अरविंद केजरीवाल बनाम संदीप दीक्षित, नई दिल्ली सीट की लड़ाई हुई दिलचस्प

अरविंद केजरीवाल और संदीप दीक्षित

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इमेज कैप्शन, नई दिल्ली सीट से संदीप दीक्षित मैदान में हैं. यहां से अरविंद केजरीवाल विधायक हैं.
    • Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के पहली सूची जारी होने के बाद से ही पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित चर्चा में हैं.

संदीप दीक्षित को नई दिल्ली सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया है. इस सीट पर आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विधायक हैं.

केजरीवाल ने 2013 विधानसभा चुनाव में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को इस सीट पर हराया था. तब से वो इस सीट से लगातार विधायक हैं.

अब तक दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं हुई है, हालांकि इसके फ़रवरी में आयोजित होने की संभावना है.

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कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित (फ़ाइल तस्वीर)

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को नई दिल्ली सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया है.

आम आदमी पार्टी ने अब तक विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की दो सूची जारी की है. वहीं, बीजेपी ने अब तक उम्मीदवारों की कोई सूची जारी नहीं की है.

संदीप दीक्षित ने टिकट मिलने के बाद एक्स पर लिखा, "दिल्ली विधानसभा के लिए नई दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार बनाने पर कांग्रेस नेतृत्व का शुक्रिया अदा करता हूँ, और विशेष आदर सम्मानित सोनिया गांधी जी का. इस ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा और मेहनत से पूरा करने का संकल्प भी लेता हूँ."

संदीप दीक्षित ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "दिल्ली को बर्बाद करने में अरविंद केजरीवाल और आप की सरकार के कार्यकाल का अहम योगदान है. हालांकि केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने नयी तरह की राजनीति के वायदे पर मौका दिया था, लेकिन जितने भी वायदे किए गए वो सब झूठे निकले हैं."

"हम नई दिल्ली सीट से लड़ रहे हैं और जहां तक शीला दीक्षित की विरासत का सवाल है, ये सिर्फ़ मेरी नहीं है बल्कि पूरी पार्टी की है."

हालांकि, आम आदमी पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद सुशील गुप्ता का कहना है कि संदीप दीक्षित केजरीवाल के सामने चुनौती नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "संदीप दीक्षित केजरीवाल के सामने कोई चुनौती नहीं हैं. शीलाजी के बाद संदीप दीक्षित ने नई दिल्ली सीट से कोई लगाव नहीं रखा है, दिल्ली में कांग्रेस का कोई वजूद भी नहीं है."

इस पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला कहते हैं कि नई दिल्ली में संदीप दीक्षित की छवि साफ सुथरी और पढ़े लिखे राजनीतिज्ञ की है.

वो कहते हैं, "उन्हें भी इस क्षेत्र में समर्थन मिल सकता है. इसलिए नई दिल्ली सीट पर संदीप दीक्षित के आ जाने पर कांग्रेस भी दौड़ में शामिल हो गई है, अन्यथा वो रेस से बाहर थी."

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कांग्रेस बनाम केजरीवाल की लड़ाई अन्ना आंदोलन से शुरू हुई जिसमें केजरीवाल ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था. अन्ना आंदोलन के ख़त्म होने के बाद केजरीवाल ने नई पार्टी का गठन किया.

अन्ना आंदोलन के दौरान केजरीवाल ने संदीप दीक्षित के माध्यम से ही तत्कालीन यूपीए सरकार से बातचीत शुरू की थी.

दोनों में पहले से जान पहचान थी. दरअसल, अरविंद केजरीवाल और संदीप दीक्षित, दोनों ही राजनीति में आने से पहले एनजीओ सेक्टर में काम करते थे.

बताया जाता है कि संदीप दीक्षित के पहले संसदीय कार्यकाल में केजरीवाल कभी कभार उनके ऑफिस में भी आते थे. हालांकि संदीप के करीबियों का कहना है कि दोनों में कोई ज़्यादा नज़दीकी नहीं थी.

