मनीष सिसोदिया को अपनी सीट बदलने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अब जंगपुरा सीट से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. पार्टी ने उनकी जगह अवध ओझा को पटपड़गंज से टिकट दिया है.
टिकट घोषित होने के बाद अवध ओझा अपने चुनावी कार्यालय में कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात कर रहे हैं और चुनाव प्रचार की रणनीति बना रहे हैं.
कार्यालय से थोड़ी दूर मुकेश दुबे अपने ई-रिक्शा के साथ सवारी का इंतज़ार कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के बदायूं से संबंध रखने वाले मुकेश पिछले 20 साल से मंडावली में रहते हैं और पटपड़गंज विधानसभा के वोटर हैं.

मनीष सिसोदिया पटपड़गंज विधानसभा छोड़कर जंगपुरा चले गए हैं, क्या आपको पता है?
इस पर मुकेश कहते हैं, "मुझे सुबह इसके बारे में पता चला था जब कुछ लोग आपस में इस पर बात कर रहे थे. सिसोदिया जी ठीक थे लेकिन उनके आस-पास के नेता सही नहीं थे. बस में यात्रा फ़्री है तो इससे रिक्शा का काम-धंधा भी प्रभावित हुआ है."
क्या यहां पर आप आम आदमी पार्टी के नए प्रत्याशी अवध ओझा को जानते हैं? मुकेश कहते हैं कि वो अवध ओझा को नहीं जानते हैं और यहां चेहरा नहीं पार्टी देखकर लोग वोट करेंगे.
मुकेश की इस बात से अवध ओझा भी सहमत दिखते हैं. अवध ओझा कहते हैं, "बिल्कुल सही बात है. अभी बतौर प्रत्याशी मेरा जनता से संवाद शुरू नहीं हुआ है. लेकिन आशा करता हूं कि एक-दो दिन में इस तरह की सभी चीज़ें शुरू हो जाएंगी."

मनीष सिसोदिया ने क्यों बदली सीट?
साल 2013 में जब आम आदमी पार्टी पहली बार दिल्ली के चुनाव में उतरी थी तो मनीष सिसोदिया ने पटपड़गंज सीट को चुना था. मनीष सिसोदिया के सामने बीजेपी के नकुल भारद्वाज और कांग्रेस के अनिल कुमार की चुनौती थी. सिसोदिया ने पहले ही चुनाव में दोनों को पीछे छोड़ा और 50 हज़ार से ज़्यादा वोट हासिल किए थे. बीजेपी के नकुल भारद्वाज और मनीष सिसोदिया के बीच हार-जीत का अंतर 11,476 मत थे.
साल 2015 में यह अंतर बढ़कर 28 हज़ार से ज़्यादा हो गया था. मनीष सिसोदिया को 75,477 वोट मिले थे और आप से बीजेपी में आए विनोद कुमार बिन्नी को 46,716 मत मिले थे.
साल 2020 का चुनाव मनीष सिसोदिया के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित रहा था. उस समय एक तरफ़ तो आम आदमी पार्टी की स्पष्ट बहुमत से सत्ता में वापसी हो रही थी लेकिन दूसरी तरफ़ मनीष सिसोदिया बीजेपी के रविन्दर सिंह नेगी के मुक़ाबले पिछड़ रहे थे. कांटे की टक्कर में मनीष सिसोदिया 3,207 वोट के अंतर से ज़रूर जीते लेकिन रविन्द्र सिंह नेगी ने इस प्रदर्शन से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष कहते हैं, "पटपड़गंज में पिछली बार के नतीजे याद कीजिए. काउंटिंग वाले दिन दोपहर 12 बजे तक पार्टी के खेमे में यह बात स्पष्ट नहीं थी कि मनीष सिसोदिया जीत जाएंगे. बाद में जीते लेकिन मार्जिन बहुत कम था."
"एक तो मार्जिन कम और काफ़ी दिनों से जेल में रहने की वजह से क्षेत्र में सक्रिय नहीं थे. इसलिए हो सकता है कि इन वजहों से उन्हें सीट बदलनी पड़ी."

