अरविंद नेताम का इस्तीफा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए कितना बड़ा झटका

अरविंद नेताम

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम ने अंततः पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है.

अरविंद नेताम के पार्टी छोड़ने की अटकलें लंबे समय से लगाई जा रही थीं.

उन्होंने बुधवार को विश्व आदिवासी दिवस के दिन कांग्रेस से इस्तीफ़े की घोषणा की.

इंदिरा गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री रह चुके, पांच बार के सांसद 80 साल के अरविंद नेताम ने ऐसे समय में इस्तीफ़ा दिया है, जब राज्य में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं.

अरविंद नेताम ने बीबीसी से कहा, "पिछले पौने पांच सालों में कांग्रेस पार्टी ने मुझे हाशिये पर रखा. जब मर्ज़ी तब बुलाया, जब मर्ज़ी तब दुत्कार दिया. कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में भी आदिवासी हितों की उपेक्षा लगातार जारी रही. पेसा कानून को तहस-नहस कर दिया गया. यही कारण है कि मैंने पार्टी की जगह समाज के लिए काम करना शुरू किया. मुझे कांग्रेस पार्टी ने नोटिस जारी किया, मैंने जवाब दिया तो पार्टी चुप्पी साध गई."

अरविंद नेताम

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नेताम के कांग्रेस पर आरोप

किसी दूसरे दल में जाने की अटकलों को पूरी तरह खारिज़ करते हुए अरविंद नेताम ने कहा कि वे मूलतः सामाजिक कार्यकर्ता हैं, इसके बाद कांग्रेसी या राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.

अरविंद नेताम ने आरोप लगाया, "एडसमेटा, सारकेगुड़ा जैसी फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट को इस सरकार ने विधानसभा में पेश किया. लेकिन कई दर्जन आदिवासियों को माओवादी बता कर की गई हत्या के मामले में आज तक एक एफआईआर भी दर्ज नहीं की गई."

उन्होंने कहा, "हमारी पुरखों ने अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए बेईमान सरकारों से लड़ाई लड़ी थी. बिरसा मुंडा से लेकर सिद्धू कान्हू और गुंडाधूर तक हमारे संघर्ष का इतिहास रहा है. यह लड़ाई अब भी जारी है."

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कांग्रेस की सफ़ाई

अरविंद नेताम के कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़े की ख़बरों के बीच प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि आदिवासी समाज कांग्रेस पार्टी की सरकार से ख़ुश है.

पत्रकारों से बातचीत में दीपक बैज ने कहा, "हर व्यक्ति को संतुष्ट कर पाना, खास कर राजनीतिक व्यक्ति को संतुष्ट कर पाना, मैं समझता हूं, संभव नहीं है. लेकिन आदिवासी समाज और आदिवासी वर्ग, हमारी सरकार से बहुत खुश है."

इधर, अरविंद नेताम के कांग्रेस पार्टी छोड़ने को विपक्षी दल भाजपा ने कांग्रेस के लिए एक 'बड़ा झटका' करार दिया है.

इसी साल मई में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता नंद कुमार साय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे.

नंद कुमार साय राज्य के उत्तरी हिस्से सरगुजा संभाग से आते हैं, तो अरविंद नेताम की राजनीतिक ज़मीन राज्य का दक्षिणी हिस्सा बस्तर रहा है.

भाजपा नेता नारायण चंदेल

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भाजपा की प्रतिक्रिया

भाजपा नेता नारायण चंदेल का कहना है कि नंद कुमार साय के कांग्रेस में जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उनके साथ भाजपा का कोई भी व्यक्ति कांग्रेस में नहीं गया.

लेकिन अरविंद नेताम जैसे बड़े जनाधार वाले नेता के कांग्रेस छोड़ने का राज्य की आदिवासी सीटों पर बड़ा प्रभाव होगा.

नारायण चंदेल ने बीबीसी से कहा, "अरविंद नेताम जैसे विनम्र, अनुभवी और वरिष्ठ नेता को कांग्रेस नहीं संभाल पाई तो मान कर चलिए कि कांग्रेस सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. अरविंद नेताम का पार्टी छोड़ना तो सिलसिले की शुरुआत है. चुनाव तक बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ेंगे."