दिल्ली कांग्रेस के मीडिया विभाग के वाइस चेयरमैन परवेज़ आलम खान का कहना है कि अरविंद केजरीवाल अपने एनजीओ के काम के सिलसिले में आते थे, केजरीवाल के एनजीओ का काम पूर्वी दिल्ली में था जहां से संदीप दीक्षित सांसद थे.

अरविंद केजरीवाल के राजनीति में पदार्पण से काफी पहले 2004 में ही संदीप दीक्षित पूर्वी दिल्ली से सांसद बन चुके थे. 2009 के चुनाव में वो दोबारा सांसद बने, दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल अन्ना आंदोलन के बाद राजनीति में सक्रिय हुए.

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर का कहना है, "संदीप दीक्षित के पास सिर्फ शीला दीक्षित की विरासत है. इस सीट पर वो नए हैं. दिल्ली में कांग्रेस भी कमज़ोर है लिहाज़ा, कोई करिश्मा ही कांग्रेस को जिता सकता है."

इसके बरअक्स वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला कहते हैं, "अरविंद केजरीवाल ने इस सीट से शीला दीक्षित को चुनाव हराया था जब कि वो तीन बार की मुख्यमंत्री रह चुकी थीं. अब उनके बेटे संदीप दीक्षित का नई दिल्ली विधानसभा से चुनाव लड़ना इसे बहुत महत्वपूर्ण बना देता है. वे वहां पर चुनावी फेरबदल कर सकते हैं."

विनोद शुक्ला के मुताबिक भाजपा भी वहां अपना कोई मज़बूत दावेदार उतारेगी, दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता भी अब पहले जैसी नहीं रही है, भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई अब चुनावी मुद्दे की तरह से इस्तेमाल नहीं हो सकती.

उनका कहना है कि 'इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास के मापदंड पर दिल्ली लगातार पिछड़ रही है. केजरीवाल को इसका नुकसान हो रहा है. मुस्लिम और दलित वोट बैंक में नाराज़गी है जिसे दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस आपस में बाँट रहे हैं.'

केजरीवाल का कांग्रेस से नरम-गरम रिश्ता

संदीप दीक्षित

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इमेज कैप्शन, संदीप दीक्षित ने दिल्ली सरकार के ख़िलाफ़ 2022 में अभियान चलाया था और उस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.

2013 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 28 सीटें मिली थीं. वहीं 31 सीटें जीतकर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी.

कांग्रेस ने अपने 8 विधायकों का समर्थन आप को दिया था. अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए. दोनों का साथ दो महीने भी नहीं चल पाया.

कांग्रेस के तत्कालीन दिल्ली प्रभारी शकील अहमद ने बीबीसी से कहा कि आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का फैसला सबकी सहमति से लिया गया था, हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उस वक्त भी इसके लिए तैयार नहीं थीं.

राजनीति में कुछ भी हो सकता है लेकिन ये थोड़ा चौंकाने वाला फैसला ज़रूर था. आप ने उस कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई जिसके ख़िलाफ़ वो भ्रष्टाचार का प्रचार करके चुनावी मैदान में उतरी थी. इसके बाद से आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता और टूटता रहा.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष पाठक ने कहा, "2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गठबंधन का कोई राजनीतिक असर भी नहीं हुआ क्योंकि गठबंधन के बावजूद बीजेपी सभी सीटें जीतने में कामयाब रही. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान संदीप दीक्षित चांदनी चौक से टिकट मांग रहे थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला."

वो लगातार दो बार लोकसभा चुनाव से दूर भी रहे हैं. लेकिन पार्टी का प्रचार करते रहे.

दिल्ली में आप और कांग्रेस का विधानसभा में गठबंधन न होने की एक वजह यह भी है कि दोनों के वोट लगभग एक समान हैं. बीजेपी के वोट शेयर में पिछले कई चुनाव में किसी प्रकार की गिरावट नहीं देखी गई.

दिल्ली में कांग्रेस की कश्मकश

दिल्ली कांग्रेस

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस ने चुनाव की तैयारियों के तहत दिल्ली में न्याय यात्रा शुरू की थी.