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का मानना है कि पार्टी सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए ऐसा कर रही है.
प्रमोद जोशी कहते हैं, "पार्टी ने दोनों लिस्ट में आधे से ज़्यादा लगभग 18 लोगों के टिकट काट दिए हैं. मनीष सिसोदिया सीनियर नेता हैं तो उनका टिकट तो नहीं काट सकते इसलिए सीट बदल थी. उनके साथ राखी बिड़लान की भी सीट बदली है. आम आदमी पार्टी एंटी इंकम्बेंसी के फ़ैक्टर से बचना चाहती है. पिछली बार कांग्रेस और नोटा अगर रविन्दर नेगी के पक्ष में जाता तो वो जीत जाते. आप को भी यह बात पता है."
सिसोदिया के सीट बदलने पर बीजेपी लगातार सवाल उठा रही है.
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा, "अगली बार मनीष सिसोदिया दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करें या अरविंद केजरीवाल के शीशमहल पर जवाब देने से बचने की कोशिश करें, तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि अगर इतना ही अच्छा काम किया है, तो जेल क्यों गए और पटपड़गंज छोड़ कर जंगपुरा जाने की नौबत क्यों आई?"
बीजेपी नेता रविन्दर सिंह नेगी मनीष सिसोदिया को भगोड़ा बता रहे हैं.
वहीं मनीष सिसोदिया का कहना है कि पटपड़गंज हो या जंगपुरा इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.
समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में मनीष सिसोदिया कहते हैं, "पटपड़गंज दिल्ली में है और जंगपुरा भी दिल्ली में है. इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं कहां से चुनाव लड़ता हूं. जब मैं डिप्टी सीएम था तो मैंने पूरे मन से जंगपुरा के लिए काम किया था."

बीजेपी ने आख़िरी बार 1993 में इस सीट पर कमल खिलाया था. ऐसे में रविन्दर सिंह नेगी अगर उम्मीदार बनेंगे तो क्या यह सीट वापस पाने के लिए यह चुनाव उनके लिए एक मौक़ा है?
प्रमोद जोशी कहते हैं, "सीट पर उत्तराखंडी, पूर्वांचल और बिहार से आने वाले मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. ओझा का दावा पूर्वांचल और बिहार के वोटरों पर है लेकिन अगर ये मतदाता रविन्दर सिंह नेगी के पक्ष में गए तो उनके लिए मुश्किल नहीं होगी."
"एक और फैक्टर यह है कि ओझा इलाक़े के मतदाताओं के लिए नया चेहरा हैं जबकि रविन्दर सिंह नेगी विनोद नगर से सभासद हैं. यहां के लोग उनसे भली-भांति परिचित हैं."
आप ने लोगों के बीच दिल्ली के शिक्षा मॉडल और बतौर शिक्षा मंत्री सिसोदिया का जमकर प्रचार किया है. अब पार्टी ने शिक्षा के क्षेत्र से ही अवध ओझा को यहां उतारा है लेकिन पार्टी से इतर मतदाताओं के बीच उनकी अपनी पहचान बड़ी चुनौती है.
ओझा कहते हैं, "विनोद नगर में मेरा परिवार रहता है इसलिए मैंने यह सीट उनसे मांगी थी. बीजेपी चाहे तो हमसे शिक्षा पर बात कर ले. जीत तो जीत होती है चाहे 3200 वोट हों या एक वोट. हो सकता है कि मनीष सिसोदिया चालीस हज़ार से ज़्यादा वोट पा जाते."

पटपड़गंज के लोग क्या कह रहे हैं?
कृष्णा देवी वेस्ट विनोद नगर में रहती हैं और घर में ही कॉस्मेटिक की दुकान चलाती हैं.
मनीष सिसोदिया के सवाल पर कृष्णा कहती हैं, "पिछली बार सिसोदिया जी हारते-हारते जीते थे. उधर शशि गार्डन से जीते थे, यहां से तो हार ही गए थे. इसलिए लग रहा है कि सीट बदल ली है."
कृष्णा बातचीत कर रही थीं तभी उनके पति भी आ गए. उन्होंने बताया, "बहुत साल हो गए हैं उन्हें यहां इसलिए लोग भी बदलाव चाह रहे हैं. अब जब से जेल वगैरह गए हैं तो क्षेत्र में वक़्त भी नहीं दे पा रहे हैं."
पटपटगंज के ठीक बगल में विश्वास नगर विधानसभा सीट है. यहां से आप ने दीपक सिंघल को प्रत्याशी बनाया है. जगह-जगह उनके पोस्टर लगे हैं लेकिन पटपड़गंज में ऐसा माहौल नहीं है.
पूर्वी स्कूल ब्लॉक, मंडावली में रहने वाले 75 साल के शाहबुद्दीन का कहना है कि चेहरे से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता लेकिन आप का मामला थोड़ा डाउन है.
शाहबुद्दीन बताते हैं, "सिसोदिया मिलनसार थे और उनके वश में जो काम थे वो करवा देते थे. लेकिन शराब घोटाले से उनकी छवि प्रभावित हुई है. कांग्रेस से गठबंधन होता तो सीट आराम से निकल सकती थी लेकिन अब बीजेपी से मुक़ाबला है.
श्रीराम चौक मंडी में चहल-पहल है और लोग सब्ज़ी ख़रीदने आ रहे हैं. इस मंडी में राजेश्वरी की भी दुकान है.
सिसोदिया पर राजेश्वरी कहती हैं, "मनीष सिसोदिया लोगों के लिए काम कर रहे थे. लेकिन उन्हें जेल जाना पड़ा और फिर यहां के लोगों को समय नहीं दे पाए. जब पब्लिक के बीच नहीं रहे तो वोट कैसे मांग पाएंगे? पब्लिक तो पूछेगी कि आप तो आए ही नहीं इसलिए शायद सीट बदल ली."

