अरविंद केजरीवाल ने जिन सियासी फ़ैसलों से कई बार हैरान किया

अरविंद केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल अपने फ़ैसले से चौंकाते हैं लेकिन उनके सियासी मायने होते हैं
    • Author, चंदन जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल के नए सियासी प्रयोग ने एक बार फिर से कई लोगों को चौंकाया है.

पहले केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की और मंगलवार को आतिशी को मुख्यमंत्री की कमान देने का फ़ैसला किया.

केजरीवाल ने अपने सियासी करियर की शुरुआत से ही कई बार ऐसे फ़ैसले किए हैं जो चौंकाने वाले रहे हैं. चाहे वो दिल्ली में शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने का फ़ैसला हो या बनारस में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़.

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केजरीवाल को इस तरह के सियासी दांव से फ़ायदे भी हुई हैं और इसकी वजह से उन्हें आलोचला का शिकार भी होना पड़ा है.

वरीष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी के मुताबिक़, "केजरीवाल को आप पसंद करें या ना करें लेकिन वो एक राजनेता हैं. वो सोचते एक नेता की तरह हैं. उन्होंने मुश्किलों को मौक़े में बदल दिया है."

अरविंद केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, वरीष्ठ वकील और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने केजरीवाल के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ी है

नीरजा चौधरी कहती हैं, ''केजरीवाल में जोखिम उठाने का साहस है और यह एक तरह का जुआ है. यह सफल भी हो सकता है और असफल भी. 10 साल के शासन के बाद दिल्ली में एक नयापन देना उनके लिए ज़रूरी था.''

अरविंद केजरीवाल बीते क़रीब 10 साल से दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. दिल्ली में बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केजरीवाल सरकार बड़े काम करने का दावा करती रही है.

वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता मानते हैं, "यह चौंकाने से ज़्यादा नाटकीयता से भरा फ़ैसला है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वो सचिवालय नहीं जा सकते थे. किसी फ़ाइल पर साइन नहीं कर सकते थे. दिल्ली का मुख्यमंत्री वैसे भी एक मेयर से ज़्यादा कुछ नहीं है, इसलिए उन्होंने इस्तीफ़ा देना बेहतर समझा है."

हालांकि केजरीवाल इस तरह के चौंकाने वाले फ़ैसले पहले भी करते रहे हैं. नज़र डालते हैं, उनके ऐसे ही कुछ फ़ैसलों पर जो आम जनता से लेकर मीडिया और सियासत की सुर्खियों में रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी बनने के बाद से नया आकार लेती रही है

चौंकाने वाला इस्तीफ़ा

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि केजरीवाल जो फ़ैसले लेते हैं, उनमें उनकी राजनीतिक सोच साफ़ झलकती है.

प्रमोद जोशी कहते हैं, "केजरीवाल पहली बार मेट्रो ट्रेन में सवार होकर शपथ लेने आए थे. वो एक पुरानी 'वेगन आर' कार पर चलते थे. उन्होंने कहा था कि सरकारी आवास नहीं लूंगा. राजनीति की शुरुआत में उन्होंने इस नाटकीयता को जगह दी.''

हेमंत सोरेन, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और कल्पना सोरेन

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इमेज कैप्शन, हेमंत सोरेन ने जेल जाने से पहले झारखंड के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, केजरीवाल ने जेल से बाहर आने के बाद ऐसा किया है

अरविंद केजरीवाल जब इसी साल 21 मार्च को दिल्ली की नई आबकारी नीति में कथित अनियमितता के मामले में जेल गए, तब उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया था. उन्हें इस्तीफ़ा उस वक़्त दिया, जब उन्हें ज़मानत मिल गई.

हाल ही में ऐसे ही हालात में मनी लॉन्ड्रिंग के एक आरोप में घिरे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जेल जाने से पहले मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इसी साल 31 जनवरी को हेमंत सोरेन की गिरफ़्तारी हुई थी और उनके बाद चंपाई सोरेन को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया था. जेल से बाहर आने के बाद पाँच जुलाई को हेमंत सोरेने ने फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

केजरीवाल
इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल ने सियासत में कई नए प्रयोग किए हैं

शरद गुप्ता कहते हैं, "केजरीवाल यह दिखाना चाह रहे थे कि बीजेपी की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और जब मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया तो अपनी मर्ज़ी से दिया."

पिछले हफ़्ते ही शुक्रवार को केजरीवाल जेल से बाहर आए थे और रविवार को उन्होंने आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. इसी में उन्होंने एलान किया था कि वो दो दिनों के भीतर इस्तीफ़ा दे देंगे.

केजरीवाल ने पार्टी मुख्यालय में कार्यकर्ताओं और समर्थकों से कहा, "मैं सीएम की कुर्सी से इस्तीफ़ा देने जा रहा हूँ और मैं तब तक सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठूंगा, जब तक जनता अपना फ़ैसला न सुना दे."

उन्होंने कहा है कि जब तक जनता उनको इस पद पर बैठने के लिए नहीं कहेगी, तब तक वो फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे.

नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, दिल्ली जैसे छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए भी अरविंद केजरीवाल की तुलना नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से होती रही है

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से तुलना

दिल्ली विधानसभा के लिए अगर समय पर चुनाव हुए तो अगले साल फ़रवरी में चुनाव होने हैं. हालांकि केजरीवाल नवंबर में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के साथ दिल्ली में भी चुनाव की मांग कर रहे हैं.