दिल्ली में कांग्रेस ने शीला दीक्षित के 2013 के चुनाव हारने के बाद कई प्रयोग किए पर सफलता नहीं मिल पायी.

आप का करिश्मा कांग्रेस को कमज़ोर करता रहा. नौजवान नेताओं में अनिल चौधरी को भी कमान दी गई पर पार्टी की हार का सिलसिला जारी रहा.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष पाठक कहते हैं, "दिल्ली में कांग्रेस के कमज़ोर होने की सबसे बड़ी वजह यही है कि उसके वोट बैंक पर पूरी तरह से आम आदमी पार्टी ने कब्ज़ा कर लिया है. शीला दीक्षित ने अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में दिल्ली में कांग्रेस के पक्ष में एक मज़बूत वोट बैंक तैयार कर दिया था, उन्होंने दिल्ली में रहने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को कांग्रेस के साथ मज़बूती से जोड़ दिया था."

पाठक के मुताबिक़, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के साथ-साथ मुसलमान भी कांग्रेस के साथ मज़बूती से जुड़ गए थे.

लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा चलाए गए आंदोलन से बने माहौल में कांग्रेस के वोटर्स का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से जुड़ गया और फिर जुड़ता ही चला गया.

कांग्रेस अपने उसी वोट बैंक को आम आदमी पार्टी से नहीं छीन पा रही है.

पाठक का कहना है कि कांग्रेस के अंदर कश्मकश के माहौल का होना भी इसकी सबसे बड़ी वजह मानी जा सकता है.

वो कहते हैं, "ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि आम आदमी पार्टी को दोस्त माने या दुश्मन? दिल्ली में लड़ रहे कांग्रेसी नेताओं का भी अपने ऊपर से भरोसा ही उठ गया है और जो बिना लड़े ही हार मान बैठे हों, वो जीत तो क्या, लड़ भी नहीं सकते हैं."

दिल्ली के 2013 से चुनावी आंकड़े

संदीप दीक्षित अपनी मां शीला दीक्षित के साथ (फ़ाइल तस्वीर)

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इमेज कैप्शन, संदीप दीक्षित अपनी मां शीला दीक्षित के साथ (फ़ाइल फ़ोटो)

वरिष्ठ पत्रकार शकील अख़्तर कहते हैं कि कांग्रेस के साथ परेशानी ये है कि 2013 के बाद पार्टी दिल्ली में अपने बूते खड़ी नहीं हो पा रही है क्योंकि मुख्य लड़ाई बीजेपी और आप के बीच हो रही है.

दरअसल 2015 और 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 70 में एक भी सीट नहीं जीत पाई. उसके वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आती गई.

दिल्ली की सत्ता पर 15 साल तक काबिज़ रहीं शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कांग्रेस 2013 में विधानसभा चुनाव हार गई. खुद तीन बार की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित को भी हार का सामना करना पड़ा.

पंजाब और हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन नहीं था. आप ने पंजाब में कांग्रेस को धराशायी करके सरकार बनाई थी.

2013 के विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की नयी पार्टी आप को 28 सीटों के साथ 29 फ़ीसदी से अधिक वोट मिले.

वहीं बीजेपी ने अपना 30 प्रतिशत वोट बरकरार रखा लेकिन 31 सीटें जीतने के बावजूद वो सरकार नहीं बना पाई. वहीं कांग्रेस को 24 फ़ीसदी से अधिक वोट मिले.

2015 के विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीटों पर जीत मिली, बीजेपी 3 पर ही सिमट गई.

इसमें कांग्रेस का वोट प्रतिशत 10 फ़ीसदी के करीब रहा. बीजेपी का वोट प्रतिशत इसमें भी 30 फ़ीसदी से अधिक बना रहा.

वहीं आप को 54 प्रतिशत से अधिक वोट मिले. 2020 में आप को 62 सीटें मिलीं और 53 प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिला.

जबकि बीजेपी को 35 फ़ीसदी से अधिक मत मिले लेकिन इस बार कांग्रेस पांच प्रतिशत के आंकड़े को भी पार नहीं कर पाई थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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