बरेली के फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के फ़ैसले में ‘लव जिहाद’ के ज़िक्र पर क्या कहते हैं क़ानून के जानकार

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश में बरेली की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि ये प्रायोजित तौर पर ‘लव जिहाद’ का मामला है जिसमें विदेशी फंडिंग से इनकार नहीं किया जा सकता.
यह फ़ैसला अपर सेशन जज रवि कुमार दिवाकर ने सुनाया है.
बरेली की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने धर्म छिपाकर विवाह करने के एक मामले में फ़ैसला सुनाया है जिसकी काफ़ी चर्चा है. इस मामले में अपराध साबित होने के बाद अपराधी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है.
2020 में केंद्र सरकार ने कहा था कि 'लव जिहाद' की कोई तय क़ानूनी परिभाषा नहीं है. लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में 2020 में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा था कि भारत में सभी को धार्मिक आज़ादी है.
उन्होंने कहा था, "केरल हाई कोर्ट समेत कई अदालतें ये विचार रख चुकी हैं कि 'लव जिहाद' की कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं है. किसी केंद्रीय एजेंसी ने लव जिहाद का कोई मामला दर्ज नहीं किया है."
पुलिस को दी गई शिकायत में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि मोहम्मद आलिम नाम के एक व्यक्ति ने अपना नाम बदलकर पहले उनसे शादी की और फिर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया.
पीड़िता की शिकायत पर बरेली पुलिस ने आईपीसी की धारा 376(2) (एन), 323, 506 और 504 के तहत मुक़दमा दर्ज किया था.

फ़ैसले में ‘लव जिहाद’ की परिभाषा
अपने फ़ैसले में बरेली की अदालत के जज ने ‘लव जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल किया.
उन्होंने फ़ैसले में लिखा, “उपरोक्त प्रकरण के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि मामला ‘लव जिहाद’ के माध्यम से अवैध धर्मांतरण का है.”
जज ने अपने निर्णय में यह निष्कर्ष निकाला है कि यह प्रायोजित तौर पर हो रहा है, जिसमें विदेशी फ़ंडिंग से इनकार नहीं किया जा सकता. पूरे प्रकरण में ‘लव जिहाद’ साबित हो गया है.
अदालत ने इस फ़ैसले में ‘लव जिहाद’ को परिभाषित भी किया गया है जिसके अनुसार, ‘लव जिहाद में मुस्लिम पुरुष शादी के माध्यम से इस्लाम में धर्मांतरण के लिए व्यवस्थित रूप से हिंदू महिलाओं को निशाना बनाते हैं.'
फ़ैसले में लिखा गया है कि ऐसे मामलों के अपराधी पहले प्यार का दिखावा करते हैं, फिर धोखे से शादी कर लेते हैं.
फ़ैसले में यह भी कहा गया है कि इससे भारत की आबादी के अनुपात में बड़े स्तर पर बदलाव हो सकता है, जिसके लिए साजिश की जा रही है. इस तरह की साजिश इसलिए की जा रही है ताकि भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे हालात पैदा किए जा सकें.
इसके लिए भारत सरकार को भी आगाह किया गया है. हालांकि न्यायाधीश ने यह टिप्पणी भी की है कि एक अराजक व्यक्ति के काम से पूरी कौम बदनाम हो रही है.
फ़ैसले में इस केस का उदाहरण भी दिया गया है कि कैसे इस प्रकरण में अपराधी मोहम्मद आलिम ने अपना नाम आनंद बताकर वादिनी को धोखे में रखकर हिंदू रीति-रिवाज से उससे शादी की. फिर उसके साथ बलात्कार किया और उसकी फोटो व वीडियो भी बनायी, तत्पश्चात उसके साथ कई बार बलात्कार किया.
इस फ़ैसले पर लखनऊ में हाईकोर्ट के अधिवक्ता मनुश्रेष्ठ मिश्रा का कहना है, "मामला बलात्कार का था, अवैध धर्मांतरण का नहीं था. न्यायाधीश ने इसे ‘लव जिहाद’ का मामला बताते हुए एक मुस्लिम व्यक्ति को बलात्कार के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई, जबकि शिकायतकर्ता ने अपनी गवाही वापस ले ली थी."
“लव जिहाद के माध्यम से अवैध धर्मांतरण तो धर्म विशेष के कुछ अराजक तत्व करते हैं या करवाते हैं या उसमें सहयोग करते हैं या षड्यंत्र में शामिल होते हैं.”
हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता फुज़ैल अहमद अय्यूबी ने कहा, "बरेली के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा दिया गया निर्णय क़ानून व्यवस्था एवं न्याय प्रणाली में एक अनोखा निर्णय है, जहाँ विद्वान न्यायाधीश ने पूरे निर्णय में केवल ऐसी टिप्पणियां की हैं जिसे क़ानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है."
अय्यूबी कहते हैं, "2018 में हादिया केस में उच्चतम न्यायालय इन तर्कों को ठुकरा चुका है."

