गोधन न्याय योजना में 'अन्याय' के आरोप, क्या है पूरा मामला

गोधन न्याय योजना

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
लाल लाइन

छत्तीसगढ़ सरकार की गोबर खरीद योजना विवाद में

विपक्ष ने कहा, योजना भ्रष्टाचार का शिकार हो रही है

गोबर खरीद के आंकड़ों में अंतर की वजह से उठे सवाल

लेकिन सरकार कह रही है इस तरह के आरोप हास्यास्पद

सरकार कहना है इसका सबसे ज़्यादा लाभ महिलाओं को

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छत्तीसगढ़ सरकार का दावा -1

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के जोबी गांव की रहने वाली लक्ष्मणी राठिया का दावा है कि उनकी महिला स्वसहायता समूह ने गोबर खरीदने के बाद उससे कंपोस्ट खाद बना कर 2 लाख 15 हज़ार रुपये कमाए.

लक्ष्मणी राठिया ने एक आयोजन में राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बताया कि इससे मिले पैसे से उन्होंने दसवीं और बारहवीं में पढ़ने वाले अपने बच्चों के लिए कंप्यूटर ख़रीदा है.

लक्ष्मणी कहती हैं, "इस गोबर के कारण मेरे बच्चे अब ठीक से पढ़ाई कर पाएंगे."

लक्ष्मणी राठिया राज्य के उन सैकड़ों लोगों में शुमार हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि राज्य सरकार की 'गोधन न्याय योजना' ने उनकी ज़िंदगी बदल दी.

पिछले दो सालों से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यक्रमों में ऐसे लोगों को गांवों से बुलाया जाता है और वे अपनी सफलता की कहानी बताते हैं.

किसी ने गोबर बेच कर स्कूटी ख़रीदी तो किसी ने ट्रैक्टर. किसी ने इसी गोबर को बेच कर बेटियों का ब्याह किया तो किसी की आजीविका ही इस गोबर से चल रही है.

छत्तीसगढ़ सरकार का दावा - 2

गोबर खरीद के मामले में आदर्श माने जाने वाले बिलासपुर ज़िले में इस साल सितंबर के पहले सप्ताह के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि गोबर बेचने के लिए पंजीकृत 10,696 किसानों में से केवल 353 किसानों ने ही गोबर बेचने में दिलचस्पी दिखाई.

अधिकारियों ने दावा किया कि बारिश के कारण गोबर बेचने वाले किसानों की संख्या कम हो गई. लेकिन पड़ोसी ज़िले कोरबा में इसी सितंबर महीने में पिछले दो सालों में सर्वाधिक गोबर की खरीद हुई.

राज्य में वार्षिक गोबर ख़रीद के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि शुरुआती साल की तुलना में गोबर की ख़रीद में भारी गिरावट आई है.

20 जुलाई 2020 में जब यह योजना शुरू हुई थी, तब गोबर ख़रीदने के केंद्र भी गिने-चुने थे. लेकिन जैसे-जैसे गोबर ख़रीद केंद्र बढ़ते गए, गोबर की खरीद कम होती चली गई.

20 जुलाई 2020 से 31 मार्च 2021 तक के 254 दिनों में, राज्य में लगभग 45 लाख क्विंटल गोबर खरीद हुई. यानी इस दौरान प्रति दिन औसत 18 हजार क्विंटल गोबर की खरीद हुई.

लेकिन अगले साल गोबर की खरीद का यह आंकड़ा बढ़ने के बजाय, एक तिहाई से भी कम हो गया.

1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2022 तक, 364 दिनों के आंकड़े बताते हैं कि गोबर ख़रीद का आंकड़ा घट कर लगभग 21 लाख क्विंटल पर लुढ़क गया. यानी इस साल प्रति दिन औसत 5 हजार क्विंटल गोबर की ही ख़रीद हुई.

दोनों दावे सरकार के ही हैं. लेकिन दोनों में परस्पर विरोधाभास है. इनके बीच के अंतर को समझने के लिए पहले इस योजना को समझने की ज़रूरत है.

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असल में 20 जुलाई 2020 से छत्तीसगढ़ सरकार ने 'गोधन न्याय योजना' की शुरुआत करते हुए दो रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से गोबर खरीदना शुरू किया है.

इस गोबर से स्वसहायता समूह की महिलाएं 10 रुपये प्रति किलो में जैविक खाद और दूसरे उत्पाद बना कर बेचती हैं.

छत्तीसगढ़ में 20वीं पशु गणना के अनुसार, 99.84 लाख गोवंशीय पशु और 11.75 लाख भैंस हैं.

ऐसे में 'गोधन न्याय योजना' की जब शुरुआत हुई तो महीनों तक राज्य में केवल गोबर और जैविक खाद की ही चर्चा होती रही. राज्य सरकार ने भी इसे अपनी महत्वाकांक्षी योजना की तरह विस्तारित किया और इसका असर भी हुआ.

