स्वीकार कर लिया.
अजमेर दरगाह हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों की आस्था का केंद्र रही है.

मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद और वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के लिए दायर याचिकाओं पर आए फ़ैसलों के बाद अब उत्तर प्रदेश और राजस्थान की निचली अदालतों के इन फ़ैसलों ने क़ानूनी जानकारों को निराश किया है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी हिंदी से कहा, “एक मौखिक टिप्पणी (तत्कालीन सीजेआई की) क़ानून नहीं बन सकती.”
लेकिन उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इन दोनों मामलों के याचिकाकर्ता और 'हिंदू राष्ट्रीय सेना' नाम की संस्था के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता इससे निश्चित हैं.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, “हम ऐसी कोई भी जगह नहीं छोड़ेंगे जहां मस्जिद है. इसके बाद दिल्ली के जामा मस्जिद का नंबर होगा. उत्तर प्रदेश में ऐसी बहुत सारी जगहें हैं. हम सरकार से कहेंगे कि मस्जिदों को मंदिर घोषित कर दिया जाए.”
विष्णु गुप्ता के विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयान से उलट हैं.
मोहन भागवत ने 2 जून 2022 को लोगों से कहा था, “हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने की ज़रूरत नहीं है.”

जस्टिस चंद्रचूड़ की मौखिक टिप्पणी क्या थी?
भारत के पिछले चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के दौरान मई 2022 में एक मौखिक टिप्पणी की थी.
उन्होंने कहा था कि प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल अधिनियम) 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार, किसी भी संरचना के धार्मिक चरित्र की “जांच करने” पर रोक नहीं लगाता है.
उपासना स्थल अधिनियम उस समय अस्तित्व में आया, जब राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था. सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को संवैधानिक मान्यता देते हुए इसे वैध ठहराया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अधिनियम दर्शाता है, “इतिहास और उसकी ग़लतियों का इस्तेमाल वर्तमान और भविष्य को दबाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाएगा.”
लेकिन तत्कालीन चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने ज्ञानवापी की मस्जिद कमिटी से कहा था कि वो अपनी आपत्तियां ट्रायल कोर्ट के सामने दायर करे.
तत्कालीन सीजेआई की इस मौखिक टिप्पणी को ट्रायल कोर्ट और बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क़ानूनी अधिकार के तौर पर लिया.
इन अदालतों ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम के तहत इस तरह के मामलों पर रोक नहीं है. इसके बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में भी सुनवाई को जारी रखने की मंजूरी मिली.

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मौखिक टिप्पणी के नतीजे
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने बीबीसी हिंदी से कहा, “उपासना स्थल अधिनियम 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार उपासना स्थल के रूप को बदलने से रोकता है. इस अधिनियम के तहत संभल और अजमेर मामलों की सुनवाई को शुरुआत में ही ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए था.”
उन्होंने कहा, “ज्ञानवापी मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ की मौखिक टिप्पणी के कारण यह माना गया कि भले ही 15 अगस्त 1947 के अनुसार रहे उपासना स्थलों के चरित्र में बदलाव नहीं किया जा सकता लेकिन उनके चरित्र की जांच की जा सकती है.”
प्रशांत भूषण इसे अलग तरीके से कहते हैं, “अदालत लोगों से बात करने के लिए एक स्थानीय आयुक्त की नियुक्ति कर सकती है. लेकिन कोई भी सर्वे करने या खुदाई की अनुमति नहीं दी जा सकती है. ख़ासकर जब यह दावा किया जा रहा हो कि 1947 से पहले वहां कुछ था.”
सुप्रीम कोर्ट के वकील कालीश्वरम राज इस मामले पर बीबीसी हिंदी से कहते हैं, “हमारी संस्थाओं और अदालतों को इतिहास से सीख लेनी चाहिए. हमारी संसद ने कुछ ऐसे सबक सीखे हैं और 1991 का अधिनियम इसका प्रमाण है. ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे में दिखाई गई उदारता ने देशभर की अदालतों को ग़लत संदेश दिया है. यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण और चौंकाने वाला था.”
राज कहते हैं, “संसद का एक अधिनियम न केवल जनता के फ़ैसले की अभिव्यक्ति है बल्कि यह एक ऐसा उपकरण भी है जिसे देश ने धार्मिक कट्टरता के ख़तरे से खुद को बचाने के लिए विकसित किया. यह उन सभी मामलों में सबक देता है जिसे हमने अतीत में सीखा हैं. हमारी अदालतों और संस्थानों को इतिहास से सीख लेनी चाहिए.”