फैसले में विदेशी फंडिग का ज़िक्र
अपर सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने फ़ैसले में कहा, "लव जिहाद के ज़रिए अवैध धर्मांतरण में पैसे की ज़रूरत होती है इसलिए विदेशी फंडिग से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस फ़ैसले को डीजीपी और सरकार के मुख्य सचिव को भी भेजने का भी निर्देश दिया है."
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता फुज़ैल अहमद अय्यूबी का कहना है कि "विद्वान न्यायाधीश ने इसलिए अपनी न्यायिक क्षमता के परे आने वाली राजनीतिक वक्तव्यों को अपने निर्णंय में आधार बनाया है."
अय्यूबी ने कहा कि "ऐसा करते समय अदालत को ये आभास होना चाहिए था कि वो एक सत्र न्यायालय की हैसियत से एक आपराधिक मुक़दमे में निर्णय दे रहे थे न कि एक संवैधानिक अदालत की तरह किसी सामाजिक कल्याण याचिका या पीआईएल में. संवैधानिक अदालतें भी इस प्रकार की अटकलें लगाने वाले फ़ैसले नहीं दिया करती हैं."
वहीं हाई कोर्ट की अधिवक्ता सायमा ख़ान कहती हैं, "लव जिहाद को विदेशी फंडिंग या एक बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय साजिश के रूप में बिना ठोस सबूत के व्याख्या करना कई क़ानूनी और नैतिक मुद्दे खड़ा करता है. किसी भी आपराधिक या दीवानी प्रक्रिया में आरोप लगाने वाले पक्ष पर साक्ष्य प्रस्तुत करने का बोझ होता है."
"लव जिहाद विदेशी फंडिंग या अंतरराष्ट्रीय साजिश के आरोपों को क़ानूनी रूप से टिकने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य की आवश्यकता होती है बिना उचित जांच और साक्ष्य के, ऐसे दावे क़ानूनी रूप से ग़लत हैं."
सायमा ख़ान कहती हैं, "किसी व्यक्ति या संगठन पर अंतरराष्ट्रीय साजिश का आरोप लगाना बिना ठोस सबूत के निर्दोष होने की धारणा का उल्लंघन करता है. जब तक दोष सिद्ध नहीं होता, हर व्यक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत इस धारणा का हकदार है."

शिकायत कर्ता के पलटने के बाद फ़ैसला
हाई कोर्ट में अधिवक्ता मनुश्रेष्ठ मिश्रा का कहना है, "न्यायाधीश महोदय यह भूल गए कि बयान में बताया गया है कि शिकायतकर्ता ने मुक़दमे के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि मामला हिंदू संगठनों और उसके माता-पिता के दबाव में दर्ज किया गया था."
शिकायत कर्ता ने अदालत में सुनवाई के दौरान यह भी कहा था कि मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत उसके बयान माता-पिता के दबाव में दिए गए थे.
मनुश्रेष्ठ मिश्रा का कहना है कि न्यायाधीश महोदय ने शिकायतकर्ता की गवाही को नज़रअंदाज़ करते हुए दावा किया कि उसके आरोप में कोई सच्चाई नहीं है क्योंकि "पीड़िता एक शिक्षित महिला है" जो अपने माता-पिता के दबाव में आने की संभावना नहीं है.
मनुश्रेष्ठ मिश्रा कहते हैं कि न्यायाधीश महोदय ने जबरन अपनी सोच शिकायतकर्ता के बारे में आदेश में पेश की, "इस अदालत के अनुसार, जब पीड़िता अपने माता-पिता के साथ नहीं रह रही है, और किराए के घर में अकेली रह रही है, और जब वह अदालत में पेश होती है तो वह एक एंड्रॉयड फोन लेकर आती है."
"यह एक रहस्य है कि उसे घर में अकेले रहने, खाने-पीने, कपड़े पहनने और मोबाइल पर बात करने के लिए पैसे कैसे मिलते हैं. निश्चित रूप से, उपरोक्त मामले में, वादी/पीड़िता को कुछ आर्थिक मदद दी जा रही है और यह आर्थिक मदद आरोपी के माध्यम से दी जा रही है, और उपरोक्त मामला लव जिहाद के माध्यम से अवैध धर्मांतरण का मामला है."

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता फुज़ैल अहमद अय्यूबी कहते हैं कि हालांकि निर्णय में दर्ज तथ्यों में भी पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है जो ज़ाहिर है, मगर उसके अलावा भी निर्णय में 'लव जिहाद' के ऊपर की गई टिप्पणियां अटकलें लगाने की श्रेणी में कही जा सकती हैं.
अय्यूबी कहते हैं कि "ये भी महत्त्वपूर्ण है कि न तो एफ़आईआर में, न ही आरोप पत्र में, उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की किसी भी धारा का उल्लेख है, निर्णय में उस क़ानून का भी उल्लेख कर दिया गया है और ये कह दिया गया है कि उक्त अधिनियम में प्रतिषेदित कृत भी किये गए हैं जबकि उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी."
कौन हैं रवि कुमार दिवाकर
बरेली में अपर सत्र न्यायाधीश के तौर पर तैनात रवि कुमार दिवाकर पहले भी सुर्ख़ियों में रहे हैं.
इससे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ की तारीफ़ की थी और उन्हें समर्पण और त्याग के साथ सत्ता पर काबिज़ होने वाले धार्मिक व्यक्ति के लिए आदर्श उदाहरण बताया था.
मुस्लिम धर्मगुरु तौकीर रज़ा खान के मामले में कहा था कि "भारत में दंगों का कारण यह है कि राजनीतिक दल विशेष धर्म की तुष्टिकरण में लगे हुए हैं. इससे उस धर्म विशेष के लोगों का मनोबल काफी बढ़ जाता है, उन्हें विश्वास है कि अगर वे दंगे करवा देंगें तो सत्ता संरक्षण के कारण उनका बाल भी बांका नहीं होगा".
हालांकि हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने इस टिप्पणी को हटाने के लिए कहा था और कहा कि ये अनुचित टिप्पणी की है जिसमें राजनीतिक निहितार्थ और व्यक्तिगत विचार शामिल हैं.
दिवाकर ने 2022 में ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर कोर्ट कमिश्नर को हिंदू देवी देवताओं की उपस्थिति का निरीक्षण करने के लिए वीडियोग्राफ़ी करने की इज़ाज़त दी थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित


