साल 2012 में आम आदमी पार्टी बनी और 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

तब अरविंद केजरीवाल दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़े थे.

राजनीति की शुरुआत में ही शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के उनके फ़ैसले ने कई लोगों को चौंका दिया था. माना जाता है कि कोई भी नेता जीत के लिहाज से आसान सीट को पसंद करता है.

शीला दीक्षित उस समय लगातार 15 साल से दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं और दिल्ली में उनकी पहचान एक बड़े कांग्रेसी नेता के तौर पर थी.

शरद गुप्ता कहते हैं, "केजरीवाल को यह पता है कि 'जायंट कीलर' यानी दिग्गज नेता को हराना कितना महत्वपूर्ण है. इस जीत के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी तुलना नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से होने लगी."

केजरीवाल ( फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल पहली बार कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे

कांग्रेस विरोध और फिर कांग्रेस का साथ

साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में 28 सीटों पर जीत मिली थी.

यहाँ केजरीवाल ने एक नया चौंकाने वाला फ़ैसला किया था, जब उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली की सरकार बनाई थी. उस वक़्त कांग्रेस के पास दिल्ली विधानसभा में 8 विधायक थे.

यह फ़ैसला इसलिए भी चौंकाने वाला था क्योंकि केजरीवाल के सियासत की नींव में कांग्रेस का विरोध था. कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के ख़िलाफ़ ही उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी.

हालाँकि उस वक़्त केजरीवाल ने 49 दिनों में ही दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था और कांग्रेस के समर्थन से बनी 'आप' की सरकार गिर गई थी.

इस इस्तीफ़े के बाद अरविंद केजरीवाल पर बीजेपी ने भी निशाना साधा था और उन्हें कांग्रेस की आलोचना का शिकार भी होना पड़ा था.

केजरीवाल और शीला दीक्षित (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को हराकर केजरीवाल ने बड़ी सुर्खियां बरोरी थीं

'जायंट कीलर' बनने की कोशिश

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अरविंद केजरीवाल ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बनारस से नरेंद्र मोदी को चुनौती दी थी.

आम आदमी पार्टी ने उन चुनावों में कुल 432 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें 413 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की ज़मानत जब्त हो गई थी. आप को केवल चार लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी.

केजरीवाल को ख़ुद भी उस चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा था.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'जायंट कीलर' बनकर शीला दीक्षित जैसी दिग्गज कांग्रेसी नेता को हराने का जो दांव खेला था, वह बनारस में नाकाम हो गया.

हालाँकि उस वक़्त केजरीवाल को बिल्कुल नई जगह और नई पार्टी का उम्मीदवार होने के बाद भी दो लाख से ज़्यादा वोट मिले थे. केजरीवाल को बीएसपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों से भी ज़्यादा वोट मिला था और वो दूसरे नंबर पर रहे थे.

माना जाता है कि इस हार के बाद केजरीवाल ने दिल्ली में नए सिरे से अपनी सियासी ज़मीन तैयार करनी शुरू की.

एक तरफ़ दिल्ली में नई बनी मोदी सरकार थी, दूसरी तरफ़ केजरीवाल मीडिया के कैमरे और सुर्खियों से दूर दिल्ली के गली मोहल्लों में लोगों के बीच जाकर संपर्क कर रहे थे.

इसका फ़ायदा आम आदमी पार्टी को साल 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिला और उसने राज्य की 70 में से 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को लेकर आम आदमी पार्टी में बड़ा विवाद देखने को मिला था

'आप' नहीं, 'मैं' की सियासत

अरविंद केजरीवाल अपनी सियासत की शुरुआत में अहम फ़ैसले लेने से पहले जनता की राय लेने की बात करते थे. यहां तक कि उन्होंने शुरू में अपने उम्मीदवारों के चयन में भी इसका पालन किया था.

लेकिन पार्टी में धीरे-धीरे अन्य नेताओं की जगह केजरीवाल का दबदबा बढ़ता चला गया और पार्टी के कई नेता दूर होते चले गए.

इस फेहरिस्त में योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार और कुमार विश्वास जैसे नेताओं के नाम अहम हैं. इन सभी को आम आदमी पार्टी की स्थापना के समय से ही पार्टी का बड़ा चेहरा माना जाता था.

उस वक़्त बड़े नेताओं के पार्टी से बाहर होने के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर भी सवाल खड़े किए जा रहे थे.

लेकिन केजरीवाल ने न केवल दिल्ली में दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई बल्कि पंजाब में भी अपनी सरकार बना ली और अब आम आदमी पार्टी को भारत की एक 'नेशलन पार्टी' का दर्जा हासिल है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, "आतिशी पढ़ी-लिखी और समझदार हैं. उनकी अपनी महत्वाकांक्षा नज़र नहीं आती है. उन्होंने दिल्ली की शिक्षा और स्वास्थ्य नीति पर बहुत काम किया है. उनकी छवि भी साफ़ है. इसलिए उनसे लड़ा नहीं जा सकता."

प्रमोद जोशी मानते हैं कि आतिशी के मुख्यमंत्री बनने से बिहार में जीतन राम मांझी या झांरखंड में चंपाई सोरेन जैसी घटना होने की आशंका नहीं है.

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