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केंद्र को भी ऐसी योजना चलाने की सलाह

पिछले साल लोकसभा में कृषि की स्थायी समिति ने केंद्र सरकार को छत्तीसगढ़ की 'गोधन न्याय योजना' की तरह गोबर खरीदने की कोई योजना बनाने का सुझाव दिया.

दूसरी ओर पड़ोसी राज्य झारखंड और मध्य प्रदेश समेत आठ राज्यों ने छत्तीसगढ़ की देखा-देखी गोबर खरीद योजना पर काम भी शुरू कर दिया.

सरकार का दावा है कि इस योजना से 2 लाख 89 हज़ार से अधिक ग्रामीण और पशुपालक किसानों को लाभ हो रहा है.

इसी तरह गोबर खरीद कर खाद व अन्य उत्पाद बनाने के काम में 11,187 महिला स्वसहायता समूह सीधे जुड़े हैं जिनसे 83,874 महिलाएं जुड़ी हुई हैं.

'गोधन न्याय योजना' से कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव का दावा करने वाले राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का मानना है कि पिछले दो सालों में दूध नहीं देने वाली गायों को भी लावारिस छोड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगी है. इसके अलावा राज्य में जैविक खेती को भी बढ़ावा मिला है.

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भ्रष्टाचार के आरोप

लेकिन विपक्ष के आरोप कुछ और हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता डॉक्टर रमन सिंह इस पूरी योजना को ही एक बड़ा भ्रष्टाचार बताते हैं. उनका आरोप है कि इस योजना में किसानों और ग़रीबों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है.

डॉक्टर रमन सिंह ने बीबीसी से कहा, "यह योजना केवल डेयरी चलाने वालों को लाभ पहुंचाने की योजना है. राज्य में आज भी ज़्यादातर इलाकों में गोबर खरीदने के गौठान ही नहीं बने. अगर गौठान बन गए तो वहां गोबर खरीद की व्यवस्था नहीं है. सारा काम काग़ज़ों में चल रहा है.''

उन्होंने कहा, '' डेयरी वालों की गोबर खरीद से बनने वाले खाद का कोई ख़रीदार नहीं है. गुणवत्ताहीन कंपोस्ट खाद ज़बर्दस्ती किसानों को लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है. यह भ्रष्टाचार की योजना है."

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कांग्रेस ने कहा, आरोप मनगढ़ंत

दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला भ्रष्टाचार के आरोप को मनगढ़ंत बताते हैं. उनका कहना है कि इस तरह के आरोप केवल राजनीति से प्रेरित हैं.

लेकिन इसी साल जुलाई में विधानसभा में गोबर खरीद और कंपोस्ट खाद बनाने के जो आंकड़े पेश किए गए हैं, उनमें भी भारी विरोधाभास है.

गरियाबंद ज़िले में 2021-22 में लगभग 52 हज़ार क्विंटल गोबर की खरीद हुई, लेकिन दावा किया गया कि खाद बनाने के लिए 78 हज़ार क्विंटल गोबर का उपयोग किया गया है.

उसी तरह से सूरजपुर ज़िले में 22 हजार क्विंटल गोबर की खरीद हुई, लेकिन खाद निर्माण के लिए 69 हज़ार गोबर के उपयोग के आंकड़े काग़ज़ों में दर्ज हैं. ऐसे ही आंकड़े कुछ और इलाकों से भी आए हैं.

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कांग्रेस ने कहा, सबसे ज़्यादाफ़ायदा महिलाओं को

हमने इस संबंध में राज्य सरकार के प्रवक्ता और कृषि मंत्री रविंद्र चौबे से भी संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.

हालांकि कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला गोबर खरीद में गड़बड़ियों के आरोप को हास्यास्पद बताते हैं.

सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं कि जब सरकार ने गोबर खरीद में महज़ 90 करोड़ रुपये का भुगतान किया था, तब भाजपा नेता और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इस योजना में पांच हज़ार करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया था.

सुशील आनंद शुक्ला ने बीबीसी से कहा," हमारी इस योजना ने गांव के उन बेसहारा लोगों की मदद की है जिनके पास आय का कोई साधन नहीं था. आज ग़रीब भूमिहीन मज़दूर गोबर इकट्ठा कर के रोज़गार पा रहे हैं.''

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वो कहते हैं, ''गोबर बेचने वाली 47 फ़ीसदी महिलाएं हैं यानी यह महिलाओं को भी आर्थिक संबल प्रदान कर रहा है. गोधन न्याय योजना और किसान न्याय योजना ने गांव की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम किया है."

कांग्रेस प्रवक्ता के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन इतना तो तय है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में गोबर खरीद योजना की सफलता और विफलता के आंकड़े ग्रामीण इलाकों में बहस के केंद्र में रहेंगे.

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