मध्य भारत के जिन थोड़े से आदिवासी नेताओं ने केंद्र की राजनीति में अपनी धमक बनाई, उनमें एक नाम अरविंद नेताम का है.

21 मई 1942 को बस्तर में जन्मे अरविंद नेताम किशोरावस्था से ही आदिवासी समाज की गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं.

इंदिरा गांधी के साथ अरविंद नेताम

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इंदिरा कैबिनेट में बनाई जगह

एमए और एलएलबी के अलावा लंदन से पर्यावरण का सर्टिफिकेट कोर्स करने वाले अरविंद नेताम ने 29 साल की उम्र में अपना पहला चुनाव बस्तर की कांकेर लोकसभा सीट से लड़ा था.

पांचवीं लोकसभा के लिए 1971 में हुए इस चुनाव में अरविंद नेताम अपने एकमात्र प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनसंघ के बृजलाल सिंह बारसाय को हराकर संसद में पहुंचे.

तत्कालीन इंदिरा गांधी ने तब युवा नेताम को अपने मंत्रिमंडल में जगह दे दी. उस समय अरविंद नेताम को केंद्र सरकार में शिक्षा और समाज कल्याण और संस्कृति विभाग का उपमंत्री बनाया गया.

1980, 1984, 1989 और 1991 में भी अरविंद नेताम, कांकेर से सांसद चुने गये और अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष समेत पार्टी में कई जिम्मेदारियां संभालीं.

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नरसिम्हा राव सरकार में भी रहे मंत्री

1993 से 1996 तक वे पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में अरविंद नेताम कृषि राज्य मंत्री भी रहे.

ये वही दौर था, जब 1993 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष और पर्यवेक्षक सीताराम केसरी ने चुनाव जीतने पर राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी.

अरविंद नेताम, अजीत जोगी और दिलीप सिंह भूरिया जैसे नेता पहले से ही राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग करते रहे थे.

अरविंद नेताम

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इमेज कैप्शन, अरविंद नेताम ने 29 साल की उम्र में अपना पहला चुनाव बस्तर की कांकेर लोकसभा सीट से लड़ा था

हवाला कांड में आरोप

1991 के बहुचर्चित हवाला कांड में अलग-अलग राजनीतिक दलों के जिन नेताओं का नाम चर्चा में आया, उनमें एक नाम अरविंद नेताम का भी था.

हवाला कांड को कारण बताते हुए 1996 में कांग्रेस पार्टी ने नेताम की जगह उनकी पत्नी छबिला नेताम को टिकट दी और छबिला नेताम ने भी जीत हासिल की.

इस बीच अरविंद नेताम के छोटे भाई और मध्य प्रदेश सरकार में वन मंत्री, शिव नेताम का नाम बस्तर में पेड़ कटाई से जुड़े 'मालिक मकबूजा कांड' में आया.

हवाला कांड के बाद 'मालिक मकबूजा कांड' में शिव नेताम की कथित संलिप्तता के आरोप के बाद पार्टी के भीतर ही नेताम परिवार को लेकर विवाद बढ़ता गया.

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बसपा में भी हो चुके हैं शामिल

1997 में आंबेडकर जयंती के दिन अरविंद नेताम ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी.

कांग्रेस छोड़ कर बहुजन समाज पार्टी में शामिल होने के बाद कहा था, "जिन लोगों ने मुझे अपमानित किया है, उनके ख़िलाफ़ लड़ने का अधिकार मुझे है."

बसपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए अरविंद नेताम 1998 में फिर कांकेर से चुनाव मैदान में उतरे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

इस सीट पर भाजपा के सोहन पोटाई जीत कर आए.

बाद में इन्हीं सोहन पोटाई के साथ मिल कर अरविंद नेताम ने सर्व आदिवासी समाज की कमान संभाली और 2017 में 'जय छत्तीसगढ़ पार्टी' भी बनाई.

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इमेज कैप्शन, 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के समय अरविंद नेताम (तस्वीर में सबसे बाएं) ने यूपीए के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी की जगह आदिवासी नेता पीए संगमा को समर्थन दिया था

जारी रहा अंदर बाहर जाने का दौर

चुनावी हार के बाद 1998 में अरविंद नेताम की घर वापसी हुई. दो साल बाद छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना लेकिन अरविंद नेताम हाशिए पर रहे.