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क्या है आगे का रास्ता?
संजय हेगड़े कहते हैं, “यह बहुत ही तुच्छ और अफ़सोसजनक है कि जहां कोई राहत नहीं दी जा सकती वहां मुकदमे की सुनवाई हो रही है. सर्वे आदि की अंतरिम कार्यवाही अक्सर हिंसक भावनाओं को उत्तेजित करने और भड़काने के लिए की जाती है."
संजय हेगड़े बोले, "भारत पुराने ज़माने की दुश्मनी की 'न्यायिक कारसेवा' में वापसी बर्दाश्त नहीं कर सकता. हमारे पास बहुत से ऐसे मामले हैं, जिनका तुरंत निपटारा किया जाना चाहिए. इस तरह के धार्मिक कानूनी दांव-पेंच से हमें कुछ हासिल नहीं होता.”
जबकि राज ने कहा, “संभल मामला पूर्व सीजेआई की बेंच के आदेश का दुर्भाग्यपूर्ण और अप्रिय नतीजा है.”
संजय हेगड़े ने प्रशांत भूषण से सहमति जताते हुए कहा, “मौखिक टिप्पणी का कोई न्यायिक महत्व नहीं होता है. सुप्रीम कोर्ट यह कहते हुए एक आदेश या फ़ैसला दे सकता है कि अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे मामलों को ग़ैरकानूनी बताते हुए उन्हें बंद कर दें.”
प्रशांत भूषण कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट को एक और फैसला देने की ज़रूरत है जिसमें इस बात का ज़िक्र हो कि उपासना स्थल क़ानून के लागू होने के बाद उपसाना स्थलों के चरित्र को नहीं बदला जा सकता है."
वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर एक याचिका दायर की जा सकती है जिसमें यह मांग की जाए कि उपासना स्थल क़ानून के मद्देनज़र कोई भी सर्वे या खुदाई नहीं करवा सकता है. इससे इस तरह की बहुत सी गड़बड़ियों पर रोक लग जाएगी.”

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क्या सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए?
इस पर संजय हेगड़े कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट बहुत कम मामलों में स्वतः संज्ञान लेता है. हालांकि ये सभी विवाद हर चरण में मुकदमे के रूप में सुप्रीम कोर्ट में आते हैं और इसकी संभावना रहती है कि कोर्ट ज़रूरी आदेश या फ़ैसला सुना दे.”
राज इससे एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं, “इसके आगे का एकमात्र रास्ता यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट 1991 के अधिनियम में निषेधात्मक धाराओं का सख़्ती से पालन करने के लिए कहे. इसके लिए भले ही सुप्रीम कोर्ट को अपनी ग़लतियों को सुधारना पड़े.”
वो कहते हैं, “ऐसी घोषणा वैध और न्यायोचित होगी क्योंकि यह केवल इस मुद्दे पर बने क़ानून को दोहराएगी. मगर संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार देश की सभी अदालतों को इसका पालन करने के लिए बाध्य करेगी. ऐसी घोषणा आने वाले समय में ट्रायल कोर्ट को संसद के बनाए अधिनियम का उल्लंघन करने से रोकेगी.”
कुछ वकीलों ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बताया कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करने पर भी विचार कर सकता है.
इसके तहत यह फ़ैसला दिया जा सकता है कि बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के किसी स्थान के धार्मिक चरित्र पर सवाल उठाने वाला कोई मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता.

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क्या आरएसएस का रुख़ बदल गया है?
जून 2022 में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद मिले सभी संकेतों से ऐसा लगता है कि संघ के रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है.
भागवत ने कहा था कि अयोध्या का मामला “कुछ ज़रूरी मुद्दों की वजह से उठाया गया था.”
भागवत का यह रुख़ था कि, “आक्रमणकारियों ने हिंदुओं का मनोबल तोड़ने और धर्म परिवर्तन कर बने नए मुसलमानों के बीच अपनी छवि बनाने के लिए मंदिरों को तोड़ना शुरू किया था.”
दिलचस्प बात यह है कि उनका बयान अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले के संदर्भ में था.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, “मानव इतिहास शासनों के उत्थान और पतन का प्रमाण है. कानून का इस्तेमाल, समय में पीछे जाने और इतिहास में जो कुछ हुआ उससे असहमत हर किसी व्यक्ति को क़ानूनी राहत देने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है. आज के समय में अदालतें इतिहास के सही ग़लत फ़ैसलों का संज्ञान तब तक नहीं ले सकतीं, जब तक यह साबित न हो जाए कि उनके क़ानूनी परिणाम वर्तमान में लागू किए जा सकते हों.”
मोहन भागवत ने कहा था कि ज्ञानवापी मामले को भी “हिंदू और मुसलमान मैत्रीपूर्ण तरीके से सुलझा सकते हैं.”
हालांकि संघ कार्यकर्ताओं में यह भावना है कि इस मामले को देश के अलग-अलग हिस्सों में वक्फ़ बोर्ड की विभिन्न संपत्तियों पर किए जा रहे दावों के नज़रिए से देखा जाना चाहिए.
नाम न छापने की शर्त पर आरएसएस के एक सदस्य ने बीबीसी हिंदी से कहा, “आरएसएस ने अपना रुख़ नहीं बदला है. आरएसएस शांति चाहता है. लेकिन वक्फ़ मामले में हो रहे दावों को देखते हुए आरएसएस को इस पर अपने विचारों को संतुलित करने की ज़रूरत है.”
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने संभल की शाही जामा मस्जिद में ट्रायल कोर्ट के सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली मस्जिद समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया.
चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने ट्रायल कोर्ट से कहा है कि जब तक सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका हाई कोर्ट में सूचीबद्ध नहीं हो जाती, तब तक मामले पर आगे कोई कार्रवाई न की जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शांति बनी रहनी चाहिए.
संयोग से संभल मस्जिद भी 'स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम' की धारा 10 के अनुसार एक संरक्षित स्मारक है और एक 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' है.
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