जंगपुरा को ही क्यों चुना?
मनीष सिसोदिया को 9 दिसंबर को जंगपुरा सीट से टिकट मिला था लेकिन सिसोदिया दो हफ़्ते पहले से ही जंगपुरा के इलाक़े में घूम रहे थे.
26 नवंबर को मनीष सिसोदिया सुंदर नर्सरी में झुग्गी-झोपड़ियों के बीच पहुंचे थे. कुछ दिन पहले यहां झुग्गियों को तोड़ा गया था.
सिसोदिया ने कहा था कि बीजेपी वाले झुग्गी टूरिज़्म कर रहे हैं और हम यहां बीजेपी को एक्सपोज़ करने आए हैं.
सिसोदिया के साथ दिल्ली सरकार में मंत्री सौरभ भारद्वाज और जंगपुरा विधायक प्रवीण कुमार थे.
इस सीट पर आम आदमी पार्टी 2013 से लगातार जीत रही है और जीत-हार का अंतर भी आप के पक्ष में दिखाई देता है. सिसोदिया की उम्मीदवारी के पीछे इस फ़ैक्टर को भी अहम माना जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष कहते हैं, "जंगपुरा सीट पर बीजेपी कभी चुनाव नहीं जीती है. 2013 से पहले कांग्रेस चुनाव जीतती थी और 2013 के बाद आम आदमी पार्टी. वर्तमान में कांग्रेस के पास दिल्ली में एक भी सीट नहीं है और आप का बीजेपी से सीधा मुक़ाबला है. ऐसे में मनीष सिसोदिया के लिए जंगपुरा से ज़्यादा सुरक्षित कौन सी सीट हो सकती है."
जंगपुरा सीट पर सिख और पंजाबी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए में रखते हुए आप ने 2013 में मनिंदर सिंह धीर को टिकट दिया और वो जीतने के बाद दिल्ली विधानसभा के स्पीकर बने थे. हालांकि, तब जीत का अंतर सिर्फ़ 1744 वोट थे.
साल 2015 में धीर आप छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए और फिर प्रवीण कुमार को जंगपुरा सीट से मौक़ा मिला.
धीर को 2013 में 37% वोट शेयर मिला था, वहीं प्रवीण 2015 में 48% और 2020 में 50% तक वोट शेयर ले गए.
नेहरू नगर, सनलाइट कॉलोनी, निज़ामुद्दीन बस्ती और दरियागंज भी इसी विधासभा सीट में हैं, जहां मुस्लिम और दलितों की एक बड़ी आबादी रहती है. आम आदमी पार्टी की नज़र इस वोट बैंक पर भी है.
जंगपुरा के वर्तमान विधायक प्रवीण कुमार ने कहा है कि वो मनीष जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं.
प्रवीण कुमार ने एक्स पर लिखा, "दिल्ली में शिक्षा क्रांति के जनक मनीष सिसोदिया जी को बीजेपी की कठपुतली ED-CBI ने फर्जी मुकदमों में फंसाकर 17 महीने जेल में रखा. यह न केवल अन्याय था, बल्कि जनता की आवाज को दबाने की साजिश थी."
"मैंने मनीष जी से आग्रह किया कि इस अन्याय का जवाब जंगपुरा की जागरूक जनता देगी. हम सब मिलकर उन्हें चुनाव लड़वाएंगे और भारी मतों से विजयी बनाएंगे."
जंगपुरा में अभी कांग्रेस और बीजेपी ने अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए है. उम्मीदवार घोषित होने के बाद सीट से जुड़े बाक़ी समीकरण भी साफ़ हो जाएंगे.
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