15 अक्टूबर, 2003 को अरविंद नेताम ने कांग्रेस पार्टी छोड़ कर एनसीपी का दामन थाम लिया. लेकिन चार महीने में ही उनका एनसीपी से मोहभंग हो गया.

7 फरवरी, 2004 को अरविंद नेताम भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए लेकिन यहां भी उनका मन नहीं माना. अंततः 21 सितंबर, 2007 को वे फिर से कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए.

2012 में राष्ट्रपति चुनाव के समय उन्होंने यूपीए के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी की जगह आदिवासी नेता पीए संगमा को समर्थन दिया था.

नेताम ने तब कहा था, "हम आदिवासी राष्ट्रपति के पक्ष में हैं. हमने कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने के लिए संसद के सेंट्रल हॉल में तीन दिनों तक प्रतीक्षा की. लेकिन हमें समय नहीं दिया गया और अंततः हमने पीए संगमा को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया है."

अरविंद नेताम और पीए संगमा ने आदिवासियों के हक़ और अधिकार का हवाला देते हुए 'नेशनल पीपुल्स पार्टी' बनाई

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इमेज कैप्शन, अरविंद नेताम और पीए संगमा ने आदिवासियों के हक़ और अधिकार का हवाला देते हुए 'नेशनल पीपुल्स पार्टी' बनाई

कांग्रेस से निलंबन

28 जून 2012 को कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया.

अरविंद नेताम और पीए संगमा ने आदिवासियों के हक़ और अधिकार का हवाला देते हुए 'नेशनल पीपुल्स पार्टी' बनाई.

संगमा इस पार्टी के अध्यक्ष बने और नेताम कार्यकारी अध्यक्ष.

इसके बाद धीरे-धीरे अरविंद नेताम ने खुद को आदिवासी समाज के कामकाज तक समेट लिया.

17 मई, 2018 को राहुल गांधी ने फिर से अरविंद नेताम को कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाई.

बस्तर के इलाके में पार्टी 12 में से 11 सीटें जीतने में सफल रही.

भूपेश बघेल

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अरविंद नेताम का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो उन्हें किनारे कर दिया गया.

अरविंद नेताम फिर से सर्व आदिवासी समाज की गतिविधियों में लौट गए.

राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद आदिवासी मुद्दों पर अरविंद नेताम और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तनातनी सामने आने लगी.

बैलाडीला में आयरन ओर की खदानों के लिए ग्राम सभा की अनदेखी से लेकर हसदेव अरण्य में पेसा क़ानून को किनारे कर के कोयला खदान दिए जाने के मामले पर अरविंद नेताम के मतभेद सार्वजनिक हो चुके थे.

वीडियो कैप्शन, पिछले एक साल से नक्सल प्रभावित सुकमा में चल रहा है बस्तर के आदिवासियों का आंदोलन.

आदिवासी इलाकों में नाराज़गी और 'नोटा'

भाजपा विधायक नारायण चंदेल का दावा है कि राज्य की 90 में से आदिवासियों के लिए आरक्षित 29 सीटों पर सर्व आदिवासी समाज के उम्मीदवार अगर खड़े होंगे तो कांग्रेस पार्टी मुश्किल में आ जाएगी. अभी 29 में से 26 सीटों पर कांग्रेस पार्टी का कब्ज़ा है.

नारायण चंदेल कहते हैं, "आदिवासी इलाकों में कांग्रेस से भारी नाराजगी है. जिन आदिवासियों ने धोखे में आ कर पिछले चुनाव में कांग्रेस को वोट किया था, वे इस बार कांग्रेस को हराने के लिए तैयार बैठे हैं."

नारायण चंदेल का दावा अपनी जगह है.

लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में 90 में से 14 सीटों पर नोटा तीसरे स्थान पर था और 90 में से कम से कम 9 सीटो पर स्वतंत्र उम्मीदवारों ने वोट काट कर कांग्रेस, भाजपा और बसपा के लिए मुश्किल पैदा की थी.

इतना तो तय है कि तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में सर्व आदिवासी समाज की उपस्थिति, इस बार कई सीटों पर चौंकाने वाला परिणाम दे सकती है.

वीडियो कैप्शन, छत्तीसगढ़ में 'राम वन गमन पथ' के ज़रिए क्या 'सॉफ्ट-हिंदुत्व' की राजनीति कर रही है कांग्रेस

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